अध्याय 3 / 30
वापसी का सौदा
राख से उठी द्वारा Avni Oberoi
अगली सुबह अमारा छह साल बाद पहली बार उसी अहूजा हवेली की देहरी लाँघती है जहाँ से उसे बारिश में फेंका गया था, और अपनी असली शर्त रखती है, कि हुमा क़र्ज़ तभी पुनर्गठित करेगी जब घर से रूठ कर गया इकलौता ईमानदार बेटा कबीर वापस बुला कर रोशनी हाइट्स का सिर बनाया जाए। माजी बेबस हो कर मान जाती हैं, और किसी को नहीं पता कि अमारा अपने उस अकेले पुराने हमदर्द को घर खींच रही है जिसने कभी तारा पर यक़ीन किया था। रतन चाचा ऑडिट को हर मोड़ पर धुंध में टालते हैं, और उस रात अपने आदमी को फ़ोन कर के कहते हैं कि ये औरत बहुत पुराने सवाल पूछती है, और ज़रूरत पड़ी तो जैसे एक बहू ट्रेन के साथ ग़ायब हुई थी, वैसे एक लेनदार भी ग
रात के ग्यारह से सुबह के पाँच तक वो काग़ज़ अमारा के हाथ से नहीं छूटा। एक अधिकार-पत्र, एक जाली दस्तख़त, और उस पर छह साल से मरी हुई एक औरत का नाम। तारा अहूजा।
"तुमने मुझे मारा, फिर मेरे नाम को भी नहीं बख़्शा। ... हर चोरी मेरे मुर्दा हाथ से करवाई। कितनी बार मारोगे मुझे? मैं हर बार राख से उठ आऊँगी।"
पर सुबह की उस ठंडी रोशनी में एक बात साफ़ थी। बेला ने ठीक कहा था, जो आदमी ये कर रहा था वो चोर नहीं, कारीगर था। बाहर से, सिर्फ़ बहीखातों को देख कर, उसे पकड़ना नामुमकिन था।
और अकेला ऑडिट काफ़ी नहीं था। रतन उसे सालों घुमा सकता था, एक एक पन्ना खोता हुआ। अमारा को इस घर के अंदर एक ईमानदार हाथ चाहिए था, जो बिना जाने वो धागे खींच दे जिन्हें रतन ने बरसों से छुपा रखा था।
"एक ईमानदार अहूजा। ... इस पूरे ख़ानदान में एक ही तो था।"
और उस एक नाम पर अमारा का दिल रुक गया। कबीर। समर का छोटा भाई। वो अकेला, जो उस रात चीख़ा था कि तारा चोर नहीं हो सकती। और जो बाद में यही कह कर चला गया, कि जो घर एक बेगुनाह बहू को बारिश में फेंक दे, उसकी देहरी पर वो दुबारा क़दम नहीं रखेगा।
"छह साल में सिर्फ़ एक आवाज़ थी, कबीर, जिसने मुझ पर यक़ीन किया था। ... आज मुझे उसी आवाज़ को उसी घर में बुलाना है, जिससे वो नफ़रत करता है। माफ़ करना। मैं तुम्हें फिर उसी आग में खींच रही हूँ। पर इस बार तुम अकेले नहीं जलोगे।"
"मम्मा... आप फिर सारी रात नहीं सोईं। ... आँखें बता रही हैं। लाल हैं।"
"अरे, मेरा जासूस उठ भी गया। ... बस थोड़ा काम था, राजा। तू सो जा।"
"बेला आंटी कहती हैं आप बहुत लोगों का पैसा वापस लाती हैं। ... तो मेरी साइकिल का पैसा भी वापस ला दो ना। रोहन ने उधार लिया था, लौटाया नहीं।"
"ज़रूर लाऊँगी। ... रोहन का नाम लिस्ट में सबसे ऊपर लिख लिया है। पूरे ब्याज के साथ।"
"और पापा को भी उसी लिस्ट में लिख लो ना, मम्मा। ... वो तो सबसे पुराना उधार है। पूरे पाँच साल हो गए, अभी तक नहीं आए।"
अमारा के सीने में कुछ टूटा। वो बच्चा नहीं जानता था कि उसका सबसे पुराना उधार आज उसी हवेली में बैठा था, जहाँ उसकी माँ को चोर कह कर फेंका गया था। उसने आरव को कंबल में लपेटा, माथे पर बोसा दिया, और उसके सो जाने तक बाल सहलाती रही।
"सो जा, मेरे राजा। ... तेरा हर उधार वसूल होगा। और तेरे पापा वाला सबसे आख़िर में। पूरे ब्याज के साथ।"
और उस सुबह अमारा ने फ़ैसला कर लिया। कबीर अहूजा वापस आएगा। उसका इकलौता दोस्त, जिसे वो ख़ुद बुला रही थी, और उसे भनक तक नहीं होगी कि वो किसके लिए लौट रहा है।
उसी सुबह, अहूजा हवेली। वो संगमरमर की इमारत, बाहर से चमकती, अंदर से क़र्ज़ में धँसती। आँगन में नौकर झाड़-पोंछ में जुटे थे, और बीचोंबीच खड़ी माजी हर किसी पर बरस रही थीं।
"वो चाँदी के दीये आगे रखो, पीतल के नहीं! ... और ये मुरझाए फूल कौन रख गया? हुमा की मालकिन आ रही है, कोई भिखारन नहीं! हर चीज़ ऐसे चमके, जैसे हमें किसी के पैसे की ज़रूरत ही ना हो।"
यही इस घर का सबसे पुराना हुनर था। ऊपर की हर चीज़ चमकाना, और नीचे की सड़ांध को उसी चमक के नीचे दफ़ना देना। बहू भी इसी तरह दफ़नाई गई थी, एक झूठी मुस्कान के नीचे।
"इतनी भागदौड़ किसलिए, भाभी? ... घबराइए मत, मुस्कुराइए। जो क़र्ज़ देता है, वो घबराए घर से डरता है, और चैन वाले घर पर भरोसा करता है।"
"चैन? किस बात का चैन, रतन? कल इस औरत ने पूरे दस साल का ऑडिट माँग लिया। तुम जानते हो, उन दस सालों में क्या क्या दफ़न है इन बहीखातों में।"
"मैं ही तो जानता हूँ, भाभी। इसीलिए कहता हूँ, घबराने की ज़रूरत नहीं। ... पुराने काग़ज़ की अपनी रफ़्तार होती है। कौन सा पन्ना कब मिलेगा, ये मैं तय करूँगा। ऑडिट होगा ज़रूर, बस इतने आराम से कि उसकी उम्र निकल जाए, और मेरा एक बाल भी बाँका ना हो।"
रतन मुस्कुराए, और उनकी उँगलियाँ मेज़ पर हौले हौले थाप देने लगीं। एक... दो... तीन। हुमा के हर ऑडिटर को कोई ना कोई पन्ना 'फ़िलहाल नहीं मिल रहा' था, कोई साल 'दीमक खा गई' थी। रतन दीवार नहीं, धुंध बनते थे, जिसमें से गुज़रो तो हाथ कुछ ना आए।
"तुम्हारे ही भरोसे ये घर चल रहा है, रतन। ... समर से तो अब कुछ होता नहीं। दिन भर उस अजनबी औरत के ख़यालों में खोया रहता है। पता नहीं क्या जादू कर गई है ये अमारा।"
"हाँ... वो औरत। ... उसमें कुछ है, भाभी। जिस तरह वो देखती है, जैसे इस घर का हर कोना उसे पहले से पता हो। जैसे कोई खोई चीज़ ढूँढ नहीं रही, पहचान रही हो।"
बाहर, हुमा की काली गाड़ी फाटक में मुड़ी। पिछली सीट पर बेला ने एक फ़ाइल बढ़ाई और धीरे से कहा, कि हर ऑडिटर किसी दीवार से टकरा कर लौट रहा है। अमारा ने सिर्फ़ इतना कहा, कि धुंध को दीवार की नहीं, एक हवा की ज़रूरत होती है। और वो हवा आज वो ख़ुद ले कर आई थी।
और फिर हवेली का बड़ा दरवाज़ा खुला, और अमारा अंदर आई। छह साल बाद, पहली बार। उसी देहरी पर, जहाँ से एक बरसाती रात दो नौकरों ने उसे बाहर धकेला था, आज वो अपने पैरों पर, सिर उठाए, अंदर दाख़िल हुई।
उसके क़दम एक पल को उसी देहरी पर ठिठके। पैरों के नीचे वही ठंडा संगमरमर था। कानों में अब भी वही दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ थी। अमारा का चेहरा पत्थर रहा, पर आँचल के नीचे मुट्ठियाँ भिंच गईं। उसने उस देहरी को यूँ पार किया, जैसे कोई अपनी ही क़ब्र के ऊपर से गुज़रता है।
"अमारा जी! आइए, आइए। हमारे इस पुराने घर में आपके क़दम पड़े, ये हमारा सौभाग्य है। ... हवेली भले पुरानी हो, इसकी शान आज भी वैसी है। अहूजा कभी किसी के आगे छोटे नहीं हुए।"
"शान... हाँ, माजी। शान अब भी है। बस उसके नीचे की नींव थोड़ी खोखली हो गई है। ... फ़िक्र मत कीजिए, मैं नींव देखने ही आई हूँ। ऊपर की चमक तो मुझे कब की दिख चुकी।"
बैठक में ऑडिट के काग़ज़ात तैयार रखे थे, समर के दस्तख़त उन पर हो चुके थे, ठीक वैसे जैसे कल रात अमारा ने कहा था। माजी ने वो काग़ज़ अदब से आगे बढ़ाए, जैसे कोई भेंट चढ़ा रही हों। अमारा ने एक नज़र देखा, और फ़ाइल बंद कर दी।
"सब हो गया है, अमारा जी। जैसा आपने कहा। अब तो हुमा हमारा क़र्ज़ पुनर्गठित कर देगी ना? रोशनी हाइट्स को डूबने से बचा लेगी?"
"बचाएगी। ... पर हुमा एक और शर्त रखती है, माजी। और ये शर्त काग़ज़ पर नहीं। ये इस घर के ख़ून से जुड़ी है।"
"और... और शर्त? आप तो कहती थीं, ऑडिट आख़िरी शर्त है।"
"रोशनी हाइट्स डूब रहा है, माजी, क्योंकि उसे चलाने वाला कोई नहीं। हुमा अपना पैसा किसी बिन-कप्तान के जहाज़ में नहीं डालेगी। ... मुझे इस परियोजना का सिर वो आदमी चाहिए, जिसे इमारतें बनाना आता हो, और जिसके हाथ साफ़ हों। मुझे कबीर अहूजा चाहिए। वापस, इसी प्रोजेक्ट के सिर पर।"
कमरे में एक पल के लिए साँस रुक गई। माजी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। और कोने में रतन की वो उँगलियाँ, जो अब तक हौले हौले थाप दे रही थीं, अचानक रुक गईं। बिल्कुल रुक गईं। कबीर का नाम कमरे में यूँ गिरा, जैसे किसी ने बरसों बाद एक बंद खिड़की खोल दी हो।
"कबीर? ... नहीं। ये नहीं हो सकता, अमारा जी। कबीर ने इस घर से मुँह मोड़ लिया था। छह साल पहले वो अपनी सगी माँ को, अपने भाई को छोड़ कर चला गया। कह गया कि इस देहरी पर दुबारा क़दम नहीं रखेगा। आप किसी और को ले लीजिए, कोई भी अच्छा इंजीनियर..."
"माजी ठीक कहती हैं, अमारा जी। ... कबीर आर्किटेक्ट है, पत्थर और नक़्शों का आदमी। इतने बड़े हिसाब-किताब का बोझ वो नहीं सँभाल पाएगा। ये तो हिसाब जानने वालों का काम है। मुझ जैसे पुराने लोगों का।"
"हिसाब जानने वाले ही तो, चाचा जी, इस घर को यहाँ तक ले आए हैं। ... मुझे हिसाब जानने वाला नहीं, वो चाहिए जो हिसाब में हेरफेर करना नहीं जानता। इस घर में एक ही आदमी था, जिसने कभी झुक कर किसी झूठ पर दस्तख़त नहीं किए। जो एक बार सच के साथ खड़ा हुआ, चाहे उसकी क़ीमत उसका अपना घर ही क्यों ना रही हो। ... मुझे वही आदमी चाहिए।"
रतन की आँखें सिकुड़ीं। माजी हैरान थीं। इस औरत को, जो छह महीने पहले तक काग़ज़ों पर एक बेनाम कंपनी थी, कबीर के बारे में इतना कुछ कैसे पता था? उसकी ईमानदारी, उसका सच के साथ खड़ा होना, ये तो इस घर की चारदीवारी के अंदर की बातें थीं।
"आप... आप कबीर को इतना जानती हैं, अमारा जी? ... आपने तो उसे कभी देखा तक नहीं। फिर आपको कैसे पता कि उसने सच के लिए अपना घर तक छोड़ दिया?"
"हुमा हर उस चीज़ को जानती है, माजी, जिस पर उसका एक रुपया लगा हो। ... मैंने आपके पूरे ख़ानदान की एक एक साँस ख़रीद रखी है। मुझे हर चेहरे की क़ीमत पता है। किसने सच बोला, किसने झूठ, ... और किसने उस वक़्त सिर्फ़ खिड़की से बाहर देखा।"
"आप बहुत गहराई तक देखती हैं, अमारा जी। ... इतनी, कि कभी कभी लगता है, आपको हमारे क़र्ज़ से ज़्यादा हमारे अतीत में दिलचस्पी है। इतने पुराने सवाल... कोई लेनदार आम तौर पर नहीं पूछता।"
"मैं कोई आम लेनदार नहीं हूँ, चाचा जी। ... और शर्त, शर्त होती है। कबीर लौटेगा, और रोशनी हाइट्स का सिर बनेगा। वरना हुमा अपना हाथ खींच लेगी, और फिर ना ये हवेली बचेगी, ना ये शान, ना पुराने सवाल पूछने वाला कोई। ... डूबते लोग रस्सी के रंग पर बहस नहीं करते, माजी। पकड़ते हैं, या डूब जाते हैं।"
माजी की आँखें भर आईं, ग़ुस्से से या बेबसी से, कहना मुश्किल था। जिस बेटे को उन्होंने अपने घमंड में जाने दिया था, आज उसी को वापस बुलाने के लिए उन्हें एक अजनबी के आगे हाथ फैलाना था। ये उनकी सबसे बड़ी हार थी, और इसे मानने के सिवा कोई चारा नहीं।
"...ठीक है। ... मैं ख़ुद कबीर को फ़ोन करूँगी। पर वो नहीं आएगा, अमारा जी। उस लड़के की नफ़रत बहुत गहरी है। वो इस देहरी पर दुबारा क़दम नहीं रखेगा, चाहे कुछ हो जाए।"
"आएगा, माजी। ... आप बस उससे कहिएगा, कि इस घर में एक बहुत पुराना हिसाब बरसों से अधूरा पड़ा है, और उसे चुकाने का वक़्त आ गया है। ... कबीर जैसे लोग नफ़रत के बुलावे पर नहीं, अधूरे हिसाब के बुलावे पर आते हैं।"
और उस एक पल में अमारा बहुत हल्का सा मुस्कुराई। वो मुस्कान, जिसका असली मतलब उस कमरे में कोई नहीं समझा। माजी को लगा, ये किसी अमीर औरत की जीत की मुस्कान है। उन्हें नहीं पता था कि उस औरत ने अभी अभी इस घर में अपना इकलौता सिपाही बुला लिया था। वो अकेला, जो कभी उसके लिए खड़ा हुआ था, और जो लौटेगा, ये जाने बिना कि किसके लिए।
जाते हुए, दरवाज़े पर अमारा एक पल को फिर रुकी। उसी देहरी पर। उसने अपनी उँगलियाँ बहुत हौले से उस ठंडे संगमरमर पर फेरीं, जहाँ छह साल पहले एक रात उसका सब कुछ बिखर गया था।
"इस घर की हर देहरी मेरे लिए बंद हुई थी, कबीर। ... सिर्फ़ एक दरवाज़ा था, जो तुमने खुला रखा था। अब उसी एक खुले दरवाज़े से, मैं इस पूरे घर को गिराऊँगी।"
अमारा की गाड़ी फाटक से निकल गई, पर उसके सवाल दीवारों में टँगे रह गए। माजी अंदर चली गईं, कबीर को फ़ोन मिलाने के भारी बोझ के साथ। पर रतन वहीं खड़े रहे, खिड़की के पास, उस ख़ाली फाटक को देखते। और बरसों में पहली बार, उनके चेहरे से वो अवुंचल मुस्कान ग़ायब थी।
"किसने सच बोला, किसने झूठ... और किसने उस वक़्त सिर्फ़ खिड़की से बाहर देखा। ... ये औरत क़र्ज़ की बात नहीं कर रही थी। ये उस रात की बात कर रही थी। ... पर उस रात के बारे में सिर्फ़ दो लोग जानते हैं। एक मैं, और दूसरी वो, जो अब है ही नहीं।"
उस रात, हवेली के पिछले हिस्से के एक अँधेरे कमरे में, रतन ने एक नंबर मिलाया। वही नंबर, जो वो सिर्फ़ तब मिलाते थे, जब कोई मसला काग़ज़ से बड़ा हो जाता। दूसरी तरफ़ एक चपटी, ठंडी आवाज़ ने फ़ोन उठाया, और सिर्फ़ इतना पूछा, कि हुक्म क्या है।
"एक औरत है। हुमा कैपिटल वाली। अमारा। ... बहुत पुराने सवाल पूछ रही है। ऐसे सवाल, जिनके जवाब मैंने छह साल पहले एक ट्रेन के नीचे दफ़न कर दिए थे। ... उस पर नज़र रखो। हर क़दम पर। कहाँ जाती है, किससे मिलती है, और वो बच्चा किसका है जो उसके साथ रहता है। सब पता करो।"
दूसरी तरफ़ से उस चपटी आवाज़ ने कुछ पूछा। शायद ये, कि अगर वो औरत हद से आगे बढ़ गई तो? रतन एक पल चुप रहे। और फिर उनकी उँगलियाँ, उस अँधेरे में, मेज़ पर हौले हौले थाप देने लगीं। एक... दो... तीन।
"तो फिर वही होगा, जो इस ख़ानदान में हमेशा होता आया है। ... इस घर में जो मसला हद से बड़ा हो जाता है ना, वो रहता नहीं। ग़ायब हो जाता है। ... एक बहू ग़ायब हुई थी, एक ट्रेन के साथ। ज़रूरत पड़ी, तो एक लेनदार भी ग़ायब हो जाएगी। बस इस बार, पूरी तरह। कोई राख भी ना बचे।"
और उस अँधेरे में बैठा वो आदमी नहीं जानता था, कि जिस लेनदार को वो दुबारा ग़ायब करने की बात कर रहा था, वो कोई अजनबी नहीं थी। वो वही बहू थी, जिसे उसने छह साल पहले एक ट्रेन के नीचे ग़ायब किया था। जिस राख को वो हमेशा के लिए बुझा देना चाहता था, वो राख अब उसी की छत के नीचे, उसी की मेज़ पर बैठ कर, उसकी हर साँस गिन रही थी। ... और इस बार, ग़ायब होने की बारी किसी और की थी।
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