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Chapter 10 of 30

जो जानता था

राख से उठी by Avni Oberoi

उस अँधेरे बहीखाना कमरे में वक़्त जैसे साँस लेना भूल गया था। ... आरव कबीर की बाँहों में झूल रहा था, हवा में अभी भी उस अधूरी लोरी की गूँज तैर रही थी, और तारा का छह बरस पुराना पूरा क़िला अब बस एक धागे पर खड़ा था। ... उसे अपने बेटे को उन बाँहों से लेना था, और अपने चेहरे को एक बाल भर भी चटकने नहीं देना था।

"ये तो कोई बच्चा गलियारे में भटक गया लगता है... लाइए, मुझे दीजिए इसे।" ... "डरो मत, बेटा। ... इधर आओ, मेरे पास आओ।"

पर उस पाँच साल के बच्चे को कोई बहाना नहीं आता था। ... लालटेन की काँपती रौशनी में उसने अपनी माँ का चेहरा पहचाना, और कबीर की बाँहों को यूँ छोड़ दिया जैसे वो कभी थीं ही नहीं।

"मुम्मा!" ... "मिल गईं! ... मैंने कहा था ना, मैं आपको ढूँढ ही लूँगा!" ... "और मुम्मा, ये बड़ा सोने वाला घर बिल्कुल आपकी फ़ोटो जैसा है! ... बिल्कुल वैसा ही!"

और वो एक लफ़्ज़, 'मुम्मा', उस पत्थर के कमरे में यूँ गिरा जैसे संगमरमर पर सिक्का गिरता है। ... कबीर ने बच्चे को छोड़ दिया, और उसके चेहरे पर कुछ बहुत गहरे तक जम गया। ... उसने कुछ कहा नहीं, बस देखा। आरव को, फिर तारा को, फिर उन दोनों के बीच की उस ख़ाली हवा को।

"हाय राम, ये बच्चा! ... माडम, ये तो नीचे वाली आया का लड़का है, पूरा घर इसे ढूँढ रहा है इस अँधेरे में!" ... "चल बेटा, चल, तुझे तेरी आया के पास ले चलूँ..."

"आया का नहीं!" ... "मैं तो मुम्मा का बेटा हूँ! ... सबको पता होना चाहिए। ... मैं आरव हूँ, और मैं बहादुर हूँ।"

कबीर की नज़र उस बच्चे के चेहरे पर ठहर गई। ... वो माथा, वो ठोड़ी... कहीं देखी हुई, बहुत क़रीब की, पर याद के परदे के पीछे छिपी हुई। ... और कानों में अब भी वही लोरी, जो इस दुनिया में सिर्फ़ एक औरत गाती थी। ... एक पाँच साल का बच्चा। एक भाभी, छह बरस से 'मरी हुई'। एक लोरी। ... कबीर ने कुछ नहीं कहा, पर उस रात उसके अंदर एक चुपचाप गिनती शुरू हो गई।

"हाँ। ... ये मेरा बेटा है, मिस्टर अहूजा।" ... "मैं इसे आज साथ ले आई थी, और इस तूफ़ान में ये मुझसे बिछड़ गया। ... बस, इतनी सी बात है।" ... "बहुत रात हो गई है। मैं चलती हूँ।"

"बेटा।" ... "आपका बेटा।" ... "बहुत प्यारा है, अमारा जी। ... और बहुत... जाना-पहचाना।"

उसने इल्ज़ाम नहीं लगाया, सवाल नहीं किया, बस देखा। ... और तारा जानती थी कि इल्ज़ाम से लड़ा जा सकता है, पर इस ख़ामोश देखने का कोई तोड़ नहीं होता। ... वो आरव को सीने से लगाए, बिना पीछे मुड़े, उसी गलियारे से निकल गई जहाँ छह बरस पहले उसे घसीटा गया था। ... और पीछे, अँधेरे में खड़ा कबीर, अब भी गिन रहा था।

अगली सुबह तूफ़ान थम चुका था, और रोशनी हाइट्स की अधूरी इमारत धुले आसमान के नीचे किसी अधूरे सवाल की तरह खड़ी थी। ... अमारा फ़ाइलें ले कर साइट ऑफ़िस पहुँची, हर रोज़ की तरह ठंडी। ... पर आज कबीर की नज़रें बदली हुई थीं। वो नक़्शे देख रहा था, पर देख उसे रहा था।

"रोशनी हाइट्स का दूसरा फ़ेज़ अगले महीने से शुरू होगा, मिस्टर अहूजा।" ... "हुमा की शर्तें साफ़ हैं। इस बार मुझे हर ईंट का हिसाब चाहिए, एक-एक बोरी सीमेंट तक।"

"हिसाब।" ... "आपको हर चीज़ का हिसाब चाहिए होता है, है ना, अमारा जी? ... क़र्ज़ का, ईंटों का... बरसों का।" ... "कल रात आप बहुत जल्दी चली गईं। ... बच्चे को सीने से लगा कर।"

"बच्चा थका हुआ था, और डरा हुआ भी।" ... "और मुझे सुबह एक बोर्ड मीटिंग थी। ... इसमें कौन सा हिसाब बाक़ी रह गया, मिस्टर अहूजा?"

"एक बात पूछूँ, अमारा जी? ... थोड़ा निजी सवाल है।" ... "आपके बेटे के पिता... वो कहाँ हैं?"

वो सवाल, जिसके चारों तरफ़ तारा ने छह बरस से एक दीवार खड़ी कर रखी थी। ... समर का नाम अगर इस कमरे में गिर पड़ता, तो छह बरस की सारी मेहनत उसी वक़्त राख हो जाती।

"आरव के पिता मर चुके हैं, मिस्टर अहूजा।" ... "मेरे बेटे की दुनिया में कोई पिता नहीं है। ... सिर्फ़ एक माँ है, जो अकेले उसकी हर लड़ाई लड़ती है।" ... "और मुझे उम्मीद है, ये आपका आख़िरी निजी सवाल था।"

कबीर ने सिर हिलाया, और बात वहीं छोड़ दी। ... पर तारा ने देखा, उसने वो जवाब माना नहीं, बस कहीं अंदर, एक अधूरी एंट्री की तरह, अगली बार के लिए निशान लगा कर रख लिया।

"आप जानती हैं, अमारा जी, सबसे अजीब बात क्या है?" ... "मैं आपकी हर शर्त से चिढ़ता हूँ, और फिर भी... जब आप इस साइट पर नहीं होतीं, तो ये अधूरी इमारत और ज़्यादा अधूरी लगने लगती है।" ... "और कल रात से, एक लोरी मेरे सिर से नहीं उतर रही।"

तारा खिड़की की तरफ़ मुड़ गई, ताकि कबीर उसका चेहरा ना देख सके। ... छह बरस में पहली बार किसी मर्द की आवाज़ ने उसकी बर्फ़ में एक दरार डाल दी थी, और वो मर्द ठीक वही था जिसे उसका सच सबसे पहले पकड़ना था।

"आपको अपने काम पर ध्यान देना चाहिए, मिस्टर अहूजा। ... लोरियाँ इमारतें नहीं बनातीं।" ... "और मुझे देर हो रही है।"

उस शाम कबीर ने बात को यूँ ही मरने नहीं दिया। ... वो अमारा को हवेली के उसी पिछले आँगन में जा मिला, जहाँ कभी नीम के नीचे तारा भाभी बहीखाते ले कर बैठा करती थीं। ... वो जगह, वो नीम, और सामने खड़ी वो औरत... कबीर के अंदर की गिनती अब शोर करने लगी थी।

"मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ, अमारा जी।" ... "एक औरत थी, इस घर की सबसे छोटी बहू। वो हँसती थी, तो ये पत्थर का घर थोड़ा कम पत्थर लगने लगता था। और वो एक लोरी गाती थी, चाँद के टुकड़े वाली।" ... "फिर एक रात इस घर ने उसे चोर कह कर बारिश में फेंक दिया, और वो एक ट्रेन के साथ चली गई। ... आज उसे मरे पूरे छह बरस हो गए।"

"अब आप आई हैं। ... वही लोरी आपके होंठों पर है। ... आपका एक बेटा है, ठीक पाँच बरस का। ... और बूढ़ी शांति आपके पीछे ऐसे देखती है जैसे कोई मुर्दा वापस लौट आया हो।" ... "मैं हिसाबदार नहीं हूँ, अमारा जी। पर इतनी सी गिनती तो मुझे भी आती है।"

यही वो कगार था। ... एक लफ़्ज़ 'हाँ', और छह बरस का बदला और छुपाव, सब एक साथ पूरा हो जाता। इस पूरी दुनिया में एक यही मर्द था जिसने कभी तारा पर यक़ीन किया था। ... और तारा को उसी के चेहरे पर झूठ बोलना था। अपने बेटे को ज़िंदा रखने के लिए।

"आप एक मरी हुई औरत में एक ज़िंदा औरत ढूँढ रहे हैं, मिस्टर अहूजा। ... ये आपका मातम है, कोई पहचान नहीं।" ... "हाँ, मेरा एक बेटा है। मैंने उसे अकेले पाला है, राख से उठा कर। ... और उसकी माँ का नाम अमारा है।" ... "जो नाम आप ढूँढ रहे हैं, उसका हिसाब कब का चुकता हो चुका। ... कुछ औरतें मर कर ही आज़ाद होती हैं। ... उन्हें दुबारा ज़िंदा मत कीजिए।"

कबीर ने उस एक जवाब में इनकार भी सुना और इक़रार भी, दोनों एक ही आवाज़ में गुँथे हुए। ... वो एक क़दम पीछे हटा, ना यक़ीन के साथ, ना ही सुकून के साथ।

"ठीक है, अमारा जी। ... मैं और नहीं पूछूँगा।" ... "पर एक बात जान लीजिए। ... मैंने अपनी भाभी को एक बार नहीं बचाया, क्योंकि उस रात मैं यहाँ था ही नहीं।" ... "वो ग़लती दुबारा नहीं करूँगा। ... जो भी आप हैं, अमारा जी, आप अकेली नहीं हैं।"

तारा वहीं नीम के नीचे खड़ी रह गई, जैसे किसी ने उसके छह बरस पुराने ज़ख़्म पर बहुत नरमी से हाथ रख दिया हो। ... कबीर ने बिना किसी नाम को छुए, ख़ुद को उसकी तरफ़ खड़ा कर दिया था। ... और यही सबसे ख़तरनाक बात थी।

उसी रात, हुमा कैपिटल के दफ़्तर में, जहाँ अमारा को अमारा होने का नाटक नहीं करना पड़ता था, बेला ने फ़ाइलों का एक पूरा पहाड़ मेज़ पर पटका। ... उसकी आँखें तारा का चेहरा पढ़ रही थीं, और जो वो पढ़ रही थी, वो उसे पसंद नहीं आ रहा था।

"तो। ... आज हमने इकलौते ईमानदार अहूजा के सामने अपने बेटे को नुमाइश पर रख दिया।" ... "अच्छा है। अगली बार सीधे आरव को रतन चाचा की गोद में बिठा दें? ... बस वही एक काम बाक़ी रह गया है।"

"बेला, मेरे पास कोई चारा नहीं था। ... बच्चा गलियारे में भटक गया था, और मैं उसी कमरे में फँसी थी।" ... "और कबीर... कबीर ख़तरा नहीं है।"

"यही तो सबसे बड़ा ख़तरा है, तारा।" ... "जो दुश्मन कुछ नहीं जानता, वो अँधेरे में तीर चलाता है, और अक्सर चूक जाता है। ... पर जो आधा सच जान ले, वो ठीक उसी जगह हाथ रखता है जहाँ सबसे ज़्यादा दर्द होता है।" ... "और वो लड़का तुम्हारा आधा सच जान चुका है। लोरी, बच्चा, तुम्हारी आँखें। ... आधा जानने वाला हमराज़, पूरा जानने वाले दुश्मन से हमेशा ज़्यादा ख़तरनाक होता है।"

बेला कभी ग़लत नहीं होती थी, और यही सबसे बड़ी मुसीबत थी। ... एक तरफ़ देसाई की वो खुली फ़ाइल थी जो एक 'मर चुकी' तारा का सबूत माँग रही थी, दूसरी तरफ़ रतन का वो आदमी जो अब भी शहर में घूम रहा था। ... और अब इन दोनों के ठीक बीच एक तीसरा इंसान आ खड़ा हुआ था, जो सच से मुहब्बत करता था, और तारा से... शायद उससे भी ज़्यादा।

"मैं तुम्हें रोक नहीं रही, तारा। ... कुसुम अम्मा ने मुझे भी राख से ही उठाया था, मुझे पता है ये आग कैसी होती है।" ... "पर एक माँ को अपने बेटे के लिए बर्फ़ रहना पड़ता है। ... और तुम उस लड़के के पास जा कर पिघल जाती हो।"

"मैं बर्फ़ ही रहती हूँ, बेला। हर जगह, हर वक़्त।" ... "बस... कबीर के सामने, छह बरस में पहली बार, मुझे किसी के आगे बर्फ़ रहने का मन नहीं करता।" ... "पर तुम फ़िक्र मत करो। मन और हिसाब, मैंने बहुत पहले अलग रखना सीख लिया है। ... आरव के लिए।"

पर उसी रात, हवेली के दूसरे कोने में, कबीर अपने कमरे में अकेला बैठा था। ... उसके एक हाथ में साइट ऑफ़िस से चुपके से उठाई गई अमारा की एक तस्वीर थी, जो किसी फ़ाइल से गिरी थी और जिसे उसने बिना सोचे जेब में रख लिया था। ... और दूसरे हाथ में अहूजा ख़ानदान का वो पुराना एल्बम, जिसे इस घर में किसी ने बरसों से खोलने की हिम्मत नहीं की थी।

उसने काँपते हाथों से पन्ने पलटे, और फिर वो आख़िरी तस्वीर आई। ... तारा भाभी की आख़िरी तस्वीर, इसी नीम के नीचे खींची हुई, हँसती हुई, हल्की सी पेट से। ... छह बरस से इस घर में किसी ने इस चेहरे को ठीक से नहीं देखा था, क्योंकि इसे देखना ही एक गुनाह था।

"एक ही आँखें।" ... "वही ठोड़ी। वही हँसी... जो अब हँसती नहीं, सिर्फ़ हिसाब जोड़ती है।" ... "छह बरस... और इन दो चेहरों के बीच का ये सारा फ़ासला... एक झूठ है।"

और उस ख़ामोश कमरे में, कबीर की हथेली पर, दो तस्वीरें एक-दूसरे के बराबर आ खड़ी हुईं। ... एक 'मरी हुई' भाभी। एक 'अजनबी' लेनदार। ... और उन दोनों चेहरों के बीच के वो छह बरस भरभरा कर गिर पड़े, जैसे राख के ढेर पर से हवा का एक झोंका गुज़र गया हो। ... कबीर की आँखों में आँसू थे, पर होंठों पर कोई हैरानी नहीं। सिर्फ़ एक सच, जो अब वो जान चुका था।

"तुम ज़िंदा हो।" ... "तुम मरी नहीं, तारा भाभी। ... तुम इस घर की देहलीज़ पर, रोज़, मेरी अपनी आँखों के सामने खड़ी हो।" ... "और अब जो मैं जानता हूँ... इस पूरे घर में, इस पूरे शहर में, यही सबसे ख़तरनाक बात है।"

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