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Chapter 24 of 30

रतन का जाल

राख से उठी by Avni Oberoi

माजी के वो लफ़्ज़ अब भी अमारा के कानों में गूँज रहे थे, कि तुम्हारी ये आँखें बिल्कुल उसी की जैसी हैं। ... हवेली से हुमा के दफ़्तर तक का पूरा रास्ता उसने एक बार भी पलक झपकाए बिना काटा था, और शीशे के पार दिल्ली की रौशनियाँ राख की तरह पीछे छूटती रहीं। अमारा का चेहरा हमेशा की तरह पत्थर था, पर मेज़ पर रखे उसके हाथ अब भी काँप रहे थे। छह बरस में पहली बार, किसी ने उस चेहरे के इतने क़रीब आ कर तारा को छू लिया था।

“माजी ने मेरा हाथ थामा, बेला।” ... “और कहा कि मेरी आँखें उनकी खोई तारा जैसी हैं। शक नहीं था उस आवाज़ में, बस एक दर्द था, एक ऐसी पहचान जिसे वो ख़ुद नहीं समझ पातीं।” ... “एक तरफ़ माजी की ममता, दूसरी तरफ़ रागिनी का यक़ीन, और तीसरी तरफ़ रतन की ख़ामोशी। तीनों तरफ़ से दीवारें मेरी तरफ़ खिसकती आ रही हैं।”

“दीवारें खिसक रही हैं, तो हमें उनसे पहले चलना होगा।” ... “और एक ख़बर है जो तुम्हें बिल्कुल पसंद नहीं आएगी। रतन अहूजा पिछले तीन दिन से एकदम शांत है। ना कोई मीटिंग टाल रहा है, ना ऑडिट पर लड़ रहा है। उसके फ़ोन के सारे रिकॉर्ड अचानक ठंडे पड़ गए हैं।” ... “तारा, जब चूहे इतने चुप हो जाएँ, तो समझ लो बिल्ली छलाँग की तैयारी में है। जो आदमी छह बरस पहले तुम्हें ट्रेन तक धकेल आया था, वो आज मुस्कुरा रहा है। मुझे ये मुस्कुराहट रत्ती भर पसंद नहीं।”

“पसंद तो मुझे भी नहीं, बेला।” ... “रतन को पता है मैं ज़िंदा हूँ, और उसे ये भी पता है कि मैं कौन हूँ। जो आदमी एक बार किसी को राख कर चुका हो, वो दुबारा मारने से पहले सोचता नहीं, बस मौक़ा ढूँढता है।” ... “तो अब मैं उसे मौक़ा दूँगी ही नहीं। हर कौर जो मैंने हफ़्तों में परोसना था, वो अब रातों में परोसूँगी। बटरा का काग़ज़, देसाई की फ़ाइल, वो रिकॉर्डिंग, सब एक साथ मेज़ पर। रतन के गिरने और मेरे मरने के बीच जितना भी वक़्त बचा है, अब वो मिनटों में गिना जाएगा।”


अमारा को नहीं पता था कि जिस मौक़े को वो रतन से छीनना चाहती थी, रतन उसे बहुत पहले बुन चुका था। ... उसी रात, चाँदनी चौक की एक पुरानी हवेली के तहख़ाने में, जहाँ अहूजा ख़ानदान के असली बहीखाते सड़ रहे थे, रतन अहूजा एक अकेले दीये के नीचे बैठा था। रतन कभी अपने शिकार के पीछे नहीं भागता था। वो अपने ही धागों के बीचोंबीच बैठ कर इंतज़ार करता था, कि शिकार ख़ुद चल कर उसके जाल में आए।

“आओ, आओ। इतनी दूर क्यों खड़े हो, बेटा?” ... “छह बरस पहले एक छोटी सी ग़लती हो गई थी। मैंने एक औरत को उस आख़िरी ट्रेन पर चढ़ा दिया और मान लिया कि किस्सा तमाम हो गया। पर वो औरत कहीं उतर गई, और आज मेरे ही घर की मालकिन बन कर मेरे सिर पर बैठी है।” ... “इस बार कोई ग़लती नहीं होगी। इस बार मैं जल्दबाज़ी में एक धागा नहीं खींचूँगा। इस बार मैं पूरा जाल बुनूँगा, और उसमें सिर्फ़ वो औरत नहीं, उसका हर आख़िरी सहारा एक साथ फँसेगा।”

“हुक्म कीजिए, रतन जी। एक इशारा, और वो औरत आज रात ग़ायब।” ... “पर वो अकेली नहीं है। उसके पीछे हुमा की पूरी ताक़त है, कबीर बाबा अब खुल कर उसके साथ खड़े हैं, और वो बूढ़ा बटरा भी उसी की पनाह में जा बैठा है। एक को दबाएँगे, तो बाक़ी तीनों एक साथ चीख़ उठेंगे।”

“इसीलिए एक को नहीं दबाएँगे, बेटा। तीनों को एक ही रात, एक ही जगह दफ़नाएँगे।” ... “पहला, बटरा का वो असली दस्तख़त वाला काग़ज़, जो मुझे फाँसी के फंदे तक ले जा सकता है। वो काग़ज़ मुझे चाहिए, राख होने से पहले। दूसरा, हुमा। उस औरत की सारी ताक़त उसके बेदाग़ नाम में है। मैं ऐसे काग़ज़ बनवा रहा हूँ जो साबित करेंगे कि असली चोर हुमा कैपिटल है, कि अहूजा का पैसा उसी ने घुमाया। जिस दिन हुमा का नाम गंदा हुआ, उस दिन ये अमारा एक बेनाम मुजरिम रह जाएगी।” ... “और तीसरा... मुझे ख़बर मिली है कि उस औरत के पास एक बच्चा है। एक छुपा हुआ बेटा, जिसे वो दुनिया की हर निगाह से छुपा कर रखती है।”

“बच्चा...” ... “तो जिस औरत को कोई तोड़ नहीं सकता, उसे उसका अपना बच्चा तोड़ देगा।”

“बिल्कुल सही समझे।” ... “जो औरत अपनी जान की परवाह नहीं करती, वो अपने बच्चे की एक ही चीख़ पर घुटनों पर आ जाती है। उस बच्चे को ढूँढो। जहाँ भी उसने छुपाया हो, उस तक पहुँचो, और उसे बिना किसी शोर के मेरे हाथ में लाओ।” ... “अगले हफ़्ते रोशनी हाइट्स की भव्य दावत है। पूरा शहर वहाँ होगा, हर बड़ा नाम, हर कैमरा। उसी अधूरी इमारत में एक हादसा होगा, बेटा। एक ऐसा हादसा जिसमें वो औरत, वो काग़ज़, और उसका राज़, तीनों एक साथ मलबे के नीचे दब जाएँगे। और मैं, हमेशा की तरह, भीड़ में खड़ा अफ़सोस जताता नज़र आऊँगा।”


उसी रात, शहर के दूसरे सिरे पर, अमारा के अपने धागे भी कसने लगे। ... रतन को जो नहीं पता था, वो ये कि अमारा ने पहले ही अपने दो सबसे भरोसेमंद हाथ हरकत में ला दिए थे। बेला बटरा और आरव की हिफ़ाज़त की तरफ़, और कबीर उस काग़ज़ की तरफ़ जो रतन की क़ब्र खोद सकता था। एक ही फ़ोन लाइन पर तीनों जुड़े थे, और तीनों जानते थे कि आज रात कुछ न कुछ टूटने वाला है।

“बटरा अभी महफ़ूज़ है, मैं ख़ुद उसके पास पहुँच रहा हूँ।” ... “पर बेला, रतन के आदमी आज रात सड़कों पर हैं। मैंने दो गाड़ियाँ देखीं जो हुमा के सेफ़हाउस के चक्कर काट रही थीं। और मुझे यक़ीन है कि वो सिर्फ़ बटरा के काग़ज़ के पीछे नहीं हैं।” ... “बेला, आरव कहाँ है? तारा के बेटे को आज रात हर हाल में हमारी अपनी निगाह में होना चाहिए। मुझे ये रात बिल्कुल पसंद नहीं आ रही।”

“आरव सबसे गहरे ठिकाने पर है, कबीर। तारा ने ख़ुद उसे वहाँ शिफ़्ट करवाया, शहर से बाहर, एक ऐसी जगह जिसका पता सिर्फ़ तीन लोगों को है।” ... “उसके साथ वही आया है जो पिछले दो बरस से उसे सँभाल रही है। भरोसे की औरत, तारा ने ख़ुद परखा है। आज रात दस बजे वो आरव को नए ठिकाने पर पहुँचा देगी, और सुबह तक बच्चा मेरी अपनी निगाह के नीचे होगा।” ... “रतन उस बच्चे तक कभी नहीं पहुँच सकता। उस तक पहुँचने के लिए उसे हमारे अपने घेरे को तोड़ना पड़ेगा, और कबीर, हमारा घेरा नहीं टूटता।”

“घेरे नहीं टूटते, बेला, जब तक कोई उन्हें अंदर से ना खोले।” ... “मुझे नहीं पता क्यों, पर आज मेरा दिल आरव के लिए बैठा जा रहा है। बेला, आया से ख़ुद बात करो, हर घंटे। और कबीर, तुम बटरा को ले कर सीधे मेरे पास आओ, अकेले सफ़र मत करना।” ... “रतन ने आज तक जो भी वार किया है, हमेशा वहीं किया है जहाँ हमने सबसे कम पहरा रखा हो। तो आज रात हम कहीं भी बेपहरा नहीं छोड़ेंगे। एक इंच भी नहीं।”

“काश मुझे भी तुम्हारे इस घेरे पर उतना ही भरोसा होता, बेला।” ... “मैं बटरा तक पहुँच गया हूँ। बूढ़ा घबराया हुआ है, कहता है रतन के आदमी उसके क़स्बे में उसका पुराना पता पूछते फिर रहे थे।” ... “तारा से कहो कि आज रात सब कुछ एक साथ हो रहा है। रतन ने अपना जाल बिछा दिया है, और हम ठीक उसके बीचोंबीच खड़े हैं। हमें उससे एक चाल आगे रहना ही होगा, वरना...”


पर तारा उससे एक चाल आगे रहने का सिर्फ़ इंतज़ार नहीं कर रही थी। ... अगली शाम, जब रतन अहूजा ने सोचा भी नहीं था, अमारा ख़ुद उसके दफ़्तर की देहरी पर आ खड़ी हुई। ना कोई अपॉइंटमेंट, ना बेला, बिल्कुल अकेली। दो लोग जो एक-दूसरे का पूरा सच जानते थे, एक मेज़ के आमने-सामने बैठ गए, और फिर भी दोनों ने अपने मुखौटे नहीं उतारे। यही इस खेल का सबसे ख़तरनाक हिस्सा था।

“अरे, हुमा की मालकिन ख़ुद मेरे ग़रीबख़ाने पर। ये तो बड़े नसीब की बात है।” ... “बैठिए, अमारा जी। या...” “...आपको किस नाम से बुलाऊँ? आजकल नामों का बड़ा भरोसा नहीं रहा। लोग एक नाम के साथ मरते हैं, और किसी दूसरे नाम के साथ लौट आते हैं।”

“नाम से क्या फ़र्क़ पड़ता है, रतन जी।” ... “आप मुझे उस नाम से बुलाइए जिससे आपको रात को नींद ना आती हो। मेरा काम वैसे भी नाम से नहीं, हिसाब से है।” ... “और आपका हिसाब अब पूरा होने को है। मेहरबान ट्रेडर्स के हर लेनदेन की डोर अब मेरे हाथ में है। बटरा का असली दस्तख़त वाला काग़ज़ महफ़ूज़ है। और देसाई की फ़ाइल आज भी खुली है, इसी इंतज़ार में कि उस रात की सच्ची कहानी आख़िर कौन सुनाता है।”

“काग़ज़, फ़ाइलें, हिसाब...” “आप बहुत होशियार हैं, इसमें कोई शक नहीं। पर होशियारी की एक कमज़ोरी होती है, बेटी। होशियार लोग हमेशा काग़ज़ बचाने में लगे रहते हैं।” ... “और मेरे जैसे बूढ़े जानते हैं कि इस दुनिया में कुछ चीज़ें काग़ज़ से कहीं ज़्यादा क़ीमती होती हैं। कुछ चीज़ें जो चीख़ती हैं, हँसती हैं, और 'मुम्मा' पुकारती हैं।” ... “आप अपने काग़ज़ों की चौकीदारी कीजिए, अमारा जी। मैं ज़रा देखता हूँ कि इस बड़े शहर में और क्या-क्या खुला छूट गया है, जिसकी चौकीदारी करना कोई भूल बैठा है।”

अमारा की रीढ़ में बर्फ़ दौड़ गई, पर उसके चेहरे पर एक पत्ती तक नहीं हिली। ... “धमकियाँ वो देते हैं, रतन जी, जिनके पास वक़्त होता है। और आपका वक़्त... वो रेत की तरह आपकी मुट्ठी से गिरता जा रहा है।” ... “एक बात याद रखिएगा। जो जाल बुनने में इतने बरस लगा देते हैं, वो अक्सर भूल जाते हैं कि हर जाल के दो सिरे होते हैं। एक शिकार का गला बाँधने के लिए, और एक... बुनने वाले के अपने गले के लिए। मैं राख से सिर्फ़ जलने के लिए नहीं उठी, रतन जी। मैं वसूलने के लिए उठी हूँ।”

दफ़्तर का दरवाज़ा बंद होते ही अमारा का मुखौटा चटक गया। ... रतन ने आरव को छुआ नहीं था, उसका नाम तक नहीं लिया था, पर उसकी हर बात एक ही तरफ़ इशारा कर रही थी, उसके बेटे की तरफ़। गाड़ी में बैठते ही उसने बेला का नंबर मिलाया, और उसकी आवाज़ अब अमारा की नहीं, तारा की थी, एक डरी हुई माँ की आवाज़। रतन जानता था कि आरव है। और अगर वो जानता था, तो वो पहुँच भी सकता था।

“बेला, आरव को अभी, इसी वक़्त मेरे पास लाओ।” ... “रतन जानता है। उसने आज मेरे मुँह पर, मेरी आँखों में देख कर मेरे बेटे की तरफ़ इशारा किया है। मुझे परवाह नहीं कि रात के कितने बजे हैं, आया को फ़ोन करो और कहो कि आरव को नए ठिकाने पर नहीं, सीधे मेरे पास लाए।” ... “बेला, मुझे बस एक बार उसकी आवाज़ सुननी है। एक बार उसकी 'मुम्मा' सुन लूँ, फिर मैं सब सँभाल लूँगी। जल्दी करो।”

दूसरी तरफ़ बेला ने फ़ौरन आया का नंबर मिलाया। ... घंटी बजती रही, बजती रही, और किसी ने फ़ोन नहीं उठाया। दस बजे आरव को नए ठिकाने पर पहुँच जाना था। घड़ी में साढ़े दस हो रहे थे। बेला ने दूसरा नंबर मिलाया, फिर तीसरा। ठिकाने पर तैनात आदमी ने जो बताया, उसे सुन कर बेला के हाथ से फ़ोन लगभग छूट गया।

“तारा...” ... “आया आरव को लेकर शाम सात बजे ही निकल गई थी। उसने पहरेदारों से कहा कि ख़ुद तारा का फ़ोन आया है, ठिकाना बदलने का हुक्म है। किसी को शक नहीं हुआ, वो दो बरस से हमारे अपने घेरे का हिस्सा थी।” ... “पर तुमने तो कोई फ़ोन नहीं किया था, तारा। और वो सात बजे से लापता है। उसका फ़ोन बंद है, गाड़ी का कोई अता-पता नहीं। तारा... आरव उसी के साथ है, और वो घर नहीं लौटी।”

जिस आया को तारा ने ख़ुद परखा था, जिसे उसने अपने बेटे की, अपनी आख़िरी साँस की चौकीदारी सौंपी थी, वो हफ़्तों पहले बिक चुकी थी। ... रतन का जाल घर के अंदर, तारा के अपने घेरे के ठीक बीचोंबीच, बहुत पहले बुना जा चुका था। और अब, इस पूरे शहर में तारा के पास सब कुछ था। हुमा, काग़ज़, गवाह, बदला, सब कुछ। बस वो एक चीज़ नहीं थी जिसके लिए वो राख से उठी थी। उसका बेटा जा चुका था।

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