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Chapter 14 of 30

पहचान की रात

राख से उठी by Avni Oberoi

सुबह की पहली धुँधली रौशनी टेढ़ी छत की दराज़ों से छन आई, और वो रात, जो अब तक साँस रोके खड़ी थी, धीरे धीरे छूटने लगी। ... कबीर का काँपता हाथ अब भी हवा में वहीं जमा था, तारा के चेहरे से बस एक इंच दूर। पर बाहर बारिश थम चुकी थी, और वो नदी, जो रात भर पुल को निगले बैठी थी, अब पीछे सरक रही थी। ... छह बरस की वो लंबी रात ख़त्म हो रही थी, और कबीर के पास बचा वक़्त भी।

"मैंने फ़ैसला कर लिया, तारा।" ... "तुमने कहा था, सुबह तक सोच लूँ। ... सूरज निकल आया है। और मैं अब भी यहीं खड़ा हूँ। तुम्हारी तरफ़।"

"सोच लो, कबीर अहूजा। ... जिस राख के साथ खड़े होने की बात कर रहे हो, वो तुम्हारे बाप के घर को, तुम्हारे भाई समर को, तुम्हारे रतन चाचा को जला कर राख कर देगी।" ... "जो मेरे साथ चलेगा, उसे अपने ही ख़ून की क़ब्रें, अपने हाथों से खोदनी होंगी। ... इतनी ताक़त है इन हाथों में?"

"मैं तुम्हारे बदले के साथ खड़ा नहीं हो रहा, तारा। ... मैं तुम्हारे साथ खड़ा हो रहा हूँ। ये दोनों एक बात नहीं।" ... "जिन्हें मैं ख़ून कहता था, उन्होंने एक बेगुनाह, पेट से बहू को बारिश में मरने फेंका, और उनका देवर दूर खड़ा देखता रहा। ... छह बरस पहले मैं ख़ामोश रहा। आज नहीं।"

एक पल तारा कुछ नहीं बोली। ... वो आदमी अपना पूरा ख़ानदान, अपना नाम, अपनी हर ज़मीन तराज़ू के एक पलड़े में रख रहा था, और दूसरे में सिर्फ़ उसे तौल रहा था, एक ऐसी औरत को जो ख़ुद को मरा हुआ कहती थी। ... छह बरस में पहली बार किसी ने उसे राख नहीं, आग समझ कर चुना था। पर उसने चेहरे को हिलने नहीं दिया।

"ठीक है। तो एक शर्त पर।" ... "इस कमरे के बाहर, तुम मेरे साथी हो, मेरे हमराज़ हो, मेरे वो हाथ हो जहाँ मैं ख़ुद नहीं पहुँच सकती। ... पर मोहब्बत नहीं, कबीर। वो सुख उस औरत के लिए है जो ज़िंदा है, और तारा तो उसी रात मर गई थी। ... जो लौटी है, वो प्यार नहीं करती। सिर्फ़ हिसाब पूरा करती है।"

"मंज़ूर।" ... "पर एक मुर्दा औरत के लिए तुम ठंडी चाय पीते हुए मुँह बहुत ज़िंदा बनाती हो।" ... "मैं तुम्हारा हाथ बनूँगा, वहाँ जहाँ तुम नहीं पहुँच सकतीं। और तुम्हारा नाम, अपने सीने की उसी सबसे गहरी क़ब्र में दफ़न रखूँगा।"

जब वो दोनों ढाबे की सीढ़ियों से उतरे, तो पानी पुल के पत्थरों से नीचे सरक चुका था। ... सड़क के उस पार वो छोटा सा क़स्बा था, जहाँ छह बरस से एक आदमी नया नाम ओढ़े छुपा बैठा था। ... रतन का आदमी अभी नदी के दूसरी तरफ़ फँसा था। छह बरस में पहली बार, तारा उससे आगे थी।

क़स्बे की एक तंग गली के आख़िरी सिरे पर, एक बंद दुकान के पीछे, वो आदमी रहता था जिसे दुनिया छह बरस से मरा समझती थी। ... दरवाज़े पर नाम कुछ और पुता था, भूषण, पर उन थकी, धँसी आँखों में तारा ने उसी मुनीम बटरा को पहचान लिया, जिसने कभी रतन के इशारे पर एक झूठे काग़ज़ पर उसका नाम चढ़ा कर उसे चोर बना दिया था।

"क... कौन है? ... मैं भूषण हूँ। यहाँ कोई बटरा नहीं रहता।" ... "ग़लत घर है तुम्हारा। मैं किसी को नहीं जानता, किसी का हिसाब मुझ पर बाक़ी नहीं। ... मुझे बख़्श दो।"

"बटरा जी, हम नुक़सान पहुँचाने नहीं आए। ... मैं कबीर हूँ। कबीर अहूजा।" ... "हाँ, उसी ख़ानदान से। पर उस घर से जितनी नफ़रत आपको है, उससे रत्ती भर कम मुझे नहीं। ... दरवाज़ा खोलिए। वक़्त बहुत कम है।"

"रतन का आदमी आपसे सिर्फ़ एक रात पीछे है, बटरा जी। कल एक नदी ने उसे रोका। कल कोई नहीं रोकेगा।" ... "मैं हुमा से हूँ। रतन आपको हमेशा के लिए ख़ामोश कराना चाहता है। मैं आपको बोलना सिखाना चाहती हूँ। ... क़ब्र वो देगा। कठघरा मैं दूँगी।"

"कठघरा।" ... "आप जानती हैं रतन अहूजा किस चीज़ का बना है? ... उसने कंपनी का पैसा बरसों 'मेहरबान ट्रेडर्स' के नाम से चुराया, और जब ऑडिट सिर पर आया, सारा गुनाह उस बेचारी नई बहू पर मढ़ दिया। ... और वो झूठा काग़ज़ मेरे इन्हीं हाथों ने बनाया था, मैडम। उसी रात से मैं साँस लेते हुए भी लाश हूँ।"

"जानती हूँ, बटरा जी। उस बहू का हिसाब भी मेरे ही खाते में लिखा है।" ... "मैं हर वो क़र्ज़ वसूलती हूँ जो लोग भूल जाते हैं कि उन पर बाक़ी है। कुछ हिसाब काग़ज़ पर होते हैं, और कुछ इंसान के अपने सीने में बरसों दबे रहते हैं। ... आप मुझे रतन का असली काग़ज़ दीजिए, और मैं आपकी बाक़ी ज़िंदगी लौटा दूँगी।"

"नहीं, नहीं। आप समझ नहीं रहीं, मैडम।" ... "रतन के अपने दस्तख़त वाला वो असली अधिकार-पत्र, जो चीख़ चीख़ कर कहता है कि पैसा उसने चुराया, तारा ने नहीं, वो मैंने छुपा कर रखा है। ... वही एक काग़ज़ है जिसकी वजह से मैं आज तक ज़िंदा हूँ। जिस दिन वो किसी के हाथ में गया, उसी दिन मेरी साँस भी।"

"तो वो काग़ज़ हमें सौंप दीजिए, बटरा जी। हुमा आपको नया नाम नहीं, नई ज़िंदगी देगी।" ... "जब तक वो काग़ज़ अकेले आपके पास है, तब तक आप भी अकेले हैं।"

"अकेला ही सुरक्षित हूँ, बेटा।" ... "वो काग़ज़ ऐसी जगह है जहाँ मेरे सिवा किसी का हाथ नहीं पहुँच सकता। ना रतन का, ना आपका। ... और जब तक मेरी आँखें ना देख लें कि आप सच में उस शैतान से बड़ी हैं, मैं वो जगह किसी को नहीं बताऊँगा, गवाही तो दूर की बात है। ... पहले रतन को गिरता दिखाइए, मैडम। फिर बटरा ख़ुद चल कर कठघरे में आ खड़ा होगा।"

तभी गली के मुहाने पर एक गाड़ी की परछाईं धीमी हुई, और बटरा का चेहरा राख हो गया। ... छह बरस के डर ने उसकी हड्डियों को सिखा दिया था कि ऐसी सुनसान, गीली गली में सुस्त पड़ती गाड़ी किसकी होती है। उसके काँपते हाथ चिटकनी की तरफ़ लपके।

"चले जाइए। अभी, इसी वक़्त। ... और मुझ तक पहुँचने का रास्ता, अगर मैं तय कर पाया, तो ख़ुद ढूँढूँगा।" ... "अगर आप सच में उस बहू की तरफ़ हैं, तो रतन को गिराइए। बाक़ी सब बाद में।"

एक पल में दरवाज़ा भिड़ गया, और वो आदमी अपने अँधेरे में यूँ ग़ायब हुआ जैसे वहाँ कभी कोई था ही नहीं। ... तारा और कबीर तेज़ क़दमों से गली के दूसरे सिरे की तरफ़ मुड़ गए, और उनकी पीठ पीछे, मुहाने पर, वो सुस्त गाड़ी अब भी खड़ी थी, शीशे के पीछे एक ठंडी, सब्र वाली आँख छुपाए।

उधर दिल्ली में, अहूजा हवेली के पुराने बैठकख़ाने में, रतन अहूजा अपनी ऊँची कुर्सी पर बैठा था, और उसकी उँगलियाँ मेज़ पर वही पुरानी थाप दे रही थीं। एक। दो। तीन। ... वो थाप, जो तब बजती थी जब कोई सवाल उसकी उम्मीद से ज़्यादा क़रीब आ जाता था।

"हाँ, बोलो। ... वो बूढ़ा मुनीम, वो पुराना हिसाब... निपट गया?" ... "मैंने एक छोटा सा काम कहा था। एक बूढ़े को उसकी नींद तक पहुँचा दो। इतनी सी बात में इतनी देर क्यों, भाई?"

"रात भर एक नदी बीच में आ गई, चाचा जी। पुल डूब गया था, मैं दूसरी तरफ़ अटका रहा।" ... "जब तक मैं पार पहुँचा, बटरा तक कोई और पहले पहुँच चुका था। वो बूढ़ा अब अकेला नहीं है। हुमा की कोई औरत उसके पास आई थी। ... और उसके साथ, कबीर अहूजा था।"

"कबीर।" ... "मेरा भतीजा, अपने ही घर के एक लेनदार के साथ, एक गुम मुनीम को ढूँढने निकल गया। ... ईमानदारी सबसे ख़तरनाक बीमारी है, इसका इलाज नहीं होता।" ... "बटरा को छोड़ो अभी। मुझे उस औरत का चेहरा चाहिए। ये हुमा वाली बहुत पुराने सवाल पूछती है। ... पता करो वो कौन है, और उसकी एक साफ़ तस्वीर मेरे हाथ में ला कर रखो।"

"चेहरा मिल जाएगा, चाचा जी। वो दोनों अभी शहर लौट रहे हैं, मैं उनकी गाड़ी के पीछे हूँ।" ... "सूरज ढलने से पहले, आपकी मेज़ पर उसकी तस्वीर होगी।"

लाइन कट गई, और रतन की उँगलियाँ फिर वही थाप देने लगीं। एक। दो। तीन। ... उसे नहीं पता था कि उसने अभी अपने ही आदमी को उस चेहरे की तरफ़ धकेल दिया है जिसे उसने छह बरस पहले ख़ुद एक ट्रेन के हवाले किया था। ... कुछ काग़ज़ खोदने से नहीं मिलते। वो ख़ुद बाहर आ जाते हैं।

लौटती सड़क अब सूखने लगी थी, और गाड़ी के भीतर की ख़ामोशी रात वाली से अलग थी। रात की ख़ामोशी में अनकहा प्यार था। इस दिन की ख़ामोशी में एक क़ीमत थी, जो अब दोनों को साफ़ दिखने लगी थी।

"तुम्हें पता है ना, तारा, मैंने अभी क्या चुना है?" ... "तुम्हारे पास खड़े होने के लिए, मुझे वो काग़ज़ रौशनी में लाना होगा जो मेरे अपने चाचा को फाँसी तक ले जाएगा। तुम्हें पाने का रास्ता, मेरे अपने ख़ून को मिटाने से हो कर जाता है। ... और मैंने वो रास्ता चुन लिया है, बिना एक पल हिचके।"

"और मेरा रास्ता, कबीर?" ... "जिस दिन मैं दुनिया के सामने कहूँगी कि तारा ज़िंदा है, उसी दिन रतन को यक़ीन हो जाएगा कि जिस औरत को उसने ट्रेन के नीचे भेजा था, वो लौट आई है। और जो एक बार मारने की कोशिश कर चुका है, वो दुबारा करेगा। ... इस बार सिर्फ़ मुझ पर नहीं। उस रौशनी में मेरा बेटा भी खड़ा होगा।"

"तो तुम दोनों तरफ़ से फँसी हो।" ... "छुपी रहोगी, तो नाम कभी साफ़ नहीं होगा और रतन आज़ाद घूमेगा। सामने आओगी, तो वो तुम्हारे और आरव के पीछे आ जाएगा। ... तुम्हारी अपनी जीत ही तुम्हारे बेटे पर निशाना बना देगी।"

एक पल तारा की आँखें खिड़की के बाहर टिकी रहीं, और फिर उसका हाथ बेख़याली में बटुए में रखी उस पुरानी, मुड़ी-तुड़ी फ़ोटो पर चला गया, जिसमें एक पाँच साल का बच्चा हँस रहा था। ... मालकिन अमारा जिस बात को सौ लोगों के सामने बर्फ़ बना कर कहती थी, उसी पर, इस ख़ाली सड़क पर, तारा का गला रुँध आया।

"वो कल रात मेरी पुरानी फ़ोटो सीने से लगा कर सोया, कबीर। जिसमें मैं हँस रही हूँ। बेला से बोला, मुम्मा हँसती हुई ही लौटेगी।" ... "मैं छह बरस से उस हँसी का झूठ जी रही हूँ। और जब तक रतन ज़िंदा है, मेरा बेटा उसी हँसती फ़ोटो के पीछे छुपा रहेगा। ... इसलिए मोहब्बत नहीं। पहले उसकी ज़मीन महफ़ूज़, फिर कुछ और।"

"मैं तुम्हें कुछ करने को नहीं कह रहा, तारा। ना सामने आने को, ना छुपे रहने को, ना मुझसे मोहब्बत करने को।" ... "बस इतना, कि जिस दिन तुम वो रौशनी चुनोगी, तुम उसमें अकेली नहीं खड़ी होगी। तुम्हारे और उस बच्चे के आगे एक अहूजा खड़ा होगा। इस बार सही तरफ़ का।"

तारा ने अपना हाथ ना हटाया, ना उस पर रखा। ... दोनों के बीच वो एक इंच की दूरी अब भी थी, वही जो कल रात कबीर के हाथ और उसके चेहरे के बीच जमी थी। ... मोहब्बत को उन्होंने तराज़ू के एक पलड़े में रख दिया था, और दूसरे में एक बच्चे की जान, एक साफ़ नाम, और एक पूरा ख़ानदान जिसे राख होना था। तराज़ू अभी झूल रहा था।

क़स्बे के आख़िरी मोड़ पर एक पुराना पेट्रोल पंप था, और वहाँ हुमा की गाड़ी एक पल रुकी। कबीर उतरा, गाड़ी के दूसरी तरफ़ जा कर तारा के लिए दरवाज़ा खोला, एक भूली हुई आदत जो इस औरत के सामने अपने आप लौट आई थी। ... और उसी पल, कुछ क़दम पीछे, एक धूल भरी गाड़ी के शीशे के पीछे, वो सब्र वाली ठंडी आँख जाग उठी।

"तो ये है वो हुमा वाली औरत। जिसके सामने पूरा अहूजा ख़ानदान झुकता है।" ... "चाचा जी को उसका चेहरा चाहिए। ठीक है। ले लेते हैं तेरा चेहरा।"

कैमरे की आँख उस औरत के चेहरे पर सरकी, और ठीक उसी लम्हे, जब तारा कबीर के लिए एक पल को मुड़ी, धूप उसके चेहरे पर सीधी आ पड़ी। ... और शीशे के पीछे बैठे उस आदमी का हाथ, जो कभी नहीं काँपता था, हवा में जम गया। ... क्योंकि वो चेहरा उसने पहले भी देखा था। एक बरसती रात में, एक रेलवे यार्ड की पटरियों के किनारे। ... उसी के अपने हाथों ने वो चेहरा उस ट्रेन की तरफ़ धकेला था।

"ये... ये नहीं हो सकता।" ... "मैंने इसे ख़ुद उस रात उस ट्रेन पर चढ़ते देखा था। ... ये अमारा नहीं है। ये तो वो बहू है। ... वो जो उस रात मर गई थी।"

गाड़ी आगे बढ़ गई, और उसे जाते हुए वो आदमी देखता रहा, जबड़ा भिंचा हुआ, साँस रुकी हुई। ... फिर उसने फ़ोन पर वो तस्वीर खोली, कबीर और तारा, एक साथ, धूप में। और उसके नीचे, अपने मोटे, ठंडे अँगूठों से, घर की तरफ़ भेजने के लिए सिर्फ़ दो लफ़्ज़ टाइप किए। दो लफ़्ज़, जो उस पूरी हवेली को बारूद की तरह उड़ा देने वाले थे।

"वो ज़िंदा है।"

उसका अँगूठा एक पल उस हरे बटन पर ठहरा। ... दूर दिल्ली में, एक मरे हुए नाम पर छह बरस से जमी राख के नीचे, एक चिंगारी सुलगने को तैयार थी। ... तारा को नहीं पता था कि जिस चेहरे को उसने बोर्डरूम में सौ लोगों से छुपाया था, वो अभी अभी उसके क़ातिल की मुट्ठी में बंद हो गया है। ... उस आदमी ने बटन दबा दिया, और वो दो लफ़्ज़ अँधेरे में उड़ चले, उस घर की तरफ़, जहाँ बहुत जल्द कोई ये पढ़ने वाला था, कि जिस बहू को उन्होंने मार कर दफ़ना दिया था... वो अब तक ज़िंदा है।

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