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Chapter 25 of 30

बेटा किसका

राख से उठी by Avni Oberoi

बेला के वो आख़िरी लफ़्ज़, कि आरव उसी के साथ है और वो घर नहीं लौटी, फ़ोन के उस पार अब भी हवा में लटके थे। छह बरस जो बर्फ़ अमारा ने अपने चेहरे पर जमाई थी, वो एक ही धड़कन में चटख़ गई। हाथ में पकड़ा फ़ोन काँप रहा था, या शायद हाथ।

“गाड़ी वापस मोड़ो, बेला। हुमा नहीं, अहूजा हवेली की तरफ़।” ... “रतन के पास मेरा आरव साढ़े तीन घंटे से है। मेरे चाँद का टुकड़ा उस आदमी के हाथ में है जिसने मुझे ट्रेन के नीचे धकेलवाया था।”

“तारा, एक पल मेरी बात सुनो। घबराहट में लिया हर फ़ैसला सीधा रतन के हक़ में जाएगा।” ... “मैंने हर आदमी सड़कों पर उतार दिया है, हर टोल, हर नाके पर। पर रतन अब जानता है कि तुम कौन हो, और तुम्हारा बेटा उसके हाथ में है। वो सिर्फ़ फ़िरौती नहीं माँगेगा, वो तुम्हें टूटा हुआ देखना चाहता है।”

छह बरस से तारा रतन से एक क़दम आगे चलती आई थी, पर आज पहली बार वो पीछे थी, और उसकी क़ीमत एक पाँच बरस का बच्चा चुका रहा था। रतन को पैसा नहीं डराता। उसे सिर्फ़ एक आदमी डरा सकता था, वही, जो उस बच्चे के लिए पूरी दुनिया जला दे। वही आदमी, जिसने कभी तारा को बारिश में फेंका था।

“समर।” ... “मैं जानती हूँ तुम क्या कहोगी, बेला। कि समर को सच बता कर मैं अपना नाम, अपना बेटा, अपना गला, सब उसके हाथ में रख दूँगी।” ... “पर मैं छह बरस हर मुखौटा सिर्फ़ आरव को महफ़ूज़ रखने के लिए पहनती रही। आज वो महफ़ूज़ नहीं है, तो आज से कोई मुखौटा नहीं।”

“और अगर वो अपने बेटे को तुमसे छीनने की ठान ले? वो अहूजा है, तारा। कल को कह सकता है कि बच्चा उसका है, इस हवेली का वारिस है।” ... “मैं गाड़ी मोड़ रही हूँ। पर तुम एक आग बुझाने के लिए हाथ में दूसरी आग उठा कर ले जा रही हो।”


जिस देहरी से छह बरस पहले उसे घसीट कर बारिश में फेंका गया था, आज आधी रात वो उसी देहरी को अपने पैरों से लाँघ रही थी। समर की बैठक में रौशनी जल रही थी, वो सोया नहीं था, हर पीले पन्ने में अपनी खोई तारा को ढूँढता बिखर रहा था। उसे नहीं पता था कि जिस औरत तक पहुँचने की वो बरसों भीख माँगता रहा, वो इसी वक़्त उसके दरवाज़े पर खड़ी है।

“अमारा जी? इस वक़्त? क्या हुमा की तरफ़ से कोई ख़बर है?” ... “अगर आप तारा के बारे में कुछ लाई हैं, कोई पता, कोई चिट्ठी, तो ख़ुदा के लिए बता दीजिए। मैं छह बरस से एक माफ़ी लिए फिर रहा हूँ, जो बस एक बार उसके पैरों में रखना चाहता हूँ।”

“माफ़ी।” ... “तुम छह बरस से एक माफ़ी लिए फिर रहे हो, समर। और मैं छह बरस से एक सवाल।” ... “उस रात जब तुमने मुझे चोर कह कर बारिश में फिंकवाया, तुमने एक बार भी मुड़ कर मेरी आँखों में नहीं देखा था। तो आज देखो, समर। ठीक से देखो।”

समर ने देखा, सच में देखा, जैसे कोई डूबता आदमी आख़िरी बार किनारे को देखता है, और उसके चेहरे का रंग उड़ता चला गया। वो आँखें। “तुम्हारी ये आँखें बिल्कुल उसी की जैसी हैं”, माजी ने इसी औरत का हाथ थाम कर कहा था। वो लोरी जो कबीर ने पहचानी थी। वो चेहरा जो हर सुबह उसके ख़्वाब में राख हो जाता था। समर के होंठ काँपे, पर आवाज़ नहीं निकली।

“नहीं। ये मुमकिन नहीं। तारा कहीं और है, तुमने ख़ुद कहा था कि तुम सिर्फ़ उसकी भेजी हुई हो, उसकी लेनदार...” ... “पर तुम्हारी आवाज़, वो लोरी, माजी ने तुम्हारी आँखों में उसे देखा था... ख़ुदा, नहीं। तुम कहीं और नहीं हो। तुम शुरू से यहीं थीं।”

“हाँ, समर। मैं शुरू से यहीं थी।” ... “तुम्हारी वो अमारा, तुम्हारी वो लेनदार... मैं तारा हूँ। वही तारा जिसे तुमने पेट से, बेघर, बेनाम, बारिश में मरने के लिए फेंक दिया था।” ... “मैं मरी नहीं, मैं राख से उठी। और छह बरस तुम्हारी इसी मेज़ के सामने बैठ कर तुम्हारे घर का एक-एक क़र्ज़ अपने हाथ में लेती रही, और किसी ने मुझे पहचाना तक नहीं।”

समर घुटनों के बल गिर पड़ा। वो रोया नहीं, चीख़ा नहीं, कुछ दुख इतने बड़े होते हैं कि आवाज़ उनके सामने बौनी पड़ जाती है। एक मरी तारा को वो दफ़ना सकता था। एक ज़िंदा तारा को वो सिर्फ़ देख सकता था, और अपने किए को हर साँस के साथ जी सकता था।

“तुम ज़िंदा हो, और मैंने तुम्हें चोर कहा। मैंने रागिनी की एक बात पर अपनी बीवी को, अपने बच्चे की माँ को, बारिश में फिंकवा दिया।” ... “मुझे मार दो, जो चाहो ले लो। पर एक बार कह दो कि तुमने उस रात मुझे नहीं पुकारा था। क्योंकि वो एक बात मैं ज़िंदगी भर नहीं जी पाऊँगा।”

“उठो, समर। मैं तुम्हारा मातम सुनने नहीं आई, उसके लिए हम दोनों के पास पूरी उम्र पड़ी है।” ... “मैं तुम्हें एक और सच बताने आई हूँ, वो सच जो मैंने छह बरस अपनी जान से ज़्यादा छुपाया।” ... “उस रात जब तुमने मुझे फेंका, मेरे पेट में तुम्हारा बच्चा था। और वो बच्चा, समर, उस रात मरा नहीं।”

“बच्चा...” ... “हमारा बच्चा, उस रात... सबने कहा था कि... तारा, हमारा बच्चा ज़िंदा है?” ... “वो 'मेरे पापा' वाली तस्वीर, वो चेहरा जो हूबहू मेरा था... तुमने कहा था वो मेरे ज़मीर का वहम है। वो वहम नहीं था, है ना?”

“वो तुम्हारा बेटा है।” ... “उसका नाम आरव है, वो पाँच बरस का है। उसकी आँखें अहूजा हैं, उसकी ज़िद अहूजा है, और उसका ख़ून, जिसकी वजह से मैं आज तक डरती आई हूँ, वो तुम्हारा ख़ून है।” ... “मैंने उसे हर निगाह से छुपाया, इस घर से, तुमसे, रतन से, क्योंकि जिस दिन ये लोग जानते कि उसमें अहूजा का ख़ून है, वो उसे मुझसे छीन लेते। और वो दिन आज आ गया।”

“पाँच बरस का।” ... “वो कैसा है, तारा? देखने में मेरे जैसा है, या तुम्हारे जैसा?” ... “ख़ुदा, मेरा एक बेटा है, और मैं उसका नाम आज पहली बार सुन रहा हूँ, वो भी इसलिए क्योंकि वो एक क़ातिल के हाथ में है।”

“वो तुम्हारे जैसा ज़िद्दी है और मेरे जैसा बेख़ौफ़, और हर उस बात पर हँसता है जिस पर दुनिया रोती है।” ... “वो अपनी हर तस्वीर में एक चाँद बनाता है, क्योंकि मैं उसे वही लोरी सुनाती हूँ जो कभी इस घर में गूँजती थी।” ... “और हर रात पूछता है, मुम्मा, मेरे पापा कब आएँगे। आज उसका पापा उसे ढूँढ रहा है, और वो एक ऐसी जगह है जहाँ कोई नहीं पहुँच सकता।”

यही वो सवाल था जिससे तारा छह बरस डरती आई थी, वो दिन जिस दिन समर को पता चलेगा कि वो बच्चा उसी का है। उसने हज़ार बार इस पल की कल्पना की थी, और हर बार समर का हाथ उसके बेटे की तरफ़ बढ़ता, वारिस माँगता, उसका आख़िरी सहारा भी छीनता हुआ देखा था। वो उस वार के लिए तैयार, सीधी खड़ी हो गई।

“आरव।” ... “तारा, मैं जानता हूँ तुम क्या सोच रही हो। कि अब मैं अपने वारिस पर हक़ जताऊँगा, तुमसे अपना बेटा माँगूँगा।” ... “मैंने बाप बनने का हक़ उसी रात खो दिया था जब मैंने उसकी माँ को बारिश में फेंका। वो हक़ मैं नहीं माँगूँगा। मैं सिर्फ़ पूछ रहा हूँ, वो कहाँ है, और उसे वापस लाने के लिए मुझे किसका गला दबाना है।”

तारा ने जिस वार के लिए ख़ुद को पत्थर बनाया था, वो कभी आया ही नहीं। जिस आदमी से उसने छह बरस नफ़रत की थी, उसने अपने बेटे पर हक़ जताने के बजाय अपना सिर झुका दिया। तारा के अंदर कुछ बहुत पुराना, बहुत थका हुआ, हौले से हिल गया। ये वो समर नहीं था जिसने उसे फेंका था, ये कोई और था, जिसे उसी एक रात ने राख कर दिया था।

“तुम पूछते हो किसका गला। तो सुनो, समर, ध्यान से सुनो।” ... “जिसने मुझ पर चोरी का इल्ज़ाम गढ़ा, वो कंठी और वो पैसा ख़ुद चुरा कर मेरे नाम मढ़ा, वो रागिनी नहीं, तुम्हारे अपने रतन चाचा थे।” ... “उस रात मैं इत्तिफ़ाक़ से उस ट्रेन पर नहीं चढ़ी थी, उन्होंने मुझे धकेलवाया था। और आज वही रतन तुम्हारे अपने ख़ून के आरव को अपनी मुट्ठी में दबाए बैठा है।”

“रतन चाचा। वो आदमी जिसे मैंने अपने बाप की जगह रखा। जिसके एक इशारे पर मैंने अपनी बीवी को चोर कहा।” ... “तुमने मुझे छह बरस अँधेरे में रखा, और तुम्हारा हक़ बनता था। पर अब मैं जाग गया हूँ। रतन ने मेरे घर का सबसे बड़ा गुनाह मेरे ही हाथों करवाया, अब मैं उसका सबसे बड़ा हथियार बनूँगा, तुम्हारा हथियार। हुक्म दो, तारा। मुझे बस इशारा दो कि आरव कहाँ है।”

छह बरस पहले इसी घर में समर ने झूठ का साथ चुना था। आज उसी घर में, उसी आदमी ने पहली बार सच का साथ चुना, और जिस बहू को उसने राख किया था, आज उसी के हुक्म का इंतज़ार कर रहा था। तारा ने छह बरस ये जंग अकेले लड़ी थी। आज पहली बार उसकी पीठ के पीछे एक और इंसान खड़ा था।


ठीक उसी पल तारा के हैंडबैग में रखा फ़ोन बज उठा, स्क्रीन पर सिर्फ़ एक अनजान नंबर। तारा के हाथ अचानक बर्फ़ हो गए। एक माँ को कोई नहीं बताता कि फ़ोन के उस पार कौन है, उसका दिल पहले ही जान जाता है। उसने काँपती उँगली से फ़ोन कान से लगाया।

“बेटी, इतनी रात गए जागी हुई हो? माँ का दिल है, आज तुम्हें नींद कैसे आएगी।” ... “तुम्हारा बच्चा मेरे पास है, तारा। हाँ, तारा। अब मुखौटों की ज़रूरत नहीं।” ... “सौदा सीधा है। बटरा का वो असली दस्तख़त वाला काग़ज़, और हुमा के पास अहूजा का जितना क़र्ज़ है, आज रात मेरे नाम वापस लिख दो। बदले में तुम्हारा आरव तुम्हें ज़िंदा वापस मिल जाएगा।”

“उसके बाल की एक जड़ को भी हाथ लगाया, रतन, तो मैं तुम्हें वो हिसाब दूँगी जो किसी अदालत के बस का नहीं।” ... “तुमने छह बरस पहले मेरी पूरी ज़िंदगी का क़र्ज़ लिया था, और मैं उसे वसूलने राख से उठी। पर एक माँ का क़र्ज़ मैं किसी काग़ज़ पर नहीं, रतन, तुम्हारी अपनी साँसों में गिन-गिन कर वसूलूँगी।” ... “मुझे मेरा बेटा लौटा दो। जो चाहिए ले लो, सब कुछ, पर मुझे मेरा आरव लौटा दो।”

“देखा? जो औरत अपनी जान की परवाह नहीं करती, वो अपने बच्चे की एक चीख़ पर घुटनों पर आ जाती है।” ... “पर एक बात साफ़ कर दूँ। छह बरस पहले मैंने तुम्हें उस ट्रेन पर चढ़ाया, पर मरते हुए देखने रुका नहीं। इसीलिए तुम आज ज़िंदा हो।” ... “इस बार वो ग़लती नहीं दोहराऊँगा। अगले हफ़्ते रोशनी हाइट्स की दावत में तुम अपने बेटे को लेने आओगी, और उस अधूरी इमारत से इस बार ना माँ लौटेगी, ना बेटा। इस बार मैं तुम दोनों को एक साथ राख करूँगा।”

फ़ोन कट गया, और रतन का वो आख़िरी लफ़्ज़, राख, कमरे के बीचोंबीच जलता हुआ छूट गया। सामने समर खड़ा था, अपने बेटे का नाम अभी-अभी सीख कर। अगले हफ़्ते की वो दावत अब कोई तारीख़ नहीं, एक चिता थी, जिस पर रतन दो नाम पहले ही लिख चुका था, एक माँ का, और एक बेटे का।

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