DesiHub

Chapter 15 of 30

टूटा आईना

राख से उठी by Avni Oberoi

रात के उस सन्नाटे में, अहूजा हवेली के भीतरी कमरे में, रतन की मेज़ पर एक फ़ोन अकेला जल रहा था, और उसके ऊपर झुकी थीं रागिनी की अंगूठियों से लदी उँगलियाँ, जिन्हें वहाँ नहीं होना चाहिए था। ... रतन मंदिर के एक बड़े चढ़ावे में गया था, अपना वही भला चेहरा ओढ़े, और फ़ोन यहीं छोड़ गया था। हफ़्तों से रागिनी इसी हुमा वाली औरत की जड़ें खोद रही थी, और आज रात, उसी मेज़ पर, स्क्रीन एक अनजान नंबर से जगमगा उठी। ... एक तस्वीर, और उसके नीचे सिर्फ़ दो लफ़्ज़।

"वो ज़िंदा है." ... "कौन... कौन ज़िंदा है? किसका फ़ोन है ये, जो रतन को आधी रात ऐसे लफ़्ज़ भेजे?" ... उसका अँगूठा उस धुँधली तस्वीर पर जा टिका, और उसने उसे बड़ा कर के खोल लिया।

तस्वीर धीरे धीरे साफ़ हुई। ... दिन की तेज़ धूप, एक पेट्रोल पंप, और उसके पास खड़े दो लोग। एक कबीर था, ये तो रागिनी पहली नज़र में जान गई। ... पर दूसरा, वो औरत का चेहरा, जिस पर सीधी धूप पड़ रही थी। जिसे हफ़्तों से वो बोर्डरूम में, दावतों में देखती आई थी, और जिससे हर बार उसे एक बेनाम, ठंडा डर लगता था। ... और अब, उस खुली धूप में, उस चेहरे पर से छह बरस की धुंध एक झटके में उतर गई।

"ये चेहरा... ये तो..." ... "नहीं। नहीं, ये नहीं हो सकता।" ... "तारा। ... ये तारा है।"

"वो बहू... जिसे हमने उस रात इसी घर से चोर कह कर निकाला था। ... वो मरी नहीं।" ... "वो हमारी अपनी मेज़ पर बैठी है, हमें अपने ही घर में झुका रही है। ... अमारा बन कर।"

कमरा एक पल को रागिनी के पैरों के नीचे झूल गया। ... छह बरस पहले, इसी हवेली की सीढ़ियों पर खड़ी हो कर उसने उस पेट से बहू को चोर कह कर बारिश में घसीटे जाते देखा था, और पलक तक नहीं झपकाई थी। उस रात उसने सोचा था कि किस्सा दफ़न हो गया, अब सब सिर्फ़ उसका है। ... और आज वही दफ़नाई हुई औरत, हुमा की मालकिन बन कर, उनके एक एक क़र्ज़ की डोर मुट्ठी में थामे, उन्हीं के सिरहाने आ बैठी थी।

"अगर ये तारा है... अगर ये ज़िंदा है, और इसने मुँह खोला..." ... "तो सबसे पहले फाँसी किसकी चढ़ेगी? रतन की नहीं। ... मेरी। कंठी मैंने रखी थी, समर के कान मैंने भरे थे।" ... "किसी को पता नहीं चलना चाहिए। रतन को भी नहीं। ... वो अपनी चोरी बचाएगा, मुझे नहीं।"

और फिर रागिनी ने वो किया जो उसने सोचा भी नहीं था कि वो अपने ही साथी के साथ करेगी। ... उसने वो पूरा संदेश रतन के फ़ोन से मिटा दिया, जड़ से, जैसे वो कभी आया ही ना हो। फिर उसी तस्वीर को चुपके से अपने फ़ोन पर भेज लिया, और रतन का फ़ोन ठीक उसी जगह वापस रख दिया। ... छह बरस पहले ये काम रतन के आदमियों पर छोड़ा गया था, और अधूरा रह गया। इस बार रागिनी किसी पर नहीं छोड़ेगी।

"छह बरस पहले हमने तुझे सिर्फ़ फेंका था, तारा।" ... "वो हमारी ग़लती थी। फेंकी हुई चीज़ लौट आती है।" ... "इस बार फेंकूँगी नहीं। इस बार पक्का करूँगी कि तू सच में वहीं जाए जहाँ हम तुझे छह बरस पहले भेज आए थे। ... इस बार, अपने हाथों से।"

रागिनी की आँखों में एक ठंडी योजना जमने लगी। ... उसे अब किसी फ़िक्सर की, किसी ट्रेन की ज़रूरत नहीं थी, बस एक ऊँची, सुनसान जगह चाहिए थी। ... और उस पूरे घर में एक ही ऐसी जगह थी, वही सबसे ऊँची छत की मुँडेर, जहाँ से छह बरस पहले एक ज़िंदगी को धकेला गया था। वहीं वो इसे ख़त्म भी करेगी।

अगली शाम, अहूजा हवेली अपनी रोज़ की तरह उसी एक औरत के इशारों पर झुकी हुई थी। ... बेला दिल्ली के दफ़्तर लौट चुकी थी, और अमारा अकेली, रोशनी हाइट्स के काग़ज़ों में सिर झुकाए बैठी थी, जब रागिनी उसके पास आई, अपना वही मीठा, टूटा हुआ मुखौटा फिर से चढ़ाए। ... और गलियारे के दूसरे सिरे पर, बूढ़ी शांति ने उन दोनों को एक साथ देखा, और उसके सीने में एक अनजानी बेचैनी सरक गई।

"अमारा जी, बस एक मिनट। ... इतना काम, इतनी थकन।" ... "आइए ना, थोड़ी देर ऊपर छत पर चलते हैं। वहाँ से रोशनी हाइट्स की सारी रौशनी दिखती है, आपका अपना बनाया हुआ ख़्वाब।" ... "और मुझे आपसे कुछ बात भी करनी है। औरत से औरत। इस घर में हम दोनों ही तो बाहर से आई हैं, है ना?"

"छत।" ... "उस घर की छत, जहाँ से इस ख़ानदान की हर चीज़ शुरू होती है, और हर चीज़ ख़त्म।" ... "चलिए, रागिनी जी। जो हिसाब बरसों से किसी छत पर अधूरा पड़ा हो, उसे वहीं जा कर चुकाना अच्छा रहता है। ... मैं भी बहुत दिनों से इस घर की एक ख़ास छत देखना चाहती थी।"

वो दोनों औरतें उन्हीं पुरानी, घुमावदार सीढ़ियों से ऊपर चढ़ीं। ... और हर सीढ़ी के साथ अमारा का पत्थर चेहरा भीतर से दरकता रहा, क्योंकि यही वो रास्ता था जहाँ से छह बरस पहले, पेट से, चोर कह कर, उसे बारिश में घसीटा गया था, जब उसकी कोख में आरव की पहली साँस पल रही थी। ... रास्ते में एक क़दीमी आईने में दो औरतों के अक्स एक पल को यूँ टकराए, जैसे किसी और ज़माने में दो पुरानी दुश्मन आँखें टकराई हों।

"तो दिखाइए, रागिनी जी।" ... "वो बात, जो सिर्फ़ इसी छत पर हो सकती थी, किसी बंद कमरे में नहीं। ... मैं सुन रही हूँ। पूरी रात आपकी है।"

रागिनी ने पीछे मुड़ कर छत का लोहे का दरवाज़ा भिड़ा दिया, और उसकी चिटकनी की खट हवा में गूँज गई। ... उसे नहीं पता था कि उन्हीं सीढ़ियों पर, कुछ ही क़दम नीचे, एक और परछाईं ठिठकी थी, जिसे शांति की घबराई फुसफुसाहट ऊपर तक खींच लाई थी। ... और जैसे ही चिटकनी बंद हुई, रागिनी के चेहरे से वो मीठा मुखौटा एक झटके में उतर गया।

छत पर दिल्ली की रौशनियाँ दूर तक बिछी थीं, और ठीक बीच में वो पुरानी मुँडेर थी, वो कगार, जिसके पार छह बरस पहले एक ज़िंदगी को धकेल दिया गया था। ... अब वहाँ सिर्फ़ दो औरतें थीं, छह बरस पुराना एक ख़ून, और वो छत, उस पूरी रात की इकलौती गवाह।

"अब कोई काग़ज़ नहीं, कोई बोर्डरूम नहीं, अमारा जी। ... या मैं तुझे तेरे असली नाम से बुलाऊँ?" ... "मैंने तस्वीर देख ली। धूप में तेरा चेहरा देख लिया। छह बरस बाद भी मैं उसे पहचान गई।"

"तू अमारा नहीं है। ... तू तारा है।" ... "वो बहू, जिसे हमने चोर कह कर निकाला था, जिसे हम मरा समझ बैठे थे। ... और तू, बेशर्म, ज़िंदा लौट आई, हमारी ही मेज़ पर आ बैठी।"

"तारा।" ... "कितना अजीब नाम ले कर तुम मुझ पर टूट रही हो, रागिनी जी। एक मरी हुई औरत का नाम।"

"पर चलो, मान लेती हूँ तुम्हारी बात। बोलो। ... जिस तारा से तुम इतना डरती हो, उसके साथ इस घर ने किया क्या था?" ... "कहो, अपने ही मुँह से, इसी छत पर। मैं छह बरस से किसी को ये कहते सुनना चाहती थी।"

"क्या किया था?" ... "वो कंठी, वो मंदिर के चढ़ावे का पैसा, सब मैंने तेरे कमरे में रखा था, अपने इन्हीं हाथों से। ... और फिर समर के कान में रोई, कि उसकी नई बहू चोर निकली।"

"समर मेरा था, तारा। ये घर मेरा था।" ... "और तू, एक बाहर से आई लड़की, बहीखाते में सिर घुसाए, धीरे धीरे सब कुछ अपने नाम करती जा रही थी। ... तुझे हटाना ज़रूरी था। तू बीच में एक दीवार की तरह खड़ी थी।"

और ठीक उसी पल, छत के उस लोहे के दरवाज़े की झिरी के पीछे, सीढ़ियों पर एक आदमी जम गया। ... समर। शांति की घबराई फुसफुसाहट उसे यहाँ तक खींच लाई थी, कि छोटी बहू मालकिन को उसी मनहूस छत पर ले गई है। ... और अब वो वहीं खड़ा, अपनी ही बीवी के मुँह से वो सच सुन रहा था, जिसे उसने छह बरस, समझना ना चाहते हुए, दबाए रखा था।

"तो चोर तुम थीं, रागिनी जी। और सज़ा किसी और ने काटी।" ... "तुम्हें पता है, कुछ आईने टूट कर भी चेहरा नहीं भूलते। ... जिस औरत को तुमने इसी छत से तोड़ा था, वो हर एक किरच में तुम्हें देखती रही। छह बरस।"

"पर रुको मत। बोलती जाओ।" ... "क्योंकि हिसाब का सबसे बड़ा कौर अभी बाक़ी है। सिर्फ़ फँसाना, सिर्फ़ निकालना, इतने से तो एक जली हुई औरत राख हो कर भी लौट आती है। ... तुमने और क्या किया था, उस रात, उस बारिश में?"

"तुझे निकालना काफ़ी नहीं था।" ... "रतन ने कहा, निकाली हुई बहू लौट सकती है, बोल सकती है। उसका लौटना नामुमकिन होना चाहिए। ... इसलिए हमने पक्का किया कि तू उस रात उसी ट्रेन पर हो।"

"वो हादसा... वो हादसा, हादसा नहीं था, तारा।" ... "वो उसी रात के लिए, तेरे लिए रचा गया था। ... और फिर भी, किसी तरह, तू लौट आई। राख से भी लौट आई। ... इसीलिए मुझे तुझसे इतना डर लगता है।"

सीढ़ियों पर खड़े समर के भीतर कुछ भरभरा कर गिर पड़ा। ... छह बरस पहले उसने अपनी पेट से बीवी को चोर कहते इस घर के सामने आसान झूठ चुना था। ... और अब वही बीवी उसी की ज़बान से क़बूल कर रही थी कि उन्होंने सिर्फ़ तारा को फेंका नहीं था, उसे अपनी ही छत पर जान से मारने की साज़िश रची थी।

"उस रात बारिश बहुत तेज़ थी, रागिनी जी।" ... "जिस औरत को तुमने इस छत से घसीटा, वो अकेली नहीं थी। उसके भीतर एक और साँस पल रही थी। और तुमने दोनों को एक साथ उस बारिश में फेंक दिया।" ... "इसे बदला मत समझना। इसे सिर्फ़ हिसाब समझना। और हिसाब, रागिनी जी, अब पूरा हो रहा है।"

"मैंने... मैंने ये सब क्यों कह दिया?" ... "अगर तू यहाँ से जीती-जागती उतरी, तो कल मेरा नाम हर अख़बार में होगा, हर कठघरे में।" ... "तूने आज मुझसे मेरा गुनाह कबूल करवा लिया। ... तो अब तू यहाँ से नीचे नहीं जाएगी, तारा। कम से कम ज़िंदा तो नहीं।"

रागिनी की नज़र उस मुँडेर पर जा टिकी, उसी कगार पर, जहाँ से छह बरस पहले तारा को धकेला गया था। ... उन आँखों में अब वो पुरानी मीठी रागिनी नहीं, सिर्फ़ एक घिरा हुआ, डरा हुआ जानवर बचा था। ... उसने अपने और उस कगार के बीच खड़ी तारा को देखा, और दिल्ली की रौशनियाँ उनके नीचे, बहुत नीचे, बेख़बर टिमटिमा रही थीं।

"इस बार कोई ट्रेन नहीं, तारा।" ... "इस बार सिर्फ़ तू, ये छत, और वो नीचे की ख़ामोशी। ... माफ़ करना। पर तुझे इस बार सच में मरना ही होगा।"

रागिनी पूरी ताक़त से आगे झपटी, और उसके दोनों हाथ तारा के कंधों से जा टकराए। ... तारा की एड़ियाँ पीछे उसी ठंडी मुँडेर से टकराईं, उसका धड़ पीछे झुका, और दिल्ली की टिमटिमाती रौशनियाँ एक पल को उसके सिर के नीचे घूम गईं। ... वही कगार, वही अँधेरा नीचे, वही छह बरस पुरानी बरसती रात, सब एक साथ उसकी आँखों के आगे कौंध गया।

"आरव..." ... "नहीं... इस तरह नहीं। ... अभी नहीं।"

और ठीक उसी पल, जब तारा का संतुलन उस कगार के पार झुक चुका था, अँधेरे में से एक हाथ बिजली की तरह लपका, और उसकी कलाई को कस कर जकड़ लिया। ... एक ही झटके में वो हाथ तारा को उस मौत के मुँह से खींच कर वापस, ठोस ज़मीन पर ले आया।

रागिनी वहीं जम गई, उसके अपने दोनों हाथ अभी भी हवा में, धक्के के उसी रुख़ में अटके हुए। ... और तारा ने, अब भी उस मज़बूत मुट्ठी में जकड़ी अपनी कलाई के साथ, पलट कर देखा कि वो हाथ किसका था।

"मैंने सब सुन लिया।" ... "हर एक लफ़्ज़, रागिनी। ... वो कंठी, वो झूठे काग़ज़, वो ट्रेन। सब।"

"जिस औरत को मैंने अपने ही घर के कहने पर चोर समझ लिया..." ... "उसे तुमने मरवाने की कोशिश की। मेरे ही घर में, मेरी ही आँखों के सामने। ... और मैं छह बरस एक झूठ की छाँव में सोता रहा।"

छत पर सिर्फ़ हवा की आवाज़ थी, और दूर, नीचे, दिल्ली की बेख़बर रौशनियाँ। ... एक तरफ़ रागिनी, अपने ही क़बूलनामे के बोझ तले जमी हुई। दूसरी तरफ़ अमारा, जिसकी कलाई अब भी उस आदमी की मुट्ठी में थी जिसने कभी उस पर से यक़ीन उठा लिया था। ... और बीच में समर, जिसने अभी सुना था कि जिसे उसने खोया उसे किसी ने जान-बूझ कर मारना चाहा था, और जिसे उसने अभी बचाया, वो शायद... वो शायद वही थी। ... उस पूरी छत पर किसी की साँस नहीं चल रही थी, और एक अनकहा नाम तीनों के बीच अँधेरे में लटका रह गया।

Comments

Sign in to join the conversation.

No comments yet. Be the first to share your thoughts.