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Chapter 30 of 30

सुबह की मालकिन

राख से उठी by Avni Oberoi

भोर अब धूसर नहीं रही थी। जले ढाँचे के पीछे से सूरज की पहली सुनहरी कोर निकली, और नीचे बिखरी राख भी सोने की तरह चमक उठी। कबीर के हाथ में आग से बचाया काग़ज़ काँप रहा था, उस पर लिखा दूसरा नाम हवा में लटका था। विक्रमादित्य बजाज। पर पहली बार तारा के सीने में अँधेरे में हिसाब माँगती वो पुरानी भूख नहीं जागी।

“तारा... ये आदमी बाहर है, आज़ाद है। जिस चोरी की जड़ हमने आज रात काटी, उसका पहला बीज इसी ने बोया था।” ... “तू कहे तो मैं अभी ये काग़ज़ देसाई के पास ले जाऊँ। इसका भी हिसाब आज ही।”

“नहीं, कबीर।” ... “छह बरस मैंने हर हिसाब अँधेरे में लिया, हर कौर रात के परदे के पीछे परोसा, क्योंकि मेरे पास सिर्फ़ अँधेरा था।” ... “पर आज मेरे पास सुबह है। और जिसके पास सुबह हो, वो अँधेरे में शिकार नहीं करता।”

“ये नाम कहीं नहीं भाग रहा। बजाज को अभी पता चला है कि जिस बहू को उसने राख करवाया, वो ज़िंदा है और हुमा उसके हाथ में है। आज वो डरा हुआ है, मैं नहीं।” ... “ये काग़ज़ बेला को दे दे, हुमा की तिजोरी में एक और सोई फ़ाइल। जिस दिन ये हिलेगा, मैं इसे अँधेरे में नहीं, अपनी सुबह में बुला कर हिसाब चुकाऊँगी।”

“मुम्मा...” ... “अब वो बुरा आदमी चला गया ना? अब कोई हमें नीचे नहीं गिराएगा?” ... “अब हम घर जा सकते हैं?”

“हाँ, मेरे चाँद। वो बुरा आदमी चला गया। अब कोई हमें कभी नहीं गिराएगा।” ... “और अब हम अपने घर जा रहे हैं। जहाँ से हमें फिर कभी कोई नहीं निकालेगा।”

बेला चली आई, आँखों की कोर आज गीली, और वो जला काग़ज़ बिना एक लफ़्ज़ ले लिया, जैसे जानती हो उसे कहाँ रखना है। हुमा का हर क़र्ज़, रतन की अपनी आवाज़ की रिकॉर्डिंग, आज पूरे शहर के हाथ में थी। और बजाज का नाम फ़िलहाल एक बंद फ़ाइल में सो गया, कोई खुला ज़ख़्म नहीं, बस एक परछाईं, इस सुबह से बहुत दूर।

“तारा... आग बुझ गई।” ... “तूने उस टूटती इमारत पर कहा था, जो कहना है वो आग बुझने के बाद भी कहा जा सकता है। आग बुझ चुकी है। अब कह दूँ?”

“कह देना।” ... “पर यहाँ नहीं, कबीर, इस राख में नहीं। जिस जगह मुझे मिटाने की कोशिश हुई, वहाँ मैं अपनी नई ज़िंदगी की पहली बात नहीं कहूँगी।” ... “जो कहना है, एक धुली सुबह के लिए बचा ले। छह बरस रुके हैं, कुछ घंटे और सही।”

और फिर वो उठी, उसी हवेली की तरफ़ जिसकी देहरी से छह बरस पहले उसे पेट से, बालों से घसीट कर बारिश में फेंका गया था। पर इस बार उसे कोई घसीट कर नहीं ले जा रहा था। इस बार वो अपने पैरों पर, अपने बेटे को सीने से लगाए, उस घर के अंदर जा रही थी, एक मालिक की तरह।


हफ़्ते बीते। हवेली की दीवारें वही थीं, पर अंदर की हवा बदल चुकी थी। चाँदनी चौक की सदियों पुरानी अहूजा ज्वेल्स, जिसके कारीगर महीनों से बिन तनख़्वाह बैठे थे, फिर खुल गई। तारा चाहती तो इस घर को तोड़ कर राख कर सकती थी, जैसे उन्होंने उसे किया था। पर उसने जलाना नहीं, बनाना चुना। हर कारीगर को उसका बकाया मिला, हर नौकर को उसकी खोई इज़्ज़त।

उसी हफ़्ते देसाई आख़िरी बार आया, हाथ में वही छह बरस पुरानी फ़ाइल जो कभी बंद नहीं हुई थी। उसने कहा था, ये तब तक बंद न होगी जब तक लाश, मौत का सबूत, या ख़ुद वो औरत ज़िंदा सामने न आ जाए। आज वो औरत उसके सामने ज़िंदा खड़ी थी। देसाई ने 'मृत' का ठप्पा काटा, और लापता बहू का किस्सा उसकी मौत पर नहीं, उसके ज़िंदा होने पर ख़त्म हुआ।

रागिनी तो कभी की बेघर हो कर अपने ही झूठ के मलबे में गुम हो चुकी थी। पर एक हिसाब अब भी बाक़ी था, जिसे तारा ने ख़ुद छह बरस टाल रखा था। माजी का हिसाब। और फिर वो सुबह आई, जब वो बूढ़ी औरत, जिसने कभी उसे चोर कह कर बारिश में फिंकवाया था, ख़ुद उसके दरवाज़े पर आ खड़ी हुई, बिना किसी शान के, सिर्फ़ एक काँपती, टूटी माँ।

“मैं माफ़ी माँगने नहीं आई, बेटा।” ... “माफ़ी का हक़ मैंने उसी रात खो दिया था, जब मैंने घर की झूठी इज़्ज़त के लिए एक पेट से बच्ची को अपने हाथों बारिश में धकेल दिया।” ... “और उसके साथ मैंने अपने घर का इकलौता चिराग़ भी फेंक दिया, अपना ख़ून। जिस पोते के लिए मेरा दिल छह बरस तड़पा, उसे मैंने ख़ुद उस रात मौत के हवाले कर दिया था।”

“मैंने तुझ में उसे पहले दिन से देखा था। तेरी आँखें... मैंने कहा था ना, तेरी आँखें हूबहू मेरी खोई तारा जैसी हैं।” ... “मेरा दिल जानता था, पर ज़बान डरती थी। क्योंकि जिस दिन मैं ये मान लेती, मुझे मानना पड़ता कि मैंने अपने हाथों क्या किया।” ... “तू वही है ना, मेरी तारा? तू लौट आई?”

“हाँ, माजी।” ... “मैं वही हूँ, वो बहू जिसे आपने नौकरानी समझ कर घर से फेंक दिया था। मैं पूरे छह बरस सिर्फ़ आपसे नफ़रत करने के लिए ज़िंदा रही।” ... “पर आज आपको अपने पैरों में गिरा देख कर, वो नफ़रत मुझे बोझ लगने लगी है। और मैं ये बोझ अब और नहीं ढोना चाहती।”

“मैं आपको माफ़ नहीं कर रही, माजी। कुछ रातें माफ़ नहीं होतीं। पर मैं आपसे बदला भी नहीं लूँगी।” ... “अब तक मैं हर हिसाब वसूल कर के बराबर करती आई। पर आज सीखा, कुछ हिसाब चुका कर नहीं, छोड़ कर पूरे होते हैं।” ... “आप इसी घर में रहेंगी, अपने पोते की परछाईं में। ये मेरी सज़ा भी है और मेरी दया भी।”

और उसी दोपहर, पहली बार, माजी ने अपने उस पोते को गोद में लिया जिसे उन्होंने अनजाने में उसी रात राख में फेंक दिया था। आरव ने उन्हें पहले अजनबी की तरह देखा, फिर उनकी झुर्रियों वाली उँगली पकड़ ली, और उस एक पल में एक बूढ़ी औरत का छह बरस से टूटा दिल जुड़ने लगा।

और उस घर में एक हिसाब और था, नफ़रत का नहीं, प्यार का। शांति। वो बूढ़ी नौकरानी, जो कभी सबकी नज़र बचा कर भूखी तारा को गरम रोटियाँ पकड़ा देती थी। तारा ने उसे पीछे के अँधेरे कमरे से निकाल कर घर के भीतर एक रौशन कमरा दिया, और पूरी हवेली की देखरेख उसके हाथों में सौंप दी।

“शांति काकी, जिस रात इस घर में सब मुझे चोर चिल्ला रहे थे, उस रात सिर्फ़ तुम्हारी एक गरम रोटी ने याद दिलाया था कि मैं अब भी इंसान हूँ।” ... “उस एक रोटी का क़र्ज़ मैं छह बरस सीने में लिए घूमती रही। आज से इस घर की रसोई पर तुम्हारा हुक्म चलेगा, नौकरानी बन कर नहीं, इस घर की सबसे बड़ी बन कर।”

शांति काकी की झुर्रियों में आँसू बह निकले, और उन्होंने काँपते हाथों से तारा का माथा चूम लिया, ठीक वैसे जैसे छह बरस पहले, जब उसे चूमने वाला कोई नहीं बचा था। उस दिन हवेली के नीचे का वो पूरा छुपा संसार, जो हमेशा डर में साँस लेता था, पहली बार खुल कर साँस ले सका, उसी की छाँव में जिसे कभी इस घर ने राख किया था।


उधर, महीनों की सुनवाई के बाद अदालत का फ़ैसला आया। रतन अहूजा, जो उम्र भर समझता रहा कि क़ानून उसकी जेब में है, अपनी ही आवाज़ की रिकॉर्डिंग, बटरा की गवाही और समर के बयान के आगे, दो क़त्ल और छह बरस की चोरी का मुजरिम ठहरा। उसे उम्र क़ैद हुई। जिस बहू को उसने ट्रेन पर राख करने भेजा था, आज उसी की सच्चाई ने उसे उम्र भर सलाख़ों के पीछे पहुँचा दिया।

और अब वो दिन आ पहुँचा, जिसे तारा ने छह बरस मुट्ठी में बंद रखा था, जिसे चुनने का हक़ उसने सिर्फ़ अपने पास रखा था। आज उसने वो दिन ख़ुद चुना, और आरव का नन्हा हाथ थाम कर उसे बग़ीचे में ले आई, जहाँ समर काँपते हाथों से उनका इंतज़ार कर रहा था।

“मुम्मा, ये वही अंकल हैं ना, जो उस रात आग में मेरे पास रो रहे थे?” ... “इनकी शक्ल तो बिलकुल मेरी उस ड्रॉइंग वाले पापा जैसी है, जो मैं स्कूल में बनाता था। तुमने तो कहा था वो सिर्फ़ मेरे मन की बात है।”

“मेरे चाँद... मैंने तुझसे आज तक एक झूठ नहीं बोला, बस कुछ सच के लिए सही वक़्त का इंतज़ार किया।” ... “वो ड्रॉइंग तेरे मन की बात नहीं थी, आरव। तेरा दिल जानता था। ये अंकल... ये तेरे पापा हैं। समर। तेरा अपना ख़ून।”

“आरव...” ... “मैं जानता हूँ, बेटा, मैं बहुत देर से आया हूँ। मैं तेरी किसी सालगिरह पर नहीं था, तेरे किसी गिरने पर तुझे उठाने नहीं था।” ... “मैं ये नहीं कहूँगा कि आज से मुझे पापा बुला, वो हक़ मुझे कमाना होगा। पर अगर तू इजाज़त दे, तो मैं बस तेरे आस-पास रहना चाहता हूँ।”

“तुम उस रात आग में मेरे और मौत के बीच खड़े हुए थे। मुम्मा ने बताया।” ... “अच्छे लोग ऐसा करते हैं। बुरे लोग भाग जाते हैं। तुम भागे नहीं।” ... “ठीक है, तुम धीरे-धीरे मेरे पापा बन सकते हो। पर याद रखना, मुम्मा सबसे पहले है। हमेशा।”

“सुन लिया, समर? धीरे-धीरे। उसकी रफ़्तार से, मेरी शर्तों पर।” ... “तू इसका बाप है, ये सच हमेशा रहेगा। पर तू मेरा कुछ नहीं है। और ये घर तेरा नहीं, आरव का है। ये गाँठ ज़िंदगी भर बाँध कर रखना।”

“मंज़ूर है, तारा। जितना तू देगी उतना ही काफ़ी है, जितना ये देगा उतना ही काफ़ी है।” ... “मैंने उस एक रात एक झूठ चुना था। आज से ज़िंदगी भर उसी झूठ का सच चुनूँगा, तेरी हर शर्त पर। यही मेरी सज़ा है, और मैं इसे सिर झुका कर क़बूल करता हूँ।”


उस शाम तारा उसी छत पर जा खड़ी हुई, जहाँ से छह बरस पहले उसे घसीट कर नीचे फेंकने की कोशिश हुई थी। पर आज वो छत उसकी थी, और नीचे पूरा चाँदनी चौक शाम की रौशनी में जगमगा रहा था। तभी सीढ़ियों पर एक जानी-पहचानी आहट हुई। कबीर। और जो बात छह बरस से बचा रखी थी, आज उसके आगे खड़ी आग बुझ चुकी थी।

“आग बुझ गई, तारा। रतन उम्र क़ैद में है, तेरा नाम साफ़ है, बजाज एक सोई फ़ाइल है। अब हमारे बीच कोई हिसाब खड़ा नहीं।” ... “सिर्फ़ एक चीज़ खड़ी है, जो सबसे मुश्किल है। तू कभी मेरे भाई की बीवी थी। ये शहर जानता है, और कभी नहीं भूलेगा।”

“और मैं ये सब जान कर भी तुझे चुनता हूँ, तारा। छह बरस पहले, जब ये पूरा घर तुझे चोर कह रहा था, तब भी अकेला मैं तेरे साथ खड़ा था।” ... “तब मैं तुझे बचा नहीं पाया, वो अपराध छह बरस ढोया। आज मैं कुछ बचाने नहीं, बस तेरे और आरव के साथ जीने आया हूँ। अगर तू मुझे अपना ले।”

“कबीर...” ... “छह बरस मैंने अपने दिल को बर्फ़ बना कर रखा, क्योंकि जिस दिन मैं उसे पिघलने देती, उसी दिन मेरा बदला कमज़ोर पड़ जाता।” ... “पर आज मेरा बदला पूरा हो चुका है, और पहली बार मुझे मज़बूत नहीं रहना। पहली बार मैं सिर्फ़ चाह सकती हूँ। और मैं तुझे चाहती हूँ, बिना किसी हिसाब के।”

“मुम्मा! कबीर चाचू ने कहा था, अगर तुमने हाँ बोल दिया तो कल सुबह हम तीनों छत पर पतंग उड़ाएँगे!” ... “मैंने चाचू को पहले ही बता दिया था कि तुम हाँ ही बोलोगी, क्योंकि तुम सबसे ज़्यादा हँसती हो ना, सिर्फ़ चाचू के पास।” ... “तो हम पतंग उड़ा रहे हैं ना? कल सुबह?”

“हाँ, मेरे चाँद। कल सुबह हम तीनों मिल कर पतंग उड़ाएँगे।” ... “और परसों भी। और उसके बाद हर सुबह। जितनी सुबहें हमारे हिस्से में बची हैं, सब की सब।”

जिस औरत को इस शहर ने कभी चोर कह कर, मरने के लिए बारिश में फेंक दिया था, वो राख से उठी थी। पर आज वो सिर्फ़ राख से उठी हुई एक औरत नहीं थी। आज उस सुबह की मालकिन वो ख़ुद थी। हर वो सुबह, जो कभी उसके लिए सज़ा हुआ करती थी, आज उसकी अपनी थी, उसके अपने नाम लिखी हुई।

“छह बरस पहले उन्होंने मुझे राख समझ कर हवा में उड़ा दिया था।” ... “उन्हें क्या पता था कि राख हवा में उड़ती है, हर दरवाज़े के नीचे से, हर खिड़की की झिरी से, और उड़ते-उड़ते एक दिन पूरे आसमान की मालिक बन जाती है।” ... “मेरा हिसाब पूरा हुआ, कबीर। अब मैं वसूलने नहीं, बस जीने आई हूँ।”

और वहाँ, चाँदनी चौक के ऊपर, अपने बेटे को गोद में और अपने चुने हुए इंसान को साथ लिए, वो औरत खड़ी रही, जिसे कभी इसी शहर ने राख कह कर फेंक दिया था। सूरज अब पूरा निकल आया था, और उसकी हर किरन उस चेहरे पर पड़ रही थी जो अब किसी से नहीं डरता था। राख से उठी थी वो, कभी। और अब... अब हर आने वाली सुबह भी सिर्फ़ उसी की थी।

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