Chapter 9 of 30
लोरी की गूँज
एक तूफ़ानी रात बहीखाना कमरे में बिजली जाने पर अमारा और कबीर अँधेरे में क़ैद हो जाते हैं, और बिना नक़ाब के वो लगभग तारा बन जाती है; कबीर उस भाभी का मातम खोलता है जिसे वो बचा नहीं पाया, और अमारा बेख़याली में वही लोरी गुनगुना उठती है जिस पर कबीर पत्थर हो जाता है। जैसे ही रौशनी लौटती है, गलियारे से एक ऐसी नन्ही आवाज़ 'मुम्मा' पुकारती है जो इस घर में नहीं होनी चाहिए थी, और आरव दौड़ कर सीधे कबीर की बाँहों में जा गिरता है।
जिस फ़ैसले के साथ पिछली रात ख़त्म हुई थी, इस रात वो फ़ैसला रफ़्तार बन चुका था। ... तारा ने ठान लिया था, अब हर कौर महीनों में नहीं, हफ़्तों में परोसा जाएगा, और उसी हफ़्ते उसने वो क़दम उठाया जिसकी हिम्मत छह बरस में उसने ख़ुद को नहीं दी थी। ... एक तूफ़ानी रात, बारिश की चादर ओढ़े, वो सीधी अहूजा हवेली के उस पुराने बहीखाना कमरे में उतर आई, जहाँ रतन चाचा के काग़ज़ का वो हिस्सा दफ़्न था, जिसे वो कभी पूरी तरह मिटा नहीं पाए थे।
बेला ने सूखे लहजे में मना किया था। ... 'उसी घर के तहख़ाने में, अकेले, तूफ़ान की रात? ... देसाई हर तरफ़ सूँघ रहा है, रतन का आदमी अब भी शहर में घूम रहा है, और तुम शेर की माँद में लालटेन ले कर घुस रही हो।' ... पर तारा को अब इत्मीनान की मोहलत नहीं थी। मेहरबान ट्रेडर्स का असली धागा यहीं, इन्हीं धूल भरे बस्तों में कहीं दबा पड़ा था, और उसे इसी घर की मिट्टी से खोदना था।
"सँभल के, बहू। ... इन सीढ़ियों की उम्र मेरी उम्र से भी ज़्यादा है।" ... "अरे, माडम, माडम। ... ये ज़ुबान भी ना, छह बरस पुरानी आदत है। ... इस घर में तो अब दीवारों के भी कान उग आए हैं।"
"तुम्हारी ज़ुबान से डर नहीं लगता, शांति काकी। ... इस पूरे घर में बस एक तुम्हीं हो, जिसके सामने मुझे 'अमारा' का बोझ नहीं उठाना पड़ता।" ... "बाक़ी हर जगह तो मुझे अपनी साँस भी नाप कर लेनी पड़ती है।"
"बोझ की बात मत कर, मेरी बच्ची। ... मैंने तुझे उस रात इसी देहलीज़ से बारिश में घिसटते देखा था, और आज इसी घर के एक-एक क़र्ज़ की डोर तेरी हथेली में है।" ... "पर एक बात कान खोल कर सुन। वो देसाई नाम का जाँच वाला कल फिर आया था। और रतन बाबू की आँखें... वो तुझे ऐसे तौलती हैं जैसे कोई बहुत पुराना हिसाब जोड़ रही हों। ... इस घर में ज़्यादा देर मत रुका कर, बहू।"
"हिसाब तो मैं भी जोड़ने ही आई हूँ, काकी। ... एक अधूरा हिसाब, जो छह बरस से मेरी हथेली पर लिखा है।" ... "मुझे बस मेहरबान ट्रेडर्स के सबसे पुराने बहीखाते चाहिए। ... इसी घर के काग़ज़ एक दिन इसी घर के ख़िलाफ़ गवाही देंगे।"
बाहर तूफ़ान हवेली की खिड़कियों को यूँ पीट रहा था, जैसे छह बरस पुरानी कोई चीख़ अंदर आना चाहती हो। ... तभी गलियारे में क़दमों की आहट हुई।
दरवाज़े पर कबीर था। ... वो अपनी रोशनी हाइट्स की पुरानी फ़ाइलें उठाने आया था, जो इसी बहीखाना कमरे में कहीं दबी थीं। पर अमारा को यहाँ, धूल भरे बस्तों के बीच खड़ी देख कर वो एक पल को ठिठक गया।
"आप? ... इस वक़्त, इस तहख़ाने में?" ... "पूरा शहर तूफ़ान में डूबा है, मिस अमारा, और हुमा कैपिटल की मालकिन अकेली, अहूजा हवेली के सबसे पुराने कमरे में, बरसों पुराने काग़ज़ खंगाल रही हैं। ... आप कभी सीधे रास्ते नहीं चलतीं, है ना?"
"सीधा रास्ता उनके लिए होता है, मिस्टर अहूजा, जिनका कुछ छिपाने को ना हो।" ... "और मैं वही देखने आई हूँ, जो इस घर ने बरसों से धूल के नीचे छिपा रखा है। ... आप अपनी फ़ाइल उठाइए, मैं अपनी।"
"आप दोनों बड़े लोग अपने-अपने काग़ज़ देखो, मैं दूसरी लालटेन ले कर आती हूँ। ... इस तूफ़ान में तो अभी बत्ती गई..." ... "...और गई।"
और उसी लफ़्ज़ के साथ पूरी हवेली अँधेरे में डूब गई। ... शांति की लालटेन गलियारे में दूर जाती एक नन्ही सी लौ रह गई, और फिर वो भी ग़ायब हो गई। ... बहीखाना कमरे का वो भारी, पुराना दरवाज़ा, जो बरसों से अपने ही वज़न से टेढ़ा था, हवा के एक झोंके से चरमरा कर अटक गया। ... और उस घुप अँधेरे में अब सिर्फ़ दो लोग बचे थे। कोई अमारा नहीं, कोई लेनदार नहीं। बस दो इंसान, और एक ही घर के दो पुराने ज़ख़्म।
"हे भगवान, ये दरवाज़ा फिर अटक गया! ... आप घबराना मत, बहू... माडम! ... मैं नीचे से चाबी और लालटेन ले कर आती हूँ। ... इस तूफ़ान में तो बिजली घंटों नहीं लौटेगी।"
अँधेरे की एक अजीब आदत होती है। वो चेहरों के नक़ाब उतार देता है। ... तारा को अपना 'अमारा' वाला मुखौटा नज़र ही नहीं आ रहा था, और शायद इसीलिए वो उसे पहनना भूल गई। ... कबीर एक पुराने बस्ते के सहारे बैठ गया, और उसकी आवाज़ अँधेरे में नरम हो आई।
"आपको पता है, मैं इस कमरे में आख़िरी बार सात बरस पहले आया था। ... भाभी के साथ।" ... "वो नई-नई ब्याह कर आई थीं, और इस घर का हिसाब-किताब सीख रही थीं। इसी कमरे में, इन्हीं बस्तों की धूल में बैठ कर, वो घंटों बहीखाते पढ़ती थीं।"
"आपकी भाभी। ... वही, जिनकी लोरी आप भूल नहीं पाते।" ... "बताइए ना... वो कैसी थीं?"
"वो इस पत्थर के घर में एक अकेली जलती हुई मोमबत्ती थीं। ... सबसे छोटी बहू, और सबसे बड़ा दिल।" ... "मैं इस घर का सबसे बेकार बेटा था, सबकी नज़रों में। पर तारा भाभी ने कभी मुझे बेकार नहीं समझा। ... वही एक थीं, जो मेरे अधूरे नक़्शे देख कर कहती थीं, 'कबीर, एक दिन तू इस शहर की सबसे ऊँची इमारत बनाएगा।'"
"और जिस रात इस घर ने उन पर चोरी का इल्ज़ाम मढ़ा, उन्हें पेट से, बारिश में, चोर कह कर घसीट कर बाहर फेंका... ...उस रात मैं शहर में नहीं था।" ... "मैं लौटा, तो सुना कि वो ट्रेन के उस हादसे में चली गईं। ... मैं उन्हें बचा नहीं पाया, अमारा। मैं वहाँ था ही नहीं। ... और उसी रात मैंने ये घर छोड़ दिया। इसलिए नहीं कि मुझे इनसे नफ़रत थी, बल्कि इसलिए कि मैं ख़ुद को आईने में नहीं देख पा रहा था।"
अँधेरे में तारा की आँखों से आँसू बह निकले, और पहली बार उसे उन्हें रोकना नहीं पड़ा, क्योंकि उन्हें देखने वाला कोई नहीं था। ... उसके सामने वो अकेला इंसान बैठा था, जिसने उसके लिए ये घर छोड़ा था। ... और वो अब भी उसे ये नहीं बता सकती थी कि जिसे वो मरा समझ कर रो रहा है, वो ठीक उसके सामने, एक हाथ भर की दूरी पर साँस ले रही है।
"मत कीजिए अपने आप को माफ़, मिस्टर अहूजा। ... कुछ क़र्ज़ ऐसे होते हैं, जो चुकाने वाला मर भी जाए, तो माफ़ नहीं होते।" ... "और कुछ हिसाब मुर्दों के साथ दफ़्न नहीं होते। ... वो राख के नीचे दबे पड़े रहते हैं, अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए।"
"आप... आप जब ऐसे बोलती हैं, तो लगता है आप इस दर्द को अंदर से जानती हैं। ... जैसे आपने भी किसी को इसी तरह खोया हो।" ... "कौन हैं आप, अमारा? ... कभी लगता है, मैं आपको बरसों से जानता हूँ, और कभी लगता है, बिल्कुल नहीं जानता।"
अँधेरे में उनके बीच की दूरी अब एक साँस भर की रह गई थी। ... छह बरस में पहली बार, किसी की इतनी क़रीबी से उसे डर नहीं, एक अजीब सा सुकून मिला। ... और यही सुकून सबसे ख़तरनाक चीज़ थी। क्योंकि सुकून में इंसान अपना पहरा भूल जाता है।
"हम्म... हम्म हम्म, हम्म... हम्म हम्म..." ... "...सो जा रे, सो जा, मेरे चाँद के टुकड़े..."
और अँधेरे में कबीर पत्थर हो गया। ... उसकी साँस रुक गई। वो लोरी। वही लोरी। ... चाँद के टुकड़े वाली वो लोरी, जो उसने बचपन में इसी हवेली की छत पर, अपनी भाभी के होंठों पर सुनी थी। जो इस पूरी दुनिया में सिर्फ़ एक इंसान गाता था। ... और वो इंसान छह बरस पहले मर चुका था।
"...अँधेरा तेरा कुछ ना बिगाड़े, माँ की गोद में सो जा, मेरे राजे..." ... "..."
"ये लोरी..." ... "...ये लोरी आपको कहाँ से आती है, अमारा? ... मैंने ये बरसों से किसी और के मुँह से नहीं सुनी। ... सिर्फ़..." ... "...नहीं। ... कुछ नहीं। ... इस अँधेरे में मेरा दिमाग़ मुझसे कोई पुराना खेल खेल रहा है।"
"मैंने कहा था ना, लोरियाँ सबकी एक जैसी होती हैं।" ... "चाँद, नींद, माँ की गोद। ... इसमें ऐसा क्या है, जो सिर्फ़ किसी एक का हो?" ... "कुछ भी तो नहीं।"
तभी गलियारे में एक पीली रौशनी काँपी, और उस भारी दरवाज़े की दरार से लालटेन की लौ झाँकी। ... किसी ने बाहर से ज़ोर लगा कर वो अटका दरवाज़ा खोला, और अँधेरे का वो जादू, जिसने दो लोगों को उनके नक़ाबों से नंगा कर दिया था, टूट गया।
"आ गई, आ गई! ... माफ़ करना, नीचे तो पूरा घर उलट-पुलट है, आधे लोग मोमबत्तियाँ ढूँढ रहे हैं।" ... "आप ठीक तो हैं ना, माडम? ... इतने अँधेरे में डर तो नहीं लगा?"
"मैं... मैं अपनी फ़ाइलें फिर कभी ले जाऊँगा।" ... "माफ़ कीजिए, अमारा। पता नहीं इस अँधेरे में मैं क्या-क्या कह गया।" ... "पर वो लोरी... मैं उसे अब फिर से नहीं भूल पाऊँगा।"
कबीर के जाते ही तारा ने पीछे की दीवार का सहारा लिया। ... बेला की वही सूखी चेतावनी उसके कानों में गूँज उठी, 'तुम इस परिवार के जितने पास रहोगी, आरव उतना ही ख़तरे में होगा।' ... आज वो ख़तरा किसी फ़ाइल या फंदे का नहीं था। आज वो ख़तरा उसके अपने सीने में था, जो एक लोरी पर, एक अँधेरे कमरे में, चुपके से दरक गया था।
"मैंने तुझसे कहा था ना, बहू, ये घर तेरे लिए महफ़ूज़ नहीं। ... और वो लड़का..." ... "...उसकी आँखें तुझ पर बहुत देर तक ठहरती हैं। और जो इंसान सच से इतना प्यार करता हो, वो एक दिन सच को पहचान ही लेता है।"
और ठीक उसी वक़्त, हवेली के बाहर, बारिश में भीगते गेट पर एक गाड़ी खड़ी थी। ... तारा उस शाम आरव को साथ ले आई थी, ये सोच कर कि बस पाँच मिनट का काम है, और फिर बेटे को घर छोड़ देगी। पर बिजली गई, दरवाज़ा अटका, और वो पाँच मिनट आधे घंटे में बदल गए। ... वो नन्हा तूफ़ान जानता था कि उसकी मुम्मा उसी 'बड़े सोने वाले घर' के अंदर है, और तूफ़ान की एक कड़क के साथ, उसने आया का हाथ छुड़ाया, और उस अँधेरी, बरसती हवेली के अंदर भाग गया।
बहीखाना कमरे में शांति बस्ते समेट रही थी, तारा अपनी साँस सँभाल रही थी, कि तभी गलियारे के दूर वाले सिरे से एक आवाज़ आई। ... एक नन्ही, डरी हुई आवाज़, जिसे इस घर की किसी दीवार को कभी नहीं छूना चाहिए था।
"मुम्मा? ... मुम्मा, आप कहाँ हो?" ... "यहाँ बहुत अँधेरा है... मुझे डर लग रहा है, मुम्मा!"
तारा का ख़ून जम गया। ... इस पूरी दुनिया में एक ही आवाज़ थी, जो उसे 'मुम्मा' कहती थी, और वो आवाज़ इस वक़्त, इसी घर के इसी गलियारे में गूँज रही थी। ... और दरवाज़े पर ठिठका कबीर, जो अभी-अभी जा ही रहा था, उस आवाज़ की तरफ़ मुड़ गया।
"आरव... नहीं!" ... "रुक जा, बेटा, वहीं रुक जा! ... मैं आ रही हूँ, बस वहीं रुक!"
पर बहुत देर हो चुकी थी। ... लालटेन की लौ देख कर आरव दौड़ पड़ा, और उस अँधेरे गलियारे में वो पाँच साल का बच्चा ये नहीं पहचान सका कि रौशनी के पास खड़ी वो परछाईं उसकी माँ की नहीं है। ... वो दौड़ता हुआ आया, और सीधा सबसे पास खड़ी बाँहों में जा गिरा। ... कबीर की बाँहों में।
"मिल गया रास्ता!" ... "अरे! ... आप तो वही हो! ... बड़े शेर वाले अंकल! ... रोशनी हाइट्स वाले!" ... "मैंने कहा था ना मैं बहादुर हूँ। मैं अकेले, अपनी मुम्मा को ढूँढते-ढूँढते यहाँ तक आ गया!"
"हे राम..." ... "...ये बच्चा... इस घर में... इनकी बाँहों में..."
और वहाँ, उस अँधेरे बहीखाना कमरे की देहलीज़ पर, वो मंज़र जम गया, जिसका डर तारा को छह बरस से था। ... उसका बेटा, समर का ख़ून, उस अकेले अहूजा की बाँहों में, जो कभी तारा को जानता था, जो अभी-अभी उसी की लोरी अँधेरे में सुन चुका था। ... एक बच्चा, जिसने 'मुम्मा' पुकारा था एक ऐसे कमरे में, जहाँ सिर्फ़ अमारा खड़ी थी। ... कबीर ने बच्चे को थामे, धीरे से नज़र उठाई, पहले तारा की तरफ़, फिर उन बड़ी-बड़ी आँखों की तरफ़। ... और उस एक पल में, हवा में टँगी उस अधूरी लोरी और उन जानी-पहचानी आँखों के बीच, वो सवाल जनम ले रहा था, जिसे आज तक गिनने की हिम्मत किसी ने नहीं की थी।
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