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Chapter 20 of 30

उस रात का सच

राख से उठी by Avni Oberoi

वो आख़िरी लफ़्ज़ अँधेरे में घुल गया, और बटरा का पुराना फ़ोन ख़ामोश हो गया। ... पर ये ख़ामोशी पहले जैसी नहीं थी। कमरे में अब भी रतन की वो ठंडी आवाज़ तैर रही थी, छह बरस पुरानी, पर उतनी ही ताज़ा जितनी उस बारिश की रात। कबीर की उँगली फ़ोन पर जमी थी, और अमारा पत्थर बनी बैठी थी।

“ये कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं था।” ... “छह बरस मैं हर रात शुक्र करती रही कि ख़ुदा ने मुझे उस डूबती ट्रेन से बचा लिया।” ... “पर मुझे बचाया नहीं गया था, कबीर। मुझे भेजा गया था... मरने के लिए। मेरा ज़िंदा रहना ही असली हादसा था।”

“तारा, मेरी तरफ़ देखो।” ... “हाँ, उन्होंने तुम्हें मारना चाहा, और तुम उनकी हर साज़िश के बावजूद बच गईं।” ... “पर अब ये सिर्फ़ तुम्हारे नाम की लड़ाई नहीं रही। जिस पल उसे पता चलेगा कि तुम ज़िंदा हो, वो दुबारा कोशिश करेगा। ये अब तुम्हारी जान की जंग है।”

छह बरस से अमारा के भीतर एक बहीखाता चलता आया था। ... एक तरफ़ उनका गुनाह, दूसरी तरफ़ उसका हिसाब। पर बटरा के फ़ोन की उस एक आवाज़ ने पूरा बहीखाता उलट दिया। जो अब तक इंसाफ़ का सवाल था, वो एक पल में जीने और मरने का सवाल बन गया।

“मैं यहाँ हिसाब वसूलने आई थी, कबीर।” ... “एक चोरी का, एक झूठ का, एक बेइज़्ज़ती का। मैंने सोचा सबसे बड़ा गुनाह मेरा नाम चुराना था।” ... “पर उन्होंने मेरा नाम नहीं, मेरी साँस चुरानी चाही थी। और वो हिसाब राख से नहीं चुकता।”

“और वो आदमी अब भी उसी घर में बैठा है।” ... “मेरी माँ के बग़ल में, हर सुबह की चाय पर, जैसे उसने कभी किसी की जान नहीं ली।” ... “छह बरस से वो एक क़ातिल के साथ एक छत के नीचे सो रहे हैं, और किसी को ख़बर नहीं।”

“मुझे वो रात याद है, कबीर। हर पल याद है।” ... “बारिश, बालों से घसीटा जाना, वो देहरी जो मेरे पीछे बंद हुई। मैं समझती थी वो ज़िल्लत का अंत था।” ... “पर वो पहला वार था। असली फ़रमान तो उस फ़ोन पर पहले ही दिया जा चुका था।”

सोफ़े पर बटरा बुख़ार में कराह रहा था, बेख़बर कि उसके फ़ोन की एक आवाज़ ने अभी क्या तोड़ा है। ... मेज़ पर चाय के वही दो कप ठंडे पड़े थे, एक नई ज़िंदगी के इंतज़ार में रखे। और अमारा की नज़र अनजाने में अपने फ़ोन की तरफ़ चली गई, उस स्क्रीन पर जहाँ उसके सोते बेटे की एक पुरानी तस्वीर थी।

“अगर वो एक बार मार सकता है, कबीर...” ... “...तो उसकी परछाईं जहाँ पहुँचेगी, वहाँ राख छोड़ती जाएगी। और मेरी राख से बड़ी एक चीज़ अब साँस ले रही है।” ... “आरव। अगर उसकी नज़र कभी मेरे बेटे तक पहुँची...”

“नहीं पहुँचेगी।” ... “आरव बेला के पास महफ़ूज़ है, इस शहर के सबसे दूर कोने में, जहाँ अहूजा नाम की हवा भी नहीं पहुँचती।” ... “और इस बार तुम अकेली नहीं हो, तारा। इस बार तुम्हारे और उस आदमी के बीच मैं खड़ा हूँ।”

तभी बाहर बजरी पर टायरों की आवाज़ उभरी, और दोनों की साँस रुक गई। ... कबीर खिड़की तक गया, झिरी से झाँका, और उसके कंधे ढीले पड़ गए। बाहर खड़ी गाड़ी जानी-पहचानी थी। फ़िक्सर नहीं लौटा था। बेला आई थी।

“मैं दो कप चाय के लिए थोड़ी देर से आई थी।” ... “और यहाँ पूरा जंग का मैदान सज गया। बटरा की ये हालत, वो टूटा दरवाज़ा, तुम्हारे हाथों पर ख़ून।” ... “मुझे एक एक लफ़्ज़ बताओ, अमारा। शुरू से। कौन आया था?”

“रतन का आदमी। हमसे पहले पहुँच गया।” ... “बटरा को अधमरा कर के लाया, और असली दस्तख़त वाला काग़ज़ जेब में डाल कर ले गया। छह बरस की मेहनत, एक रात में।” ... “पर काग़ज़ जाने से पहले, बटरा ने हमें कुछ और सुनाया।”

“कुछ और? क्या?” ... “तुम्हारी आँखें ऐसी तब नहीं होतीं जब सिर्फ़ पैसा जाता है। ये किसी और ही चीज़ का रंग है।” ... “वो पुराना फ़ोन। उसमें क्या था?”

अमारा ने कुछ नहीं कहा। ... उसने बस झुक कर बटरा का फ़ोन उठाया, वो बेनाम फ़ाइल दुबारा खोली, और कमरे में एक बार फिर वही खरखराती, छह बरस पुरानी आवाज़ भर गई। रतन का वो ठंडा हुक्म। बेला की उँगलियाँ मेज़ के किनारे पर सफ़ेद पड़ गईं।

“ये सिर्फ़ चोरी नहीं थी।” ... “वो इस औरत को उस ट्रेन पर मारना चाहता था। जिस पल उसने कहा, ज़िंदा उतर कर वापस ना आए, ये पूरी लड़ाई बदल गई।” ... “ये अब क़र्ज़ की जंग नहीं, क़त्ल की है, अमारा। और तुम उसका अधूरा छूटा काम हो।”

“और सबसे बुरी बात अभी बाक़ी है, बेला।” ... “उस आदमी ने आज अमारा का चेहरा क़रीब से देखा। और जाते जाते कहा कि ये चेहरा उसने कहीं देखा है, किसी बहुत पुरानी बारिश में।” ... “वो याद करने की कोशिश कर रहा था। और वो अभी दिल्ली जा रहा है।”

“रतन के पास। ख़ुद, अपने मुँह से रिपोर्ट देने।” ... “वही आदमी छह बरस पहले तारा को उस ट्रेन तक धकेल कर लाया था। उसने वो चेहरा मरते हुए देखा था, और आज ज़िंदा देखा है।” ... “अगर उसे याद आ गया... तो रतन को जोड़ते देर नहीं लगेगी।”

“वो जोड़ लेगा, बेला। मुझे कोई शक नहीं।” ... “रागिनी ने एक तस्वीर से जोड़ लिया। कबीर ने एक लोरी से। और रतन इन दोनों से कहीं तेज़ है।” ... “सवाल ये नहीं कि उसे पता चलेगा। सवाल ये है कि जिस पल पता चलेगा, वो सबसे पहले किस पर हाथ डालेगा।”

“समझ लो, अमारा। उसके लिए तुम एक मोहरा नहीं, पूरी बिसात हो।” ... “तुम्हारे इर्द गिर्द हर इंसान अब उसकी एक चाल है। शांति, जो इसी घर के अंदर है। कबीर, जो खुल कर तुम्हारे साथ है।” ... “और वो, जिसका नाम हम इस कमरे में भी ज़ोर से नहीं लेते।”

“मेरी फ़िक्र मत करो।” ... “मैं उस घर से कब का निकल चुका हूँ। मेरा नाम, मेरी जड़ें, सब मैंने ख़ुद जला दी हैं।” ... “मैं उसकी बिसात का मोहरा नहीं, उसके रास्ते की दीवार हूँ।”

“तुम्हारी बात नहीं कर रही, कबीर।” ... “मैं उस पाँच बरस के बच्चे की बात कर रही हूँ, जो इस पूरे खेल में सबसे छोटा और सबसे बड़ा दाँव है।” ... “रतन अभी उसके बारे में नहीं जानता। पर जिस दिन वो तुम तक पहुँचा, वो उस घर की हर परछाईं तक पहुँच जाएगा। और उस परछाईं में एक बच्चा है।”

“आज रात, बेला। अभी।” ... “आरव को उस ठिकाने से निकालो जहाँ वो अभी है। नया घर, नया नाम, कोई निशान नहीं जो हुमा तक या मुझ तक जोड़ा जा सके।” ... “मैंने उन्हें अपनी राख दे दी। पर अपने चाँद का एक टुकड़ा नहीं दूँगी।”

“अभी निकलती हूँ। सुबह से पहले आरव किसी और ही शहर में होगा, जहाँ अहूजा नाम एक अफ़वाह भी नहीं।” ... “कुसुम माँ ने मुझे भी राख से उठाया था, अमारा। मैं जानती हूँ एक बच्चे को बचाना क्या होता है।” ... “तुम रतन तक पहुँचने का रास्ता सोचो। बच्चे को मैं सँभालती हूँ।”

“जाओ। और सुनो, बेला।” ... “छह बरस मैंने हर कौर धीरे धीरे परोसा, क्योंकि ये सिर्फ़ हिसाब था, और हिसाब सब्र माँगता है।” ... “पर कुछ क़र्ज़ पैसे से नहीं, साँसों से चुकाए जाते हैं। और ये वाला अब मेरी अपनी जान की ज़मानत पर खड़ा है।”

उसी रात, दिल्ली के दूसरे छोर पर, रतन अहूजा अपनी बैठक की मद्धम रौशनी में इंतज़ार कर रहे थे। ... दरवाज़ा खुला, और फ़िक्सर अंदर आया, रात की ठंड और ख़ून की बासी महक लिए। उसने बिना एक लफ़्ज़ वो असली दस्तख़त वाला काग़ज़ मेज़ पर रखा, और उसके बग़ल में कुछ धुँधली तस्वीरें, जो उसने दूर से उस औरत की खींची थीं।

“तो ये है वो काग़ज़।” ... “छह बरस पुरानी एक ग़लती, आख़िरकार मेरी मेज़ पर वापस। जानते हो, इसने मुझे कितनी रातों की नींद उधार में रखी?” ... “तुमने अच्छा काम किया। पर तुम्हारी आवाज़ में कुछ और भी है। बोलो।”

“काग़ज़ आपके पास है, साहब। पर बात काग़ज़ की नहीं।” ... “वो हुमा वाली औरत। मैंने उसका चेहरा आज इतने क़रीब से देखा जितना छह बरस में कभी नहीं।” ... “और मुझे याद आ गया, साहब। कि वो चेहरा मैंने पहले कहाँ देखा था।”

“कहाँ।” ... “तुम्हारी याददाश्त छह बरस में कभी नहीं भटकी, इसीलिए तुम मेरे काम के हो। तो बोलो, ये आधी रात को किस पुरानी बात की गिरह खोल रहे हो।”

“उस बारिश की रात, साहब। ठीक छह बरस पहले।” ... “वही चेहरा। वो बहू, जिसे मैं ख़ुद उस आख़िरी ट्रेन तक धकेल कर लाया था। वही आँखें, जो उस रात मुझे प्लेटफ़ॉर्म पर देख रही थीं।” ... “वो अमारा कोई और नहीं। वो वही बहू है, साहब। तारा।”

रतन अहूजा एकदम स्थिर हो गए, उँगलियाँ मेज़ पर बीच थाप में जमी हुई। ... एक लम्बे पल तक वो कुछ नहीं बोले। फिर उन्होंने धीरे से दराज़ खोली और एक पुरानी फ़ाइल निकाली, वो हादसे की रिपोर्ट, जिसके साथ नत्थी थी उस बहू की पीली पड़ चुकी तस्वीर।

“ये मुमकिन नहीं।” ... “वो बहू उस पटरी पर राख हुई थी। मैंने ख़ुद पक्का करवाया था। कोई लाश नहीं, कोई सबूत नहीं, कोई वापसी नहीं।” ... “मुर्दे लौट कर हिसाब नहीं माँगते।”

रतन ने वो पीली पुरानी तस्वीर उठाई और उसे फ़िक्सर की खींची अमारा की तस्वीरों के बराबर रख दिया। ... दीये की काँपती लौ में दोनों चेहरे एक दूसरे को घूरते रहे। वही माथा, वही आँखें, बस उनमें अब वो डर नहीं था। उन चेहरों के बीच के छह बरस राख की तरह गिर पड़े।

“वही आँखें।” ... “वही आँखें जो हर बोर्डरूम में मुझे घूरती रही हैं। वही औरत जो छह बरस पुराने ऑडिट का सवाल पूछती है, जो मेरे घर में यूँ चलती है जैसे वो उसका अपना हो।” ... “क्योंकि वो उसका अपना ही है। ये हुमा अजनबी नहीं, मेरी अपनी दफ़नाई हुई बहू है।”

“और कबीर साहब, साहब।” ... “वो उसके साथ खड़े थे, सेफ़हाउस में, उसकी हिफ़ाज़त में। मुझे तब समझ नहीं आया था कि इस घर का बेटा उस औरत के साथ क्यों है।” ... “अब समझ आता है। वो अपनी भाभी के साथ खड़ा था।”

रतन अहूजा की आँखों के सामने पिछले कई महीने एक नए रंग में रंग गए। ... हुमा का अचानक आना, कबीर को वापस बुलाने की वो अजीब शर्त, हर कौर जो ठीक वहीं गिरा जहाँ सबसे दर्द हुआ। ये किसी लेनदार का कारोबार नहीं था। ये एक औरत का बदला था, जिसे उन्होंने मरा समझ कर फेंका, और जो राख से उठ कर उनकी मेज़ तक आ पहुँची थी।

“अमारा।” ... “वही बहू, जिसे इस घर ने राख किया था। छह बरस बाद वो अपना हिसाब वसूलने लौट आई है, मेरे ही घर में बैठ कर।” ... “और मैं उसके सामने झुकता रहा, बिना जाने कि जिस मुर्दे से मैं क़र्ज़ माँग रहा हूँ, वो ज़िंदा है।”

“छह बरस पहले आपने कहा था, कोई लाश नहीं, कोई सबूत नहीं।” ... “मैंने ठीक वैसा ही किया था, साहब। ये मेरी ग़लती नहीं थी कि वो ट्रेन से ज़िंदा उतर गई।” ... “तो अब? फिर वही रास्ता? कोई ट्रेन, कोई हादसा?”

“नहीं। इस बार कोई ट्रेन नहीं, कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं, कोई ऐसी ग़लती नहीं जो छह बरस बाद मेरी मेज़ पर वापस आए।” ... “जिस बहू को हमने दफ़नाया था, वो अपना हिसाब वसूलने लौट आई है। इस बार तुम उसे अधूरा नहीं छोड़ोगे।” ... “इस बार... उसे ठीक से ख़त्म करो।”

रतन अहूजा ने दोनों तस्वीरें उठाईं और उन्हें एक पल के लिए दीये की लौ के ऊपर थामा, जैसे परख रहे हों कि राख को दुबारा जलाना कितना आसान होगा। ... फिर उनकी उँगलियाँ फिर मेज़ पर थाप देने लगीं। एक। दो। तीन। छह बरस बाद, पहली बार, शिकारी को पता था कि उसका शिकार कौन है। और उस पूरे शहर में सिर्फ़ एक इंसान थी जो अभी नहीं जानती थी कि उसका क़ातिल अब उसका नाम जान चुका है।

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