DesiHub

Chapter 22 of 30

खून का रिश्ता

राख से उठी by Avni Oberoi

रतन अहूजा की बैठक में शाम किसी पुराने ख़ून की तरह जमी हुई थी। ... भारी परदे खिंचे थे, एक अकेली मेज़-बत्ती जल रही थी, और उसी पीली रौशनी में रतन यूँ बैठे थे जैसे बरसों से किसी के आने का इंतज़ार कर रहे हों। जब रागिनी बहे काजल और उतरे गहनों के साथ अंदर आई, तो वो ना चौंके, ना उठे। बस एक मेहरबान मुस्कान से उसका इस्तक़बाल किया, उसी मुस्कान से जिसके पीछे छह बरस पहले एक बहू की मौत का हिसाब लिखा गया था।

“चाचा जी...” ... “मैं आपके लिए एक ऐसी ख़बर लाई हूँ जो इस पूरे शहर में सिर्फ़ आपके लिए हीरे से क़ीमती है। वो हुमा वाली औरत, अमारा... वो अमारा नहीं है।” ... “वो तारा है, चाचा जी। वही बहू जिसे हमने उस रात राख कर दिया था। वो मरी नहीं, ज़िंदा लौट आई है, और आपकी अपनी मेज़ पर बैठ कर आपको एक-एक कर के बर्बाद कर रही है।”

“बैठ जा, बेटी। साँस ले।” ... “इतनी दूर से इतनी बड़ी ख़बर ले कर भागी आई, और मैंने अभी तक तुझे पानी तक नहीं पूछा। ये अहूजा घर के तौर-तरीक़े नहीं।” ... “अब आराम से बता। तू कह रही है कि अमारा असल में तारा है।”

रागिनी ठिठक गई। ... उसने ये बैठक हज़ार बार अपने ज़हन में खेली थी। हर बार इसमें रतन का चेहरा सफ़ेद पड़ता, आवाज़ काँपती, वो बिखर जाते। पर सामने बैठा आदमी ना काँपा, ना पीला पड़ा। उसने बस पानी का गिलास आगे बढ़ा दिया, जैसे रागिनी ने मौसम की बात की हो, ख़ून की नहीं।

“तुझे लगता है तू मेरे घर में आग की ख़बर ले कर आई है, रागिनी।” ... “पर बिटिया, जिस आग की तू बात कर रही है, उसका धुआँ मैं दो रातें पहले ही सूँघ चुका हूँ।” ... “अमारा तारा है। ये मैं तुझसे पहले जान चुका हूँ।”

रागिनी के चेहरे से सारा रंग एक ही पल में उतर गया। ... वो पूरे रास्ते यही सोचती आई थी कि उसके पास वो एक चीज़ है जो सिर्फ़ उसके पास है, तारा का असली नाम, वो चाबी जिससे वो इस घर में अपनी खोई जगह ख़रीद लेगी। पर वो चाबी रतन की मुट्ठी में पहले से पड़ी थी। जिस राज़ को बेचने वो इतनी दूर आई थी, उसका ख़रीदार उसे मुफ़्त में जानता था।

“आपको... आपको पता था?” ... “दो रातों से आप जानते हैं कि वो तारा है, और वो अब भी ज़िंदा है? अब भी साँस ले रही है?” ... “जिस आदमी ने एक बार उसे मारने की क़ीमत चुकाई, वो दुबारा उसे अपनी मेज़ पर बैठा देख कर चुप बैठा है? आप तो कहते थे उस रात का काम पूरा हो गया था।”

“पूरा हुआ था, बेटी। मुझे तो यही बताया गया था।” ... “छह बरस मैं चैन से सोया, इस यक़ीन में कि वो हिसाब चुक गया। फिर एक तस्वीर मेरी मेज़ पर आई, उस बरसाती रात के चेहरे के बराबर, और मेरी नींद उड़ गई।” ... “पर मैं तेरी तरह घबरा कर नहीं दौड़ता। मैं इंतज़ार करता हूँ, सही वक़्त, सही हाथ। जल्दबाज़ी में की मौत सवाल छोड़ जाती है, और वही सवाल आज मेरी मेज़ पर बैठा है।”

“तो फिर मैं...” ... “मैं आपके पास जो ख़बर ले कर आई, वो तो आपके पास पहले से थी। मैं आपके किसी काम की नहीं रही।” ... “मैंने अपना आख़िरी पत्ता आपके सामने रख दिया, और वो पत्ता आपकी जेब में पहले से पड़ा था।”

“काम की?” ... “बेटी, अब सवाल ये नहीं कि तू मेरे किस काम की है। सवाल ये है कि तू मेरे लिए कितनी बड़ी मुसीबत है।” ... “तू जानती है कि अमारा तारा है। तुझे चोर कह कर निकाला गया है। तेरे पास खोने को कुछ नहीं बचा, और तेरी ज़बान पर किसी को यक़ीन नहीं। ऐसी औरत या तो सबसे अच्छा हथियार होती है... या सबसे ख़तरनाक गवाह।”

उन आख़िरी लफ़्ज़ों में रागिनी को अपनी मौत की परछाईं दिखी। ... वो समझ गई कि जिस आदमी के पास वो पनाह माँगने आई थी, वो उसे या तो इस्तेमाल करेगा, या उसी तरह ख़ामोश करा देगा जैसे बरसों पहले एक बहू को किया था। इस मेज़ पर उसके लिए सिर्फ़ दो रास्ते बचे थे, और दोनों की डोर रतन की मुट्ठी में थी।

“पर मैं अपने घर की बहू को यूँ बेकार नहीं फेंकता।” ... “तू अपनी खोई जगह ढूँढती मेरे पास आई है ना? वो घर तो नहीं, समर ने वो दरवाज़ा बंद कर दिया।” ... “पर उससे बड़ी चीज़ दे सकता हूँ। तारा। उसका अंत। और उस मेज़ पर एक कुर्सी, जहाँ हम वो काम पूरा करेंगे जो छह बरस पहले अधूरा रहा। तू और मैं, उस रात की तरह।”

“उस रात...” ... “उस रात मैंने सोचा था कि तारा को मिटा कर मैं इस घर की मालकिन बन जाऊँगी। बन भी गई, पूरे छह बरस।” ... “और उसी ने लौट कर मुझसे मेरा एक-एक ज़र्रा छीन लिया। तो ठीक है, चाचा जी। जो अधूरा रहा, इस बार उसे पूरा होने दीजिए। और इस बार मेरे हाथ काँपेंगे नहीं।”

और यूँ, उसी मेज़ पर, उसी अँधेरे में, वो पुराना ख़ून का रिश्ता दुबारा बँध गया। ... छह बरस पहले जिन दो हाथों ने मिल कर एक पेट से बहू को राख किया था, आज वो फिर एक-दूसरे की तरफ़ बढ़े, इस बार उसी राख से उठी औरत को दुबारा जलाने के लिए। एक की नफ़रत, दूसरे का सब्र, और उन दोनों के बीच बस एक ही नाम, तारा।

“पर इस बार कोई ट्रेन नहीं, कोई ऐसा हादसा नहीं जिससे वो ज़िंदा उतर आए।” ... “और, बेटी, उस देसाई की फ़ाइल आज भी खुली है, जो तारा की मौत का सबूत माँग रही है।” ... “तो जिस दिन ये हुमा वाली औरत मरेगी, दुनिया उसे तारा समझ कर दफ़नाएगी। एक ही लाश से दो क़ब्रें भर जाएँगी। तारा भी ख़त्म, उसका खुला मुक़दमा भी।”


शहर के दूसरे छोर पर, हुमा के उसी बेनाम दफ़्तर में, रात गहरा रही थी। ... अमारा खिड़की के पास खड़ी थी, नीचे फैली पुरानी दिल्ली की बत्तियों को देखती हुई, जिनमें कहीं एक हवेली थी जो उसकी थी, और कहीं एक क़ब्र जो उसकी होनी चाहिए थी। बेला दरवाज़ा खोल कर अंदर आई, एक हाथ में फ़ोन और चेहरे पर वही सूखी, सतर्क वफ़ादारी।

“रागिनी रतन के पास पहुँच गई।” ... “मेरे आदमी ने उसकी गाड़ी घंटे भर पहले रतन की इमारत के बाहर देखी। वो अंदर गई, और अभी तक बाहर नहीं आई।” ... “जिन दो हाथों ने मिल कर तुझे उस रात मारा था, अमारा, वो आज एक ही कमरे में बंद हैं। ये मेल अच्छा नहीं।”

“जानती हूँ।” ... “रतन को अब पता है मैं कौन हूँ, रागिनी को भी, और अब वो दोनों एक मेज़ पर हैं।” ... “पर उनके हाथ में सिर्फ़ मेरा नाम है। मेरे हाथ में उस रिकॉर्डिंग की कॉपी है, जिसमें रतन ख़ुद मुझे मारने का हुक्म देता है। काग़ज़ उनके पास गया, पर बटरा ज़िंदा है, कबीर उसके पहरे पर है, और समर अब भी मेरे लिए अपने ही चाचा की क़ब्र खोद रहा है, ये समझे बिना कि कुदाल किसके हाथ में है।”

“मैं जानती हूँ तेरे पास पत्ते हैं।” ... “पर उस दिन भी कहा था, जिस औरत के पास खोने को कुछ ना बचे, वो सबसे ख़तरनाक होती है। और अब वो ज़ख़्मी साँप एक ऐसे आदमी की माँद में घुसा है जो पहले भी डस चुका है।” ... “फ़िक्सर तेरे चेहरे को उस बारिश वाली रात से जोड़ चुका है, अमारा। वो अब किसी अजनबी को नहीं, तारा को ढूँढ रहा है। और तारा के पास एक कमज़ोरी है जो अमारा के पास कभी नहीं थी।”

“आरव।” ... “मैंने उसे और गहरे छुपा दिया है, बेला। नया शहर, नया नाम, और उसके सिर पर वही चाँद जो उसे हर जगह अपना घर लगता है।” ... “रतन मेरे नाम तक पहुँच गया, ठीक है। पर मेरे बेटे तक पहुँचने से पहले उसे मेरी पूरी राख में से गुज़रना होगा। और राख सिर्फ़ बुझती नहीं, बेला, जलाती भी है।”

“तो हम रुकेंगे नहीं?” ... “तेरा हथौड़ा, समर, कल रतन के खातों में और गहरे उतरेगा। मैंने उसे मेहरबान ट्रेडर्स के आख़िरी तार तक का रास्ता दिखा दिया है, ये जताए बिना कि रास्ता मैंने बिछाया है।” ... “पर ध्यान रख, अमारा। तू समर का मुँह रतन की तरफ़ ताने बैठी है, और रतन तुझे मिटाने की तैयारी में है। दो चक्कियाँ एक साथ चल रही हैं, और तू ठीक बीच में खड़ी है।”


बेला के जाते ही, जैसे उसके नाम की गूँज उसे खींच लाई हो, समर हुमा के दफ़्तर पहुँचा। ... इस बार वो कोई मालिक नहीं था। वो एक टूटा हुआ आदमी था, हाथ में छह बरस पुरानी फ़ाइलों की थैली और सीने में एक सवाल जो उसे अंदर ही अंदर खा रहा था। वो उस औरत के पास आया था जिसे वो सिर्फ़ तारा की भेजी लेनदार समझता था, ये जाने बिना कि तारा ख़ुद उसके सामने खड़ी थी।

“मुझे उससे मिलना है, अमारा जी।” ... “आपने बताया था कि तारा ज़िंदा है, कहीं और, महफ़ूज़। मैं उस दिन से एक रात नहीं सोया। मुझे बस एक बार उसके सामने खड़ा होना है, एक बार कहना है कि मैं जानता हूँ मैंने क्या किया।” ... “मैंने एक पेट से औरत को, अपनी बीवी को, एक झूठ पर बारिश में फेंक दिया। कौन सी सज़ा इस गुनाह के बराबर होगी? बस मुझे उस तक पहुँचा दीजिए। उसके पैरों में गिर कर माफ़ी माँगना चाहता हूँ।”

“माफ़ी...” ... “माफ़ी माँगने से पहले सोचिए, समर जी, कि आपको माफ़ी की ज़रूरत किसने डाली। कंठी किसने चुराई? झूठे काग़ज़ किसने बनाए? और उस चोरी का असली पैसा किस शेल कंपनी से हो कर किसकी जेब में गया?” ... “तारा को ढूँढने से पहले उस हाथ को ढूँढिए जिसने उसे आपसे छीना। वो हाथ आज भी आपके अपने सिरहाने बैठा है।”

“आप ठीक कहती हैं। मैं ढूँढूँगा, उस हाथ को काट कर रहूँगा, चाहे वो किसी का भी हो।” ... “पर एक ज़ख़्म है, अमारा जी, जो किसी अदालत से पूरा नहीं होगा।” ... “जिस रात मैंने तारा को निकाला, वो अकेली नहीं थी। वो मेरे बच्चे से पेट से थी। मैंने उस रात सिर्फ़ एक औरत को नहीं, एक ऐसे बच्चे को भी मार दिया जिसकी मैंने कभी शक्ल तक नहीं देखी। मैं कभी बाप नहीं बन पाया, और उस ज़ख़्म का नाम तक मैं किसी को नहीं बता सकता।”

और तारा के ठीक सामने वो आदमी अपने मरे हुए बच्चे का मातम कर रहा था, उस बच्चे का जो असल में ज़िंदा था, उसी घड़ी उसी चाँद के नीचे सो रहा था। ... वो सच उसके गले में ख़ंजर की तरह अटका था। बस एक लफ़्ज़, और वो इस आदमी को बता सकती थी कि उसका बेटा साँस लेता है, हँसता है, आइसक्रीम गिरने पर रोता है। पर वो लफ़्ज़ उसके बेटे की जान की क़ीमत पर आता, और वो क़ीमत तारा कभी नहीं चुकाती।

“कुछ बच्चे राख में दफ़्न नहीं होते, समर जी।” ... “कुछ आग से बच निकलते हैं, और उस माँ के साथ पलते हैं जिसने उन्हें जन्म देने के लिए ख़ुद मरना क़बूल किया।” ... “पर वो बातें मुर्दों की हैं, और आप ज़िंदा हैं। ज़िंदा रहते जो हिसाब चुक सकता है, उस पर ध्यान दीजिए। असली चोर को ढूँढिए, समर जी। बाक़ी सब अपने आप राख से उठ आएगा।”


उसी रात, रतन अहूजा की उसी बैठक में, वो पुराना क़ातिल अपनी बिसात का पहला मोहरा आगे बढ़ा रहा था। ... रागिनी अब वो टूटी, गिड़गिड़ाती औरत नहीं रही थी जो घंटे भर पहले अंदर आई थी। उसकी आँखों में अब आँसू नहीं, एक ठंडा मक़सद जम चुका था। रतन ने मेज़ की दराज़ से एक छोटी सी शीशी निकाल कर उसके सामने रख दी।

“तू वो एक हाथ है, रागिनी, जिस पर किसी को शक नहीं होगा।” ... “तेरी ज़बान पर अब किसी को यक़ीन नहीं, इसलिए तेरा किया कभी गवाही नहीं बनेगा। और तू उस औरत के इतने क़रीब जा सकती है जितना मेरा कोई आदमी नहीं, औरत से औरत।” ... “अगले हफ़्ते रोशनी हाइट्स पर हुमा के नाम एक दावत है, पूरा शहर, बत्तियाँ, भीड़। और उसी ऊँचाई पर एक हादसा होगा। इस बार कोई ट्रेन नहीं, बेटी। इस बार तू।”

रागिनी ने वो शीशी अपनी मुट्ठी में बंद कर ली, और उसके होंठों पर वही पुरानी, ज़हरीली मुस्कान लौट आई। ... छह बरस पहले जिस छत से पेट से तारा को धकेला गया था, अब उसी ऊँचाई पर, एक दावत की रौशनी में, उसे दुबारा राख करने की तारीख़ लिख दी गई थी। और तारा, जो अपने ज़िंदा बेटे के मरने का झूठा मातम सुन कर लौटी थी, को ख़बर तक नहीं थी कि उसकी मौत अब किसी अजनबी के नहीं, एक जाने-पहचाने ज़हर के हाथ में थी, और वो घड़ी अभी अभी चलनी शुरू हुई थी।

Comments

Sign in to join the conversation.

No comments yet. Be the first to share your thoughts.