तारा को उसके अपने ससुराल ने चोरी के झूठे इल्ज़ाम में उस रात घर से निकाल दिया, जब वो समर के बच्चे से पेट से थी और उसका पति एक दूसरी औरत की बाँहों में जा चुका था। बारिश में, बेघर और बेनाम भटकती तारा उस रात एक ट्रेन हादसे में लापता हो गई, और अहूजा ख़ानदान ने चैन की साँस ली कि किस्सा ख़त्म हुआ। पर राख से भी कुछ उठता है। छह साल बाद दिल्ली की डूबती अहूजा हवेली के दरवाज़े पर अमारा नाम की एक औरत आती है, "हुमा कैपिटल" की बेनाम मालकिन, जिसके हाथ में अब अहूजा ख़ानदान के एक-एक क़र्ज़ की डोर है। किसी को याद नहीं कि ये वही बहू है जिसे उन्होंने मरने के लिए सड़क पर फेंक दिया था। किसी को नहीं पता कि उसके साथ जो पाँच साल का बेटा है, वो समर का ख़ून है। और किसी को नहीं पता कि उसके पास वो सबूत है जो चीख़-चीख़ कर बताएगा कि पैसे असल में किसने चुराए थे। अब बदला परोसा जाएगा, एक-एक कौर, एक-एक कोर्स। इस पूरे घर में सिर्फ़ एक इंसान हमेशा उसके साथ खड़ा था, समर का छोटा भाई कबीर, जो आज भी नहीं जानता कि जिस अमारा की तरफ़ उसका दिल खिंचता जा रहा है, वो कौन है। और सबसे ख़तरनाक सवाल अभी बाक़ी है: उस दिन क्या होगा, जिस दिन समर को पता चलेगा कि वो बच्चा उसी का है?
Contents
-
छह साल पहले एक मानसून की रात, चोरी के झूठे इल्ज़ाम में पेट से बहू तारा को अहूजा हवेली से बारिश में फेंक दिया जाता है, और उसी रात एक ट्रेन हादसे में वो लापता हो जाती है। छह साल बाद डूबते अहूजा ख़ानदान के गाला में हुमा कैपिटल की बेनाम मालकिन अमारा आती है, उनके हर क़र्ज़ की डोर हाथ में लिए, और रात को अपने पाँच साल के उस बेटे को गोद में लेती है जिसका बाप समर है।
-
अमारा अपने दायें हाथ बेला के साथ अहूजा के दफ़्तर पर क़ब्ज़ा कर लेती है, और जो ख़ानदान कभी उसे चोर कह कर निकाल चुका था, अब उसके हर लफ़्ज़ पर सिर झुकाता है। बोर्डरूम में समर छह साल बाद उस अजनबी की तरफ़ खिंचता है जिसे वो पहचान नहीं पाता, और अमारा अपनी पहली ठंडी शर्त रखती है, पूरे दस साल का फ़ॉरेंसिक ऑडिट। रात को बेला बहीखातों में मेहरबान ट्रेडर्स नाम की एक ख़ोल कंपनी का धागा पकड़ती है, और उससे नत्थी एक अधिकार-पत्र पर उन्हें ख़ुद तारा के जाली दस्तख़त मिलते हैं, जो उसके मरने के बाद के हैं।
-
अगली सुबह अमारा छह साल बाद पहली बार उसी अहूजा हवेली की देहरी लाँघती है जहाँ से उसे बारिश में फेंका गया था, और अपनी असली शर्त रखती है, कि हुमा क़र्ज़ तभी पुनर्गठित करेगी जब घर से रूठ कर गया इकलौता ईमानदार बेटा कबीर वापस बुला कर रोशनी हाइट्स का सिर बनाया जाए। माजी बेबस हो कर मान जाती हैं, और किसी को नहीं पता कि अमारा अपने उस अकेले पुराने हमदर्द को घर खींच रही है जिसने कभी तारा पर यक़ीन किया था। रतन चाचा ऑडिट को हर मोड़ पर धुंध में टालते हैं, और उस रात अपने आदमी को फ़ोन कर के कहते हैं कि ये औरत बहुत पुराने सवाल पूछती है, और ज़रूरत पड़ी तो जैसे एक बहू ट्रेन के साथ ग़ायब हुई थी, वैसे एक लेनदार भी ग
-
कबीर छह साल बाद उसी अहूजा हवेली लौटता है जिसकी देहरी दुबारा ना लाँघने की उसने क़सम खाई थी, और वो घर अब उन दो लोगों को एक साथ रखता है जिन्होंने तारा को सबसे ज़्यादा चाहा था, पर कोई किसी को नहीं पहचानता। बूढ़ी शांति अमारा में बार बार तारा का अक्स ढूँढती है, अमारा और कबीर रोशनी हाइट्स पर टकराते हैं जहाँ एक बच्चे की ड्रॉइंग उसकी बर्फ़ को एक पल के लिए पिघला देती है, और आख़िर में, उसी गलियारे में जहाँ से उसे घसीटा गया था, अमारा बेख़याली में वही लोरी गुनगुना उठती है जो कभी तारा गाती थी। दरवाज़े पर ठिठका कबीर काँपती आवाज़ में कहता है कि ये तो उसकी भाभी की लोरी है, और उसे मरे हुए छह साल हो गए।
-
5
शेयरधारकों की भव्य दावत में अमारा अपने बदले का पहला कौर परोसती है, रतन के डेक में छुपा एक झूठा अस्सी करोड़ का आँकड़ा सबके सामने बेनक़ाब कर के, और समर को सौ अजनबियों के बीच वो ज़िल्लत का घूँट पिलाती है जो उसने कभी तारा को पिलाया था। दावत ख़त्म होते होते, भीड़ के उलट एक इंश्योरेंस जाँचकर्ता अंदर आता है, छह साल पुराने ट्रेन हादसे की फ़ाइल दुबारा खोलता है, और ख़ानदान से हलफ़ उठा कर ये पुष्टि माँगता है कि उनकी लापता बहू तारा सच में मर चुकी है।
-
दुबारा खुली हादसे की फ़ाइल पूरे ख़ानदान से ज़्यादा अमारा को हिला देती है, और वो देसाई के मामले को हुमा की ज़मानत का बहाना बना कर अपने हाथ में खींच लेती है, पर बेला के रुकने के इसरार के बावजूद अपने कौर धीमे करने से इनकार कर देती है। रागिनी उसे हवेली की पुरानी बैठक में अकेले घेरती है और एक क़दीमी आईने में दो दुश्मन आँखें एक पल को टकराती हैं; फिर आरव के स्कूल से ख़बर आती है कि उसने अपने कभी ना देखे पापा का हूबहू अहूजा चेहरा बना दिया है, और उसी शाम शांति उसके कमरे में वो ड्रॉइंग उठा कर, चाँद वाली लोरी पहचान कर, छह साल से अनकहा एक नाम फुसफुसा उठती है, 'तारा।'
-
शांति तारा को पहचान लेती है, पर अमारा उसे डर नहीं बल्कि नरमी और अधूरी लोरी दे कर, बच्चे की ख़ातिर राज़ छुपाए रखने की शर्त पर, इन्हीं दीवारों के अंदर अपनी पहली सच्ची हमराज़ बना लेती है; अगली शाम माफ़ी माँगने आया समर अनजाने में उसी तारा को खोने का गुनाह उसके सामने क़बूल कर बैठता है जिसे वो दफ़नाए बैठा था। और उधर रागिनी हुमा के अपने दफ़्तर के एक ख़रीदे हुए आदमी से अमारा की निजी फ़ाइल छीन लेती है, जिसका पहला ही पन्ना तारा के ग़ायब होने के बाद वाली सर्दी में पैदा हुए एक बेटे के जन्म का सबूत है।
-
आरव को हर निगाह से दूर बेला की देखरेख में बंद रखने के बावजूद वो नन्हा तूफ़ान माँ की पुरानी फ़ोटो वाला 'बड़ा घर' और अपने कभी ना देखे पापा को ढूँढने भाग निकलता है, और सीधा रोशनी हाइट्स की साइट पर पहुँच कर कबीर की गोद में जा गिरता है, जहाँ ख़ून बिन नाम के ख़ून को पहचान लेता है; दोनों को हँसते देख कर तारा का छह बरस से जमा सीना चटक जाता है, और उसी रात वो बेला से कहती है कि अब वो हर कौर तेज़ी से परोसेगी, क्योंकि इस ख़ानदान के पास रहना उसके बेटे को उन्हीं हाथों की पहुँच में ला रहा है जो कभी उसे मिटाना चाहते थे।
-
एक तूफ़ानी रात बहीखाना कमरे में बिजली जाने पर अमारा और कबीर अँधेरे में क़ैद हो जाते हैं, और बिना नक़ाब के वो लगभग तारा बन जाती है; कबीर उस भाभी का मातम खोलता है जिसे वो बचा नहीं पाया, और अमारा बेख़याली में वही लोरी गुनगुना उठती है जिस पर कबीर पत्थर हो जाता है। जैसे ही रौशनी लौटती है, गलियारे से एक ऐसी नन्ही आवाज़ 'मुम्मा' पुकारती है जो इस घर में नहीं होनी चाहिए थी, और आरव दौड़ कर सीधे कबीर की बाँहों में जा गिरता है।
-
10
अँधेरे बहीखाना कमरे का जमा हुआ मंज़र टूटता है, आरव तारा की गोद में लौट आता है, पर कबीर वो गिनती कर बैठता है जो किसी ने नहीं की थी, एक बच्चा, एक 'मरी' भाभी, और वही लोरी; वो इल्ज़ाम नहीं लगाता, बस देखता है, और यही देखना सब बदल देता है। घिरी अमारा सिर्फ़ बच्चे को अपना मान कर बाप का नाम और अपनी पहचान एक दोहरी लाइन के पीछे छुपा लेती है, और उसी रात अकेला कबीर तारा की आख़िरी तस्वीर को अमारा की चुराई तस्वीर के बराबर रख कर जान जाता है कि वो ज़िंदा है।
-
11
फ़ॉरेंसिक ऑडिट का फंदा कसता है और रतन चाचा पूरी पुरानी चोरी दुबारा उसी 'मर चुकी' तारा पर मढ़ने चलते हैं, यहाँ तक कि देसाई की फ़ाइल का फ़ायदा उठा कर उसे काग़ज़ पर मुर्दा और चोर दोनों घोषित करवाना चाहते हैं; अमारा झूठ को बनने देती है और समर को उसकी मंज़ूरी की भूख से खेल कर वही असली फ़ाइलें निकलवाती है जो एक दिन उसके चाचा को फाँसी पर चढ़ाएँगी, और उसी रात अकेला समर बटरा के हाथ का वो पुराना नोट पा लेता है जो तारा को नहीं, रतन को असली चोर बताता है।
-
12
बटरा के नोट के साथ रात भर टूटता समर समझ जाता है कि उसने एक बेगुनाह, पेट से बहू को मरने के लिए फेंका और असली चोर आज भी उसके अपने घर में बैठा है, पर काग़ज़ को गवाही में बदलने के लिए वो ग़ायब हुआ गवाह बटरा चाहिए; बेला छह महीने के पीछा के बाद बटरा को एक क़स्बे में नए नाम के पीछे ढूँढ निकालती है, टूटा समर अमारा के पास आ कर उसकी आँखों में देख पूछता है कि क्या उसने एक मासूम को मारा, और अमारा दोहरी लेनदार लाइन के पीछे अपना सच और अपने ज़िंदा बेटे की चीख़ दबाए रखती है, तभी बेला फ़ोन पर बटरा का पक्का पता देती है और साथ ही बताती है कि एक घंटा पहले अहूजा गैराज से एक गाड़ी उसी पते की तरफ़ निकल चुकी है।
-
13
बटरा तक भागते अमारा और कबीर को बाढ़ में डूबा पुल रोक लेता है, और वो एक टूटे से कमरे में रात भर के लिए फँस जाते हैं जहाँ छह बरस का ग़म, अपराधबोध और भूख सतह पर आ जाती है; कबीर आख़िरकार कह देता है कि वो जानता है अमारा असल में तारा है, उसकी भाभी, और उसने कभी उसका साथ नहीं छोड़ा। जब उसका काँपता हाथ तारा के चेहरे तक पहुँचता है और दोनों एक साँस की दूरी पर आ जाते हैं, तो तारा पीछे हट कर अपना मुखौटा फिर बाँध लेती है और कहती है कि वो मोहब्बत के लिए नहीं, उन लोगों को दफ़नाने लौटी है जिन्हें कबीर अपना ख़ानदान कहता है, और अब कबीर को चुनना होगा, अपना ख़ून, या वो राख जो उन सबको जला देगी।
-
14
राख से उठी का मध्य-मोड़: सुबह होते ही कबीर पूरी तरह, खुल कर तारा का साथ चुन लेता है, पर तारा मोहब्बत की जगह सिर्फ़ हमराज़ी की शर्त रख देती है, और ये चुनाव उन्हें जोड़ता नहीं, सबसे कठिन हिस्सा शुरू करता है। रतन के आदमी से एक रात आगे पहुँच कर दोनों गुम मुनीम बटरा को ढूँढ निकालते हैं, पर वो अपने पास छुपे उस असली सबूत के बग़ैर गवाही देने से इनकार कर देता है जो सिर्फ़ उसकी पहुँच में है। लौटते रास्ते सच खुलता है, कि तारा को पाने के लिए कबीर को अपना ख़ून मिटाना होगा, और आज़ाद होने के लिए तारा को ऐसी वापसी माननी होगी जो उसके बेटे पर निशाना बना देगी। तभी रतन का पीछा करता आदमी दोनों की तस्वीर खींच कर घर
-
15
फ़िक्सर की भेजी वो तस्वीर और दो लफ़्ज़ सबसे पहले रागिनी के हाथ लगते हैं, जो धूप में तारा का चेहरा पहचान कर काँप उठती है, और अपने ही साथी रतन तक से वो राज़ छुपा कर, संदेश मिटा कर, इस बार ख़ुद, अकेले काम तमाम करने की ठान लेती है। अगली शाम वो अमारा को उसी पुरानी छत पर बहला ले जाती है जहाँ से छह बरस पहले तारा को घसीटा गया था, और मुखौटे उतरते ही रागिनी अपने ही मुँह से पूरी फँसाई, झूठे काग़ज़ और उस 'हादसे' की साज़िश कबूल कर बैठती है, जबकि सीढ़ियों पर छुपा समर हर लफ़्ज़ सुन लेता है। जैसे ही रागिनी अमारा को उसी छत से नीचे धकेलती है, ऐन आख़िरी पल एक हाथ उसकी कलाई जकड़ लेता है, समर का, जिसने अपनी बीवी क
-
16
छत पर बचाई गई अमारा को बचाते ही रागिनी आख़िरी दाँव चलती है और चीख़ कर कहती है कि ये अमारा नहीं, ज़िंदा लौटी तारा है, पर अमारा फ़ौरन उसी की क़ातिलाना क़बूलियत को ढाल बना कर उस सच को एक घिरी हुई औरत का पागलपन साबित कर देती है, और समर, जो वो बोझ उठा ही नहीं सकता, यक़ीन कर लेता है। अकेले में वो समर को सिर्फ़ आधा सच देती है, कि तारा ज़िंदा तो है पर कहीं और है और अमारा महज़ उसकी भेजी हुई लेनदार है, और उसे अपने ही चाचा की चोरी खोदने की तरफ़ धकेल देती है, जबकि बेढाल रागिनी उसी रात रतन की बैठक में पहुँच कर उस हुमा वाली औरत को हमेशा के लिए ग़ायब करवाने का सौदा रख देती है।
-
17
रात के उस सौदे से बेख़बर घर में समर छह बरस पुरानी फ़ाइलें खोल कर सबके सामने ऐलान करता है कि तारा ज़िंदा है, और अनजाने में अमारा की तोड़फोड़ ख़ुद उसके लिए करने लगता है, जबकि तारा और कबीर चुपके से इस बिखरते आदमी को सँभालने में उलझते हैं। तारा फ़ैसला करती है कि समर को सच का एक नापा-तुला टुकड़ा दे कर उसे सीधे रतन पर तान देगी, पर उसकी बैठक में क़दम रखते ही उसे समर के हाथ में आरव की वो 'मेरे पापा' वाली तस्वीर मिलती है, जिसका हूबहू अहूजा चेहरा उसे अपने ही अक्स जैसा लग रहा है।
-
समर के हाथ में आरव की तस्वीर देख कर घिरी अमारा उस हूबहू अहूजा चेहरे को एक टूटे आदमी के अपने ज़मीर का वहम साबित कर के तस्वीर वापस छीन लेती है और उसका ग़ुस्सा सीधे मेहरबान ट्रेडर्स और रतन पर तान देती है, फिर छह बरस के पीछा के बाद डरे हुए मुनीम बटरा तक ख़ुद पहुँच कर उसे क़ब्र की जगह हिफ़ाज़त और गवाह का कठघरा दे कर सामने आने को राज़ी कर लेती है। उधर रतन मुखौटा उतार कर आज रात बटरा और वो काग़ज़ ख़त्म करने का हुक्म देता है, और जिस रात बटरा को महफ़ूज़ घर लाया जाना था, घंटी बजने पर अमारा बेला के बजाय रतन के फ़िक्सर को पाती है, जिसकी मुट्ठी में गिरेबान से पकड़ा लहूलुहान बटरा लटका है।
-
19
सेफ़हाउस की दहलीज़ पर रतन का फ़िक्सर लहूलुहान बटरा को घसीट लाता है और छीना असली दस्तख़त वाला अधिकार-पत्र जेब में लिए खड़ा है, तभी कबीर पहुँच जाता है और दो के सामने और देसाई की खुली फ़ाइल के डर से फ़िक्सर काग़ज़ ले कर घायल बटरा को छोड़ अँधेरे में घुल जाता है, पर जाते जाते अमारा का चेहरा एक पल को पहचानने जैसा घूरता है। अंदर बटरा को सँभालते हुए अमारा समझ जाती है कि रतन सिर्फ़ चोर नहीं, क़ातिल है, और कबीर खुल कर अपने ही ख़ून के ख़िलाफ़ उसके साथ खड़ा हो जाता है। बुख़ार में बटरा बताता है कि काग़ज़ उसकी अकेली ढाल नहीं थी, और आख़िर में अँधेरे कमरे में उसके पुराने फ़ोन से छह बरस पुरानी एक रिकॉर्डिंग बज
-
20
बटरा के फ़ोन की रिकॉर्डिंग की गूँज में अमारा समझ जाती है कि उसका ज़िंदा रहना ही असली हादसा था और उसका बदला अब इंसाफ़ नहीं, अपनी जान बचाने की जंग बन गया है, और बेला उसे आगाह करती है कि फ़िक्सर उसका चेहरा उस बारिश वाली रात से जोड़ने के क़रीब है और सीधे रतन को रिपोर्ट देने दिल्ली जा रहा है, इसलिए वो उसी रात आरव को और गहरे छुपा देती है। दिल्ली में फ़िक्सर ख़ुद पहुँच कर वो असली काग़ज़ और अमारा की तस्वीरें मेज़ पर रखता है, और रतन पुरानी हादसा-फ़ाइल की पीली तस्वीर उसके बराबर रख कर पहली बार जान जाता है कि अमारा वही दफ़नाई हुई बहू तारा है, और अपने आदमी को हुक्म देता है कि इस बार कोई ट्रेन, कोई हादसा नह
-
अमारा पूरे ख़ानदान के सामने रागिनी को उसी ख़ानदानी कंठी की चोरी में बेनक़ाब कर देती है जिसके झूठे इल्ज़ाम में कभी तारा को राख किया गया था, और जो समर कभी तारा को निकाल बैठा था वही आज रागिनी को उसी देहरी से बाहर कर देता है। बेघर रागिनी आख़िरी दाँव में चीख़ती है कि अमारा ही ज़िंदा लौटी तारा है, पर उसका सच एक जली हुई औरत की बड़बड़ाहट बन कर बिखर जाता है, और सब कुछ खो कर वो सीधे रतन की बैठक की तरफ़ गाड़ी मोड़ लेती है।
-
रागिनी तारा का असली नाम बेचने रतन की बैठक पहुँचती है, पर पाती है कि ख़रीदार वो राज़ पहले से जानता है और तारा की मौत लिख चुका है; रतन उसे मिटाने के बजाय उसकी बेक़ीमत ज़बान को हथियार बना कर वही छह बरस पुराना ख़ून का रिश्ता दुबारा बाँध लेता है और उसे ज़हर थमा कर दावत में तारा को ख़त्म करने की तारीख़ तय कर देता है, जबकि टूटा हुआ समर अमारा के सामने अपने मरे समझे बच्चे का मातम खोलता है जो असल में ज़िंदा है।
-
23
अपने ही घर के ढहते झूठ के बीच माजी टूटने लगती हैं, और अमारा की फ़ाइल से गिरी एक बच्चे की चाँद वाली तस्वीर उनके अंदर एक बेनाम ममता जगा देती है। वो अमारा को शक से नहीं, एक अजीब मातम से अकेले घेरती हैं और पहली बार क़बूल करती हैं कि उन्होंने उस बहू को बारिश में फेंकने के लिए ख़ुद को कभी माफ़ नहीं किया; अमारा जिस औरत से नफ़रत करने छह बरस जी थी, उसी के सच्चे आँसू उसकी नफ़रत को उलझा देते हैं, जबकि कबीर चेताता है कि रतन का चुप हो जाना ही उसका सबसे ख़तरनाक होना है।
-
24
रतन अपने तहख़ाने में वो जाल बुनता है जो एक ही रात रोशनी हाइट्स के एक साज़िशी हादसे में तारा, बटरा का काग़ज़ और उसका छुपा बेटा, तीनों को एक साथ राख कर दे, और अपने फ़िक्सर को बच्चे तक पहुँचने का हुक्म देता है। अमारा ख़ुद रतन के दफ़्तर जा कर अपनी आख़िरी चालें उसकी चालों के आमने-सामने रख देती है, पर उसी रात पता चलता है कि जिस आया पर उसने अपने बेटे का भरोसा किया था वो हफ़्तों पहले बिक चुकी थी, और आरव घर नहीं लौटता।
-
25
आरव के छिन जाने पर अमारा के पास कोई मुखौटा नहीं बचता, और वो उस इकलौते आदमी के पास जाती है जो उस बच्चे के लिए दुनिया जला दे, समर, और उसे छह बरस का दबाया सच बता देती है, कि अमारा ही तारा है और वो गुम बच्चा उसी का बेटा है। समर का ग़म, गुनाह और मोहब्बत एक ही मक़सद में ढल जाते हैं और छोड़ा हुआ पति अपने ही चाचा के ख़िलाफ़ तारा का सबसे तेज़ हथियार बन जाता है, तभी रतन का फ़ोन आता है, बच्चे के बदले बटरा का काग़ज़ और क़र्ज़ वापस लिखने की शर्त, और ये फ़रमान कि इस बार वो माँ और बेटे, दोनों को एक साथ राख करेगा।
-
26
रतन के दिए हफ़्ते की आख़िरी रात तारा, समर और कबीर रोशनी हाइट्स की दावत के जाल में ख़ुद चल कर जाते हैं, काग़ज़ को चारा और बटरा की रिकॉर्डिंग को असली हथियार बना कर, और छोड़ा हुआ पति और वफ़ादार देवर पहली बार उसके हुक्म पर कंधे से कंधा मिला कर लड़ते हैं। घिरा हुआ रतन अपना सबसे गहरा गुनाह उगल देता है, कि पिछले बरस बाबूजी की मौत दिल का दौरा नहीं, उसका अपना क़त्ल थी, और फिर वही छह बरस पुराना 'हादसा' दोहरा देता है, ठीक उसी पल जब तारा आरव तक पहुँचती है और बाईसवीं मंज़िल का अधूरा फ़र्श माँ और बेटे के पैरों तले भरभरा कर खुल जाता है।
-
27
तारा और आरव गिर कर इक्कीसवीं मंज़िल के टूटते फ़र्श पर बच तो जाते हैं, पर उसी क़ब्रनुमा मलबे में रतन के साथ क़ैद हो जाते हैं, जहाँ तारा गिड़गिड़ाने के बजाय एक फ़ैसला सुनाती है, कि हुमा उसका एक-एक क़र्ज़ ले चुकी है, बटरा ज़िंदा है, और रतन की अपनी आवाज़ वाली रिकॉर्डिंग आज रात पुलिस समेत सौ हाथों में पहुँच चुकी है। कबीर और समर बटरा और पुलिस के साथ टूटी इमारत चढ़ कर उस तक पहुँचते हैं पर गड्ढे के उस पार बेबस रह जाते हैं, और बर्बाद पर घातक रतन तारा की छत थामे आख़िरी सरिये पर हाथ रख कर आख़िरी सौदा रखता है, बच्चे की उम्र भर की हिफ़ाज़त के बदले उसकी ख़ामोशी और हमेशा की गुमनामी।
-
28
रतन के आख़िरी सौदे को ठुकरा कर तारा उसका अपना जाल उसी पर पलट देती है; बर्बाद रतन सबको साथ ले डूबने के लिए वो आग जगाता है जो उसने कभी तारा के लिए भरवाई थी, और वो सबसे पहले उसी को अपनी लपटों में ले लेती है। समर पहली बार आग में क़दम रख कर अपने बेटे और मौत के बीच आ खड़ा होता है, कबीर सबूत को लपटों से बचा लेता है, और सबसे ऊपर वाली शहतीर एक कड़ाक के साथ टूटती है, धुएँ में इस राज़ को दबाए कि उस पार कौन ज़िंदा बचा।
-
29
धुएँ के उस पार से तारा अपने बेटे को लिए ज़िंदा निकल आती है और पूरा शहर उसे राख से उठते देखता है; रतन उसकी अपनी आवाज़ की रिकॉर्डिंग और बटरा के काग़ज़ के आगे उसी क़ानून के हाथों गिरता है जिसे वो अपना समझता था, और तारा का नाम साफ़ हो जाता है। समर पति नहीं, सिर्फ़ बाप बनने का हक़ उसकी शर्तों पर माँगता है, और आख़िर में कबीर काग़ज़ में वो दूसरा नाम पढ़ लेता है, ख़ानदान से बाहर का एक ज़ामिन जिसके आगे शहर आज भी सिर झुकाता है।
-
राख से उठी तारा अब वसूलना नहीं, जीना चुनती है, बजाज को एक सोई हुई फ़ाइल में छोड़ कर वो अहूजा घर को जलाने के बजाय फिर से बनाती है, माजी और शांति का हिसाब दया से चुकाती है, और रतन को उम्र क़ैद हो जाती है। अपनी शर्तों पर आरव को उसके बाप समर से मिलाने के बाद वो आग बुझने पर कबीर को खुल कर, आज़ादी से चुन लेती है, वो औरत जो राख से उठी और अब सुबह की भी मालकिन है।