तनवी सक्सेना ये ज़िंदगी एक बार जी चुकी है। एक चार्टर्ड अकाउंटेंट जो लखनऊ के रसूख़दार राणा ख़ानदान की बहू बनी, परिवार का घोटाला खुला तो सारा इल्ज़ाम उसी के सिर मढ़ दिया गया। बदनाम और अकेली, उसने आख़िरी साँस सलाखों के पीछे ली। फिर एक सुबह उसकी आँख खुलती है और शहनाई बज रही है, यही उसकी शादी का दिन है, तीन साल पीछे। उसे सब कुछ याद है। इस बार वो किसी की क़ुर्बानी का बकरा नहीं बनेगी। पर जिस पति को वो अपना दुश्मन समझती है, वो अरयन भी कुछ ऐसा जानता है जो उसे जानना नहीं चाहिए। दो अजनबी, एक राज़, और एक ख़ानदान जिसने उसकी शादी को ही जाल बना दिया था।
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तनवी की आख़िरी रात जेल की एक ठंडी कोठरी में ख़त्म होती है, और फिर अचानक उसकी आँख शहनाई की आवाज़ पर खुलती है, यही उसकी शादी की सुबह है, तीन साल पीछे। जो हो चुका है उसे सब याद है, और इस बार वो किसी की क़ुर्बानी नहीं बनेगी।
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राणा हवेली में तनवी का पहला दिन। जिस घर ने उसे कभी हर रस्म पर शर्मिंदा किया था, आज वो उसी घर की हर रीत बिना अटके निभा रही है, और बड़ी माँ की पारखी नज़र इस बहू को पढ़ने लगती है। तनवी चुपचाप उस जगह की तलाश में है जहाँ से उसकी बर्बादी शुरू होगी।
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तनवी और अरयन पहली बार आमने सामने। एक ठंडा, चुभता हुआ रिश्ता, जिसमें अरयन बार बार ऐसी बातें जान जाता है जो उसे जाननी नहीं चाहिए। तनवी उसे अपना दुश्मन समझती है, पर उसका हर क़दम उसे उलझाता जाता है। आख़िर में वो एक जाल बिछाती है, और अरयन उसमें फँसते फँसते रह जाता है।
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राणा परिवार का चहेता, अरयन का बड़ा भाई जैसा चचेरा भाई युवराज, हवेली लौट आता है, और पूरा घर जगमगा उठता है। तनवी उसी मुस्कुराते चेहरे को सामने देखती है जिसने उसकी ज़िंदगी बर्बाद की थी, और उसे अपनी नफ़रत छुपाकर उसके सामने मुस्कुराना है। एक खेल शुरू होता है, जिसमें दोनों एक दूसरे को नापते हैं।
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लखनऊ पर सर्दियों का तूफ़ान टूटता है, बत्ती चली जाती है, और तनवी अरयन के साथ अकेली रह जाती है। महीनों की उलझन, हर वो बात जो उसे जाननी नहीं चाहिए थी, सब एक रात में फट पड़ती है। और जब अरयन आख़िर में मुँह खोलता है, तो वो एक ऐसी बात कहता है जो सिर्फ़ एक मरी हुई औरत जान सकती थी।
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एक ही रात में सब कुछ बदल गया है। दुश्मन अब दुनिया का इकलौता इंसान है जो तनवी का सच जानता है। डरते डरते, तनवी और अरयन अपनी अपनी यादें जोड़ते हैं, एक का अतीत, दूसरे का भविष्य, और पहली बार दोनों के बीच नफ़रत की जगह कुछ और जागता है। पर जब वो आने वाली पहली चाल रोकने जाते हैं, तो पाते हैं कि कोई और भी इस खेल को खेल रहा है।
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अब वो साथी हैं, और शायद उससे भी कुछ ज़्यादा। तनवी और अरयन मिलकर साज़िश की जड़ें खोदने लगते हैं, दो ऐसे लोग जो एक दूसरे को एक बार खो चुके हैं और दुबारा खोने से डरते हैं। पर बड़ी माँ ताड़ लेती हैं कि उनका पोता और उसकी बहू एक हो गए हैं, और एक तस्वीर मेज़ पर रखकर तनवी की पूरी दुनिया हिला देती हैं।
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बड़ी माँ वो सच बता देती हैं जो तनवी की रीढ़ तोड़ देता है, उसकी शादी इत्तेफ़ाक़ नहीं, एक सोची समझी चाल थी। उसे शुरू से क़ुर्बानी के बकरे के तौर पर चुना गया था। ये सच अरयन को भी तोड़ देता है, जिसे एहसास होता है कि उसकी अपनी शादी एक हथियार थी। पर जब दोनों इस साज़िश की जड़ खोदते हैं, तो वो किसी ऐसे की तरफ़ इशारा करती है जो वक़्त से बहुत आगे चल रहा था।
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तनवी और अरयन को एहसास होने लगता है कि उनका सबसे बड़ा हथियार, आने वाले कल का ज्ञान, अब भरोसे के लायक़ नहीं रहा। जो होना था वो बदल रहा है, और युवराज हर बार उनसे एक क़दम आगे है। एक तीखी ज़बानी जंग में दोनों एक दूसरे को टटोलते हैं, और तनवी एक ऐसी चाल चलती है जो युवराज का असली चेहरा एक पल को बेनक़ाब कर देती है।
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युवराज जाल को तेज़ कर देता है। एक मनगढ़ंत संकट में तनवी को फिर वही झूठे काग़ज़ दस्तख़त करने के कगार पर ला खड़ा किया जाता है, ठीक वैसे जैसे पिछली बार हुआ था। अरयन उसे बचाता है, पर इसकी क़ीमत चुकाता है। और फिर युवराज अकेले में अपना नक़ाब उतार देता है, और जो सच सामने आता है, वो तनवी की रही सही उम्मीद भी छीन लेता है।
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सबसे अँधेरा वक़्त। दुश्मन भविष्य जानता है, अरयन की ताक़त छिन चुकी है, और मौत की मियाद क़रीब है। अरयन चाहता है तनवी सब छोड़कर उसके साथ भाग जाए, पर तनवी एक और ज़िंदगी भागते हुए नहीं काटना चाहती, और दोनों के बीच दरार पड़ जाती है। उसी रात परी आख़िरकार उस नामुमकिन सच पर यक़ीन कर लेती है, और तनवी को वो एक चीज़ सूझती है जो युवराज के पास कभी नहीं हो सकती।
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तनवी के पास एक ऐसा पत्ता है जो युवराज के पास नहीं, और अब वो पासा पलटने की ठान लेती है। अरयन आधी रात लौटता है, दरार भर जाती है, और दो लौटे हुए लोग मिलकर तीसरे के ख़िलाफ़ एक जाल बुनते हैं। पर आख़िरी सबूत वहीं बंद है जहाँ सिर्फ़ बड़ी माँ की चाबी चलती है, और तनवी को उसी औरत के पास वापस जाना होगा जिसने उसकी मौत रची थी।
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वो तारीख़ आ गई, वही जिस दिन तनवी पिछली बार मरी थी। तनवी अपना सबसे बड़ा दाँव खेलती है, बड़ी माँ को उनके अपने लाडले के ख़िलाफ़ खड़ा करके। बड़ी माँ टूटती हैं, माँ और मालकिन के बीच की जंग में मालकिन जीतती है, और तिजोरी खुलती है। जाल बंद होता है, पर युवराज भी एक लौटा हुआ इंसान है, और उसके पास भी एक चाल है। और जैसे जैसे रात गहराती है, वो दिन ठीक वैसे ही ख़तरनाक होने लगता है जैसा क़िस्मत चाहती थी।
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अँधेरे में जो गिरा, वो अरयन था, तनवी के सामने खड़े होकर गोली अपने सीने पर लेते हुए, वो क़ीमत जो वो पिछली बार नहीं चुका पाया था। पर इस बार ज़ख़्म जानलेवा नहीं। और जैसे सुबह होती है, युवराज का बुना हुआ जाल उसी पर पलट जाता है, भरे दालान में जाली दस्तावेज़ खुलता है, बड़ी माँ अपने ही लाडले के ख़िलाफ़ गवाही देती हैं, सच सामने आता है, और तनवी पहली बार दो जन्मों में, सिर उठाए, आज़ाद खड़ी होती है।
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सुबह हो गई है। तनवी का नाम साफ़ है, उसके पापा आज़ाद हैं, और जिस घर ने उसे क़ुर्बानी का बकरा बनाया था, वो उसे एक चीज़ नहीं, एक इंसान मानता है। जो शादी कभी एक जाल थी, अब वो दोनों उसे अपनी मर्ज़ी से चुनते हैं, वही फेरे, वही आग, पर इस बार सच में अपने। पर युवराज के आख़िरी लफ़्ज़ अब भी हवा में लटके हैं, एक सवाल जो अगली कहानी का बीज है।