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Chapter 7 of 15

रात के वादे

फिर वही फेरे by Avni Oberoi

अगले कुछ दिन तनवी की ज़िंदगी के सबसे अजीब और सबसे ज़िंदा दिन थे।

और इस दोहरे जीवन का सबसे मुश्किल हिस्सा था, दिन के उजाले में अजनबी बने रहना। एक सुबह नाश्ते की मेज़ पर, रात भर रजिस्टरों से जूझने के बाद तनवी की आँखें भारी थीं। अरयन ने बिना सोचे, आदत से, उसकी चाय में दो चम्मच चीनी डाली और प्याला उसकी तरफ़ सरका दिया, ठीक वैसे जैसे उसे पसंद थी। मेज़ के उस पार बैठी बुआ की भौंह उठ गई, और उन्होंने तंज़ कसा कि छोटे मालिक को भला कब से भाभी की चाय का इतना ख़याल रहने लगा।

एक पल को कमरे की हवा रुक गई। फिर तनवी ने प्याला उठाया और मुँह बिचकाया, जैसे उसमें कड़वी दवा हो।

"और ग़लत ख़याल है," उसने नाक सिकोड़कर कहा। "मुझे एक चम्मच चाहिए, दो नहीं। इन्हें तो अपनी फ़ाइलों के सिवा कुछ ठीक से याद नहीं रहता।"

"माफ़ कीजिए," अरयन ने अख़बार के पीछे अपना चेहरा छुपाते हुए कहा, उसकी आवाज़ बेहद गंभीर। "अगली बार हिसाब दुरुस्त रखूँगा।"

बुआ संतुष्ट होकर अपने नाश्ते में लौट गईं। पर मेज़ के नीचे, किसी की नज़र से दूर, अरयन के पैर ने तनवी के पैर को हल्के से छुआ, और तनवी को अपनी हँसी रोकने के लिए उस चाय का एक बड़ा घूँट भरना पड़ा, वो दो चम्मच चीनी वाली चाय, जो दरअसल बिल्कुल वैसी ही थी जैसी उसे पसंद थी।

दिन में वो आदर्श बहू थी, झुकी नज़र और नापे तौले लफ़्ज़, और अरयन ख़ामोश, व्यस्त छोटे मालिक। पूरी हवेली एक मिसाल देखती। पर रात को, जब हवेली सो जाती, जब आख़िरी नौकर की आहट भी थम जाती, तब वो दोनों बाउजी के पुराने स्टडी में मिलते, एक मोमबत्ती की रोशनी में, और एक ऐसी जंग लड़ते जिसे और कोई नहीं देख सकता था।

वो कमरा बरसों से बंद पड़ा था, स्याही और धूल की महक से भरा। यहीं वो दोनों सिर जोड़े बैठते, दो लोग जो एक ही क़ब्र से लौटे थे, अब एक दूसरे का अतीत और भविष्य जोड़ते हुए।

"ऐसे करते हैं," तनवी ने एक रात कहा, रजिस्टरों के ढेर पर झुकते हुए। "जो मुझे याद है, वो मैं बोलूँगी। जो तुम्हें याद है, तुम जोड़ना। मेरा अतीत, तुम्हारा भविष्य। बीच की खाली जगह में सच छुपा है।"

"शुरू करो।" अरयन ने मोमबत्ती क़रीब खिसकाई।

"देखो।" तनवी ने एक पन्ने पर उँगली रखी। "त्रिवेणी होल्डिंग्स से पैंतालीस करोड़ निकले। पर पैसा सीधे कहीं नहीं गया। पहले एक सीमेंट कंपनी, जिसने कभी एक बोरी सीमेंट नहीं बेची। फिर एक ट्रांसपोर्ट फ़र्म, जिसके पास एक ट्रक नहीं। फिर एक चैरिटी ट्रस्ट, जो ग़रीबों के नाम पर खुला और जिसने कभी एक रोटी नहीं बाँटी। तीन परतें। तीन झूठ। ताकि कोई पीछा न कर सके।"

"तुम्हें ये सब याद कैसे है?"

"क्योंकि यही वो काग़ज़ थे जिन पर मेरे दस्तख़त थे।" उसकी आवाज़ सपाट थी। "जेल में तीन साल मुझे यही गिनती रटाई गई, हर पेशी पर। ये नंबर मेरे दिमाग़ में जले हुए हैं। शायद इसीलिए ये मेरे साथ वापस आए हैं।"

"और आख़िर में?" अरयन झुका।

"आख़िर में मुझे नहीं पता।" उसकी उँगली उस आख़िरी परत पर रुक गई। "मेरी याद यहीं ख़त्म होती है। उस ट्रस्ट के आगे अँधेरा है। मैं तब तक जेल पहुँच चुकी थी। पैसा कहाँ गया, ये मैं कभी जान ही नहीं पाई।"

"पर मेरी याद यहाँ से शुरू होती है।" अरयन ने उस ट्रस्ट के नाम पर उँगली रखी, और उसकी आँखें सिकुड़ीं। "ये ट्रस्ट। तुम्हारे जाने के एक साल बाद, इसी ट्रस्ट ने एक नेता के चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाया। मंत्री जगन्नाथ। वही आदमी जो आगे चलकर गृह विभाग तक पहुँचा। वही जिसने तुम्हारा केस दबवाया, गवाह मुकरवाए, फ़ाइलें ग़ायब कराईं। मुझे वो दिन याद है जब अख़बार में उसकी जीत छपी थी, और मेज़ पर युवराज मुस्कुरा रहा था।" उसने तनवी को देखा। "वो पैसा रिश्वत था, तनवी। तुम्हारी ख़ामोशी की क़ीमत।"

तनवी की साँस तेज़ हुई। कुछ पल वो उस पीले पन्ने को घूरती रही, जैसे उसमें अपनी पूरी बर्बादी का नक़्शा देखती हो।

"तो ये रास्ता है," उसने आख़िरकार कहा, आवाज़ काँपती पर तेज़। "त्रिवेणी से सीमेंट से ट्रांसपोर्ट से ट्रस्ट से जगन्नाथ तक। एक ज़ंजीर। और हर कड़ी एक झूठ। अगर हम ये पैसा वहाँ पहुँचने से पहले रोक लें..."

"...तो जगन्नाथ कभी इनका नहीं बनेगा।" अरयन ने पूरा किया। "और बिना जगन्नाथ के, ये तुम्हारा केस कभी दबा नहीं पाएँगे। कोई मंत्री नहीं जो फ़ाइल ग़ायब कराए। कोई हाथ नहीं जो तुम्हें अँधेरे में धकेले।" उसकी आवाज़ में एक नई धार थी। "समझ रही हो? तुम्हारा अतीत और मेरा भविष्य, अलग अलग दोनों बेकार थे। एक के पास सवाल, दूसरे के पास जवाब, पर दोनों एक दूसरे को ढूँढ नहीं पाते थे। साथ में, ये सिर्फ़ दर्द नहीं रहा। ये एक नक़्शा है।"

तभी बाहर गलियारे में कोई आहट हुई। एक क़दम। फिर दूसरा। धीमे, संभले हुए।

दोनों जम गए। अरयन ने एक ही फूँक में मोमबत्ती बुझा दी, और कमरा अँधेरे में डूब गया। साँस रोके, वो दोनों दीवार से सटे खड़े रहे। अरयन का हाथ तनवी की कमर के पीछे चला गया, उसे दरवाज़े की सीध से हटाते, उसे ढाल देते हुए। बाहर क़दमों की आहट पास आई। दरवाज़े के नीचे से एक टॉर्च की पतली लकीर अंदर रेंगी, फ़र्श पर सरकी, और रुक गई।

तनवी का दिल इतनी ज़ोर से धड़का कि उसे लगा बाहर सुनाई दे जाएगा। अरयन की पकड़ कस गई। एक पल। दो। फिर रोशनी हटी, क़दम दूर चले गए, और गलियारे की ख़ामोशी लौट आई। कोई पहरेदार रहा होगा। या कोई और, जो देख रहा था।

जब वो गुज़र गई, तो दोनों ने राहत की साँस ली, पर अरयन का हाथ नहीं हटा। और उस अँधेरे में, इतने पास, तनवी ने पहली बार उस आदमी की धड़कन को इतने क़रीब से सुना।

कुछ देर बाद उसने फिर मोमबत्ती जलाई, और तनवी को एक अजीब नज़र से देखा।

"तुम जब हिसाब लगाती हो," उसने कहा, "तो तुम्हारी आँखें चमकती हैं। जैसे तुम किसी से जंग नहीं, इश्क़ कर रही हो। पिछली बार मैं तुम्हें समझ ही नहीं पाया। मेरे सामने एक तूफ़ान बैठा था, और मैं उसे बस एक ख़ामोश लड़की समझता रहा।"

"नंबरों से मेरा रिश्ता हमेशा इंसानों से बेहतर रहा है।" तनवी ने बिना देखे कहा, पर उसके होंठ मुस्कुरा दिए। "नंबर झूठ नहीं बोलते। नंबर धोखा नहीं देते। और सबसे अच्छी बात, नंबर कभी तुम्हें मरने के लिए अकेला नहीं छोड़ते।"

अरयन की मुस्कान फीकी पड़ गई।

"बड़ी ख़राब लाइन थी ये डेट करने वाली," तनवी ने जल्दी से जोड़ा, माहौल हल्का करते हुए। "माफ़ करना। सी ए लोग रोमांस में कमज़ोर होते हैं। हम स्प्रेडशीट में भावनाएँ ढूँढते हैं।"

अरयन सच में हँस पड़ा, पहली बार, एक छोटी, हैरान हँसी। "तुम्हें पता है, पिछली बार मैंने तुम्हें कभी हँसते नहीं देखा था।"

"पिछली बार तुमने मुझे कभी देखा ही नहीं था।"

वो चुप हो गया। फिर धीरे से बोला, "ये मेरी सबसे बड़ी सज़ा है। कि मेरे पास तुम्हारी एक भी हँसती हुई याद नहीं। तीन साल। और मुझे सिर्फ़ तुम्हारी ख़ामोशी याद है, और तुम्हारा आख़िरी पल, जो मैं देखना नहीं चाहता था, पर देख लिया।" उसने अपने हाथ देखे। "तुम्हारे जाने के बाद मैंने पीना शुरू किया। हर रात उसी कोठरी का सपना। और मेज़ पर तुम्हारे केस की फ़ाइलें, जिन्हें मैं नशे में बार बार पढ़ता, जैसे उनमें कोई जादू हो जो तुम्हें वापस ले आए। और हर सुबह एहसास होता कि अब बहुत देर हो चुकी है। तुम जा चुकी थीं।"

"अरयन..."

"तुम्हारी माँ।" उसकी आवाज़ टूटी। "वो हर महीने मेरे दफ़्तर आतीं, चुपचाप बैठतीं, और बस इतना पूछतीं कि क्या मुझे कुछ मिला। आख़िरी बार उन्होंने मुझसे कुछ नहीं माँगा। बस मेरा हाथ पकड़ा और कहा, 'बेटा, मेरी तनु अकेली चली गई। कम से कम उसका नाम तो साफ़ कर दो।' और मैं वो भी नहीं कर पाया।"

तनवी की अपनी आँखें भर आई थीं। उसने आगे बढ़कर अपनी उँगली उसके होंठों पर रख दी।

"बस," उसने कहा। "जो हुआ वो किसी और जन्म में हुआ। तुम वहाँ नहीं थे जब मुझे ज़रूरत थी, सही है। पर तुम वहाँ थे जब किसी और को परवाह नहीं थी, उस सर्द कोठरी के बाहर, अँधेरे में। तुमने मेरी आख़िरी आवाज़ सुनी, अरयन। पूरी दुनिया में सिर्फ़ तुमने।" उसने धीरे से कहा, "और इस बार हम दोनों ज़िंदा हैं। इस बार मेरी माँ को उसकी बेटी का नाम साफ़ मिलेगा, उसकी बेटी के ज़िंदा रहते। तुम और मैं, हम उसे देंगे।"

मोमबत्ती की लौ काँपी। वो दोनों बहुत पास थे, उस छोटे से कमरे में, पुराने काग़ज़ों की महक के बीच। अरयन का हाथ उठा और उसके गाल पर आई एक लट को पीछे किया, बहुत धीरे। फिर उसकी उँगलियाँ उसके जबड़े पर रुकीं, उसकी गर्दन के पास, और तनवी की साँस अटक गई। हर तार उसके भीतर खिंच गया। वो उसकी तरफ़ झुका, इतना पास कि उनके होंठों के बीच बस एक साँस का फ़ासला रह गया, और तनवी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

पर अरयन रुक गया। उसने अपना माथा उसके माथे से लगाया, दोनों हाँफते हुए।

"नहीं," उसने फुसफुसाया, ख़ुद से जितना उससे। उसकी आवाज़ भारी थी, जैसे ख़ुद को रोकना उसकी सबसे मुश्किल जंग हो। "ऐसे नहीं। डर में नहीं, इस अँधेरे में चोरों की तरह, एक कान दरवाज़े पर लगाए, नहीं। इस बार मुझे तुम्हें खोने का डर नहीं चाहिए हमारे बीच। जब मैं तुम्हें छुऊँ, तो सिर्फ़ तुम होनी चाहिए, ये साज़िश नहीं, ये मौत का साया नहीं। पहले तुम्हें आज़ाद देखना है, सिर उठाए, बेदाग़, अपने नाम के साथ। फिर," उसने उसकी आँखों में देखा, "फिर बाक़ी सब। हमारा सब।"

तनवी ने उसके सीने पर अपना हाथ रखा, उसकी तेज़ धड़कन को महसूस करते हुए, और कभी अपनी ज़िंदगी में इतना डरी और इतना सुरक्षित एक साथ महसूस नहीं किया था।

"ठीक है," उसने कहा। "पहले उन्हें ख़त्म करते हैं। फिर हमारी बारी। पर जल्दी करना, अरयन। मैंने एक पूरी ज़िंदगी इंतज़ार में गँवाई है।"

"इस बार इंतज़ार छोटा होगा," उसने उसका हाथ अपने सीने पर ही थाम लिया।

पर हवेली की दीवारों के भी कान थे, और कुछ नज़रें कभी नहीं सोतीं।

बड़ी माँ ने देखा। उन्होंने वो बदलाव देखा जो किसी और से छुपा था। उन्होंने देखा कि कैसे अरयन अब नाश्ते पर रुकता था, अख़बार के पीछे नहीं छुपता था। उन्होंने तनवी की हँसी में वो सूखापन ग़ायब होते देखा। एक सुबह उन्होंने दोनों को एक नज़र का आदान प्रदान करते देखा, एक ऐसी ख़ामोश बात जिसका मतलब सिर्फ़ वो दोनों जानते थे, और बड़ी माँ की उँगलियाँ अपने मोतियों पर रुक गईं।

ये गठबंधन था। और गठबंधन ख़तरनाक होते हैं।

बड़ी माँ जानती थीं कि गठबंधन को कैसे तोड़ा जाता है। उसकी सबसे कमज़ोर कड़ी पर एक सधा हुआ वार करके। एक ऐसा सच, जो दोनों के बीच ज़हर बन जाए।

उस शाम उन्होंने तनवी को अपने कमरे में अकेले बुलाया, हवेली के सबसे पुराने हिस्से में, भारी मख़मली पर्दों और पुरखों की उन तस्वीरों के बीच जिनकी आँखें हर जगह पीछा करती थीं।

"बैठो, बेटी," उन्होंने कहा। उनके सामने मेज़ पर एक चाँदी का संदूक़चा रखा था।

तनवी बैठी, अपने भीतर के डर को छुपाते हुए, अपनी पीठ सीधी रखते हुए।

"तुम होशियार हो," बड़ी माँ ने कहा, पान की डिबिया खोलते हुए, उनकी उँगलियाँ इत्मीनान से चलतीं, जैसे उनके पास दुनिया भर का वक़्त हो। "बहुत होशियार। शायद इस घर में आने वाली अब तक की सबसे होशियार बहू। मैंने कई बहुएँ आते देखीं, कोई रोती, कोई डरती। पर तुम? तुम गिनती करती हो। तुम्हारी आँखें हमेशा कुछ जोड़ती रहती हैं। ये मुझे अच्छा लगता है, और थोड़ा डराता भी है।"

"डर तो आपको किसी से नहीं लगता, बड़ी माँ।"

बड़ी माँ हँसीं, एक धीमी, ठंडी हँसी। "और अरयन? वो बदल गया है, तुम्हारे आने से। हँसने लगा है। तुम्हें ये अच्छा लगता होगा।"

"पति पत्नी में समझ हो तो बुरा क्या है, बड़ी माँ?"

"समझ।" बड़ी माँ ने पान मुँह में रखा, और मुस्कुराईं। "कितना प्यारा शब्द है। पर इस घर में, बेटी, समझ सबसे महँगी चीज़ है। इसकी क़ीमत हमेशा कोई और चुकाता है।" उन्होंने तनवी की आँखों में देखा, और उनकी आवाज़ शहद में लिपटी रही पर नीचे फ़ौलाद था। "मैं तुमसे एक बात साफ़ साफ़ करूँगी, क्योंकि तुम बेवक़ूफ़ों वाली बातें नहीं समझतीं। तुम सीधा हिसाब समझती हो। तो आज हिसाब की बात करते हैं।"

उन्होंने संदूक़चा अपनी ओर खींचा, पर खोला नहीं।

"तुम्हें लगता है तुम इस घर में इत्तेफ़ाक़ से आई हो? प्यार से? क़िस्मत से? कि लखनऊ की सैकड़ों लड़कियों में से, राणा ख़ानदान के इकलौते वारिस के लिए, बस यूँ ही, एक मामूली मुनीम की बेटी चुन ली गई?"

तनवी का दिल तेज़ हो गया, पर उसने अपना चेहरा पत्थर रखा। "शादियाँ ऐसे ही होती हैं, बड़ी माँ। रिश्ते आते हैं, बात बनती है।"

"भोली मत बनो, ये तुम पर जँचता नहीं।" बड़ी माँ ने संदूक़चा खोला, और उसमें से एक पुरानी, पीली पड़ चुकी तस्वीर निकाली, और उसे धीरे से मेज़ पर तनवी के सामने सरका दिया।

तनवी ने नीचे देखा, और उसकी साँस रुक गई।

तस्वीर में उसके पापा थे। बहुत साल पहले के, जवान, मुस्कुराते हुए, वो मुस्कान जो तनवी ने अपने बचपन के बाद कभी नहीं देखी थी। और उनके साथ, उनका हाथ थामे, खड़ा था एक राणा आदमी, रौबदार, जिसे तनवी ने कभी नहीं देखा था।

"ये... ये मेरे पापा हैं," तनवी ने फुसफुसाया, और तस्वीर पर उसकी उँगली काँपी। "इनका राणा परिवार से क्या रिश्ता? पापा ने तो कभी..."

"तुम्हारे पापा ने तुम्हें बहुत कुछ नहीं बताया, बेटी।" बड़ी माँ की आवाज़ शहद और बर्फ़ थी। "एक पूरी ज़िंदगी, जो तुम्हारे जन्म से भी पहले की है। तुम्हारी शादी कोई हादसा नहीं थी। हमने तुम्हें चुना था। सोच समझकर। तुम्हारे पैदा होने से भी बहुत पहले से।"

उन्होंने आगे झुककर तनवी की आँखों में देखा, और उनकी मुस्कान बहुत धीमी, बहुत गहरी थी।

"क्या तुम जानना चाहोगी, क्यों?"

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