DesiHub

Chapter 8 of 15

चुना हुआ शिकार

फिर वही फेरे by Avni Oberoi

"क्या तुम जानना चाहोगी, क्यों?"

बड़ी माँ के वो शब्द कमरे में लटके रहे, धुएँ की तरह। मेज़ पर वो पीली पड़ चुकी तस्वीर पड़ी थी, जिसमें तनवी के पापा एक अजनबी राणा आदमी से हाथ मिला रहे थे। तनवी ने उससे नज़रें नहीं हटाईं। उसके सीने में एक चीख़ उठ रही थी, पर उसने उसे गले में ही दबा लिया।

"बताइए," उसने कहा। उसकी आवाज़ बमुश्किल निकली, पर निकली।

"पच्चीस साल पहले," बड़ी माँ ने शुरू किया, और उनकी आवाज़ में किसी पुरानी लोरी का सुकून था। "तुम्हारे पिता एक मामूली मुनीम थे। राणा परिवार के एक क़रीबी कारोबारी के यहाँ बही खाते लिखते थे। इतने ईमानदार कि लोग उन पर हँसते थे। फिर उस कारोबार में सरकारी पैसे की एक बड़ी हेराफेरी पकड़ी गई। लाखों की। किसी एक को बलि चढ़ना था।"

"और मेरे पापा ने वो इल्ज़ाम अपने सिर ले लिया," तनवी ने धीरे से कहा। ये उसने पहली बार सुना था, पर अचानक उसके पापा की वो हमेशा झुकी रहने वाली गर्दन, वो थकी हुई आँखें, सब उसे समझ आने लगीं।

"तुम तेज़ हो।" बड़ी माँ मुस्कुराईं, मोतियों की माला घुमाते हुए। "अपने मालिक को बचाने के लिए। जिस आदमी ने उन्हें रोटी दी, उसका गुनाह अपने माथे पर लिख लिया। ईमानदार आदमी का बेईमानी का बोझ उठाना। ऐसा वफ़ादार आदमी हमने कभी नहीं देखा था।"

"और फिर आप मसीहा बनकर आगे आईं," तनवी ने कहा, और पहली बार उसकी नज़र तस्वीर से उठकर बड़ी माँ के चेहरे पर टिक गई। "उन्हें बचा लिया।"

"अपनी पहुँच से, अपने वकीलों से। मुक़दमा दब गया, तुम्हारे पिता एक रात भी सलाखों के पीछे नहीं सोए।"

"बचाया?" तनवी की आवाज़ में अब एक धार आ गई। "नहीं, बड़ी माँ। आपने उन्हें ख़रीद लिया। आपने उनकी जान नहीं बचाई, उनकी आज़ादी पर ताला लगा दिया, और चाबी अपने पास रख ली।"

बड़ी माँ की मुस्कान एक पल को रुकी, फिर और गहरी हो गई। उन्होंने पान की डिबिया खोली। "बदले में बस ख़ामोशी। और वो तब से ख़ामोश हैं, पच्चीस साल से। एक वफ़ादार, क़ाबू में रहने वाला, एहसानमंद आदमी। ऐसा आदमी सोना होता है। और समझदार लोग सोना ख़र्च नहीं करते, संभालकर रखते हैं। सही वक़्त का इंतज़ार करते हैं।"

"और सही वक़्त तब आया," तनवी ने कहा, और उसकी आवाज़ पत्थर हो गई, "जब आपको एक ऐसा चार्टर्ड अकाउंटेंट चाहिए था जो आपके सबसे गंदे खातों पर बिना सवाल दस्तख़त करे, और बाद में उनका इल्ज़ाम भी चुपचाप उठा ले। कोई ऐसा जिसे आप क़ाबू में रख सकें। और उससे बेहतर कौन, जो उसी एहसानमंद आदमी की बेटी हो।"

बड़ी माँ ने पान मुँह में रखा। "और फिर मुनीम जी की बेटी सी ए बन गई, अपने बैच में सबसे ऊपर। तुम्हें लगता था वो मेहनत तुम्हारी थी। मेहनत तुम्हारी थी, बेटी। इस्तेमाल हमारा रहेगा।"

"तो मुझे ख़रीदा गया।"

"नहीं।" बड़ी माँ ने तस्वीर उठाकर वापस चाँदी के संदूक़चे में रखी। "ख़रीदना तो हम अजनबियों को हैं। तुम्हें हमने विरासत में पाया। एक क़र्ज़ की तरह, जो एक पीढ़ी से दूसरी में अपने आप उतर आता है। तुम्हारे पिता का एहसान, अब तुम्हारे ख़ून में बह रहा है। तुम उसे चुकाने के लिए ही इस घर में आई हो।"

कमरा एक पल को घूमता महसूस हुआ, पर तनवी ने अपनी पीठ सीधी रखी, और मेज़ की लकड़ी को कसकर पकड़ लिया, ताकि उसके हाथ का काँपना दिख न जाए।

"तो मेरी पूरी ज़िंदगी," उसने बहुत धीरे कहा, "मेरा रिश्ता, मेरी शादी, वो सात फेरे, सब एक बही खाते की एंट्री थी। एक उधार, जो किसी और ने लिया, और जिसे चुकाने के लिए मुझे जनम से चुन लिया गया।"

"बहुत ख़ूबसूरती से कहा।" बड़ी माँ आगे झुकीं, और उनकी आवाज़ का शहद उतर गया, नीचे सिर्फ़ फ़ौलाद रह गया। "और इसीलिए मैं तुम्हें एक बार साफ़ साफ़ चेतावनी दे रही हूँ। तुम इस घर की मालकिन नहीं हो। तुम एक चीज़ हो। काम की चीज़, पर चीज़ ही। मेरे पोते की आँखों में मैंने इन दिनों एक रोशनी देखी है, जो मुझे पसंद नहीं। तुम उसके दिल में अपनी जगह बनाने की कोशिश मत करना।"

"क्यों?" तनवी ने सीधे उनकी आँखों में देखते हुए पूछा।

"क्योंकि जिस दिन इस घर की तुमसे ज़रूरत पूरी होगी, उस दिन उस दिल का कोई मोल नहीं रहेगा।" बड़ी माँ मुस्कुराईं, और वो मुस्कान सबसे डरावनी थी। "और चीज़ें इस्तेमाल के बाद फेंक दी जाती हैं। टूट जाएँ तो और जल्दी। मैं नहीं चाहती कि मेरा पोता किसी टूटी चीज़ के लिए रोए।"

तनवी धीरे से उठी। उसकी टाँगें काँप रही थीं, पर उसने उन्हें काँपने नहीं दिया।

"आपकी इस बात के लिए शुक्रिया, बड़ी माँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ हैरानी से शांत थी। "अब मुझे पता है कि मैं इस घर में कहाँ खड़ी हूँ। और साफ़ ज़मीन डगमगाती ज़मीन से कहीं बेहतर होती है।"

वो दरवाज़े तक गई, फिर रुकी, पर मुड़ी नहीं। "एक बात और। आपने कहा हिसाब एक पीढ़ी से दूसरी में उतरता है। पर हिसाब हमेशा दोनों तरफ़ चलता है, बड़ी माँ। जो आप किसी के ख़ून में लिखती हैं, वो किसी दिन उसी ख़ून से वापस भी पढ़ा जाता है।"

बड़ी माँ की उँगलियाँ, जो मोतियों पर चल रही थीं, एक पल को रुक गईं। पर तनवी कमरे से बाहर निकल चुकी थी, ठीक उस पल से पहले जब उसका चेहरा टूटने वाला था।

बाहर गलियारे के अँधेरे में उसकी साँस उखड़ गई, और कुछ पल वो ख़ुद को बिखरने से रोकती रही।

उसने अरयन को बाग़ में पाया, हवेली के पीछे वाले उस सूने अमरूद के बाग़ में, जहाँ कुछ ही दिन पहले उसने पहली बार उसे चूमा था। वो अँधेरे में खड़ा उसका इंतज़ार कर रहा था, जैसे उसे पता हो कि आज रात कुछ टूटने वाला है। और जब उसने उसे वो सब बताया, तो उसने देखा कि कैसे एक आदमी अपनी ही आँखों के सामने ढह जाता है।

"मेरा परिवार," अरयन ने फुसफुसाया, और उसकी आवाज़ टूट गई। "उन्होंने तुम्हें मेरे लिए नहीं चुना, तनवी। उन्होंने तुम्हें मरने के लिए चुना। शुरू से।"

"अरयन, सुनो..."

"और मेरी शादी।" वो सुन ही नहीं रहा था। उसकी नज़र कहीं दूर थी, किसी अँधेरी, भयानक जगह पर। "मेरी शादी सिर्फ़ वो दरवाज़ा थी जिससे तुम्हें इस मक़तल के अंदर लाया गया। मैं वो दरवाज़ा था। मैंने अपने हाथों से तुम्हारे गले में वो वरमाला डाली, और मंडप में बस यही सोच रहा था कि ये सब कितनी जल्दी ख़त्म हो।"

"तुमने कुछ नहीं..."

"मैं तुम्हें फाँसी के तख़्ते तक ले जा रहा था।" उसकी आवाज़ ऊँची हुई, फिर बैठ गई। "और मुस्कुरा रहा था। दोनों जन्मों में, तनवी। पिछली बार मैंने ऐन वक़्त पर तुम्हारा हाथ छोड़ा। और इस बार मैं ही वो हाथ हूँ जिसने तुम्हें इस घर के अंदर खींच लिया।" वो मुड़ा, और उसकी आँखों में अपने ही लिए इतनी नफ़रत थी कि तनवी सहम गई। "मैं तुम्हें बचाने आया, और आज पता चला कि असल में मैं ही वो हथियार था जिससे तुम्हें मारा गया। दोनों बार। शायद इस घर में तुम्हारे लिए सबसे बड़ा ख़तरा युवराज नहीं, मैं हूँ। शायद तुम्हें मुझसे जितना दूर हो सके..."

"बस!"

तनवी ने आगे बढ़कर उसके कुर्ते को दोनों हाथों से पकड़ा, और उसे झिंझोड़कर ज़बरदस्ती अपनी ओर घुमाया।

"सुनो मुझे। ध्यान से।" उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर उसमें लोहा था। "तुम वो दरवाज़ा नहीं हो। तुम वो आदमी हो जो आज रात अपने ही ख़ानदान के ख़िलाफ़ मेरे साथ खड़ा है। पिछली बार मैं इस घर में अकेली थी, और इसीलिए मैं मरी। किसी ने मेरा हाथ नहीं थामा, तुमने भी नहीं। पर इस बार मेरे पास तुम हो।" उसने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में ले लिया। "तुम मेरा ख़तरा नहीं हो, अरयन। तुम मेरी इकलौती वजह हो जिसकी वजह से मुझे लगता है इस बार मैं जीत सकती हूँ। ये जाल था, मानती हूँ। पर अब ये जाल नहीं, जंग है। और हम दोनों साथ ये जंग लड़ रहे हैं।"

अरयन ने उसे देखा, उन गीली, हारी हुई आँखों से। फिर एक टूटी साँस के साथ उसने उसे अपनी बाँहों में खींच लिया, जैसे उसे डर हो कि ज़रा भी ढीला छोड़ा तो वो फिर उसी सर्द कोठरी में खो जाएगी।

कुछ देर वो दोनों उस ठंडे, ख़ामोश बाग़ में एक दूसरे को थामे खड़े रहे। ऊपर दिसंबर का चाँद धुंध में काँप रहा था।

फिर तनवी ने धीरे से सिर उठाया। "पच्चीस साल पहले उन्होंने मेरे पापा से उनकी आज़ादी छीन ली," उसने कहा, बहुत धीरे, जैसे कोई फ़ैसला सुना रही हो, "और उसकी क़ीमत में मुझे एक झूठी शादी में बाँध दिया। हमने ये रिश्ता कभी नहीं चुना, अरयन। उन्होंने चुना, अपने फ़ायदे के लिए।" उसने पीछे हटकर उसकी आँखों में देखा, और अँधेरे में भी उसकी आँखें जल रही थीं। "तो चलो हम इसे चुनें। अभी। उनके लिए नहीं, अपने लिए। इस बार ये शादी उनकी चाल नहीं, हमारा फ़ैसला होगी। मैं तुम्हें चुनती हूँ, अरयन। उस सबके बावजूद जो उन्होंने बनाया।"

कुछ पल अरयन कुछ बोल नहीं पाया। फिर उसने अपना माथा झुकाकर उसका माथा चूमा, बहुत धीरे, बहुत देर तक, और उस एक चुंबन में वो सब था जो लफ़्ज़ों में कभी नहीं आ सकता था। एक झूठी शादी की राख पर खड़े होकर, दो लोगों ने, जो एक दूसरे को एक बार खो चुके थे, पहली बार एक दूसरे को सच में चुना। उनके फ़ायदे के लिए नहीं। अपने लिए।

अगली सुबह उन्हें फिर वही नक़ाब पहनना था।

नाश्ते की मेज़ पर आज एकादशी की पूजा की तैयारी थी, और कमला, घर की पुरानी रसोइया, परेशान थी कि भोग किस बर्तन में लगे, चाँदी में या पीतल में, जहाँ बड़ी मालकिन के नियम सख़्त थे और एक ग़लती पर पूरा घर सिर पर उठ जाता था। और तनवी को, पूरे परिवार के सामने आदर्श बहू बनकर, बड़े इत्मीनान से वो पूरी रस्म समझानी पड़ी, जबकि उसका मन कहीं और था, उस बही खाते के पन्ने में।

मेज़ के नीचे, चुपके से, अरयन ने उसका हाथ ढूँढा और हल्के से दबा दिया। बस इतना सा, पर उतना ही काफ़ी था। और फिर, जब कमला घबराहट में चाँदी की जगह पीतल की थाली उठा लाई और उसका चेहरा फ़क़ हो गया, तो तनवी और अरयन की नज़रें मिलीं, और दोनों को, उस पूरे ख़ानदान के बीच, उस सबसे भारी सुबह में, एक साथ अपनी हँसी रोकनी पड़ी। ये कितना अजीब था। इन मुस्कुराते क़ातिलों के बीच एक छोटी सी हँसी का बच जाना। पर शायद वही चुराई हुई हँसी उन्हें ज़िंदा रखे हुए थी।

उस रात, जब हवेली सो गई, वो दोनों फिर बाउजी के पुराने स्टडी में मिले, एक मोमबत्ती की रोशनी में, और वही पुराने रजिस्टर खोलकर बैठ गए। पर इस बार उनकी नज़र अलग थी। अब वो बस घोटाला नहीं, उस हाथ को ढूँढ रहे थे जिसने ये सब बुना था।

"अरयन, ये देखो।" तनवी की उँगली एक पुराने पन्ने पर रुकी, काँपती हुई। "याद है शादी की पहली रात मैंने जो एंट्री देखी थी? त्रिवेणी होल्डिंग्स की, वक़्त से पूरे दो साल पहले? पैंतालीस करोड़ का वो पहला पत्थर। मैंने सोचा था वही शुरुआत थी। पर मैं ग़लत थी।"

"क्या मतलब?"

"ये देखो।" उसने उससे भी पीछे के एक पन्ने पर उँगली रखी। "इससे पहले की एक एंट्री है। पर इसी से सब जुड़ा है। मेरे पापा वाली पूरी योजना, मेरा चुना जाना, त्रिवेणी, सब इसी एक पन्ने से निकलता है। और ये सब इतनी सफ़ाई से, इतने सही क्रम में हुआ है, जैसे किसी ने पूरी कहानी पहले से लिखकर रख दी हो, और फिर बस उसे एक एक करके सच होते देखता रहा हो।"

"बड़ी माँ?" अरयन ने पूछा।

"मुझे भी पहले यही लगा था। पर नहीं।" तनवी ने सिर हिलाया। "आज शाम उन्होंने मुझ पर रौब झाड़ा, जैसे इस पूरे खेल की मालकिन वही हों। पर वो ग़लत हैं। उन्हें पता ही नहीं कि कोई उनसे भी आगे चल रहा है। कोई, जो उनसे भी पहले से ये सब जानता था।"

"तुम्हें कैसे पता?"

"क्योंकि ये देखो।" उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई। "सबसे पहली एंट्री, जिससे ये पूरी ज़ंजीर शुरू होती है, ये बड़ी माँ के दस्तख़त से भी पहले की है। उस वक़्त की, जब इस खाते पर उनका कोई दख़ल ही नहीं था। ये किसी और के इशारे पर लिखी गई।"

अरयन उस पन्ने पर झुका, मोमबत्ती क़रीब लाते हुए, और तनवी ने उसके चेहरे को धीरे धीरे सफ़ेद होते देखा।

वहाँ, उस सबसे पुरानी एंट्री के नीचे, बहुत छोटे, सधे हुए, सलीक़ेदार अक्षरों में, वही लिखावट थी। वही हाथ, जो उस रात तनवी ने त्रिवेणी के पन्ने पर देखा था। हू ब हू वही। और उस एंट्री की तारीख़ उस ज़माने की थी, जब अरयन और तनवी का रिश्ता तय होना तो दूर, किसी के ज़ेहन में आया तक नहीं था।

"ये नामुमकिन है," अरयन ने फुसफुसाया, और उसके हाथ में मोमबत्ती काँप उठी। "किसी को इतने बरस पहले कैसे पता हो सकता था कि सब ठीक ऐसे ही होगा? कि मेरी शादी तुमसे होगी, कि तुम सी ए बनोगी, कि तुम्हीं वो काग़ज़ दस्तख़त करोगी? ये सब पहले से कोई कैसे लिख सकता है?"

तनवी ने धीरे से अपनी नज़र उस पन्ने से उठाई और अरयन की आँखों में डाल दी। और उस काँपती लौ में, दोनों के मन में एक ही, असंभव, भयानक जवाब उतरा। वो जवाब, जिसे वो दोनों किसी और से बेहतर पहचानते थे, क्योंकि कहीं न कहीं वो जवाब वो ख़ुद थे।

सिर्फ़ उसे, जो ये सब पहले जी चुका हो।

Comments

Sign in to join the conversation.

No comments yet. Be the first to share your thoughts.

0:00 0:00