DesiHub

Chapter 2 of 15

नई दुल्हन के दाँव

फिर वही फेरे by Avni Oberoi

राणा हवेली की सुबह घंटियों से शुरू होती थी।

तनवी की आँख खुली तो छत पर वही पुराना झूमर लटका था, बेल्जियम का काँच, जिसकी हर बूँद उसने अपनी पिछली ज़िंदगी में गिन रखी थी, उन रातों में जब नींद नहीं आती थी और डर आता था। आज उसने उन्हें फिर गिना। बहत्तर। पूरे बहत्तर।

वो इस कमरे को जानती थी। इस पलंग को, इन दीवारों को, उस खिड़की को जिससे पीछे का अमरूद का बाग़ दिखता था। ये वो कमरा था जहाँ उसने अपनी ज़िंदगी के सबसे अकेले तीन साल काटे थे।

बग़ल वाली जगह ख़ाली थी। चादर तक सिलवट रहित। अरयन रात भर नहीं आया था।

तनवी ने एक गहरी साँस ली। अच्छा है। उससे अभी नज़रें मिलाने का हौसला उसमें भी नहीं था। मंडप में उस आदमी की वो काँपती, पीली आँखें अब तक उसके सीने में अटकी थीं। वो ऐसे क्यों देख रहा था? उसे कैसे पता था?

"उसे कुछ पता नहीं," तनवी ने ख़ुद से कहा, उठते हुए। "होश में रह, तनवी। तू यहाँ प्यार करने नहीं आई। तू यहाँ हिसाब बराबर करने आई है।"

दरवाज़े पर दस्तक हुई।

"बहूरानी?" एक नौकरानी की झिझकती आवाज़। "बड़ी माँ ने मुँह दिखाई के लिए बुलाया है। सब नीचे इंतज़ार कर रहे हैं।"

मुँह दिखाई। तनवी के होंठों पर एक हल्की, ठंडी मुस्कान आई।

पिछली बार ये रस्म एक मज़ाक बन गई थी। वो नहीं जानती थी कि घूँघट किस हाथ से उठाना है, किसके पैर पहले छूने हैं, थाली में रखे शगुन को किस तरफ़ सरकाना है। और राणा घर की औरतों ने मुस्कुरा मुस्कुरा कर उसे काटा था, "अरे, इन्हें तो कुछ आता ही नहीं। पता नहीं किस घर से लाए हैं।"

इस बार उसे सब आता था।

नीचे बड़े दालान में पूरा ख़ानदान जमा था। मख़मली गद्दों पर बैठी फुफियाँ, चाचियाँ, ताइयाँ, सबके चेहरों पर वही पुरानी परख। और सबके बीच, ऊँची पीठ वाली कुर्सी पर, सफ़ेद बनारसी में, गले में मोतियों की वो तीन लड़ें जो तनवी कभी नहीं भूली, बैठी थीं रजेश्वरी राणा। बड़ी माँ। इस घर की असली मालकिन।

वो औरत जिसने तीन साल बाद, बिना पलक झपकाए, अपनी ही बहू को क़ुर्बानी का बकरा बना दिया था।

तनवी का दिल एक पल को ठंडा पड़ गया। फिर उसने अपनी मुस्कान संभाली और आगे बढ़ी।

घूँघट सही हाथ से उठा। पैर सही क्रम में छुए, पहले बड़ी माँ के, फिर बाक़ी बड़ों के। थाली का शगुन सही तरफ़ सरका। जब किसी बूढ़ी ताई ने उसके हाथ में सोने की एक अंगूठी रखी, तो तनवी ने उसे माथे से लगाया, ठीक उस तरीक़े से जो सिर्फ़ इस ख़ानदान में चलता था।

दालान में एक पल को सन्नाटा छा गया।

"वाह," एक चाची फुसफुसाई। "बहू को तो हमारे घर के रिवाज ऐसे आते हैं जैसे यहीं पैदा हुई हो।"

बड़ी माँ कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने बस अपनी आँखें थोड़ी सी सिकोड़ीं, और तनवी को ऊपर से नीचे तक देखा, एक जौहरी की तरह, जो नक़ली और असली में फ़र्क़ ढूँढ रहा हो।

"पास आओ, बेटी," उन्होंने आख़िरकार कहा। उनकी आवाज़ नरम थी, शहद जैसी। और तनवी जानती थी कि उस शहद के नीचे क्या है।

तनवी पास गई और उनके पैर छुए।

"सुना है तुम बहुत पढ़ी लिखी हो। चार्टर्ड अकाउंटेंट।" बड़ी माँ ने उसका चेहरा अपनी हथेली में लिया। उनके हाथ ठंडे थे। "अच्छा है। इस घर में पैसे का हिसाब रखना कोई आसान काम नहीं। बड़ा कारोबार है। बड़ी ज़िम्मेदारियाँ।"

"जी, बड़ी माँ," तनवी ने नज़रें नीची रखीं। "जहाँ आप कहेंगी, मैं सीख लूँगी।"

"सीखने की क्या ज़रूरत," बड़ी माँ मुस्कुराईं, "तुम्हें तो लगता है सब पहले से आता है।"

तनवी का दिल एक धड़कन के लिए रुका।

उसने ऊपर देखा। बड़ी माँ की आँखें सीधी उसकी आँखों में थीं। उनमें हँसी थी, पर पीछे कुछ और भी था। एक सवाल। एक काँटा।

"बस क़िस्मत अच्छी है, बड़ी माँ," तनवी ने हल्के से कहा। "अच्छे घर में आई हूँ। अच्छी चीज़ें ख़ुद आ जाती हैं।"

बड़ी माँ की उँगलियाँ एक पल को उसके गाल पर रुकीं। फिर उन्होंने बहुत धीरे से, बहुत मीठा पूछा, "तुम्हारे पापा अकेले हैं ना? बस एक बेटी। और कोई नहीं।"

तनवी की रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ गई। ये सवाल नहीं था। ये नाप थी।

"जी," उसने कहा।

"ऐसे आदमी की बेटी या तो बहुत समझदार होती है," बड़ी माँ ने उसका हाथ थपथपाया, "या बहुत डरी हुई। तुम कौन सी हो?"

तनवी ने सीधे उनकी आँखों में देखा। "दोनों, बड़ी माँ। समझदार हूँ, इसलिए डरती नहीं।"

एक पल। एक लंबा, ख़ामोश पल, जिसमें दालान की सारी हँसी थम गई। फिर बड़ी माँ हँस दीं, ऊँची, खनकती हँसी, और पूरा कमरा उनके पीछे हँस पड़ा।

"बहू तेज़ है," उन्होंने सबसे कहा। पर तनवी से नहीं हटीं उनकी आँखें। "बहुत तेज़।"

और तनवी जानती थी, ये पहली चाल थी, और दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया था। एक दूसरे की दुश्मन के तौर पर, भले ही अभी सिर्फ़ एक को ये बात पता थी।

रस्मों के बाद उसे रसोई और भंडार घर दिखाने की ज़िम्मेदारी पुरानी महाराजिन कमला के हवाले हुई, जो तीस साल से इस घर में थी।

"ये चाँदी का सामान यहाँ रहता है, बहूरानी," कमला ने एक बड़ी आलमारी खोली।

"और सरदियों वाली बड़ी देगें ऊपर वाले कोठे में, गुड़ के मटके के पीछे," तनवी ने बिना सोचे कह दिया। "है ना?"

कमला रुक गई, चाबियों का गुच्छा हाथ में लटका।

"जी... हाँ," उसने धीरे से कहा। "पर आपको कैसे..."

"और छोटी फूफी जी चाय में चीनी नहीं लेतीं," तनवी आगे बढ़ती गई, मानो कोई पुरानी फ़ेहरिस्त दोहरा रही हो। "बड़े बाउजी को सुबह की पूजा से पहले अदरक वाली चाय चाहिए, बिना दूध। और गुरुवार को इस घर में माँस नहीं बनता।"

कमला की आँखें फैलती चली गईं। उसने चुपके से अपने कान छुए, फिर हल्के से बुदबुदाई, "हे भगवान।"

तनवी ने ख़ुद को रोका। बहुत हो गया। उसने जल्दी से एक मासूम मुस्कान ओढ़ ली। "बस... पहले से थोड़ी पूछताछ कर ली थी। नए घर में अटपटा न लगे, इसलिए।"

"हाँ जी, हाँ," कमला ने सिर हिलाया, पर उसकी नज़रें तनवी पर ऐसे टिकी थीं जैसे उसने कोई जादूगरनी देख ली हो। बाक़ी का घर उसने थोड़ी दूरी से दिखाया।

दोपहर तक रस्में चलीं। और जब आख़िरकार उसे अपने कमरे में अकेले रहने का मौक़ा मिला, तो तनवी ने दरवाज़ा बंद किया, पीठ उससे टिकाई, और काँपते हाथों से अपना फ़ोन निकाला।

परी ने पहली घंटी पर उठाया।

"हेलो? तनु? जिंदा है तू? बता बता बता, राणा हाउस अंदर से कैसा है? सच बता, नौकर कितने हैं? झूमर असली क्रिस्टल का है? तेरे कमरे में अपना अलग बाथरूम है ना? और..."

"परी, एक साँस ले," तनवी हँस पड़ी, पहली बार उस पूरे दिन में।

"साँस बाद में। पहले गॉसिप। तेरी सास कैसी है? फ़िल्मों वाली खड़ूस, या असली वाली खड़ूस?"

तनवी की हँसी हल्की पड़ गई। "असली वाली," उसने धीरे से कहा। "परी, मुझे तुझसे कुछ कहना है। बहुत ज़रूरी। पर तू पागल समझेगी।"

"मैं तुझे पहले से पागल समझती हूँ। बोल।"

तनवी ने मुँह खोला। और सारा सच, तीन साल, अदालत, वो ठंडी कोठरी, ये सब उसके गले तक आ गया, धक्के मारता हुआ।

"परी, अगर मैं कहूँ कि मुझे पता है ये घर मेरे साथ क्या करने वाला है... कि ये लोग मुझे..."

"तनु।" परी की आवाज़ अचानक नरम हो गई, उस तरह नरम जैसे सिर्फ़ बहुत पुरानी दोस्त की हो सकती है। "सुन। नया घर, नए लोग, इतनी बड़ी हवेली। डर लगना नॉर्मल है। पर ये लोग तुझ पर जान छिड़कते होंगे। तू उनके इकलौते बेटे की दुल्हन है। तेरे साथ कौन क्या करेगा?"

तनवी ने आँखें बंद कीं। एक साँस ली। और सच को वापस निगल लिया। परी इस वक़्त उसका यक़ीन नहीं करेगी। कोई नहीं करेगा। अभी नहीं।

"कुछ नहीं," उसने कहा, और ज़बरदस्ती हँसी। "बस... यहाँ का खाना बहुत तेल वाला है। पहले ही हफ़्ते में मोटी हो जाऊँगी।"

"पगली!" परी ज़ोर से हँसी। "रानी बन गई है और खाने की पड़ी है। सुन, अपना ख़याल रख। और दूल्हे राजा? रात को कुछ रोमांस वोमांस?"

तनवी की नज़र ख़ाली पलंग पर गई। "वो बहुत व्यस्त आदमी हैं।"

"पहली रात को व्यस्त?" परी ने नाक सिकोड़ी। "लाल झंडी, मेरी जान। ख़ैर, कल पूरी रिपोर्ट चाहिए। पूरी।"

फ़ोन रखकर तनवी काफ़ी देर खिड़की के पास खड़ी रही, अमरूद के बाग़ को देखती हुई, जहाँ शाम उतर रही थी। फिर उसने आँखें पोंछीं।

रोना बाद में। काम पहले।

उसके पास एक फ़ायदा था जो दुनिया में किसी के पास नहीं था। उसे पता था कि ये घर अंदर से क्या छुपाता है। कहाँ से वो घोटाला शुरू होगा, किन काग़ज़ों से, किस कमरे से। और सबसे ज़रूरी, उसे पता था कि किस दिन, किस मेज़ पर, किस झूठे बही-खाते पर वो दस्तख़त करने को मजबूर की जाएगी।

"पिछली बार मैंने आँख बंद करके दस्तख़त किए थे," उसने अँधेरे होते कमरे से फुसफुसाया, "क्योंकि मुझे भरोसा था। इस बार मैं हर पन्ना पहले पढ़ूँगी। तुमसे पहले।"

रात गहरा गई। हवेली सो गई। और तनवी, नंगे पैर, अपने आँचल में टॉर्च छुपाए, उस लंबे गलियारे से होती हुई नीचे उतरी, जिसका हर मोड़ उसे ज़बानी याद था।

बाउजी का पुराना स्टडी। यहीं, इसी कमरे की एक दराज़ में, राणा ग्रुप के असली खाते रखे जाते थे, वो खाते जो बैंक को कभी नहीं दिखाए जाते थे।

उसने दरवाज़ा खोला। अंदर अँधेरा था, चमड़े और पुरानी फ़ाइलों की महक। उसकी टॉर्च की रोशनी मेज़ पर पड़ी, अलमारियों पर, और फिर उस बड़ी मेज़ की सबसे निचली दराज़ पर।

उसने दराज़ खींची। वहीं था। गहरे हरे रंग का मोटा रजिस्टर, चमड़े की जिल्द वाला, जिसे वो कभी नहीं भूल सकती। उसकी मौत का काग़ज़।

उसके हाथ काँप रहे थे जब उसने उसे खोला। उसे ठीक से पता था इसमें क्या होगा। शुरू के सौ पन्ने सच्चे हिसाब के, और फिर, बहुत बाद में, वो झूठी एंट्रियाँ जिनसे करोड़ों इधर से उधर किए गए थे। पर वो एंट्रियाँ अभी होनी ही नहीं चाहिए थीं। अभी तो शादी की पहली रात थी। वो घोटाला तो बहुत बाद में शुरू हुआ था।

उसने पन्ने पलटे। एक, दो, दस, बीस।

और फिर उसका हाथ रुक गया।

वहाँ, एक ताज़ा पन्ने पर, अभी सूखी स्याही में, एक एंट्री लिखी थी। एक शेल कंपनी का नाम जिसे वो पहचानती थी, वो कंपनी जिसके ज़रिए सबसे बड़ी रक़म चुराई गई थी। पैंतालीस करोड़।

पर ये एंट्री इस तारीख़ को नहीं होनी चाहिए थी। पिछली बार ये दो साल बाद हुई थी। दो साल।

तनवी की साँस अटक गई। टॉर्च की रोशनी में वो स्याही चमक रही थी, ताज़ा, गीली, असंभव।

जो होना था, वो पहले ही हो रहा था।

कोई और भी कल को बदल रहा था।

और वो किसी और की लिखावट थी।

Comments

Sign in to join the conversation.

No comments yet. Be the first to share your thoughts.

0:00 0:00