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अध्याय 17 / 30

समर का हिसाब

राख से उठी द्वारा Avni Oberoi

सुबह की रौशनी हवेली में छन कर आई, पर घर में सुकून नहीं था। ... रात ढले रतन की बैठक में उस हुमा वाली औरत को ग़ायब कर देने का सौदा हुआ था, उसकी परछाईं घर पर मंडरा रही थी। ... और उसी घर में रात भर का जागा समर बहीखाना कमरे का ताला तोड़ कर छह बरस पुरानी दफ़्न फ़ाइलें बाहर खींच रहा था।

“ये सब बाहर लाओ। हर फ़ाइल, हर काग़ज़।” ... “छह बरस पहले का हर हिसाब मेरे सामने चाहिए। जो कमरा माजी ने ताला लगा कर छुपाया, आज वो पूरा खुलेगा।” ... “बहुत देर से खुल रहा है।”

शोर सुन कर घर जाग गया। माजी दहलीज़ पर आ खड़ी हुईं, चेहरे पर वही पुराना रौब जो अब भीतर से काँप रहा था। ... और सीढ़ियों से उतरता कबीर एक पल को ठिठक गया, अपने बड़े भाई को किसी जुनूनी की तरह काग़ज़ों के ढेर में डूबा देख कर।

“किसी को कुछ नहीं कहना?” ... “छह बरस हम सब एक झूठ पर आराम से सोते रहे। हमने एक पेट से बहू को चोर कहा, बारिश में फेंका, और चैन से खाते रहे।” ... “पर वो ज़िंदा है, माजी। तारा ज़िंदा है। और मैं जान कर रहूँगा कि उस रात हुआ क्या था।”

“भाई साहब, रुकिए।” ... “आप रात भर से इसी कमरे में हैं। ऐसे नहीं। बैठिए, एक साँस लीजिए।” ... “आप कह रहे हैं तारा ज़िंदा है। ये बात आपसे किसने कही?”

“रागिनी ने। उसी छत पर, जहाँ उसने एक औरत को धकेल कर मारने की कोशिश की।” ... “और मेरा दिल कहता है वो सच थी, कबीर। जिसे मैंने छह बरस मरा समझ कर मातम किया, वो कहीं साँस ले रही है। और उसका हिसाब अब मेरे सिवा कोई नहीं चुकाएगा।”

कबीर के भीतर एक ठंडी लहर दौड़ गई। वो जानता था तारा ज़िंदा है, वो ये भी जानता था कि वो कहाँ है और किसकी गोद में एक बच्चा पल रहा है। ... और अब उसे अपने ही सगे भाई को उसी औरत के लिए बिखरते देखना था, जिसका हाथ उसने चुपके से थाम लिया था। एक ही औरत, दो भाई, और बीच में छह बरस की राख।

“अगर वो सच में ज़िंदा है, तो उसे ढूँढने का ये तरीक़ा नहीं, भाई साहब।” ... “पूरे घर को हिला कर आप उसे नहीं, बस उन लोगों को जगा देंगे जो कभी नहीं चाहते कि वो मिले। ठहरिए। सोच कर क़दम उठाइए, वरना जिसे बचाना चाहते हैं उसी को ख़तरे में डाल देंगे।”

“मैंने छह बरस ठहर कर देख लिया, कबीर। ठहरने ने मुझे सिर्फ़ एक कायर बनाया।” ... “अब मैं उस औरत के पास जाऊँगा, अमारा के पास। वो तारा को जानती है, मुझे यक़ीन है। और मैं उसके क़दमों में गिर कर भी उससे तारा का पता निकलवा कर रहूँगा।”

उसी दोपहर, हुमा के दफ़्तर के एक बंद कमरे में, अमारा का मुखौटा एक पल के लिए उतरा हुआ था। ... कबीर दरवाज़ा भीतर से बंद कर के आया था, आँखों में वही चिंता ले कर जो अब सिर्फ़ उन दोनों का राज़ थी। इन चार दीवारों के अंदर वो अमारा नहीं, तारा थी, और वो अकेला आदमी था जिसके सामने वो साँस ले सकती थी।

“समर बिखर गया है, तारा।” ... “उसने पूरा पुराना बहीखाना कमरा उलट दिया है। पूरे घर के सामने कह रहा है कि तुम ज़िंदा हो, कि वो तुम्हें ढूँढ कर रहेगा।” ... “और वो तुम्हारे पास आ रहा है। अमारा से तारा का पता माँगने।”

“आने दो उसे।” ... “छह बरस उसने मुझे मरा समझ कर आराम की नींद ली, कबीर। अब अगर उसकी रातें जल रही हैं, तो ये भी मेरे अधूरे हिसाब का एक कौर है।” ... “पर उसे अपने लिए तड़पते देखना, इतने बरस बाद, वो सुकून नहीं देता जितना मैंने सोचा था।”

“मुझे बुरा लगता है, तारा।” ... “मेरा भाई जिस औरत के लिए टूट रहा है, वो तुम हो। और मैं उसी औरत का हाथ थामे खड़ा हूँ। इस घर में इससे बड़ा गुनाह शायद कोई नहीं होगा।” ... “पर मैं इसे छोड़ नहीं सकता। तुम्हें नहीं।”

“गुनाह?” ... “गुनाह वो नहीं जो हम दोनों के बीच है, कबीर। गुनाह वो था जो इस घर ने एक पेट से बहू के साथ किया।” ... “तुम इकलौते हो जिसने मुझे कभी चोर नहीं माना। जानते हो ये कितना ख़तरनाक है, कि मैं तुम्हारे सामने साँस लेना दुबारा सीख गई हूँ?”

दो चेहरे एक साँस की दूरी पर आ कर ठहर गए। बाहर एक ख़ानदान डूब रहा था, एक पति अपनी मरी बीवी को ढूँढ रहा था, और यहाँ वो बीवी अपने देवर की हथेली में अपनी थकी उँगलियाँ छुपाए खड़ी थी। ... कबीर का हाथ उसके गाल तक उठा, और तारा ने एक पल आँखें मूँद लीं, जैसे राख के नीचे कोई चिंगारी अब भी ज़िंदा हो।

“नहीं। अभी नहीं, कबीर।” ... “जब तक रतन खड़ा है, जब तक मेरे बेटे के सिर पर इस घर की परछाईं है, मेरे पास मोहब्बत के लिए हाथ ख़ाली नहीं हैं।” ... “अभी समर को सँभालना ज़्यादा ज़रूरी है। एक टूटा आदमी हर पत्थर उलटता है, और मुझे डर है वो ग़लत पत्थर उलट दे।”

“तो उसे सही पत्थर की तरफ़ मोड़ दो।” ... “उसका ग़ुस्सा एक आग है, तारा। या तो वो आग हम दोनों को जला देगी, या तुम उसे रतन की तरफ़ मोड़ दोगी।” ... “पर जल्दी करो। क्योंकि जो आग बेक़ाबू हो जाए, वो अपनों को सबसे पहले जलाती है।”

उसी शाम समर हुमा के दफ़्तर आया। वो अब वो अकड़ा हुआ वारिस नहीं था जो पहली बार बोर्डरूम में अमारा से टकराया था। ... वो एक बिखरा हुआ आदमी था, आँखों के नीचे रात भर की स्याही, और हाथों में छह बरस पुरानी वो फ़ाइलें जिन्हें वो सुबह से खंगाल रहा था।

“अमारा जी, मुझे पता है आप तारा को जानती हैं।” ... “मैं रात भर ये काग़ज़ पढ़ता रहा, और अब यक़ीन होता है कि तारा ने वो चोरी की ही नहीं जिसका इल्ज़ाम उस पर लगा।” ... “मुझे उसके पास ले चलिए। बस एक बार कहना है कि मैंने उसके साथ क्या किया।”

“आप उसके पास जा कर कहेंगे क्या, समर जी?” ... “कि माफ़ कर दो? कि मुझे नहीं पता था? एक पेट से औरत को आपने चोर कह कर बारिश में धकेला।” ... “कौन सा लफ़्ज़ उस रात को वापस लाएगा, बताइए?”

“मुझे कुछ नहीं पता, अमारा जी।” ... “मुझे बस इतना पता है कि मेरी बीवी ने उसे फँसाया, और मैंने आँखें मूँद लीं, क्योंकि सच देखना आसान नहीं था। मैं कायर था।” ... “आप बताइए मैं क्या करूँ। कोई रास्ता दीजिए। मैं उसका क़र्ज़ चुकाना चाहता हूँ।”

“क़र्ज़?” ... “कुछ क़र्ज़ माफ़ी से नहीं चुकते, समर जी। कुछ सिर्फ़ सच से चुकते हैं।” ... “तारा के इल्ज़ाम के पीछे मत भागिए, उस पैसे के पीछे भागिए। मेहरबान ट्रेडर्स। पूछिए वो शेल कंपनी किसके इशारे पर चली, किसके हाथ से वो पैसा घूमा।”

“मेहरबान ट्रेडर्स।” ... “ये नाम मैंने बहीखातों में देखा है। बार बार, हर बरस।” ... “आप कहना चाहती हैं कि जिसने ये कंपनी चलाई, वही असली चोर है? वही जिसने तारा को फँसाया?”

“मैं कुछ कहना नहीं चाहती, समर जी। मैं चाहती हूँ आप ख़ुद देखें।” ... “जो इंसान सालों इस घर के हिसाब पर बैठा है, जिसने हर ऑडिट को धुंध में टाला, उससे पूछिए। जो सच तारा को बेगुनाह करेगा, वही उस आदमी को नंगा कर देगा।” ... “बस उसे खोदने की हिम्मत चाहिए।”

समर ने वो फ़ाइल किसी हथियार की तरह सीने से लगा ली, इस बात से बेख़बर कि जो सच वो तारा के लिए खोदेगा वो उसके अपने चाचा को फाँसी तक ले जाएगा। ... और अमारा भी ये देख ना पाई कि उस फ़ाइल के पन्नों के बीच एक और काग़ज़ चुपके से खिसक गया था, जो किसी बहीखाते का नहीं था।

रात गहरा गई थी जब बेला अपनी स्क्रीनों के पार से बोली। कमरे में सिर्फ़ बहीखातों की ठंडी नीली रौशनी थी, और दो औरतें जो इस पूरे बदले की असली मालकिन थीं। ... अमारा ने समर को रतन की तरफ़ मोड़ दिया था, पर बेला के चेहरे पर वो तसल्ली नहीं थी।

“आपने एक टूटे आदमी के हाथ में जलती मशाल थमा दी है, अमारा।” ... “समर अब रतन की तरफ़ जाएगा, ये अच्छा है। पर टूटा आदमी सीधी लकीर में नहीं चलता। वो खोदेगा, और खोदते खोदते कहीं भी पहुँच सकता है। रतन तक, या फिर सीधा आप तक।”

“इसीलिए मैं उसे भटकने नहीं दूँगी, बेला।” ... “अब तक इशारे दे रही थी, अब उसे सच का एक नापा-तुला टुकड़ा दूँगी।” ... “बटरा का वो ऑडिट नोट जो समर को मिला था, उसका मतलब समझा कर मैं उसका ग़ुस्सा रतन पर तान दूँगी। समर मेरा हथौड़ा बनेगा, और उसे पता तक नहीं चलेगा।”

“और अगर वो हथौड़ा पलट कर आप पर गिरा?” ... “समर आज तारा को ढूँढ रहा है। कल वो पूछेगा, आख़िर ये अमारा तारा को इतना गहरा क्यों जानती है? आधा सच एक फिसलन भरी सीढ़ी है, ये आपने ख़ुद कहा था।” ... “और देसाई की फ़ाइल अब भी खुली है। बटरा तक हमें रतन के आदमी से पहले पहुँचना है।”

“एक एक कर के, बेला।” ... “बटरा हमारी अगली मंज़िल है, हाँ। पर पहले समर को ठीक निशाने पर बिठाना होगा, वरना वो निशाना ख़ुद मैं बन जाऊँगी।” ... “और तुम फ़िक्र मत करो। जिस दिन ये सब ख़त्म होगा, मेरा आरव पहली बार खुली हवा में साँस लेगा।”

आरव का नाम लेते ही अमारा की आवाज़ एक पल को नरम पड़ गई। और ठीक उसी पल बेला की नज़र मेज़ पर पड़ी उस पतली फ़ाइल पर गई, जिसमें से अमारा ने आज शाम समर को काग़ज़ निकाल कर दिए थे। ... बेला ने वो फ़ाइल उठाई, पन्ने पलटे, और उसका चेहरा अचानक पत्थर हो गया।

“अमारा।” ... “आपने आज शाम समर को जो फ़ाइल दी, उसमें से... आरव की वो तस्वीर कहाँ है?” ... “वो ड्रॉइंग, जिसमें उसने अपने कभी ना देखे 'पापा' का चेहरा बनाया था। वो इसी फ़ाइल में रखी थी। और अब यहाँ नहीं है।”

एक पल के लिए अमारा के भीतर तारा और अमारा, दोनों जम गईं। ... वो तस्वीर, जिसमें पाँच बरस के आरव ने अपने कभी ना देखे बाप का हूबहू अहूजा चेहरा बनाया था, और उसके ऊपर वही चाँद जो उसकी लोरी में उगता था। वो अब समर के हाथ की उसी फ़ाइल के साथ थी। जिस आदमी की शक्ल उस काग़ज़ पर बनी थी, ठीक उसी के भाई के हाथ में।

“वो फ़ाइल समर के पास है।” ... “बेला, वो तस्वीर उसके पास है।” ... “अगर उसने उसे देख लिया... अगर उसने वो चेहरा पहचान लिया...” ... “मुझे अभी उस तक पहुँचना होगा। इसी वक़्त।”

अमारा की गाड़ी रात की सूनी सड़कों पर उसी हवेली की तरफ़ भागी, जिसकी देहरी से छह बरस पहले उसे घसीट कर फेंका गया था। ... वो हर लाल बत्ती पर सिर्फ़ एक चेहरा सोच रही थी, आरव का। और एक दूसरा चेहरा, जो अब एक तस्वीर पर समर के हाथ में था। रास्ता आज कभी इतना लंबा नहीं लगा था।

हवेली ख़ामोश थी, बस समर की बैठक से रौशनी की एक झिरी दहलीज़ पर गिर रही थी। ... अमारा ने अपने क़दमों की आवाज़ दबाई। वो मुखौटा फिर से चढ़ाने की कोशिश करती रही, पर भीतर सिर्फ़ एक माँ थी जिसका दिल हलक़ में अटका था। उसने अधखुले दरवाज़े को धीरे से धकेला।

“समर जी।” ... “मैं आपको एक ज़रूरी सच दिखाने आई हूँ। जो आप ढूँढ रहे हैं, उसका सिरा रतन के...” ... और वो लफ़्ज़ वहीं रुक गए।

समर मुड़ा नहीं। वो कुर्सी पर बैठा था, पीठ दरवाज़े की तरफ़, और उसके हाथों में कोई बहीखाता नहीं था। ... उसके काँपते हाथों में एक बच्चे की बनाई तस्वीर थी, क्रेयॉन से बना एक घर, एक चाँद, और एक मुस्कुराता आदमी, जिसके नीचे टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था, 'मेरे पापा।' और वो चेहरा, वो हूबहू अहूजा चेहरा था।

“अमारा जी।” ... “ये तस्वीर आपकी फ़ाइल से गिरी थी। किसी बच्चे ने बनाई है।” ... “पर ये चेहरा... मैं इस चेहरे को कहीं से जानता हूँ। ये तो इसी घर का चेहरा है। ये... ये तो हूबहू मेरे जैसा है।”

अमारा दरवाज़े में जड़ हो गई। वो सच जिसे उसने सबसे गहरी क़ब्र में दफ़नाया था, अब उसके अपने क़ातिल के भाई के हाथों में खुला पड़ा था। ... जिस फ़ैसले को ले कर वो आई थी, वो उसके होंठों पर ही राख हो गया, और उसकी जगह वो काग़ज़ बचा जो एक पल में उसके बेटे को इन भेड़ियों के सामने नंगा कर सकता था। ... और समर की उँगली उस मुस्कुराते चेहरे पर धीरे धीरे फिर रही थी, जैसे वो किसी आईने में अपना ही अक्स छू रहा हो।

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