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अध्याय 7 / 30

रागिनी का शक

राख से उठी द्वारा Avni Oberoi

दरवाज़े पर ठिठकी अमारा ने वो नाम सुन लिया था। ... अपना ही मुर्दा नाम, एक बूढ़ी औरत के काँपते होंठों पर। ... छह साल में खड़ी की हुई हर दीवार एक फुसफुसाहट में हिल उठी। एक लेनदार का दिमाग़ कहता था, इस दरार को अभी, इसी वक़्त, डर से बंद कर दो। पर सामने खड़ी वो शांति थी। ... वही शांति, जो कभी भूखी तारा की थाली में चुपके से गरम रोटी रख आती थी।

"तारा..." ... "बीबीजी... आप? ... ये लोरी, ये चाँद... ये तो मेरी तारा बीबी की थी।" ... "मैं बस काग़ज़ समेट रही थी, और ये सूरत मेरी आँखों के सामने आ खड़ी हुई।"

अमारा उसी ठंडे इनकार तक पहुँचने ही वाली थी, जो उसने उस रात कबीर को दिया था। 'तुम्हें ग़लतफ़हमी हुई है, काकी।' वो लफ़्ज़ उसके गले तक आए। ... पर शांति की भीगी आँखों में कोई शक नहीं था, सिर्फ़ छह बरस पुराना एक दर्द था। और उस दर्द के सामने झूठ बोलना, अपनी ही माँ के आँसू पोंछने से इनकार करने जैसा था।

अमारा ने चुपचाप दरवाज़ा भेड़ दिया। और उस बंद कमरे में, हफ़्तों में पहली बार, उसने वो ठंडा चेहरा उतार दिया जिसे दुनिया अमारा कहती थी।

"वो ड्रॉइंग मुझे दे दो, काकी।" ... "और वो लोरी, जो अभी तुम्हारे होंठों पर थी... तुम्हें अब भी याद है?"

"याद है? हाय, मैं उसे भूली ही कब थी। ... रातों को इसी छत के नीचे मेरी तारा गाया करती थी, और मैं नीचे रसोई में बैठ कर सुना करती थी।" ... "पर बीबीजी, ये लोरी तो इस पूरे घर में सिर्फ़ उसे आती थी। ... आपको ये कैसे आती है?"

अमारा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस उस बूढ़ी औरत के खुरदुरे हाथ अपने हाथों में ले लिए, और धीमे से, बहुत धीमे से, उस लोरी की एक लाइन गुनगुना दी। और उस एक गूँज में, छह बरस झड़ कर गिर गए।

"सो जा मेरे चाँद, तेरे लिए चाँद का टुकड़ा तोड़ लाऊँ..." ... "जिस तारा को इस घर ने चोर कह कर बारिश में फेंक दिया था, काकी... उसकी सारी लोरियाँ उस रात मरी नहीं थीं।"

"मैं जानती थी।" ... "ये बूढ़ी आँखें झूठ नहीं बोलतीं। पहले दिन से, जब से तुमने इस देहरी पर पाँव रखा, मेरा कलेजा काँप रहा था। ... मेरी तारा। तू ज़िंदा है। भगवान ने इस बुढ़िया की सुन ली।" ... "पर तुझे यहाँ नहीं होना चाहिए, बेटी। ये वही लोग हैं, जिन्होंने तुझे..."

"श... काकी। सुनो मेरी बात।" ... "जो तुमने अभी जाना, वो इस घर की हर दीवार से छुपा रहना चाहिए। रागिनी से, माजी से, समर से... सबसे। ... अगर किसी को भी भनक लग गई कि तारा ज़िंदा है, तो वो मुझे नहीं ढूँढेंगे।" ... "वो उस बच्चे को ढूँढेंगे, जो इस ड्रॉइंग में अपने पापा से चाँद माँग रहा है।"

"बच्चा?" ... "तेरा बच्चा है, तारा?" ... "तो सुन ले। ये शांति अपनी जीभ काट कर फेंक देगी, पर उस पर वो नाम कभी नहीं आएगा। ... मैंने तुझे इस घर में भूखा देखा है, बेटी। अब तुझे और तेरे लाल को आँच नहीं आने दूँगी। ... मेरी लाश पर से गुज़रेंगे वो लोग।"

और यूँ, उस छोटे से कमरे में, एक बच्चे की टेढ़ी लकीरों के ऊपर, अमारा को वो चीज़ मिली जो पैसे से नहीं ख़रीदी जा सकती थी। ... उन्हीं दीवारों के अंदर उसकी पहली सच्ची हमदर्द। ... डर ख़ामोशी ख़रीद लेता। पर नरमी ने एक माँ जैसी ममता ख़रीद ली। ... अब इस घर में दो लोग आधा सच जानते थे। कबीर, जिसके सीने में लोरी धँसी थी। और शांति, जिसके होंठों पर वो नाम। राख साँस ले रही थी, और उसकी चिंगारियाँ चुपके से फैलने लगी थीं।

उधर हवेली के दूसरे कोने में, उस कमरे में जहाँ कभी तारा और समर का सुहाग सजा था, अब एक ठंडा तमाशा चलता था। रागिनी ने जो सुहाग चुराया था, वो अब बस एक दिखावा रह गया था। समर खिड़की के पास खड़ा कहीं दूर देख रहा था, और रागिनी आईने के सामने अपने ज़ेवर उतार रही थी।

"आजकल तुम बोर्डरूम से घर बहुत देर से आते हो, समर।" ... "या शायद आते ही नहीं। ... तुम्हारा जिस्म यहाँ होता है, पर नज़रें हमेशा कहीं और अटकी रहती हैं।"

"मैं थका हुआ हूँ, रागिनी। ... कंपनी डूब रही है, हर सुबह एक नया क़र्ज़ मुँह बाए खड़ा होता है, और तुम्हें मेरी नज़रों की फ़िक्र है।"

"नज़रों की नहीं। उस औरत की फ़िक्र है, जिस पर तुम्हारी नज़रें टिकी रह जाती हैं।" ... "हुमा की उस मालकिन पर। अमारा। ... सब देखते हैं, समर। तुम उसे यूँ देखते हो, जैसे बरसों की कोई खोई हुई चीज़ अचानक सामने आ खड़ी हुई हो।"

"बकवास मत करो।" ... "वो हमारी लेनदार है। इस घर की इज़्ज़त उसके एक दस्तख़त पर टिकी है। मैं उसे देखता हूँ, क्योंकि मैं उससे डरता हूँ। बस इतनी सी बात है।"

पर वो झूठ दोनों ने सुन लिया। समर अमारा से डरता नहीं था। उस ठंडी, अनबूझ औरत में कुछ था, जो उसके छह साल पुराने ज़ख़्म तक पहुँच कर उस पर उँगली रख देता था। वो उसे कोई नाम नहीं दे पाता था। और रागिनी उसे बर्दाश्त नहीं कर पाती थी।

"डर।" ... "हाँ, डर तो मुझे लगता है इस औरत से। जो कहीं से टपकी, और हमारे घर की मालकिन बन बैठी। ... जिसका कोई अतीत नहीं, कोई चेहरा नहीं। 'हुमा कैपिटल, हुमा कैपिटल।' पर हुमा है कौन? आख़िर कहाँ से आई ये?"

समर बिना जवाब दिए कमरे से निकल गया, और रागिनी वहीं आईने के सामने रह गई। वही सिहरन फिर उसकी रीढ़ में उतरी, जो बैठक के उस पुराने काँच में उतरी थी। वो आँखें, कहीं देखी हुई, किसी बरसाती रात के आस पास। ... वो इस बात पर सो नहीं सकती थी। वो खोदेगी।

"हर औरत का एक अतीत होता है। ... और हर बंद दरवाज़े के पीछे एक ऐसा आदमी बैठा होता है, जो सही दाम पर चाबी बेच देता है।" ... "हुमा कैपिटल के अंदर भी कोई ना कोई ऐसा ज़रूर होगा। जिसे पैसे की भूख हो, और मालकिन से कोई पुरानी शिकायत। ... मुझे बस वही एक दरार चाहिए।"

अगली शाम, रोशनी हाइट्स के उस साइट दफ़्तर में, समर अमारा के पास आया। एक लेनदार के पास एक क़र्ज़दार की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे आदमी की तरह, जो ख़ुद को उससे दूर नहीं रख पा रहा था। उसने ख़ुद को यही समझाया था, कि वो रागिनी की, ख़ानदान की बदतमीज़ी की माफ़ी माँगने आया है।

"मैं... मैं माफ़ी माँगने आया हूँ, मिस अमारा।" ... "मेरे घरवालों ने आपके साथ जो रुखाई की, रागिनी ने आज जो कहा... वो इस ख़ानदान की तहज़ीब नहीं है। ... कम से कम, पहले नहीं थी।"

"आप अपने घरवालों की बदतमीज़ी की माफ़ी माँगने आए हैं, मिस्टर अहूजा? ... इसकी ज़रूरत नहीं। मैं लेनदार हूँ। मुझसे लोग मोहब्बत नहीं रखते, बस हिसाब रखते हैं।"

"नहीं। बात सिर्फ़ इतनी नहीं है।" ... "जब से आप इस घर में आई हैं, मुझे कुछ याद आने लगा है, जिसे मैं छह साल से दफ़नाए बैठा था। ... आपकी आँखों में कोई ठहराव है, अमारा। जैसे आप हर बात के पार देख लेती हैं। ... किसी और की आँखें भी बिल्कुल ऐसी ही थीं।"

ज़मीन नहीं फटी। तारा अपने ही पति के सामने खड़ी थी, जो उसी को, उसके अपने चेहरे के सामने, याद कर के टूट रहा था। और उस पर चढ़ी बर्फ़ का एक रेशा तक नहीं हिला। पर अंदर, कहीं गहरे, छह साल की राख ने एक चिंगारी पकड़ ली।

"किसी और की?" ... "कौन थीं वो?"

"मेरी पत्नी।" ... "बरसों पहले। तारा। ... मैंने उससे शादी की थी, और फिर मैंने उसे मरने दिया। ... इस घर ने उस पर चोरी का इल्ज़ाम लगाया, और मैं, उसका पति, चुपचाप खड़ा देखता रहा। मैंने उसका हाथ नहीं थामा। मैंने उसे उस बारिश में जाने दिया।"

"वो मुझसे मोहब्बत करती थी, अमारा। और मैंने उसे एक दूसरी औरत के लिए, एक झूठ के लिए छोड़ दिया। ... वो उस रात मेरे बच्चे की माँ बनने वाली थी। और मैंने उसे उसके हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया। ... छह साल हो गए। मैं आज तक एक रात चैन से सो नहीं पाया।"

अमारा का हर लफ़्ज़ जैसे तारा की हथेली पर एक दहकता कोयला रख रहा था। जिस माफ़ी के लिए वो छह साल तरसी थी, वो आज उसके क़दमों में रखी जा रही थी, एक ऐसे आदमी के हाथों, जो नहीं जानता था कि वो उसी औरत से बोल रहा है जिसे उसने दफ़नाया था। वो चीख़ कर अपना नाम बता देना चाहती थी। उसने उसे पूरा का पूरा निगल लिया।

"तो आप एक ऐसा क़र्ज़ ढो रहे हैं, मिस्टर अहूजा, जो कभी चुकता नहीं होगा।" ... "क्योंकि जिसका हिसाब आप चुकाना चाहते हैं, वो अब आपकी पहुँच में नहीं है। ... और कुछ हिसाब मुर्दों के पास चले जाते हैं। वहाँ ना माफ़ी पहुँचती है, ना पछतावा। बस ब्याज चढ़ता रहता है।"

"आप... आप ऐसे बोलती हैं, जैसे आप उसे जानती हों।" ... "जब आप ये कहती हैं, तो लगता है जैसे वही मुझसे बात कर रही हो। ... आप कौन हैं, अमारा? आपके पास आ कर मेरा दम क्यों घुटता है, और फिर भी मैं दूर क्यों नहीं जा पाता?"

एक पल को दोनों के बीच का फ़ासला बस एक साँस रह गया। वो पति, जिस बीवी को उसने फेंक दिया था, उसी की तरफ़ खिंचा चला आ रहा था, और दोनों में से कोई नहीं जानता था क्यों। फिर तारा एक क़दम पीछे हट गई, और बर्फ़ फिर उस ज़ख़्म पर जम गई।

"आप थके हुए हैं, मिस्टर अहूजा। ... और थके हुए लोग हर अजनबी में अपना गुनाह ढूँढ लेते हैं।" ... "जाइए। ... अपनी पत्नी के पास। वो आपका इंतज़ार कर रही होगी।"

समर आया था, उससे ज़्यादा खोया हुआ लौट गया। और अमारा खिड़की के पास अकेली खड़ी रह गई, और छह साल में पहली बार उसने अपने मुखौटे को काँपने दिया। इस माफ़ी का उसने बरसों ख़्वाब देखा था। उसे नहीं पता था कि इसका स्वाद राख जैसा होगा। ... और उसे ये भी नहीं पता था, कि घेरा तीन तरफ़ से तंग होता जा रहा था। देसाई की खुली फ़ाइल, रतन की मेज़ पर वो एक-दो-तीन थाप देती उँगलियाँ और उसका आदमी, और अब उसकी अपनी ही दीवारों के अंदर पलती एक और साज़िश।

दो रातें बाद, दोनों घरों से दूर, एक चाय की दुकान के पीछे, पीली रोशनी में डूबी पार्किंग में, रागिनी अपनी गाड़ी में बैठी इंतज़ार कर रही थी। गोद में नोटों से भरा एक मोटा लिफ़ाफ़ा रखा था। उसकी खुदाई को आख़िर वो दरार मिल गई थी।

"मैडम, ये जो मैं कर रहा हूँ ना... अगर मालकिन को इसकी भनक भर भी लग गई..." ... "पैसे पूरे हैं ना?"

"पूरे हैं। ... पहले फ़ाइल।" ... "तुम रोज़ हुमा कैपिटल के अंदर बैठ कर उस औरत का चेहरा देखते हो। ... अब बताओ, आख़िर है कौन वो?"

"मालकिन की निजी फ़ाइल है। ... दफ़्तर की सबसे बंद अलमारी से निकाली है। ... इसमें वो सब है, जो उन्होंने आज तक किसी को नहीं बताया। ... बस, मेरा नाम इसमें कभी मत आने दीजिएगा।"

और यही वो एक रिसाव था, जिसकी अमारा ने कभी पहरेदारी नहीं की थी। वो ख़ानदान नहीं, जो बाहर से उसका शिकार कर रहा था, बल्कि उसके अपने क़िले के अंदर बिका हुआ एक आदमी। ... दग़ा, जैसा कि हमेशा होता है, उसकी अपनी दीवारों के भीतर से आया। रागिनी के हाथ काँप रहे थे, जब उसने गाड़ी की मद्धम रोशनी में वो फ़ाइल खोली।

"'हुमा कैपिटल। मालकिन। निजी।'" ... "चलो देखें, अमारा जी, तुम आख़िर कहाँ से टपकी हो..."

पहला ही पन्ना कोई कंपनी का काग़ज़ नहीं था। वो एक अस्पताल का रिकॉर्ड था। एक जन्म का। एक बेटे का, जो कड़कड़ाती सर्दी में पैदा हुआ था। ठीक उस सर्दी में, जो उस बरसात के ठीक बाद आई थी, जब अहूजा ख़ानदान की बहू हमेशा के लिए ग़ायब हो गई थी। ... रागिनी उस तारीख़ को घूरती रह गई, और उसके चेहरे का सारा ख़ून उतर गया।

"एक बेटा..." ... "उसी सर्दी में। ... जिस बरसात में तारा गई थी, उसके ठीक बाद।" ... "इस औरत का एक बेटा है। ... और ये बात दुनिया में किसी को नहीं पता।"

जिस फ़ाइल को अमारा ने पूरी दुनिया से छुपा कर रखा था, वो उसके अपने दफ़्तर से निकल कर ठीक उसी औरत की गोद में आ गिरी थी, जिसके पास उसे तबाह करने की सबसे पुरानी वजह थी। ... रागिनी अभी नहीं जानती थी कि वो बेटा किसका है। पर अब उसके हाथ में वो धागा था, दाम दे कर ख़रीदा हुआ, जो छह बरस की राख को उधेड़ सकता था। ... और शहर के दूसरे सिरे पर, एक सोते हुए बच्चे और एक वादा किए हुए चाँद के ऊपर झुकी तारा को अभी ख़बर तक नहीं थी, कि उसकी अपनी दीवारें अभी-अभी बिक चुकी हैं।

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