Chapter 21 of 30
रागिनी गिरती है
अमारा पूरे ख़ानदान के सामने रागिनी को उसी ख़ानदानी कंठी की चोरी में बेनक़ाब कर देती है जिसके झूठे इल्ज़ाम में कभी तारा को राख किया गया था, और जो समर कभी तारा को निकाल बैठा था वही आज रागिनी को उसी देहरी से बाहर कर देता है। बेघर रागिनी आख़िरी दाँव में चीख़ती है कि अमारा ही ज़िंदा लौटी तारा है, पर उसका सच एक जली हुई औरत की बड़बड़ाहट बन कर बिखर जाता है, और सब कुछ खो कर वो सीधे रतन की बैठक की तरफ़ गाड़ी मोड़ लेती है।
सुबह की धूप अहूजा हवेली की उसी संगमरमरी बैठक में उतरी, जहाँ छह बरस पहले एक पेट से बहू को चोर कहा गया था। ... आज उसी लम्बी मेज़ के सिरे पर अमारा बैठी थी, सामने एक पतली नीली फ़ाइल, और उसके चेहरे पर वो शांति थी जो तूफ़ान से पहले आती है। माजी एक कोने में चुप बैठी थीं, समर दरवाज़े के पास खड़ा था, और रागिनी देर से, सजी-धजी, अपनी कुर्सी पर यूँ आ बैठी जैसे अब भी इस घर की मालकिन वही हो।
“आइए, रागिनी जी। बैठिए।” ... “मैंने आज पूरे ख़ानदान को इसलिए बुलाया, क्योंकि हुमा के ऑडिट में एक बहुत छोटा सा हिसाब निकल आया है। इतना छोटा कि किसी ने छह बरस उस पर नज़र ही नहीं डाली।” ... “घर के अंदर का हिसाब। आपके अपने हाथ का हिसाब।”
“हिसाब?” ... “मैं इस घर की बहू हूँ, अमारा जी, कोई मुनीम नहीं जो आपको एक-एक पाई का जवाब दूँ। घर का ख़र्च घर की औरतें देखती हैं।” ... “और आप, जो कल की आई हैं, हमारी रसोई के हिसाब गिनने लगीं?”
“रसोई नहीं, रागिनी जी।” ... “मंदिर के चंदे का वो पैसा, जो हर साल थोड़ा थोड़ा कम पड़ता रहा। वो सोने की चूड़ियाँ, जो बहीखाते में दर्ज हैं पर तिजोरी में नहीं। और सबसे ऊपर...” ... “...वो कंठी। ख़ानदानी कंठी, जो छह बरस पहले एक बरसाती रात ग़ायब हुई थी, और जिसकी चोरी का इल्ज़ाम किसी और के माथे मढ़ा गया था।”
कंठी का नाम सुनते ही बैठक की हवा जम गई। ... माजी की उँगलियाँ उनके पल्लू पर कस गईं। समर का चेहरा पत्थर हो गया। और रागिनी, एक पल के लिए, अपनी ही ऊँची कुर्सी में थोड़ी छोटी पड़ गई।
“ये चाँदनी चौक के एक बड़े सुनार की रसीद है, रागिनी जी।” ... “उसी कंठी को गिरवी रखने की। तारीख़ पढ़िए। उस रात के ठीक तीन दिन बाद की, जिस रात एक पेट से बहू को इसी घर से चोर कह कर बारिश में फेंका गया था।” ... “जिस चीज़ की चोरी के लिए उसे राख किया गया, वो चीज़ आपकी अलमारी से होते हुए सुनार की तिजोरी तक पहुँची थी।”
“ये... ये झूठ है।” ... “ये काग़ज़ किसी ने गढ़े हैं, मुझे फँसाने के लिए। समर! तुम इस अजनबी औरत की बात पर मुझ पर यक़ीन करोगे?” ... “मैं तुम्हारी बीवी हूँ, समर!”
समर धीरे धीरे मेज़ तक आया। ... उसने वो रसीद उठाई, उसे बहुत देर तक देखा, और फिर रागिनी की तरफ़ देखा, उन्हीं आँखों से जिनसे उसने छह बरस पहले एक बेगुनाह को देखा था। पर इस बार उन आँखों में यक़ीन नहीं, नफ़रत थी।
“मैंने तुम्हें उस छत पर अपने कानों से सब कबूल करते सुना था, रागिनी।” ... “कैसे तुमने कंठी छुपाई, कैसे झूठे काग़ज़ बनवाए, कैसे तुमने एक पेट से औरत को उस बारिश में धकेलवाया, सिर्फ़ इसलिए कि तुम इस घर की मालकिन बन सको।” ... “और मैं, बेवक़ूफ़, तुम्हारे झूठ पर एक बेगुनाह को दफ़ना बैठा। अब निकल जाओ। इस घर से, मेरी ज़िंदगी से। निकल जाओ!”
रागिनी की नज़र तड़प कर माजी की तरफ़ घूमी, उस औरत की तरफ़ जिसके साथ मिल कर उसने बरसों इस घर पर राज किया था। ... पर माजी ने अपनी आँखें ज़मीन में गाड़ लीं, और अपना पल्लू यूँ खींचा जैसे किसी गंदगी से ख़ुद को बचा रही हों। जिस साज़िश में वो दोनों कभी बराबर की शरीक थीं, आज उसका सारा बोझ अकेली रागिनी के कंधों पर छोड़ दिया गया।
“माजी... माजी, आप तो सब जानती हैं!” ... “उस रात आप भी उन्हीं सीढ़ियों पर खड़ी थीं। आपने भी उसे जाते देखा था। मैं अकेली नहीं थी, माजी, हम सब थे।” ... “वाह। तो अब सारा पाप अकेली रागिनी का, और आप सब दूध के धुले। बहुत ख़ूब।”
“एक बात याद रखिएगा, रागिनी जी।” ... “जो देहरी किसी को धक्का दे कर पार कराई जाती है, एक दिन वही देहरी लौट कर उसी हाथ से हिसाब माँगती है।” ... “कुछ क़र्ज़ ब्याज समेत लौटते हैं। और आपका ब्याज पूरे छह बरस का है।”
रागिनी को इस बार किसी ने बालों से नहीं घसीटा। ... पर बेइज़्ज़ती वही थी। नौकर उसका सामान बाँध रहे थे, माजी ने मुँह फेर लिया था, और वो उसी आँगन में खड़ी थी जहाँ से छह बरस पहले एक और औरत को निकाला गया था। दरवाज़े तक पहुँच कर वो रुकी, मुड़ी, और उसकी आँखों में एक आख़िरी, ज़हरीली चमक थी।
“तुम सब मुझे चोर कह कर निकाल रहे हो।” ... “पर तुम्हें पता भी है कि तुमने किसे अपने सिर पर बिठा रखा है? ये अमारा नहीं है!” ... “ये तारा है! वही बहू, जिसे तुमने मरा समझा था। वो मरी नहीं! ज़िंदा है, तुम्हारी मेज़ पर बैठ कर तुम्हें एक-एक कर के बर्बाद कर रही है, और तुम अंधे उसके पैर छू रहे हो!”
एक पल के लिए बैठक में कोई साँस नहीं ले सका। ... वो लफ़्ज़ हवा में लटक गया, नंगा और सच्चा। माजी की नज़र अमारा के चेहरे पर गई। समर की भी। और अमारा, जिसके अपने सीने में उसका अपना नाम हथौड़े की तरह बज रहा था, ने बस एक भँवें उठाई, जैसे किसी पागल की बड़बड़ाहट सुन रही हो।
“बस करो, रागिनी।” ... “तारा ज़िंदा है, ये मैं जानता हूँ। पर वो कहीं और है, इस औरत से बहुत दूर। ये बात ख़ुद अमारा ने मुझे बताई थी, बहुत पहले।” ... “और तुमने अभी अभी एक कंठी चुराने और एक बहू को मरवाने का इल्ज़ाम अपने ही सिर लिया है। अब तुम्हारे मुँह से निकला हर लफ़्ज़ एक चोर का, एक क़ातिल का लफ़्ज़ है। कौन तुम पर यक़ीन करेगा?”
“जिस औरत ने एक बेगुनाह को फँसाया, और कल ही एक छत से एक और औरत को धकेलने की कोशिश की...” ... “...उससे आप उम्मीद करते हैं कि वो जाते जाते सच बोलेगी?” ... “मुर्दों को ज़िंदा बताना एक घिरी हुई औरत का आख़िरी हथियार होता है, रागिनी जी। पर हथियार भी उसी के हाथ में चलता है, जिस पर लोग यक़ीन करें। आपका भरोसा तो आपने अपने ही हाथों जला दिया।”
“तुम... तुम सब अंधे हो!” ... “मैं सच बोल रही हूँ, और तुम एक झूठ के आगे सिर झुकाए बैठे हो। ठीक है। ठीक है!” ... “तुम मुझ पर यक़ीन नहीं करते। कोई बात नहीं। इस शहर में एक इंसान है, जो मेरी हर बात पर यक़ीन करेगा।”
और हवेली का दरवाज़ा उसके पीछे बंद हो गया, ठीक वैसे ही जैसे छह बरस पहले एक और औरत के पीछे बंद हुआ था। ... रागिनी आँगन के बाहर अकेली खड़ी रह गई, बेघर, बेनाम, बेइज़्ज़त। जिस औरत को उसने राख किया था, आज उसी की तरह वो भी उसी देहरी के बाहर खड़ी थी। बस फ़र्क़ इतना था कि तारा के हाथ उस रात ख़ाली थे, और रागिनी के हाथ में आज एक ज़हरीला राज़ था।
उसी दोपहर, हुमा के बेनाम दफ़्तर के एक बंद कमरे में, अमारा खिड़की के पास खड़ी थी। ... रागिनी गिर चुकी थी, पर उस जीत का कोई स्वाद नहीं था, बस राख का वही पुराना ज़ायक़ा। बेला अंदर आई, एक हाथ में फ़ोन और चेहरे पर वही सूखी, थकी हुई वफ़ादारी।
“तो रागिनी अहूजा साम्राज्य से बाहर। बरसों की मलिका, एक कंठी की रसीद पर ढेर।” ... “और तुमने आवाज़ भी ऊँची नहीं की। मैंने आज तक इतनी ख़ूबसूरत बर्बादी नहीं देखी, अमारा।” ... “आरव महफ़ूज़ है। नए शहर में, नए नाम से। कल रात उसने आया से पूछा कि क्या नए घर में भी चाँद वही रहेगा। आया ने कहा हाँ। वो मान गया।”
“वही चाँद।” ... “जब तक उसके सिर पर वही चाँद है, वो कहीं भी अपने घर में है।” ... “और कबीर? बटरा?”
“बटरा ज़िंदा है, बुख़ार उतर रहा है। कबीर उसके साथ ही है, दिन रात, पहरे पर।” ... “उसने खुल कर तुम्हारा साथ चुना है, अपने ही ख़ून के ख़िलाफ़, बिना एक पल हिचके। ऐसे आदमी रोज़ नहीं मिलते।” ... “पर काग़ज़ जा चुका है, अमारा। असली दस्तख़त वाला अधिकार-पत्र अब रतन की मेज़ पर है। और देसाई की वो हादसे वाली फ़ाइल अब भी खुली पड़ी है।”
“काग़ज़ गया, पर गवाह ज़िंदा है। और रतन को अभी तक नहीं पता कि उस रिकॉर्डिंग की एक कॉपी हमारे पास है।” ... “और समर अब भी मेरा हथौड़ा है, बेला। उसे लगता है वो तारा का इंसाफ़ ढूँढ रहा है। असल में वो अपने ही चाचा की क़ब्र खोद रहा है, और उसे ख़बर तक नहीं।” ... “मुझे बस उसका मुँह रतन की तरफ़ ताने रखना है।”
“अच्छा, और आरव ने आया के हाथ तुम्हारे लिए एक पैग़ाम भी भेजा है।” ... “उसने कहा, मुम्मा को बोलना कि मैं बहुत बहादुर हूँ, मैं बिल्कुल नहीं रोया। बस एक बार रोया, जब आइसक्रीम गिर गई।” ... “पाँच बरस का है, और तुम्हारी ही तरह हर चीज़ का हिसाब रखता है।”
“मेरा बहादुर।” ... “उसे बोलना मुम्मा जल्दी आएगी, और इस बार वापस जाने के लिए नहीं।” ... “जब ये सब ख़त्म हो जाएगा, बेला। जब इस घर का हर क़र्ज़ चुका दिया जाएगा।”
“एक बात खटक रही है।” ... “रागिनी। तुमने उसे चोर साबित कर के निकाल तो दिया, पर तुमने उसे तोड़ा नहीं, अमारा। तुमने एक ज़ख़्मी साँप को घर से बाहर छोड़ दिया, इस भरोसे पर कि उसका ज़हर अब बेकार है।” ... “पर जिस औरत के पास खोने को कुछ ना बचे, वो सबसे ख़तरनाक होती है। और उसे पता है तुम कौन हो।”
“उसे कोई नहीं सुनेगा, बेला। मैंने आज पूरे घर के सामने उसे झूठा और क़ातिल साबित कर दिया।” ... “वो चीख़ती रहेगी कि अमारा तारा है, और लोग उसे एक जली हुई औरत की बड़बड़ाहट समझेंगे।” ... “जिसकी बात कोई ना सुने, वो भला किसका क्या बिगाड़ेगी?”
बेला ने कुछ नहीं कहा। ... पर उसकी ख़ामोशी में एक चेतावनी थी, वो चेतावनी जो अमारा उस पल सुनना नहीं चाहती थी। क्योंकि इस पूरे शहर में सचमुच एक इंसान था, जो रागिनी की हर बात, हर लफ़्ज़ पर यक़ीन करता, बल्कि उसका इंतज़ार कर रहा था। और उसी घड़ी, शहर के दूसरे छोर पर, रागिनी की गाड़ी उसी इंसान की तरफ़ मुड़ रही थी।
शाम ढल रही थी जब रागिनी की गाड़ी पुरानी दिल्ली की तंग गलियों से निकल कर एक जानी-पहचानी इमारत की तरफ़ बढ़ी। ... उसका काजल बह चुका था, उसके गहने उतर चुके थे, पर उसकी आँखों में अब आँसू नहीं, एक ठंडा फ़ैसला जम गया था। जिस घर ने उसे निकाला, उसी घर के एक आदमी के पास वो लौट रही थी।
“तुमने मुझे अकेला समझ कर फेंक दिया, तारा।” ... “पर तुम भूल गईं कि इस घर में सिर्फ़ तुम ही राख से नहीं उठतीं। मैं भी उठ सकती हूँ।” ... “और मेरे पास वो एक चीज़ है जो इस पूरे शहर में सिर्फ़ एक आदमी के लिए हीरे से भी क़ीमती है। तुम्हारा असली नाम।”
रागिनी को नहीं पता था कि जिस राज़ को वो बेचने जा रही थी, उसका ख़रीदार उसे पहले से जान चुका था। ... उसे नहीं पता था कि रतन अहूजा दो रातें पहले ही वही तस्वीर, वही सच अपनी मेज़ पर रख कर देख चुके हैं। रागिनी समझ रही थी कि वो एक राज़ बेचने जा रही है। असल में वो एक ऐसे आदमी की तरफ़ बढ़ रही थी, जो उस राज़ को पहले से जानता था, और जो पहले ही अपने आदमी को एक हुक्म दे चुका था।
“जिस आदमी ने एक बार तारा को दफ़नाने की क़ीमत चुकाई थी...” ... “...देखते हैं वो उसी तारा को दुबारा दफ़नाने की क्या क़ीमत देता है।” ... “अमारा तारा है। बस यही एक सच मुझे इस घर में मेरी खोई हुई जगह वापस दिला देगा।”
गाड़ी रतन अहूजा की बैठक वाली इमारत के सामने रुकी। ... रागिनी ने एक लम्बी साँस ली, अपना बहा काजल पोंछा, और उस दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी जिसके पीछे वो आदमी बैठा था, जिसने छह बरस पहले उसके साथ मिल कर एक बहू को राख किया था। वो समझ रही थी कि वो एक सौदा करने जा रही है, एक राज़ के बदले अपनी खोई हुई ज़िंदगी। ... पर वो नहीं जानती थी कि जिस मेज़ की तरफ़ उसके क़दम बढ़ रहे थे, उस पर तारा की मौत का फ़रमान पहले ही लिखा जा चुका था। और आज रात, छह बरस बाद पहली बार, तारा को राख करने वाले वो दोनों हाथ, फिर एक ही मेज़ पर मिलने वाले थे।
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