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अध्याय 26 / 30

राख की दावत

राख से उठी द्वारा Avni Oberoi

रतन ने जो एक हफ़्ता दिया था, वो छह रातों में जल कर एक आख़िरी लौ रह गया था, और आज सातवीं रात वो लौ भी बुझने को थी। रोशनी हाइट्स, वो अधूरी इमारत जिसने पूरे अहूजा ख़ानदान को क़र्ज़ में डुबोया था, आज दुल्हन की तरह रौशनियों में सजी थी, और अंदर से एक क़ब्र की तरह ख़ाली। दिल्ली की रात को चीरती एक गाड़ी उसी इमारत की तरफ़ बढ़ रही थी, जिसमें तीन लोग थे, जिन्हें कभी एक ही आग ने अलग-अलग राख किया था, और आज पहली बार वो एक साथ थे।

“सुनो, दोनों। आज रात हम रतन के बनाए जाल में अपने पैरों से चल कर जा रहे हैं, क्योंकि उस जाल के बीचोंबीच मेरा बेटा बैठा है।” ... “रतन को लगता है मैं ये लाई हूँ, बटरा का काग़ज़ और हुमा के क़र्ज़ के दस्तावेज़, अपने आरव के बदले। ये सिर्फ़ चारा है।” ... “असली हथियार ये काग़ज़ नहीं है। असली हथियार बेला के पहरे में महफ़ूज़ बैठा ज़िंदा बटरा है, और वो रिकॉर्डिंग है जिसमें रतन की अपनी आवाज़ मेरी मौत का हुक्म देती है। आज वो आवाज़ उसी की दावत में बजेगी।”

पिछले छह दिन बेला ने हुमा के दफ़्तर को एक जंग के कमरे में बदल दिया था। घायल बटरा को उसने डॉक्टरों और अपने भरोसे के आदमियों के पहरे में छुपा रखा था, उसकी वो रिकॉर्डिंग सौ जगह महफ़ूज़ कर दी थी, और देसाई की उस खुली हादसा-फ़ाइल को क़ानूनी दाँव-पेच में इतना उलझा दिया था कि वो एक हफ़्ता और सोई रहे। सब कुछ तैयार था, सिवाय उस एक चीज़ के जो किसी बहीखाते में नहीं तुलती, एक पाँच बरस के बच्चे की जान।

“ये इमारत मैंने डिज़ाइन की थी, तारा। इसकी हर सीढ़ी, हर सर्विस लिफ़्ट मेरे नक़्शे में है।” ... “रतन आरव को ऊपर रखेगा, अधूरी बाईसवीं मंज़िल पर, जहाँ ना कोई गवाह पहुँचता है, ना रौशनी। नीचे दावत होगी, ऊपर अँधेरा। मैं पिछली सर्विस सीढ़ी से चढ़ कर आरव तक जाता हूँ, तुम रतन को सामने से उलझाओ।”

“और मैं रतन के सामने खड़ा रहूँगा, उसकी अपनी दावत में, उसके अपने भतीजे की तरह, ताकि उसकी नज़र तुम दोनों तक ना पहुँचे।” ... “माजी को मैं घर पर छोड़ आया हूँ, तारा। वो बूढ़ी औरत हफ़्तों से अंदर ही अंदर टूट रही है, तुम्हारी आँखें याद कर के रात-रात रोती है। मैं उसे आज की इस रात में नहीं घसीट सकता था।” ... “पर आज उसके घर का असली चोर बेनक़ाब होगा, और उसका नक़ाब मैं अपने हाथों उतारूँगा।”

गाड़ी रुकने से ठीक पहले, एक पल के लिए, कबीर का हाथ तारा की कलाई पर आ कर ठहर गया, ठंडा नहीं, जलता हुआ। छह बरस की राख के बीच भी उस एक छुअन में कुछ ऐसा था जो दोनों जानते थे और आज दोनों दबा रहे थे, क्योंकि आज की रात मोहब्बत की नहीं, एक बेटे की थी। तारा के कान में लगे इयरपीस में बेला की आवाज़ धड़कन की तरह गूँज रही थी, हुमा के दफ़्तर में बैठी, हर कैमरे, हर दरवाज़े, और देसाई की उसी खुली फ़ाइल तक पर नज़र रखे, जो एक ज़िंदा तारा के सामने आते ही आग पकड़ लेती।


दावत के हॉल में झूमर जल रहे थे, शीशे के गिलास टकरा रहे थे, और शहर के सबसे बड़े नाम रतन अहूजा की पीठ थपथपा रहे थे, उसी रतन की, जो मुस्कुराते हुए उन्हें एक डूबती इमारत के शेयर बेच रहा था। और उन्हीं झूमरों के ठीक ऊपर बाईस मंज़िलों का अधूरा अँधेरा खड़ा था, जहाँ सरिये नंगे थे और फ़र्श अभी सिर्फ़ आधे ढले थे। तारा उस हॉल में यूँ दाख़िल हुई जैसे बर्फ़ किसी ठहरे पानी में उतरती है।

“जाओ, कबीर। ऊपर, सर्विस सीढ़ी से, और आरव तक बिना आवाज़ किए पहुँचना। समर, तुम मेरे साथ, मेरी परछाईं बन कर।” ... “रतन जी कहाँ हैं? मैं वो लाई हूँ जो उन्होंने माँगा था। पर ये सौदा मैं इस भीड़ में नहीं, आमने-सामने, आँखों में आँखें डाल कर करूँगी।”

रतन के दो आदमी बिना एक लफ़्ज़ कहे तारा को भीड़ से निकाल कर उसी अधूरी इमारत के पेट में ले गए, एक सर्विस लिफ़्ट में, जो चरमराती हुई ऊपर, अँधेरे की तरफ़ चढ़ने लगी। उधर कबीर अपने ही खींचे नक़्शे की पिछली सीढ़ियों से एक-एक मंज़िल चढ़ता आरव तक पहुँचने की दौड़ में था, और समर उसी लिफ़्ट की परछाईं बन कर साथ-साथ ऊपर बढ़ा।

चौदहवीं मंज़िल पर एक साया अँधेरे से अलग हो कर कबीर का रास्ता रोकने आया, वही फ़िक्सर, रतन का वो आदमी जिसने छह बरस पहले तारा को उस ट्रेन तक धकेला था। पर इस मंज़िल को उसके क़ातिल से बेहतर उसके मेमार ने जाना था। कबीर एक अधूरे गड्ढे के पार कूदा, आदमी अँधेरे में उसके पीछे लपका, और उसी गड्ढे में पाँव फँसा कर मुँह के बल गिरा, और कबीर बिना रुके ऊपर चढ़ता चला गया।


बाईसवीं मंज़िल पर ना दीवारें पूरी थीं, ना फ़र्श। खुले काले आसमान के नीचे नंगे कंक्रीट के बीच से हवा साँय-साँय गुज़र रही थी, और एक अकेले बल्ब की पीली रौशनी में रतन अहूजा खड़ा था, वैसे ही शांत, वैसे ही मुस्कुराता। और एक कोने में, एक आदमी की पकड़ में, एक नन्हा साया, आरव, जिसे तारा अँधेरे में भी उसकी साँसों से पहचान लेती।

“आरव...” ... “ठीक है, बेटा, मुम्मा यहीं है। आँखें बस मुझ पर रखना।” ... “रतन। मैं आ गई, तुम्हारी अपनी शर्त पर। मेरे बेटे को छोड़ दो, और जो काग़ज़ तुमने माँगा है, वो तुम्हारा। मैं अपनी ज़बान से मुकरने वालों में से नहीं हूँ।”

“देखो तो। हुमा कैपिटल की बेनाम मालकिन, आख़िर में मेरी अपनी बहू निकली।” ... “पहले काग़ज़, तारा। फिर बच्चा। छह बरस पहले भी तुमने मुझ पर भरोसा किया था, और देखो, आज भी ज़िंदा हो। तो एक बार और सही।” ... “और हाँ, ये बाईसवीं मंज़िल है। यहाँ फ़र्श भरोसे जितना ही कच्चा है। सँभल कर पाँव रखना।”

“भरोसा, चाचा? ये लफ़्ज़ अपने मुँह में मत रखिए।” ... “मैंने आपको अपने बाप की जगह बिठाया था। और आपने मेरे ही हाथों मेरी बीवी को चोर कहलवाया, मेरे अपने बच्चे को राख करवाया।” ... “अब मेरी बारी है आपको कुछ सुनाने की। सुनिए, चाचा। ग़ौर से अपनी ही आवाज़ सुनिए।”

और उस सन्नाटे में समर के फ़ोन से एक पुरानी रिकॉर्डिंग बज उठी, रतन की अपनी आवाज़, छह बरस पुरानी, ठंडी और साफ़, अपने आदमी को हुक्म देती हुई कि वो बहू उस आख़िरी ट्रेन पर हो, और ज़िंदा उतर कर वापस ना आए। वही आवाज़, जो अभी तीन क़दम दूर खड़ी थी, और जिसकी मुस्कान पहली बार हल्के से काँपी।

“सुन लिया, रतन? ये तुम्हारी अपनी आवाज़ है, तुम्हारा वो दस्तख़त जो किसी काग़ज़ पर नहीं, हवा में हुआ है, और हवा से मिटता भी नहीं।” ... “कुछ क़र्ज़ बहीखातों में लिखे जाते हैं, रतन, और कुछ क़ब्रों में। तुमने मेरी क़ब्र पर जो लिखा था, आज मैं उसका एक-एक पैसा, सूद समेत, वसूलने आई हूँ।”

“तो बटरा ने अपनी जान की क़ीमत में ये फ़ोन भी बेच दिया। कोई बात नहीं।” ... “तुम्हें लगता है ये मेरा पहला हिसाब है, समर? तुम्हारे बाप को, मेरे अपने बड़े भाई को, पिछले बरस जो दिल का दौरा पड़ा था...” ... “...वो दौरा दवा की एक बदली हुई शीशी से आया था, जो मैंने अपने हाथ से उनके सिरहाने रखी थी। ये पूरा ख़ानदान एक-एक कर के मेरे रास्ते से हटता गया, और तुम सब मुझे प्यार से चाचा कहते रहे।”

“बाबूजी...” ... “आपने बाबूजी को मारा। मेरे बाप को, अपने सगे भाई को, सिर्फ़ इसलिए कि उनकी कुर्सी, उनकी तिजोरी आपकी हो जाए।” ... “मैं आपके एक इशारे पर अपनी बीवी को चोर कहता रहा, और आप इस पूरे घर को एक-एक कर के दफ़नाते रहे। आज ये सब ख़त्म होगा, चाचा। आज, इसी छत पर।”

सर्विस सीढ़ी के अँधेरे से कबीर उसी पीली रौशनी में निकल आया, और उसने अपने बाप के क़त्ल का इक़रार रतन के अपने मुँह से, अपने कानों से सुन लिया था। वो छोटा बेटा, जो कभी इस घर से नफ़रत में निकल गया था, आज उसी घर की सबसे गहरी जड़ काटने लौटा था।

“तुमने बाबूजी को भी नहीं छोड़ा। और हम उम्र भर तुम्हारे पाँव छूते रहे, चाचा।” ... “समर, रतन को यहाँ से एक क़दम हिलने मत देना! तारा, आरव को ले कर किनारे की तरफ़ निकलो, मैं ठीक तुम्हारे पीछे हूँ!”

और तारा चल पड़ी, छह बरस का शिकार, छह बरस का बदला, सब भूल कर, उसकी आँखों में अब सिर्फ़ कोने में खड़ा वो नन्हा साया था। हर क़दम पर नंगे कंक्रीट पर उसकी एड़ियों की आवाज़ गूँज रही थी। रतन ने उसे वो फ़र्श पार करते देखा, और उस तरह मुस्कुराया जैसे कोई आदमी मुस्कुराता है जो जानता है कि बाज़ी वो पहले ही जीत चुका है।

घिरा हुआ रतन ना पीछे हटा, ना डरा। उसने बस एक हाथ हौले से उठाया, ठीक वैसे जैसे छह बरस पहले उठाया होगा, और अपने आदमी की तरफ़ एक बारीक सा इशारा किया। नीचे, कहीं इस अधूरी मंज़िल की जड़ में, एक दबे हुए धमाके की गूँज उठी, और पूरी इमारत एक ज़ख़्मी जानवर की तरह काँप उठी।

“छह बरस पहले मैंने तुम्हें एक ट्रेन दी थी, तारा। आज मैं तुम्हें एक पूरी इमारत दे रहा हूँ।” ... “इस बार माँ और बेटा, दोनों एक साथ। जाओ, अपने आरव के पास जाओ। जल्दी जाओ, वक़्त बहुत कम है।”


इमारत के काँपते ही आरव को पकड़े आदमी ने बच्चे को छोड़ा और अपनी जान बचाने भागा। समर रतन पर झपटा, कबीर एक गिरते सरिये के नीचे से बाल-बाल हट गया, और उस अफ़रा-तफ़री को चीरती एक नन्ही आवाज़ पूरे शोर के ऊपर उठी।

“मुम्मा! मुम्मा, मुझे पता था तुम आओगी!” ... “मैंने उस अंकल को बोला था ना, कि मेरी मुम्मा हुमा वाली है, वो पूरी दुनिया ख़रीद सकती है!”

“आ जा, मेरे चाँद। आ जा, माँ आ गई। अब मैं तुझे कभी नहीं छोड़ूँगी, कभी नहीं।” ... “आँखें बंद कर ले, बेटा। मुम्मा है ना यहाँ। कुछ नहीं होगा, कुछ भी नहीं।”

एक पल के लिए, सिर्फ़ एक साँस के लिए, छह बरस की सारी राख झड़ गई, और एक माँ अपने चाँद के टुकड़े को सीने से लगाए खड़ी रह गई। और आसमान ने उन्हें बस वही एक साँस दी, उससे एक पल भी ज़्यादा नहीं।

“मुम्मा... ये ज़मीन हिल क्यों रही है? मुझे डर लग रहा है।”

और ठीक उसी पल, तारा के पैरों तले, आरव के उन नन्हे पैरों तले, वो अधूरा फ़र्श किसी टूटे हुए वादे की तरह भरभरा कर खुल गया। समर की चीख़, कबीर का लपकता हुआ हाथ, दोनों एक धड़कन की दूरी पर रह गए। वही हादसा, जो छह बरस पहले एक बहू से चूक गया था, आज माँ और बेटे को एक साथ लेने लौट आया, और बाईसवीं मंज़िल का वो फ़र्श उन दोनों को अपने साथ लिए काले अँधेरे में गिरता चला गया।

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