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Chapter 1 of 30

राख का जन्म

राख से उठी by Avni Oberoi

"चोर! इस घर की बहू निकली चोर!"

लफ़्ज़ अहूजा हवेली की संगमरमर की दीवारों से टकरा कर लौटा, और बाहर, पुरानी दिल्ली के आसमान पर बिजली कड़की, जैसे आसमान भी गवाही दे रहा हो।

छह साल पहले। एक मानसून की रात, जब बारिश दरवाज़ों पर यूँ बरस रही थी जैसे किसी को अंदर आना हो, या किसी को बाहर फेंकना हो।

माजी के काँपते हाथ में एक कंठी हार झूल रहा था। वो हीरे-मोतियों वाला ख़ानदानी हार, जो मंदिर की मूरत के लिए बना था, और जो अभी अभी नई बहू तारा के कमरे से, उसी के बक्से में से निकला था।

"मंदिर का चढ़ावा गया, ये कंठी गई, और बरामद कहाँ से हुई? इसी के बक्से से! अब भी किसी को कोई शक है?"

तारा दहलीज़ पर खड़ी थी, साड़ी बारिश की सीलन से भारी, एक हाथ अपने पेट पर, जहाँ समर का बच्चा पल रहा था, अभी सिर्फ़ चार महीने का।

"माजी, मैंने उस अलमारी को आज तक छुआ भी नहीं! बही-खाते मुझे परसों दिए थे आपने, सिर्फ़ परसों। मैं भला..."

"बही-खाते!" ... "पढ़ी-लिखी बहू लाए थे कि घर सँभालेगी। घर तो छोड़, सीधा तिजोरी सँभाल ली।"

और सीढ़ियों के ऊपर, अँधेरे में आधी छुपी, रागिनी खड़ी थी। समर की बचपन की दोस्त, जो कुछ महीनों से इस घर में यूँ रहने लगी थी जैसे घर उसी का हो। उसके होंठों पर एक ऐसी उदासी थी, जो अंदर से मुस्कुरा रही थी।

"माजी... शायद कोई ग़लती हो। तारा ऐसा नहीं कर सकती।" ... "वैसे भी, बेचारी को पैसों की ज़रूरत तो थी ही। मायके वाले तो कुछ देने से रहे।"

रागिनी ने बचाने के नाम पर वो कील ठोक दी जो माजी के दिल में पहले से गड़ी थी।

तारा की नज़र कमरे में घूमी और वहाँ जा कर रुकी जहाँ उसकी पूरी दुनिया थी। समर। उसका पति। खिड़की के पास खड़ा, बाहर बारिश देखता हुआ, उसकी तरफ़ पीठ किए।

"समर... तुम तो जानते हो, ना? तुम तो मुझे जानते हो। एक बार कह दो इनसे। एक बार कह दो कि तुम्हारी तारा चोर नहीं है।"

एक पल के लिए समर के कंधे काँपे। एक पल के लिए लगा कि वो मुड़ेगा।

फिर वो मुड़ा। पर उसकी आँखों में वो नहीं था जो तारा ढूँढ रही थी।

"हिसाब तुम्हारे पास था, तारा। ताला तुमने खोला। हार तुम्हारे ही कमरे से निकला। मैं क्या कहूँ? क्या कहूँ मैं इन सबके सामने?"

"ये मत कहो। बस इतना कह दो कि तुम्हें मुझ पर यक़ीन है।"

समर ने नज़रें झुका लीं। और उस झुकी हुई नज़र ने वो कह दिया, जो कोई भी लफ़्ज़ नहीं कह सकता था।

और ऊपर सीढ़ियों पर, रागिनी की आँखों में एक चमक दौड़ गई। जीत की।

कमरे के कोने में समर के चाचा रतन बैठे थे, वो जो इस ख़ानदान के सारे बही-खाते चलाते थे, हर हिसाब जानते थे। वो बिल्कुल चुप थे। बस उनकी उँगलियाँ कुर्सी के हत्थे पर हौले हौले थाप दे रही थीं, जैसे कोई पुराना क़र्ज़ चुकता होता देख रहा हो।

"निकालो इसे। अभी, इसी वक़्त, इसी बारिश में। मेरे घर की देहरी अब इसके क़दमों से पाक नहीं होगी।"

"माजी, बाहर बारिश है... मैं इस हाल में जाऊँगी कहाँ? मेरा बच्चा, माजी, मेरा बच्चा!"

"जहाँ चोर जाते हैं। मुझे नहीं पता।"

दो नौकरों ने तारा की बाँहें पकड़ीं। उसने समर की तरफ़ देखा, आख़िरी बार, उम्मीद की आख़िरी किरन के साथ।

"समर! ये बच्चा तुम्हारा है! समर!!"

समर खिड़की की तरफ़ मुड़ गया। और तारा को उस हवेली की देहरी से बारिश में धकेल दिया गया, जैसे कोई टूटा हुआ बर्तन घर से बाहर फेंक देता है।

बारिश ने उसे एक पल में हड्डियों तक भिगो दिया। पुरानी दिल्ली की तंग गलियाँ पानी में डूबी थीं, और तारा उनमें भटकती रही, एक हाथ पेट पर, एक हाथ दीवारों को टटोलता हुआ।

चंद घंटे पहले वो अहूजा ख़ानदान की बहू थी। अब वो कोई नहीं थी। ना पैसा, ना छत, ना नाम। बस एक चोर, एक बेघर, एक बेनाम औरत।

"तू रो मत... तू रो मत, मेरे बच्चे। तेरी माँ अभी ज़िंदा है। हम कहीं तो पहुँचेंगे। कहीं तो।"

रात गहराती गई और तारा का दम फूलने लगा, बुख़ार चढ़ने लगा। उसके क़दम शहर के किनारे उस रेलवे यार्ड की तरफ़ मुड़ गए, जहाँ अँधेरे में एक धीमी पैसेंजर ट्रेन पटरी बदल रही थी।

एक खुले डिब्बे की सीढ़ी। एक कँपकँपाता हाथ। तारा उस पर चढ़ गई, बस इतना कि बारिश से बच जाए, बस इतनी सी जगह जहाँ वो और उसका बच्चा एक रात काट लें।

उसे नहीं पता था कि पीछे हवेली में, इसी वक़्त, एक फ़ोन पर एक आवाज़ बहुत धीरे से किसी को तसल्ली दे रही थी, कि बहू आज रात उसी ट्रेन में है, और वो सुबह किसी को मुँह दिखाने के लिए नहीं बचेगी।

रात के किसी पहर, पटरी के एक जोड़ पर, वो ट्रेन डगमगाई। लोहे की एक लंबी चीख़। एक झटका जो पूरी दुनिया को उलट दे। और फिर अँधेरा, पानी, और चिंगारियाँ, सब एक साथ।

सुबह अख़बारों में ख़बर छोटी सी थी। एक पैसेंजर ट्रेन पटरी से उतरी। कुछ लाशें मिलीं, कुछ लोग लापता। लापता लोगों में एक बेनाम औरत भी थी, जिसका दावा करने कोई नहीं आया।

अहूजा हवेली में किसी ने मातम नहीं मनाया। बस माजी ने मंदिर में एक दीया जलाया, ये कह कर कि घर की नाक बच गई। और समर... समर उस रात के बाद कभी उस खिड़की के पास खड़ा नहीं हुआ।

कहानी ख़त्म हो गई। सब ने यही समझा। ... पर राख से भी कुछ उठता है।

छह साल बाद।

नई दिल्ली का सबसे महँगा बॉलरूम। झूमरों की रोशनी, शैम्पेन की महक, और अहूजा ज्वेल्स का एक भव्य गाला, जिसका असली मक़सद सिर्फ़ एक था। दुनिया को यक़ीन दिलाना कि अहूजा ख़ानदान अब भी डूब नहीं रहा।

पर परदे के पीछे सच कुछ और था। रोशनी हाइट्स, वो रियल-एस्टेट सपना जिस पर ख़ानदान ने सब कुछ दाँव पर लगा दिया था, अब एक डूबता पत्थर था। और उसका सारा क़र्ज़ एक ही जगह इकट्ठा था। एक बेनाम कंपनी के पास। हुमा कैपिटल।

मंच के पास खड़ा था समर अहूजा। छत्तीस साल का, कनपटियों पर सफ़ेदी, आँखों में वो थकान जो नींद से नहीं जाती। छह साल में वो घमंडी वारिस से ऐसा आदमी बन गया, जो हर रात किसी से माफ़ी माँगता है, पर सुबह याद नहीं रहता किससे।

उसके साथ माजी थीं, वही निर्मला अहूजा। अब कुछ और बूढ़ी, गहनों से लदी, चेहरे पर वही रौब, जो अब क़र्ज़ की दीवार के पीछे काँप रहा था।

"हुमा कैपिटल हमारे साथ है, बस यही समझ लीजिए। अहूजा नाम पर पैसा लगाना कभी घाटे का सौदा नहीं रहा।"

समर माजी के क़रीब झुका, आवाज़ धीमी।

"माजी, हुमा का इंसान आज ख़ुद आ रहा है। पहली बार। छह महीने से हम सिर्फ़ काग़ज़ों पर बात कर रहे थे। अगर उसने आज हाथ खींच लिया, तो कल रोशनी हाइट्स नीलाम हो जाएगी। और उसके साथ ये हवेली भी।"

"तो झुकना पड़े तो झुक जाना, समर। अहूजा कभी किसी के आगे नहीं झुके। पर आज हम उस हुमा के आगे झुकेंगे, जिसका चेहरा तक किसी ने नहीं देखा।"

और ठीक उसी वक़्त, बॉलरूम के बड़े दरवाज़े खुले।

एक औरत अंदर आई। काले रंग की सादा पर बेदाग़ साड़ी, गले में एक भी गहना नहीं, चेहरे पर एक ऐसी शांति जो कमरे की सारी चमक को फीका कर गई। वो यूँ चली जैसे उसे पता हो कि कमरा उसी का इंतज़ार कर रहा है। किसी ने पूछा, ये कौन हैं। एक सहयोगी ने धीरे से बताया। हुमा कैपिटल की मालकिन। नाम, अमारा।

समर ने उस औरत को देखा, और उसका दिल एक पल को रुका। जैसे कोई बहुत पुरानी, बहुत जानी-पहचानी चीज़ कमरे में लौट आई हो, जिसे वो पहचान नहीं पा रहा था।

उसे नहीं पता था कि जिस औरत को देख कर उसकी साँस अटकी, वो कोई अजनबी नहीं थी। वो उसकी अपनी थी। वो, जिसे उसने ख़ुद बारिश में मरने के लिए छोड़ दिया था।

माजी लपक कर आगे बढ़ीं, हाथ जोड़ने से बस एक क़दम पीछे।

"अमारा जी! क्या सौभाग्य है। आइए, आइए। हमने आपके बारे में इतना सुना है। हुमा कैपिटल... कितना प्यारा नाम है। इसका मतलब क्या होता है?"

अमारा रुकी। उन चेहरों पर एक नज़र डाली जो उसे पहचान नहीं रहे थे, और बहुत ठंडी आवाज़ में कहा।

"हुमा एक परिंदा है, माजी। कहते हैं, वो अपनी ही आग में जल कर राख हो जाता है। ... और फिर उसी राख से दुबारा उठ खड़ा होता है। उसे ना कोई पिंजरे में क़ैद कर सकता है, ना कोई मार सकता है।"

माजी हँसी, ये समझ कर कि ये किसी अमीर औरत की कोई शायराना बात है। उन्हें नहीं पता था कि वो औरत अभी अभी उन्हें अपनी पूरी कहानी सुना गई थी, और वो एक लफ़्ज़ नहीं समझीं।

समर आगे बढ़ा, हाथ बढ़ाया।

"अमारा जी, मैं समर अहूजा। शुक्रिया कि आप आईं। हम सच में एक मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं, और हुमा का साथ हमारे लिए..."

अमारा ने उसके बढ़े हुए हाथ को देखा। एक पल को कुछ उसकी आँखों में तैरा और डूब गया। फिर उसने हाथ मिलाया, ठंडा, नपा-तुला।

"मुश्किल दौर, मिस्टर अहूजा, अक्सर पुराने हिसाब का ब्याज होता है। जो वक़्त पर क़र्ज़ नहीं चुकाते, उन्हें एक दिन सूद समेत चुकाना पड़ता है।" ... "मैं आपका पूरा हिसाब देखने आई हूँ।"

समर को समझ नहीं आया कि उस औरत की बात से उसे डर क्यों लगा, और उससे भी ज़्यादा, कि उससे नज़रें हटाने का मन क्यों नहीं हुआ।

और तभी एक और औरत मुस्कुराते हुए पास आई, समर की बाँह थामे, जैसे मालिकाना जता रही हो। रागिनी। अब समर की पत्नी, इस घर की मालकिन।

"अमारा जी, मैं रागिनी। समर की पत्नी। आप तो बड़ी रहस्यमयी हैं। ना कोई तस्वीर, ना कोई ख़बर। इतनी दौलत, और इतना छुपाव... कहीं आप किसी से भाग तो नहीं रहीं?"

"जो भागते हैं, रागिनी जी, वो लौट कर नहीं आते। ... और मैं लौट कर आई हूँ।"

रागिनी की मुस्कान एक पल को काँपी। दो औरतें, एक पुराने आईने के दो किनारों की तरह, एक दूसरे को देखती रहीं। एक को कुछ याद नहीं था। दूसरी कभी कुछ नहीं भूली थी।

रात के डेढ़ बजे। शहर के दूसरे कोने में, एक ऊँचे अपार्टमेंट की खिड़की के पीछे, अमारा अकेली खड़ी थी। नीचे पूरी दिल्ली जगमगा रही थी, और उसके हाथ में एक टैबलेट था।

स्क्रीन पर एक दस्तावेज़ खुला था। ऊपर लिखा था, हुमा कैपिटल। और नीचे, क़ानूनी भाषा की कई परतों के बाद, एक आख़िरी लाइन।

इस तारीख़ से, अहूजा ग्रुप का सम्पूर्ण क़र्ज़, रोशनी हाइट्स समेत, हुमा कैपिटल के एकमात्र अधिकार में आता है। बहुमत लेनदार। हर फ़ैसले का हक़। ... हुमा।

अमारा ने उँगली स्क्रीन पर रखी। एक पल को रुकी। छह साल। हर रात, हर साँस, हर ज़िल्लत, इस एक लाइन तक पहुँचने के लिए थी।

और उस एक पल में, उस ठंडी, बेदाग़ अमारा के नीचे से कोई और झाँकी। तारा। वो बहू, जिसे बारिश में फेंक दिया गया था। उसके होंठ बहुत हौले से हिले, किसी से नहीं, बस उस चमकते शहर से।

"जिस देहरी से तुमने मुझे धक्का दिया था, माजी... अब उस देहरी की एक एक ईंट मेरी है। और तुम्हें पता तक नहीं चलेगा, जब तक मैं ना चाहूँ।"

और फिर अमारा ने दस्तख़त कर दिए। स्क्रीन पर एक हरी रोशनी जगी। अहूजा ख़ानदान की हर साँस अब एक ऐसी औरत के हाथ में थी, जिसे उन्होंने अपने ही हाथों से मार कर दफ़ना दिया था।

तभी, पीछे से, एक छोटी सी, नींद में डूबी आवाज़ आई।

"मम्मा... आप अभी तक सोई नहीं?"

अमारा मुड़ी, और उसका सारा बर्फ़ एक पल में पिघल गया। दरवाज़े पर एक पाँच साल का बच्चा खड़ा था, बाल बिखरे, आँखें आधी बंद, एक टेडी बाँह में लटकाए। आरव।

जो औरत अभी अभी एक पूरे ख़ानदान की क़िस्मत पर दस्तख़त कर रही थी, वो झुकी और उस बच्चे को यूँ गोद में उठाया, जैसे वो दुनिया की सबसे नाज़ुक चीज़ हो।

"बस सोने ही जा रही थी, मेरा बच्चा। तू क्यों उठ गया? कोई डरावना सपना आया?"

"नहीं। मैं सोच रहा था। मम्मा, स्कूल में सबके पापा आते हैं ना। रोहन के भी, और गुड्डी के भी।"

अमारा के गले में कुछ अटक गया।

"मेरे पापा कब आएँगे? आप हमेशा कहती हो, जब सही वक़्त आएगा तब। वो सही वक़्त कब आएगा, मम्मा?"

अमारा ने बच्चे को सीने से लगा लिया, ताकि वो उसका चेहरा ना देख सके। उसने खिड़की से बाहर देखा, उस दिशा में जहाँ शहर के दूसरे कोने में एक आदमी एक अजनबी औरत के ख़याल में सो नहीं पा रहा था। उसका बाप।

"बहुत जल्दी, मेरे राजा। बहुत जल्दी तेरे पापा से तेरी मुलाक़ात होगी। ... और उस दिन... इस पूरे शहर में भूचाल आ जाएगा।"

बच्चा उसके कंधे पर सो गया, बेख़बर कि उसका एक एक सवाल कितना ख़तरनाक था। उसे नहीं पता था कि जिस पापा का वो इंतज़ार कर रहा है, वो आज शाम उसी बॉलरूम में खड़ा था। और उसका पूरा नाम था, आरव अहूजा। इस डूबते ख़ानदान का इकलौता, छुपा हुआ वारिस।

जिस बहू को अहूजा ख़ानदान ने चोर कह कर मरने के लिए बारिश में फेंक दिया था, आज उनके महल की मालकिन वही थी। और उनके ख़ून का इकलौता चराग़, उन्हीं से चंद मील दूर, एक ऐसी औरत की गोद में सो रहा था, जिसे वो पहचानते तक नहीं थे।

बदला अभी शुरू भी नहीं हुआ था। ... और पहला कौर परोसे जाने में सिर्फ़ एक रात बाक़ी थी।

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