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Chapter 2 of 30

क़र्ज़ की मालकिन

राख से उठी by Avni Oberoi

"ये पेटियाँ अंदर वाले कमरे में। और वो अहूजा का पुराना निशान दीवार से उतरवा दीजिए। ... आज से इस मंज़िल पर सिर्फ़ एक नाम चलेगा। हुमा।"

चाँदनी चौक, अहूजा ज्वेल्स का सर-दफ़्तर। सुबह के दस बजे। तीन दिन पहले इन दीवारों में डूबते जहाज़ जैसी ख़ामोशी थी। आज यहाँ हुमा कैपिटल के लोग पेटियाँ उठाए चढ़ आए थे, और पूरी एक मंज़िल पर क़ब्ज़ा कर चुके थे।

हुक्म देती वो औरत बेला थी। हुमा की सीओओ, अमारा का दायाँ हाथ। तीखी, बेलौस, और इतनी शांत कि सामने वाला ख़ुद घबरा जाए। जिसे कभी कुसुम देवी ने भी राख से उठाया था, ठीक अमारा की तरह।

और अहूजा ख़ानदान का वही पुराना मैनेजर, जो कभी नौकरों पर चीख़ता था, आज बेला के आगे दोनों हाथ बाँधे खड़ा था, बार बार सिर हिलाता हुआ।

"आप बार बार 'जी मैडम, जी मैडम' मत कहिए। एक बार कह दीजिए, मैं मान लूँगी कि आप डरे हुए हैं।"

मैनेजर की घिग्घी बँध गई। बेला ने पहली बार नज़र उठाई, और बस हल्का सा, बहुत हल्का सा मुस्कुरा दी। ये उसका तरीक़ा था, बर्फ़ में लिपटा हुआ मज़ाक।

तभी लिफ़्ट के दरवाज़े खुले, और वो अंदर आई। वही काली, सादा पर बेदाग़ साड़ी, वही ठंडी शांति जो कमरे की हर आवाज़ को धीमा कर देती थी। अमारा।

जिस ख़ानदान ने कभी उसकी बाँह पकड़ कर उसे बारिश में धकेला था, आज उसी ख़ानदान का दफ़्तर उसके क़दमों की आहट पर साँस रोक लेता था। ... छह साल पहले हर दरवाज़ा उसके मुँह पर बंद हुआ था। अब हर दरवाज़ा उसके लिए ख़ुद खुलता था।

"सब तैयार है। इनके चेहरे देखे आपने? ऐसे देख रहे हैं जैसे कोई मसीहा आ गया हो।"

"मसीहा नहीं, बेला। ... लेनदार। मसीहा माफ़ करता है। लेनदार सिर्फ़ वसूलता है।"

"और ब्याज?"

"ब्याज छह साल का है। ... एक एक पाई वसूलूँगी।"

बोर्डरूम में एक लंबा शीशे वाला मेज़ था। एक तरफ़ पूरा अहूजा ख़ानदान बैठा था, उम्मीद और डर के बीच झूलता। दूसरी तरफ़, बिल्कुल अकेली, अमारा।

मेज़ के उस पार माजी थीं, गहनों में लिपटी पर आँखों में एक नंगा डर। उनके बराबर रागिनी, चेहरे पर वही मीठी बेचैनी। और कोने में चाचा रतन, वही अवुंचल मुस्कान ओढ़े, उँगलियाँ मेज़ पर हौले हौले थाप देती हुईं, जैसे किसी पुराने हिसाब को गिन रहे हों। और सबके बीच, समर।

"अमारा जी, हम चाहते हैं ये रिश्ता... भरोसे का हो। साफ़ साफ़ बताइए, हुमा हमसे क्या चाहती है।"

समर उस औरत को देख रहा था और बार बार अपनी ही नज़र को रोक रहा था। कोई चीज़ थी उसमें। आवाज़ का कोई मोड़, गर्दन झुकाने का कोई अंदाज़, जो उसके सीने में बहुत गहरे, किसी बरसों से बंद दरवाज़े को धीरे धीरे खटखटा रहा था।

"माफ़ कीजिए... क्या हम पहले कभी मिले हैं? आपको देख कर लगता है जैसे... जैसे बहुत पहले, कहीं।"

अमारा का चेहरा पत्थर रहा। पर मेज़ के नीचे उसकी उँगलियाँ एक पल को मुट्ठी में बँधीं, और फिर धीरे से खुल गईं।

"मुझ जैसी औरतें, मिस्टर अहूजा, अक्सर उन्हें याद आती हैं जिनका कोई पुराना हिसाब बाक़ी रह गया हो। ... शायद आपका भी कोई बाक़ी हो।"

समर चुप हो गया। उसे नहीं पता था कि उसने अभी अभी अपने ही बारे में एक सच सुना है, और उसे समझ भी नहीं आया। बस इतना पता था कि इस औरत के हर लफ़्ज़ के नीचे कोई दूसरा लफ़्ज़ छुपा था, कोई पुरानी आवाज़, जिसे वो पहचानना नहीं चाहता था, और पहचान भी नहीं पा रहा था।

"चलिए काम की बात करते हैं। हुमा अहूजा का पूरा क़र्ज़ पुनर्गठित करेगी। रोशनी हाइट्स को डूबने नहीं देगी। ... एक शर्त पर।"

माजी की साँस तेज़ हो गई। रागिनी आगे झुकी। डूबते हुए लोग रस्सी को यूँ ही देखते हैं, हर उम्मीद आँखों में लिए।

"बोलिए। जो शर्त होगी, हम मानेंगे। हमारे पास अब कोई और रास्ता नहीं है।"

"पिछले पूरे दस साल का फ़ॉरेंसिक ऑडिट। हर बही, हर खाता, हर वो पन्ना जो इस ख़ानदान ने बंद करके दफ़ना दिया। कोई अपवाद नहीं। कोई कोना नहीं जो बंद रहे।"

"क्योंकि दफ़नाई हुई चीज़ें, मिस्टर अहूजा... हमेशा दफ़न नहीं रहतीं। कभी कभी वो राख से उठ खड़ी होती हैं, और अपना हिसाब माँगती हैं।"

कोने में चाचा रतन की उँगलियाँ, जो अब तक मेज़ पर थाप दे रही थीं, एक पल को रुक गईं। बस एक पल को। फिर वो फिर से, कुछ ज़्यादा ही चौड़ा मुस्कुरा दिए।

और अमारा ने वो एक पल देख लिया। उसने वो रुकी हुई उँगलियाँ देखीं, वो ज़रा सी ज़्यादा चौड़ी मुस्कान देखी, और अंदर ही अंदर उसे यक़ीन हो गया कि जिस आदमी को वो ढूँढने आई है, वो ठीक इसी मेज़ पर बैठा है।

"दस साल, अमारा जी? इतना पुराना ऑडिट बहुत वक़्त लेगा। बहुत पुराने ज़ख़्म खुलेंगे, जो शायद अब भर चुके हैं।"

"तो यूँ समझिए, मिस्टर अहूजा। कल सुबह तक ऑडिट के काग़ज़ात पर आपके दस्तख़त। या कल दोपहर तक हुमा पूरा क़र्ज़ एकमुश्त वापस माँग लेगी।"

"और आप जानते हैं कि उस सूरत में, कल शाम तक, इस मेज़ के उस पार कोई अहूजा नहीं बचेगा। ना ये दफ़्तर, ना वो हवेली, कुछ नहीं।"

माजी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। समर ने पहले रतन की तरफ़ देखा, फिर माजी की तरफ़। तीनों की आँखों में एक ही सवाल था, और किसी के पास उसका जवाब नहीं था। किसी के पास कोई चारा नहीं था।

"...ठीक है। कल सुबह दस्तख़त हो जाएँगे।"

अमारा ने अपनी फ़ाइल बंद की, और उठ खड़ी हुई। और पहली बार उस पूरी मेज़ पर, वो बहुत हल्का सा मुस्कुराई। वो मुस्कान जिसे सिर्फ़ बेला पहचानती थी। पहला कौर परोसा जा चुका था, और मेज़ पर बैठे किसी को उसका स्वाद तक नहीं आया।

बोर्डरूम से निकलते हुए अमारा एक लंबे गलियारे से गुज़री। शीशे के उस पार अहूजा ख़ानदान की पुरानी तस्वीरें टँगी थीं। कामयाबी की, शादियों की, मंदिर के चढ़ावों की। एक तस्वीर में समर था, एक दुल्हन के साथ। पर वो दुल्हन तारा नहीं थी, रागिनी थी। जैसे तारा नाम की कोई बहू इस घर में कभी आई ही ना हो, जैसे उसकी शादी की एक भी साँस इन दीवारों में कभी टिकी ही ना हो।

और एक पल को गलियारे की वो ठंडी रोशनी उस रात की बारिश में बदल गई। दो नौकरों के हाथ उसकी बाँहों पर, देहरी से बाहर एक धक्का, पेट पर एक हाथ, और पीछे बंद होता दरवाज़ा। अमारा ने आँखें झपकीं, और गलियारा फिर से गलियारा हो गया। पर उसके हाथ अब भी ठंडे थे।

उस बेदाग़ अमारा के नीचे से तारा झाँकी। वो तारा, जिसका नाम इस ख़ानदान ने अपनी हर तस्वीर से, हर याद से, उसी रात की बारिश की तरह धो कर बहा दिया था।

"तुमने मेरी हर तस्वीर उतार दी, माजी। ... कोई बात नहीं। अब मैं ख़ुद तस्वीर में वापस आई हूँ। और इस बार, फ़्रेम मेरे हाथ में है।"

और पीछे बोर्डरूम में, समर खिड़की के पास खड़ा उस औरत को जाते देखता रहा। छह साल में पहली बार उसे किसी के जाने से यूँ बेचैनी हुई। उसे लगा जैसे वो किसी को अलविदा कह रहा है, जिसे वो कभी ठीक से हैलो भी नहीं कह पाया।

रात के ग्यारह बजे। हुमा का नया दफ़्तर, अहूजा की उसी मंज़िल पर। बाहर चाँदनी चौक की गलियाँ सो रही थीं। अंदर, एक अकेली मेज़ पर लैंप की पीली रोशनी में, बेला पुराने बहीखातों के एक पहाड़ में धँसी बैठी थी।

अमारा अंदर आई, आँचल कंधे पर ढलका हुआ, बालों में रात और थकान। थोड़ी देर पहले उसने अपने बेटे को सुलाया था, और अब वो अपने असली काम पर लौट आई थी।

"आरव सो गया?"

"तीसरी कहानी के बीच में। ... आज उसने पूछा कि क़र्ज़ क्या होता है। मैंने कहा, वो चीज़ जो लोग तुमसे ले लेते हैं और लौटाना भूल जाते हैं।"

"और आप याद दिलाने का काम करती हैं।"

"बहुत अच्छे से।"

"कुसुम देवी कहती थीं ना... बही-खाते झूठ नहीं बोलते, बस उन्हें पढ़ना आना चाहिए। ... मैं रात भर से पढ़ रही हूँ, अमारा। और ये बहीखाते चीख़ रहे हैं।"

"क्या मिला?"

बेला ने एक पुराना, पीला पड़ा पन्ना अमारा के आगे खिसकाया। दस साल का हिसाब, और उसमें एक ही नाम बार बार लौट रहा था, जैसे कोई ख़ामोश नाला जो हर साल इस ख़ानदान का थोड़ा थोड़ा ख़ून चुरा ले जाता हो।

"मेहरबान ट्रेडर्स। एक कंपनी जो ना कुछ बनाती है, ना कुछ बेचती है। बस पैसा लेती है। हर साल अहूजा ज्वेल्स से लाखों रुपये किसी 'कच्चे माल' के नाम पर इसमें गए। पर माल कभी इस घर में आया ही नहीं।"

"एक ख़ोल कंपनी। किसी ने सालों से इस ख़ानदान को अंदर ही अंदर खोखला किया है, बड़े इत्मीनान से।"

"और बड़े सलीक़े से। जो भी है, वो चोर नहीं है, अमारा। ... कारीगर है।"

अमारा की उँगली उस नाम पर रुक गई। मेहरबान ट्रेडर्स। यही वो धागा था, जिसे खींचने वो छह साल बाद लौटी थी। इसी धागे के दूसरे सिरे पर वो आदमी बँधा था, जिसने उसे चोर बनाया, और फिर मरने के लिए बारिश में फेंक दिया। पैसा उसने चुराया, इल्ज़ाम तारा पर आया। सारा दाग़ उसके नाम, और सारा माल किसी और की तिजोरी में।

"अमारा, आप ठीक हैं? आपका चेहरा... मैंने आपको इतने सालों में कभी यूँ नहीं देखा।"

"मैं ठीक हूँ, बेला। ... आगे पढ़ो। जो भी इस मेहरबान ट्रेडर्स से जुड़ा है, हर काग़ज़, हर तारीख़, सब निकालो। मुझे इस चोर का पूरा चेहरा चाहिए।"

बेला ने उस पन्ने के साथ नत्थी एक और काग़ज़ पलटा। एक अधिकार-पत्र। एक सीधा सादा ट्रांसफ़र ऑर्डर, जिस पर किसी ने अहूजा ज्वेल्स का पैसा मेहरबान ट्रेडर्स को भेजने की इजाज़त दी थी।

"अमारा... इस अधिकार-पत्र पर दस्तख़त हैं। जिसने ये पैसा भेजने की इजाज़त दी... रुकिए।"

बेला की आवाज़ अचानक बदल गई। वो, जो किसी बात पर नहीं रुकती थी, रुक गई। उसने वो काग़ज़ बहुत धीरे से, जैसे वो कोई ज़िंदा चीज़ हो, अमारा की तरफ़ बढ़ाया।

"ये तारीख़ देखिए। ये उस रात के पूरे छह महीने बाद का काग़ज़ है। जब तारा... जब आप... "

अमारा ने काग़ज़ उठाया। लैंप की रोशनी सीधी उस पर पड़ी। और एक पल को उसका सारा ख़ून जम गया, नसों में बर्फ़ की तरह।

उस अधिकार-पत्र पर, अहूजा का पैसा चुराने की इजाज़त देते हुए, एक दस्तख़त था। एक जाना पहचाना, गोल, थोड़ा कच्चा दस्तख़त। एक ऐसा नाम, जिसे इस दुनिया ने छह साल पहले मरा हुआ मान लिया था। तारा अहूजा।

"ये... ये मेरे दस्तख़त हैं, बेला। ... पर ये मैंने नहीं किए। मैंने ज़िंदगी में ये काग़ज़ छुआ तक नहीं।"

और तब अमारा को वो सच समझ आया, जो किसी भी क़र्ज़ से भारी था। जिस रात उन्होंने तारा को चोर कह कर मरने के लिए फेंक दिया था, उस रात के बाद भी, सालों तक, किसी ने उसके मरे हुए नाम से चोरी की थी। उसका नाम सिर्फ़ बदनाम नहीं किया गया था। उसे इस्तेमाल किया गया था।

एक मुर्दा औरत के जाली दस्तख़त, एक ज़िंदा चोर की ढाल बन गए थे। जितनी बार भी किसी ने अहूजा का पैसा चुराया, उतनी बार उन्होंने तारा को दुबारा क़त्ल किया, उसके ही नाम से।

"मुझे मार कर भी तुमने मेरा नाम नहीं छोड़ा। ... कोई बात नहीं। अब मैं भी तुम्हारा नाम नहीं छोड़ूँगी। जब तक ये पूरा घर राख ना हो जाए।"

लैंप की रोशनी में वो काग़ज़ हौले हौले काँप रहा था। या शायद उसे थामे हुए वो हाथ। छह साल पहले जिस औरत के दस्तख़त को इस्तेमाल कर के एक चोर बचता रहा था, आज वही दस्तख़त, उसी चोर की तरफ़ उँगली उठा रहे थे। ... और अब इस उँगली को रोकना, किसी के बस की बात नहीं थी।

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