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अध्याय 4 / 30

पुरानी दीवारें

राख से उठी द्वारा Avni Oberoi

चाँदनी चौक की एक तंग गली के आख़िर में एक ऑटो रुका। छह साल में पहली बार, कबीर अहूजा ने उस हवेली के सामने क़दम रखा, जिसकी देहरी पर उसने दुबारा पाँव ना रखने की क़सम खाई थी। उसने किराया चुकाया, बैग कंधे पर डाला, और फाटक की तरफ़ देखा। पर एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ा।

"छह साल... और ये दीवारें एक इंच नहीं बदलीं। ... वही संगमरमर, वही घमंड। बस उस रात की बारिश अब भी इनकी नींव में कहीं टपक रही है। मुझे आज भी सुनाई देती है।"

वो इस घर से नफ़रत की वजह से नहीं आया था। नफ़रत होती, तो वो कभी लौटता ही नहीं। उसे माजी के आँसुओं ने नहीं, बल्कि उस अजनबी के भेजे लफ़्ज़ों ने खींचा था। कि इस घर में एक बहुत पुराना हिसाब बरसों से अधूरा पड़ा है, और उसे चुकाने का वक़्त आ गया है।

"अधूरा हिसाब... किसी लेनदार को क्या मालूम, इस घर का सबसे पुराना हिसाब क्या है। ... वो एक बहू थी, जिसे इन्हीं दीवारों ने चोर कह कर बारिश में फेंक दिया। उसका हिसाब कौन चुकाएगा?"

तभी फाटक के अंदर से एक बूढ़ी आवाज़ चीख़ी, और शांति, वो पुरानी नौकरानी, आँचल से हाथ पोंछती लगभग दौड़ती हुई बाहर आई। कबीर को देखते ही उसकी आँखें भर आईं, और मुँह से बस एक ही नाम निकला।

"कबीर बाबा! ... हे भगवान, सच में आप ही हैं! छह साल, बाबा, छह साल इन बूढ़ी आँखों ने आपका रास्ता देखा। आओ ना, अंदर आओ। ... अरे, वहाँ पत्थर की तरह क्यों खड़े हो, बेटा?"

"शांति काकी... तुम अब भी यहीं हो। ... इस पूरे घर में एक तुम्हीं तो थीं, जिसकी आवाज़ में कभी ज़हर नहीं घुला।"

"अरे बाबा, मैं कहाँ जाऊँगी। ... इस घर की ईंटों में मेरी हड्डियाँ गड़ी हैं। पर सच कहूँ बाबा, अब ये घर वो घर नहीं रहा। ऊपर से सोना, अंदर से खोखला। और अब तो एक नई मालकिन आ बैठी है, वो हुमा वाली। अमारा।"

कबीर के क़दम रुक गए। वही नाम, जो उस अजनबी फ़ोन कॉल के पीछे था। जिस औरत ने उसे नाम ले कर, बिना कभी उससे मिले, इस घर में वापस बुलवाया था।

"यही वो औरत है ना, जिसने मुझे बुलवाया? ... एक लेनदार, जो तय करती है कि इस घर में कौन आएगा, कौन जाएगा। मुझे ऐसे लोग पसंद नहीं, काकी। जो पैसे के दम पर लोगों को शतरंज के मोहरों की तरह इधर उधर चलाते हैं।"

"पता नहीं बाबा। ... पर वो औरत... जब वो पहली बार इस देहरी पर आई ना, तो मेरा कलेजा एक पल को धक से रह गया। पता नहीं क्यों। जैसे कोई बहुत अपना, बहुत पुराना, इस घर लौट आया हो। बुढ़ापे का वहम होगा। चलो, अंदर चलो।"

और ऊपर, हवेली की एक खिड़की के पीछे से, रतन चाचा ये सब देख रहे थे। लौटते हुए कबीर को, उस अकेले ईमानदार अहूजा को। उनके चेहरे की अवुंचल मुस्कान वहीं थी, पर खिड़की की चौखट पर उनकी उँगलियाँ हौले हौले थाप देने लगीं। एक... दो... तीन। इस घर में एक साफ़ हाथ का लौटना, उनके लिए कभी अच्छी ख़बर नहीं थी।

उसी दोपहर, हवेली के भीतर वाले कमरे में। अमारा एक मेज़ पर बैठी रोशनी हाइट्स के नक़्शे देख रही थी, और शांति एक ट्रे में चाय और गरम पकौड़े ले कर अंदर आई। पर उसके हाथ, मेज़ तक पहुँचते पहुँचते, अपने आप धीमे पड़ गए।

"अमारा बीबी... आप सुबह से भूखी बैठी हैं। थोड़ा सा खा लीजिए। ... पता नहीं क्यों, आपको देख कर मन करता है कि आपको ज़बरदस्ती खिलाऊँ। जैसे... जैसे किसी को बहुत पहले खिलाया करती थी।"

अमारा की उँगलियाँ नक़्शे पर रुक गईं। ये वही शांति काकी थी, जो छह साल पहले, इसी हवेली में, चोरी-छुपे उसके कमरे में गरम रोटियाँ रख जाती थी, उन रातों में जब बाक़ी पूरा घर बहू को भूखा सुला देता था।

"किसे खिलाया करती थीं, काकी? ... किसकी याद आ रही है आपको मुझमें?"

"इस घर की एक बहू थी बीबी। तारा। ... बहुत नरम, बहुत भोली। पूरा घर उस पर बरसता था, और वो बेचारी चुपचाप सब पी जाती थी। मैं रात को चोरी से उसके कमरे में दो रोटी रख आती थी। फिर एक दिन... इन्होंने उसे चोर कह कर बारिश में निकाल दिया। और वो लौट कर कभी नहीं आई।"

अमारा ने चाय का कप उठाया, बस इसलिए कि उसका काँपता हाथ किसी को दिख ना जाए। जिस बहू के लिए ये बूढ़ी औरत आज भी रोती थी, वो उसी के सामने बैठी थी। और वो पहचान नहीं पा रही थी।

"और आपको लगता है, काकी, वो कहीं ज़िंदा होगी? ... इतने बरस बाद भी?"

"मेरा मन कहता है, हाँ। ... मैं आज भी हर मंगल को उसके नाम का एक दीया जलाती हूँ, बीबी। लोग कहते हैं, पगली है बुढ़िया, मरे हुओं के लिए दीये जलाती है। पर मेरा दिल नहीं मानता कि वो लड़की मर गई। जो इतनी सच्ची हो ना, उसे भगवान यूँ बीच रास्ते नहीं ले जाता।"

"शायद वो ज़िंदा हो, काकी। ... शायद वो कहीं लौटने का रास्ता ढूँढ रही हो। और शायद, जिस दिन वो लौटे, ये घर उसे पहचान भी ना पाए।"

शांति ने एक पल को अमारा के चेहरे को यूँ देखा, जैसे किसी धुंध में कोई जाना-पहचाना अक्स टटोल रही हो। फिर उसने सिर झटका, और चाय की ट्रे समेटने लगी। पर जाते जाते वो एक बात कह गई, जो अमारा के सीने में तीर की तरह धँस गई।

"बीबी, एक बात कहूँ, बुरा मत मानिएगा? ... आप हँसती नहीं हैं। तारा बिटिया भी नहीं हँसती थी, इस घर में आ कर। ... भगवान करे, आपके नसीब में वो कभी ना आए, जो उस बच्ची के नसीब में आया था।"

शाम को, रोशनी हाइट्स का साइट-दफ़्तर। अधूरी इमारत का ढाँचा बाहर अँधेरे में खड़ा था, किसी डूबते जहाज़ के पिंजर की तरह। और अंदर, मेज़ के दो किनारों पर, वो दो लोग पहली बार आमने-सामने थे, जिन्होंने कभी एक ही औरत को सबसे ज़्यादा चाहा था। और दोनों एक दूसरे को पहचान नहीं रहे थे।

"तो आप हैं वो हुमा वाली मालकिन। ... मैंने साफ़ बात करने की आदत रखी है, अमारा जी। मैं यहाँ इसलिए नहीं आया कि आपने मेरे परिवार का क़र्ज़ ख़रीद लिया। मैं ये जानने आया हूँ, कि आपने मुझे, हज़ारों इंजीनियरों में से, नाम ले कर क्यों बुलवाया।"

"क्योंकि हज़ारों इंजीनियर इमारतें बनाते हैं, मिस्टर अहूजा। ... पर बहुत कम लोग होते हैं, जो किसी झूठ पर दस्तख़त करने से इनकार कर के अपना घर तक छोड़ दें। मुझे इमारत बनाने वाला नहीं, मुझे साफ़ हाथ चाहिए। और सुना है, इस पूरे ख़ानदान में वो सिर्फ़ आपके पास हैं।"

कबीर एक पल को रुक गया। इस औरत को उसके बारे में इतना कैसे पता था? उसकी आवाज़ में एक बर्फ़ जैसी ठंडक थी, पर उस ठंडक के नीचे कुछ और भी था। कोई गर्म, दबी हुई रग, जो उसे अंदर तक बेचैन कर रही थी।

"मेरे साफ़ हाथों को छोड़िए। ... मैं ये जानना चाहता हूँ कि रोशनी हाइट्स डूबा कैसे। करोड़ों रुपये आख़िर गए कहाँ? मैंने फ़ाइलें देखी हैं, अमारा जी। आधे पन्ने ग़ायब हैं। जिस चाचा के भरोसे ये पूरा घर चलता है, उन्हीं के हिसाब में सबसे बड़े छेद हैं।"

और अमारा के होंठों पर एक बहुत बारीक सी चमक आई, जिसे कबीर पढ़ नहीं पाया। वो जानती थी, जो सवाल वो छह साल से पूछ रही थी, आज वही सवाल इस आदमी के मुँह से निकल रहा था। उसका अपना सिपाही, बिना जाने, ठीक उसी धागे को खींच रहा था, जिसे रतन बरसों से धुंध में छुपाए बैठा था।

"तो उन्हीं छेदों को ढूँढिए, मिस्टर अहूजा। ... जो पन्ने ग़ायब हैं, उन्हें ढूँढिए। जिन सालों को 'दीमक खा गई', उन्हें खोदिए। हुमा को इमारत बाद में चाहिए। पहले वो सच चाहिए, जो इस घर ने अपनी नींव में ज़िंदा दफ़न कर रखा है।"

"आप एक बहुत अजीब लेनदार हैं। ... लेनदार को अपने पैसे से मतलब होता है। और आपको इस घर के दफ़न किए हुए सच से। ... आख़िर आप हैं कौन, अमारा जी? और इस घर से आपको असल में चाहिए क्या?"

सवाल हवा में तना रह गया, एक तीर की तरह, ठीक अमारा के सीने की तरफ़। एक पल को कमरे की हवा भारी हो गई। वो इस आदमी को सच नहीं बता सकती थी। अभी नहीं। शायद कभी नहीं।

और ठीक उसी पल, जब अमारा ने जवाब देने के लिए अपनी फ़ाइल उठाई, उसमें से एक काग़ज़ फिसल कर मेज़ पर आ गिरा। कोई दस्तावेज़ नहीं। एक बच्चे की क्रेयॉन से बनी ड्रॉइंग। एक घर, एक औरत, और उसके बराबर एक आदमी, जिसका चेहरा एक बच्चे ने बिना देखे बनाया था। और नीचे, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था, मेरे पापा।

और उस एक लम्हे में, वो पत्थर जैसी औरत पिघल गई। अमारा ने लपक कर वो काग़ज़ उठाया, पर तब तक उसका चेहरा बदल चुका था। ठंडक की जगह एक ऐसी नरमी, एक ऐसी तड़प आई, कि कबीर की साँस रुक गई। उसने वो चेहरा एक पल को देखा, और वो अजनबी लेनदार अचानक कोई बहुत नाज़ुक, बहुत टूटी हुई औरत लगने लगी।

"ये... ये आपका बच्चा है? ... मुझे नहीं पता था। ... अभी अभी आप लोहे की एक दीवार लग रही थीं। और इस एक काग़ज़ ने आपको... एक पल में इंसान बना दिया।"

"मेरी ज़िंदगी आपके काम का हिस्सा नहीं है, मिस्टर अहूजा। ... हम रोशनी हाइट्स की बात कर रहे थे। बस उतनी ही बात कीजिए।"

पर कबीर देख चुका था। उस बर्फ़ के नीचे एक आग थी, एक माँ थी, एक ना भरने वाला ज़ख़्म था। और छह साल में पहली बार, किसी अजनबी के चेहरे ने उसके अंदर वो पुरानी टीस जगा दी, जिसे दफ़न कर के वो कभी इस शहर से भाग गया था।

उस रात, जाने से पहले, अमारा हवेली के उस लंबे गलियारे से गुज़री। वही गलियारा। जहाँ से छह साल पहले, एक बरसाती रात, दो नौकरों ने उसकी बाँहें पकड़ कर उसे देहरी तक घसीटा था।

उसके क़दम वहीं ठिठक गए। पैरों के नीचे वही ठंडा फ़र्श था, कानों में अब भी वही अपनी ही चीख़। अमारा का चेहरा पत्थर रहा, बिल्कुल शांत, पर आँचल के नीचे उसके हाथ बुरी तरह काँप रहे थे। उसने आँखें मूँद लीं, और ख़ुद को थामने के लिए, बिना सोचे, बहुत धीरे से एक लोरी गुनगुनाने लगी।

वही लोरी, जो कभी तारा अपने पेट में पल रहे बच्चे को सुनाया करती थी, इसी घर की इन्हीं दीवारों के भीतर, उन रातों में जब वो अकेली और डरी हुई होती थी। छह साल का एक बंद ताला, अचानक उसके होंठों पर खुल गया।

"सो जा, मेरे चाँद के टुकड़े... नींद परी तुझे लेने आई... ... अँखियाँ मूँद ले, माँ पास है तेरे।"

वो इतनी खोई हुई थी कि उसे पता ही नहीं चला कि गलियारे के दूसरे सिरे पर कोई रुक गया है। कबीर। वो अपना बैग उठाए बाहर निकल रहा था, और उस आवाज़ ने उसे वहीं जड़ कर दिया। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। वो एक क़दम भी नहीं हिला।

वो लोरी उसने पहले सुनी थी। ठीक इसी गलियारे में। ठीक इसी दीवार के पास। छह साल पहले, एक ऐसी औरत के होंठों से, जिसे इस घर ने चोर कह कर मार डाला था। उसकी भाभी। तारा।

अमारा ने चौंक कर आँखें खोलीं। कबीर उसे देख रहा था, पर उसकी नज़र में सवाल नहीं, एक भूचाल था। वो दरवाज़े पर एक पल को ठिठका, और लगभग अपने आप से, बहुत धीमी, बहुत काँपती आवाज़ में बोला।

"तुम... तुम वही लोरी गुनगुना रही हो, जो मेरी भाभी गाया करती थीं। ... बिल्कुल वही। एक एक लफ़्ज़, एक एक सुर, हूबहू वही। ... और मेरी भाभी को मरे हुए... पूरे छह साल हो गए हैं।"

गलियारे में एक भारी, ज़हरीली ख़ामोशी उतर आई। अमारा का ख़ून जम गया। इस पूरे घर में वो जिस एक इंसान को अपना सिपाही बना कर लाई थी, वही अकेला इंसान, जो कभी तारा को सच में जानता था, अभी अभी उस लोरी के एक सुर में उसे पहचानने लगा था। ... छह साल का दफ़न किया हुआ भेद, उसी की छत के नीचे, हौले हौले साँस लेने लगा था। और उसे रोकना, अब किसी के बस में नहीं था।

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