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अध्याय 5 / 30

पहला कौर

राख से उठी द्वारा Avni Oberoi

गलियारे में वो ज़हरीली ख़ामोशी अभी भी टँगी थी, और अमारा का ख़ून बर्फ़ हो चुका था। एक ग़लत साँस, और छह साल की बुनी हुई दीवार भरभरा कर गिर सकती थी। ... पर वो तारा नहीं थी, जो चुपचाप टूट जाती। वो अमारा थी। और अमारा गिरने से पहले वार करती थी।

"लोरी?" ... "आप एक मरी हुई औरत की लोरी में मुझे ढूँढ रहे हैं, मिस्टर अहूजा? ... ये कोई इकलौती लोरी नहीं, जो सिर्फ़ आपकी भाभी गाती थीं। दिल्ली की हर माँ यही लोरी गुनगुनाती है, अपने बच्चे को सुलाने के लिए।"

पर कबीर टस से मस नहीं हुआ। उसकी आँखें उस चेहरे पर यूँ गड़ी थीं, जैसे किसी पुरानी तस्वीर के ऊपर रखी नई तस्वीर में वो बारीक फ़र्क़ टटोल रहा हो।

"नहीं। हर माँ यूँ नहीं गाती। ... वो सुर, वो ठहराव, और 'चाँद के टुकड़े' पर आपकी आवाज़ जो टूटी ना... वो हूबहू वही थी। छह साल पहले, इसी दीवार के पास, मैंने अपनी भाभी को ठीक यही सुर टूटते सुना था।"

"या शायद..." ... "शायद आप हर उस औरत में अपनी भाभी को ढूँढते हैं, जिसे आप बचा नहीं पाए। ... छह साल हो गए, मिस्टर अहूजा। कब तक हर आवाज़ में एक मुर्दा ढूँढते रहेंगे?"

और वार ठीक निशाने पर लगा। कबीर का चेहरा एक पल को यूँ बुझ गया, जैसे किसी ने उसके सबसे पुराने ज़ख़्म पर उँगली रख दी हो। वो अपराध, कि वो तारा को बचा नहीं पाया, उसकी सबसे कमज़ोर रग थी। और अमारा ने वहीं दबा दिया।

"मैंने आपको भूत ढूँढने के लिए वापस नहीं बुलाया। ... रोशनी हाइट्स के लिए बुलाया है। कल शाम शेयरधारकों की दावत है, और इस घर की सारी बची-खुची इज़्ज़त उसी एक रात पर टिकी है। ... आप वहाँ होंगे। और अपने भूतों को घर पर छोड़ आइएगा।"

वो पलटी और गलियारे के अँधेरे में उतर गई, अपने काँपते हाथ आँचल के नीचे छुपाए। पर कबीर वहीं जड़ खड़ा रहा। कानों में अब भी वो लोरी गूँज रही थी, और दिल के किसी कोने में एक नन्हा सा शक फाँस की तरह धँस गया था। ... वो पागल नहीं था, उसने वो सुर पहचाना था।

अगली शाम। अहूजा हवेली का बड़ा दालान झूमरों की रोशनी में नहा रहा था, मेज़ों पर सफ़ेद कपड़े, और हवा में इत्र और झूठे भरोसे की ख़ुशबू। ये वही रात थी जिसके लिए रतन चाचा ने हफ़्तों जाल बुना था, वो रात जब डूबता ख़ानदान अपने शेयरधारकों को यक़ीन दिलाएगा कि जहाज़ अब नहीं डूबेगा।

और उस चकाचौंध के बीच, रागिनी किसी रानी की तरह घूम रही थी। रेशम में लिपटी, गहनों से दमकती, हर मेहमान का स्वागत माँजी हुई मुस्कान से करती। पर उसकी नज़र बार बार एक ही औरत का पीछा कर रही थी। अमारा।

"अमारा जी, आइए ना। ... देखिए, ये है असली अहूजा ख़ानदान। लोग समझते हैं हम डूब गए, पर आज की रात के बाद पूरा बाज़ार जान जाएगा कि हम फिर से उठ रहे हैं। ... आप भी देख लीजिएगा, अपनी इन आँखों से।"

"मैं यही देखने तो आई हूँ, रागिनी जी। ... कि ये घर कैसे उठता है। ... और किस चीज़ की राख पर उठता है।"

रागिनी की मुस्कान एक पल को थरथरा गई। इस औरत के लफ़्ज़ों में कोई ठंडक थी, कोई जानी-पहचानी सी बू, जो उसकी रीढ़ में उतर जाती थी। जब भी अमारा उसके घर में यूँ चलती, जैसे घर उसी का हो, रागिनी के अंदर एक पुराना डर करवट लेता, जिसका नाम वो याद नहीं करना चाहती थी।

"समर... ये औरत मुझे अच्छी नहीं लगती। ... जब ये मुझे देखती है ना, तो लगता है जैसे ये मुझे पहले से जानती हो। जैसे मेरे किसी बहुत पुराने गुनाह को जानती हो।"

"तुम्हें हर किसी में शक दिखता है, रागिनी। ... आज की रात पर ध्यान दो। बाहर इन्वेस्टर बैठे हैं। चाचा ने सारे आँकड़े तैयार कर दिए हैं, मुझे बस पढ़ने हैं। आज ये लोग पीछे हट गए, तो कल ये हवेली भी नहीं बचेगी।"

समर के हाथ की डेक रतन चाचा ने बड़े प्यार से तैयार की थी, और उसके सबसे चमकीले पन्ने पर एक आँकड़ा था, अस्सी करोड़ की एडवांस बुकिंग। पर वो पैसा किसी ख़रीदार का नहीं था। बेला ने बहीखातों में उसका पीछा किया था, और वो अस्सी करोड़, घूम फिर कर, उसी शेल कंपनी से आए थे जिसमें से रतन बरसों से चुरा रहा था। चोरी का पैसा, माँग का लिबास पहन कर, लौट आया था। और अमारा छह साल से इसी कौर का इंतज़ार कर रही थी।

दावत अपने चरम पर थी। और फिर समर उठा, हाथ में गिलास, चेहरे पर वो पुराना अहूजा घमंड जो हालात मिटा नहीं पाए थे। पूरा दालान ख़ामोश हो गया।

"दोस्तो, साथियो... मैं जानता हूँ पिछले कुछ साल अहूजा ख़ानदान के लिए आसान नहीं रहे। अफ़वाहें बहुत उड़ीं। पर आज मैं आपके सामने बातें नहीं, आँकड़े ले कर खड़ा हूँ। ... रोशनी हाइट्स को अकेले पिछली तिमाही में अस्सी करोड़ की एडवांस बुकिंग मिली है। ये डूबता जहाज़ नहीं, दोस्तो, ये किनारे लौटता जहाज़ है।"

मेज़ों पर तालियाँ बजीं। इन्वेस्टरों के चेहरों पर राहत उतरी, रागिनी के होंठों पर जीत की मुस्कान लौटी, रतन ने संतोष से सिर हिलाया। ठीक उसी पल, दालान के दूसरे सिरे से, अमारा ने अपना गिलास बहुत धीरे से मेज़ पर रखा। और उस एक हल्की सी आवाज़ ने पूरे कमरे को ठिठका दिया।

"बहुत ख़ूबसूरत आँकड़े हैं, मिस्टर अहूजा। ... बस एक छोटा सा सवाल है, महज़ समझने के लिए। ये अस्सी करोड़ की एडवांस... आख़िर किस ख़रीदार से आई है?"

"एक कॉर्पोरेट ख़रीदार है, अमारा जी। एक कंपनी, जिसने थोक में कई फ़्लैट बुक किए हैं। ... निवेश के लिहाज़ से बिल्कुल पक्का सौदा।"

"नाम?" ... "रहने दीजिए, मैं ही बता देती हूँ। मेहरबान ट्रेडर्स। ... और वो कंपनी उसी पते पर रजिस्टर्ड है, जहाँ आपकी अपनी एक सप्लायर कंपनी बैठी है। ... यानी अहूजा ख़ानदान ने ख़ुद को ही अस्सी करोड़ की 'एडवांस' दी, और उसे 'माँग' कह कर इन भले लोगों के सामने परोस दिया।"

दालान की हवा बदल गई। इन्वेस्टरों की मुस्कानें एक एक कर के बुझने लगीं, कोनों में फुसफुसाहटें उठीं। समर का गला सूख गया। जो आँकड़ा उसने अभी छाती ठोक कर पढ़ा था, वो उसी के हाथों में झूठ बन कर पिघल रहा था। उसकी नज़र पीछे बैठे रतन चाचा की तरफ़ उठी।

और रतन चाचा वहीं बैठे थे, वही अवुंचल मुस्कान सजाए, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। पर मेज़ के सफ़ेद कपड़े पर, उनकी उँगलियाँ हौले हौले थाप देने लगीं। एक... दो... तीन। ये औरत ठीक उसी तिजोरी का ताला टटोल रही थी, जिसे रतन ने बरसों बंद रखा था।

"ये... ये आँकड़े मुझे..." ... "...मुझे ऐसे ही दिए गए थे। मुझे इसकी असल कहानी नहीं पता थी।" ... "अगर कोई ग़लती हुई है, तो मैं आप सबसे माफ़ी चाहता हूँ।"

और वहाँ, सौ अजनबियों के सामने, समर अहूजा को वो घूँट पीना पड़ा, जो उसने कभी अपनी बहू को पिलाया था। छह साल पहले उसने एक झूठ चुना था, और आज एक झूठ ने, सबके सामने, उसे नंगा कर दिया था। माथे पर पसीना था, और आँखों में एक शर्म, जो शायद उस बरसाती रात के बाद पहली बार इतनी गहरी थी।

"आप सब घबराइए मत।" ... "असल में, आपको तो हुमा का शुक्रगुज़ार होना चाहिए। हुमा ने ये ग़लती आज पकड़ ली, आपका पैसा डूबने से पहले। ... इस घर की एक बहुत पुरानी आदत है, सच पर झूठ का लिबास चढ़ा कर उसे परोसना। कभी किसी झूठे आँकड़े को, तो कभी..." ... "...किसी बेगुनाह के नाम को। ... पर झूठ की उम्र छोटी होती है। वो एक ना एक दिन, अपने ही घर की देहरी पर, लौट कर ज़रूर आता है।"

रागिनी के हाथ से गिलास छूटते छूटते बचा। 'किसी बेगुनाह के नाम को।' ये तो एक लेनदार की आम सी बात थी। पर रागिनी के कानों में वो लफ़्ज़ किसी और ही रात की तरफ़ खिंच गए, एक बरसाती रात की तरफ़, जब उसने ख़ुद एक बेगुनाह के नाम पर झूठ का लिबास चढ़ाया था। उसकी पीठ पर ठंडी लकीर उतर गई।

और फिर वही हुआ, जो अमारा चाहती थी। घबराए इन्वेस्टर मान गए कि जिस घर के हिसाब पर ख़ुद हुमा की नज़र हो, वो घर अब सुरक्षित है। माजी ने बढ़ कर अमारा का हाथ थाम लिया और काँपती आवाज़ में हुमा का शुक्रिया अदा किया। पूरा ख़ानदान उस औरत का एहसानमंद हो गया, जिसने अभी उन्हें सबके सामने नंगा किया था। बदले का पहला कौर, मुस्कुरा कर परोसा जा चुका था।

"आपने मुझे आज सबके सामने..." ... "...पर शायद आप सही थीं। ... अजीब बात है। जिस औरत ने अभी मुझे तार तार किया, उसी की बात में मुझे इतना सुकून क्यों है, जैसे बरसों बाद किसी ने मुझसे सच कहा हो।"

"सच हमेशा चुभता है, मिस्टर अहूजा। ... ख़ास कर उन्हें, जो झूठ को घर में इतनी जगह दे दें, कि सच बाहर बारिश में खड़ा रह जाए।"

समर उस लफ़्ज़ की गहराई पकड़ नहीं पाया, पर उसके सीने में कुछ हिला, जैसे किसी दफ़न ज़ख़्म ने करवट ली हो। और थोड़ी दूर खड़ी रागिनी अपने पति की नज़र को उस अजनबी के चेहरे पर टिकते देख रही थी। उसकी जलन और डर, दोनों सुलग उठे।

"आप बहुत होशियार हैं, अमारा जी। ... पर एक बात कान खोल कर सुन लीजिए। इस घर में होशियार औरतों का अंजाम कभी अच्छा नहीं होता। ... मैंने अपनी आँखों से एक को यहाँ से जाते देखा है।"

"हाँ, सुना है मैंने भी। ... एक बहू थी। जिसे इस घर ने चोर कह कर बारिश में फेंक दिया था। ... पर एक बात और भी सुनी है, रागिनी जी। कि इस घर से जो जाता है, वो कभी कभी... लौट कर भी आता है।"

रागिनी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। एक पल को लगा जैसे उसके सामने अमारा नहीं, कोई परछाईं खड़ी हो, जो छह साल से किसी अँधेरे कोने में उसके इंतज़ार में बैठी थी। फिर उसने ख़ुद को झिड़का। मरे हुए लौटते नहीं। ... पर डर, एक बार जाग जाए, तो आसानी से सोता नहीं।

दावत के शोर से हट कर, अमारा ने एक पल को अपनी क्लच खोली। अंदर, तह किया हुआ, वही एक काग़ज़ था। आरव की बनाई ड्रॉइंग, एक घर, एक माँ, और एक बिना चेहरे का पापा। उस पूरे पत्थर के महल में, पहली बार, उसकी आँखें नम हुईं। ये सारा बदला, आख़िर उसी एक नन्ही जान के लिए था। ... 'बस थोड़ा और, मेरे चाँद,' उसने मन ही मन कहा। 'माँ हर कौर चुका कर आएगी।'

और दालान के दूसरे कोने से, रतन चाचा उस औरत को देख रहे थे। मुस्कान अब भी वहीं थी, पर आँखों में एक ठंडक उतर आई थी। उन्हें अपने ही लफ़्ज़ याद आ गए, जो कुछ रातें पहले उन्होंने अपने आदमी से फ़ोन पर कहे थे। कि ये हुमा वाली बहुत पुराने सवाल पूछती है। एक बहू ट्रेन के साथ ग़ायब हुई थी। एक लेनदार भी हो सकती थी।

रात ढलने लगी। इन्वेस्टर एक एक कर के विदा लेने लगे, चेहरों पर वो भरोसा जो घंटे भर पहले नहीं था। ख़ानदान ने राहत की साँस ली। तूफ़ान टल गया था, और हुमा ने, अजीब तरह से, उन्हें डुबो कर ही बचा लिया था। माजी मुस्कुरा रही थीं, रागिनी मेहमानों को फाटक तक छोड़ने लगी थी।

और ठीक उसी वक़्त, जब आख़िरी मेहमान बाहर निकल रहे थे, भीड़ के उलट, एक आदमी अंदर आया। ना कोई इन्वेस्टर, ना कोई मेहमान। एक थका हुआ, अधेड़ आदमी, हाथ में घिसा चमड़े का बैग और एक पुरानी फ़ाइल। आँखों में वो सरकारी ठंडक, जो सवाल पूछने वालों की होती है। उसने सीधे ख़ानदान की तरफ़ क़दम बढ़ाया।

"माफ़ कीजिए, इतनी रात गए आने के लिए। ... मेरा नाम देसाई है, मैं एक इंश्योरेंस जाँचकर्ता हूँ। ... मैं छह साल पुराने एक मामले की फ़ाइल दुबारा खोल रहा हूँ। एक ट्रेन हादसा। और उस हादसे में लापता हुई, इसी घर की एक बहू।"

दालान की बची-खुची हँसी एक झटके में मर गई। वो नाम, जिसे इस घर ने छह साल से दफ़न कर रखा था, अचानक देहरी पर आ खड़ा हुआ था। माजी के चेहरे का रंग उड़ गया। रागिनी फाटक के पास जम गई। और समर, जो अभी एक ज़िल्लत झेल कर लौटा था, पत्थर हो गया।

"देखिए... उस हादसे में कई लाशें मिलीं, पर आपके ख़ानदान की उस बहू की लाश कभी नहीं मिली। और जब तक लाश ना मिले, क़ानून की नज़र में इंसान 'मरा हुआ' नहीं, बस 'लापता' होता है। ... इसीलिए वो फ़ाइल आज तक बंद नहीं हुई। और अब कंपनी उसे हमेशा के लिए बंद करना चाहती है।"

और फिर जाँचकर्ता ने अपनी क़लम खोली, और वो सवाल पूछा जिसका सच पूरे घर में सिर्फ़ एक इंसान जानता था, वो इंसान जो उसी दालान में पत्थर की तरह खड़ा था।

"मुझे बस एक बात, काग़ज़ पर, आप सबके दस्तख़त के साथ चाहिए। ... क्या आप पूरे यक़ीन से, हलफ़ उठा कर ये कह सकते हैं, कि आपकी बहू, तारा अहूजा, सच में मर चुकी हैं?"

पूरा दालान साँस रोक कर खड़ा रह गया। छह साल में पहली बार, किसी ने खुल कर वो नाम लिया था। तारा। और उस नाम पर, दालान के बीचोबीच खड़ी अमारा का ख़ून जम गया। जिस औरत के 'मरने' का हलफ़नामा ये लोग अभी देने वाले थे, वो ख़ुद, ज़िंदा, उन्हीं के बीच खड़ी थी। ... वो फ़ाइल जो अभी खुली थी, वो सिर्फ़ इंश्योरेंस का काग़ज़ नहीं थी। वो एक क़ब्र थी, जिसे कोई खोदने चला आया था। और अब उसमें से जो उठेगा, उसे दुबारा दफ़न करना, किसी के बस में नहीं था।

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