Chapter 23 of 30
माँ का दिल
अपने ही घर के ढहते झूठ के बीच माजी टूटने लगती हैं, और अमारा की फ़ाइल से गिरी एक बच्चे की चाँद वाली तस्वीर उनके अंदर एक बेनाम ममता जगा देती है। वो अमारा को शक से नहीं, एक अजीब मातम से अकेले घेरती हैं और पहली बार क़बूल करती हैं कि उन्होंने उस बहू को बारिश में फेंकने के लिए ख़ुद को कभी माफ़ नहीं किया; अमारा जिस औरत से नफ़रत करने छह बरस जी थी, उसी के सच्चे आँसू उसकी नफ़रत को उलझा देते हैं, जबकि कबीर चेताता है कि रतन का चुप हो जाना ही उसका सबसे ख़तरनाक होना है।
अहूजा हवेली की वो रात किसी ढहते हुए महल की तरह थी। ... कभी इन्हीं दीवारों पर चाँदी की तश्तरियाँ चमकती थीं और निर्मला अहूजा एक रानी की तरह इस घर पर राज करती थीं। पर आज गलियारे ख़ाली थे, आधे झाड़-फ़ानूस बुझे पड़े थे, और उस सूने घर में माजी अकेली, एक बुझती शमा की तरह भटक रही थीं। जिस इज़्ज़त की ख़ातिर उन्होंने एक बहू को बारिश में फेंका था, वो इज़्ज़त अब उन्हीं की उँगलियों से राख की तरह झर रही थी।
“सुनती हो?” ... “ये दीवारें अब मुझसे बातें करती हैं। हर कोने से एक ही नाम फुसफुसाता है, जिसे मैंने छह बरस पहले इस घर से मिटा दिया था।” ... “तारा। तारा। तारा। मेरा अपना बेटा समर उसी नाम पर घर का एक-एक पत्थर उखाड़ रहा है। मैंने जिसे दफ़नाया था, वो मेरी नींद में लौट लौट आती है।”
तभी दरवाज़े पर एक साया ठिठका। ... कबीर, वो बेटा जो बरसों पहले इसी घर की देहरी दुबारा ना लाँघने की क़सम खा कर गया था, आज उसी अँधेरे गलियारे में खड़ा था। वो माँ को रोशनी हाइट्स के काग़ज़ात देने आया था, पर उजड़ी हवेली में माँ को यूँ बड़बड़ाते देख उसके क़दम रुक गए। वो अब अमारा के साथ था, फिर भी उस टूटती औरत में उसे आज भी अपनी माँ दिखती थी।
“कबीर?” ... “तू आया। मेरा सच्चा बेटा आया।” ... “इस पूरे घर में एक तू ही था जो कभी झूठ नहीं बोला। तूने उस दिन भी कहा था कि तारा बेगुनाह है, और मैंने... मैंने तुझे घर से निकलते देखा और मुँह फेर लिया।” ... “आज सच बता, बेटा। क्या मैं सचमुच इतनी बुरी माँ थी?”
“मैं आपको रोशनी हाइट्स के काग़ज़ देने आया था, माजी। बस इतना ही, और आप जानती हैं मैं इस घर में क़दम नहीं रखता।” ... “पर आप पूछती हैं कि आप कैसी माँ थीं? आपने अपनी बहू को, जो पेट से थी, चोर कह कर बारिश में धकेल दिया, और उसके बाद छह बरस चैन से सोईं। ये सवाल मुझसे मत पूछिए, माजी। ये सवाल उस आईने से पूछिए जिसके सामने आप खड़ी नहीं हो पातीं।”
“आईना...” ... “मैं आईने के सामने खड़ी नहीं हो पाती। मैं छह बरस से अपनी ही आँखों से नज़र नहीं मिला पाई।” ... “समर ने पूरे घर के सामने चीख़ कर कह दिया कि तारा बेगुनाह थी। रागिनी को उसने चोर कह कर उसी देहरी से बाहर कर दिया, जैसे कभी हमने तारा को किया था। और मैं बीच में खड़ी बस देखती रह गई, कि जिस झूठ पर मैंने अपना पूरा घर खड़ा किया, वो एक-एक ईंट गिर रहा है।”
“सच कभी मरता नहीं, माजी।” ... “आप उसे ज़िंदा दफ़ना सकती हैं, पर वो नीचे मिट्टी में साँस लेता रहता है। और एक दिन वो ज़मीन फोड़ कर बाहर आ ही जाता है, ठीक उन्हीं लोगों के सामने जिन्होंने उसे दबाया था।” ... “आप डरी हुई हैं। पहली बार मैं आपको सचमुच डरा हुआ देख रहा हूँ। और डर हमेशा वहीं से उठता है, माजी, जहाँ हमने कुछ ज़िंदा दबा रखा हो।”
निर्मला ने काँपते हाथ से अपने पल्लू में छुपा एक मुड़ा-तुड़ा काग़ज़ निकाला। ... वो किसी बच्चे की क्रेयॉन से बनी तस्वीर थी, एक बड़ा पीला चाँद, नीचे एक औरत, और टेढ़े अक्षरों में लिखा 'मुम्मा।' कुछ रोज़ पहले हुमा की मीटिंग में ये अमारा की फ़ाइल से फिसल कर गिरा था, और निर्मला ने चुपके से उठा लिया। तब से वो उसे रात-रात भर देखती रहती थीं, बिना जाने क्यों।
“ये तस्वीर उस हुमा वाली औरत की फ़ाइल से गिरी थी।” ... “किसी बच्चे ने बनाई है। एक चाँद, एक माँ, और नीचे लिखा है 'मुम्मा।'” ... “कबीर, मैं इसे देखती हूँ और मेरे अंदर कुछ टूट जाता है। जैसे कोई बहुत पुरानी, खोई हुई गोद मुझे अंदर से खींचती हो। मैं इस बच्चे को जानती तक नहीं, फिर ये काग़ज़ का टुकड़ा मुझे रात भर सोने क्यों नहीं देता?”
“ये... ये तो सिर्फ़ एक बच्चे की तस्वीर है, माजी।” ... “एक चाँद, एक माँ। दुनिया का हर बच्चा यही बनाता है।” ... “आप बहुत थकी हुई हैं। ये घर, ये टूटता हुआ सब कुछ... आपका मन आपको हर कोने में वो ढूँढने पर मजबूर कर रहा है जो अब है ही नहीं। इसे छोड़ दीजिए, माजी।”
“नहीं।” ... “मुझे उस औरत से मिलना है, कबीर। अमारा से। बिल्कुल अकेले।” ... “जब से वो इस घर में आई है, मैं उसका चेहरा देखती रह जाती हूँ। कोई है उसमें। कोई जिसे मैं जानती हूँ, कोई जिसे मैंने खोया है। तू मुझे पागल कह ले, बेटा, पर एक माँ का दिल यूँ बेवजह नहीं धड़कता।”
कबीर काग़ज़ मेज़ पर रख कर, कुछ और कहे बिना, बाहर निकल गया। ... पर उस रात जो डर वो साथ ले गया, वो रतन की किसी धमकी से कहीं भारी था। उसकी माँ, जिसने तारा को सबसे बेरहमी से ठुकराया, अब उसी तारा के चेहरे के गिर्द घूम रही थी, एक ऐसे दर्द के साथ जो झूठा नहीं था। और अमारा, जो इस औरत से नफ़रत करने के लिए छह बरस जी थी, अब उसी के सामने जाने वाली थी।
हुमा के बेनाम दफ़्तर में देर रात, कबीर उस औरत के सामने खड़ा था जो दुनिया के लिए अमारा थी, और सिर्फ़ उसके लिए तारा। ... यहाँ, इन्हीं दीवारों के अंदर, वो अपना मुखौटा उतार सकती थी। पर आज कबीर के चेहरे पर वो सुकून नहीं था जो उसे सिर्फ़ इसी कमरे में मिलता था। वो माँ की उजड़ी आँखें और उस बच्चे की तस्वीर, दोनों साथ ले आया था।
“तारा, रतन चुप है।” ... “छह हफ़्तों से वो हर मीटिंग में लड़ता, ऑडिट अटकाता आया है, हर मोड़ पर ज़हर उगलता आया है। और अचानक, दो रातों से, वो एकदम शांत है। मुस्कुरा रहा है, हर बात मान रहा है।” ... “मैं उस आदमी को बचपन से जानता हूँ। रतन चाचा जब चीख़ते हैं, तब वो सबसे कम ख़तरनाक होते हैं। जब वो यूँ चुप हो जाएँ, तब समझ लो कि कुदाल उठ चुकी है और अब सिर्फ़ गिरनी बाक़ी है।”
“जानती हूँ।” ... “रतन को पता है मैं कौन हूँ, रागिनी उसके पास है, और वो दोनों अब एक मेज़ पर हैं। ये ख़ामोशी किसी तूफ़ान से पहले वाली है।” ... “पर मेरे हाथ में उस रिकॉर्डिंग की कॉपी है जिसमें रतन ख़ुद मुझे मारने का हुक्म देता है। बटरा ज़िंदा है, तेरे अपने पहरे में। देसाई की फ़ाइल आज भी खुली है। रतन का हर पत्ता मेरी मेज़ पर पड़ा है, कबीर। जो इतना चुप है, वो अंदर से उतना ही डरा हुआ भी है।”
“सिर्फ़ रतन नहीं, तारा।” ... “माजी बिखर रही हैं, तुम्हारे चेहरे के गिर्द घूम रही हैं। उन्हें शक नहीं, पर एक दर्द है, एक टूटन, और वो तुमसे अकेले मिलना चाहती हैं।” ... “जो औरत तुम्हें अपनी नफ़रत में नहीं पहचान पाई, वो तुम्हें अपनी ममता में पहचान सकती है। मत जाओ, तारा। कम से कम आज अकेली मत जाओ।”
“छह बरस, कबीर।” ... “छह बरस मैंने इसी एक घड़ी का इंतज़ार किया है। कि जिस औरत ने मुझे पेट से, बारिश में, चोर कह कर सड़क पर फिंकवा दिया, मैं एक दिन उसकी आँखों में सीधे देखूँ।” ... “तुम मेरे लिए डरते हो, और यही एक चीज़ है जो मुझे आज भी कहीं तारा बनाए रखती है। पर मुझे उस कमरे में जाना ही होगा। कुछ हिसाब आमने-सामने बैठ कर ही चुकते हैं।”
कबीर की उँगलियाँ एक पल को उसकी उँगलियों में उलझीं, फिर धीरे से छूट गईं। ... वो जानता था कि उसे रोकना नामुमकिन है। जिस औरत ने राख से उठ कर पूरे ख़ानदान को घुटनों पर ला दिया, वो अपनी सबसे पुरानी दुश्मन से मिलने से नहीं रुकने वाली थी। अगली शाम, ढलते सूरज की सुर्ख़ रौशनी में, अमारा उसी हवेली की उसी बैठक में दाख़िल हुई, जहाँ माजी उसका इंतज़ार कर रही थीं।
बैठक में सिर्फ़ एक दीया जल रहा था, और उसकी काँपती लौ में माजी बहुत छोटी, बहुत बूढ़ी लग रही थीं। ... वो अमारा, जो हमेशा ठंडी और अभेद्य अंदर आती थी, आज देहरी पर एक पल ठिठक गई। ये वही कमरा था, वही संगमरमर का फ़र्श, जहाँ से छह बरस पहले उसे बालों से घसीटा गया था। पर उसने अपनी साँस साधी, अपना मुखौटा और कस लिया, और अमारा बन कर अंदर चली गई।
“आप आईं। शुक्रिया।” ... “मैं जानती हूँ आप हुमा की मालकिन हैं, और मैं एक डूबते घर की एक बूढ़ी औरत। आपके पास मेरे लिए वक़्त नहीं होना चाहिए।” ... “पर मुझे आपसे किसी क़र्ज़ की बात नहीं करनी। मुझे एक ऐसी बात कहनी है जो मैंने छह बरस से किसी से नहीं कही। अपने बेटों से भी नहीं।”
“कहिए, माजी।” ... “मेरे पास वक़्त की कमी ज़रूर है। पर जो बात छह बरस से किसी के सीने में दबी हो, उसे सुनने के लिए मैं रुक सकती हूँ।” ... “वैसे भी, मेरा काम तो पुराने हिसाब सुनना ही है। और जो हिसाब कभी चुकते नहीं, माजी, वही सबसे भारी होते हैं।”
“मेरे घर में एक बहू थी। तारा।” ... “वो पेट से थी, मेरे ख़ानदान का चिराग़ अपने अंदर लिए। और एक रात, चोरी के झूठे इल्ज़ाम पर, मैंने अपने ही हाथों उसे बारिश में धकेलवा दिया। उसकी एक ना सुनी। मुझे अपने घर की इज़्ज़त उस बच्ची की जान से ज़्यादा प्यारी थी।” ... “उसी रात वो एक हादसे में खो गई। मैं आज भी हर रात उसी बारिश में भीगती हूँ, बेटा। मैंने एक ही झटके में एक माँ को, और उसके अनजन्मे बच्चे को, मार दिया।”
“कुछ क़र्ज़ माफ़ी से नहीं चुकते, माजी।” ... “आप ये सब उस औरत की माफ़ी की उम्मीद में कह रही हैं। पर जिसका ये क़र्ज़ है, वो इस मेज़ पर बैठी नहीं है। वो अब भी उसी बारिश में है, उसी अँधेरे में है जहाँ आपने उसे मरने के लिए छोड़ा था।” ... “और ऐसे क़र्ज़ जीते-जी माफ़ नहीं होते, माजी। वो सूद समेत वसूले जाते हैं। एक-एक साँस पर, एक-एक रात पर।”
अमारा ने छह बरस इस औरत से नफ़रत करने में गुज़ारे थे। ... उसने सोचा था कि इस औरत के सामने उसकी आँखों में सिर्फ़ बर्फ़ होगी। पर सामने बैठी वो कोई घमंडी रानी नहीं, एक टूटी हुई बूढ़ी माँ थी, जिसके आँसू झूठे नहीं थे। और तारा ने ख़ुद को एक ख़तरनाक कमज़ोरी से लड़ते पाया, उस औरत के लिए एक बूँद तरस, जिसे वो सिर्फ़ जलता हुआ देखना चाहती थी।
“और अब...” ... “अब ये तस्वीर मेरा पीछा करती है। ये आपकी ही फ़ाइल से गिरी थी, अमारा। किसी बच्चे की बनाई, एक चाँद, और एक माँ।” ... “मैं इसे देखती हूँ और मेरी सूनी गोद दुखने लगती है, जैसे कभी कोई बच्चा इसमें रहा हो जिसे मैंने सीने से नहीं लगाया। ये किसका बच्चा है, बेटा? और इसका चाँद मुझे मेरी खोई तारा की इतनी शिद्दत से याद क्यों दिलाता है?”
“वो...” ... “वो सिर्फ़ एक बच्चे की तस्वीर है, माजी। एक चाँद, एक माँ। इसमें आपकी तारा कहीं नहीं है।” ... “आप थकी हुई हैं, और थका हुआ दिल मुर्दों को हर चेहरे में ढूँढता है। जो चला गया, वो लौट कर नहीं आता। ये आपको मान लेना ही होगा, माजी। अपने ही सुकून के लिए।”
पर माजी ने वो मानने से इनकार कर दिया। ... वो धीरे से उठीं, दीये की लौ पार कर के अमारा के क़रीब आईं, और उससे पहले कि अमारा पीछे हटती, उन्होंने उसका हाथ अपने दोनों बूढ़े, काँपते हाथों में थाम लिया। हफ़्तों से जिस चेहरे को वो टोहती रही थीं, आज उसे बिल्कुल पास से यूँ पढ़ा जैसे कोई खोया हुआ पन्ना पढ़ रही हों। और फिर, एक काँपती फुसफुसाहट में, उन्होंने वो कह दिया जिससे अमारा की रूह जम गई।
“तुम्हारी आँखें...” ... “तुम्हारी ये आँखें बिल्कुल उसी की जैसी हैं, बेटा।” ... “मेरी तारा की आँखें... हूबहू, बिल्कुल तुम्हारी इन्हीं आँखों जैसी थीं।”
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