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Chapter 13 of 30

काँपते हाथ

राख से उठी by Avni Oberoi

रात की उस सुनसान सड़क पर हुमा की गाड़ी अँधेरे को चीरती भागी जा रही थी, वाइपर पागलों की तरह बारिश से लड़ रहे थे, और शीशे के उस पार दुनिया सिर्फ़ पानी और काली धुंध थी। ... स्टीयरिंग पर कबीर के हाथ कसे हुए थे, और बग़ल की सीट पर अमारा फ़ोन को यूँ थामे बैठी थी जैसे वो कोई जलती हुई फ़ितील हो। ... छह बरस पहले एक ट्रेन उस तक पहुँच गई थी। आज रात, वो एक गाड़ी से पहले, एक आदमी तक पहुँचना चाहती थी।

"तुम मुझे रोक नहीं सकती थीं, अमारा। ... जिस पल बेला ने बताया कि तुम आधी रात एक अनजान क़स्बे की तरफ़ अकेली निकल रही हो, उसी पल मैंने गाड़ी की चाबी उठा ली।" ... "इस ख़ानदान ने पहले भी एक औरत को अकेली, अँधेरी रात में मरने के लिए छोड़ दिया था। ... मैं दुबारा वो होते हुए नहीं देख सकता।"

"मैं वो औरत नहीं हूँ, मिस्टर अहूजा। ... मैं वो हूँ जिसके एक दस्तख़त से तुम्हारे ख़ानदान की साँसें रुक जाती हैं।" ... "और मैंने तुम्हें रोका नहीं, तो सिर्फ़ इसलिए, कि जिस गाड़ी का हम पीछा कर रहे हैं, उस पर अहूजा का नाम लिखा है। ... ज़रूरत पड़ी, तो एक अहूजा ही उसे रोक सकता है। बस इतना।"

"तुम एक फ़ोन कर के पुलिस को क्यों नहीं भेज देतीं, अमारा? ... वो आदमी उसी सड़क पर कहीं रुक जाएगा।"

"क्योंकि जिस मुल्क में एक ईमानदार बहू को चोर बना कर बारिश में फेंक दिया जाता है, उस मुल्क की पुलिस एक ख़रीदे हुए बूढ़े मुनीम को नहीं बचाती, कबीर।" ... "रतन का वकील सुबह होने से पहले उसे थाने से निकाल लेगा, या हमेशा के लिए चुप करा देगा। ... बटरा को कठघरा नहीं, हुमा की ढाल चाहिए। ... और वो ढाल सिर्फ़ मैं हूँ।"

तभी फ़ोन की स्क्रीन एक बार और जगमगाई, और बेला की आवाज़ स्पीकर पर गूँज उठी, आधी बारिश की गड़गड़ाहट में डूबी हुई। ... दिल्ली में हुमा के दफ़्तर से वो अकेली उस पूरी रात की डोर अपने हाथ में थामे बैठी थी, एक सिरे पर अमारा, दूसरे पर रतन का आदमी, और बीच में एक चढ़ती हुई नदी।

"अमारा, सुन। ... रतन का आदमी तुमसे पूरा एक घंटा आगे था, पर आज उसकी क़िस्मत भी वही है जो तुम्हारी।" ... "क़स्बे से पहले जो नदी पड़ती है, उस पर का पुराना पुल पानी में डूब रहा है। ... मौसम वाले कह रहे हैं, सुबह से पहले पानी नहीं उतरेगा। ... यानी आज रात ना उसका आदमी बटरा तक पहुँचेगा, ना तुम। कुदरत ने दोनों शिकारियों को एक ही कीचड़ में फँसा दिया है।"

"इसलिए आज रात कहीं रुक जा, अमारा। पुल के इस तरफ़ कोई छत ढूँढ, और एक रात साँस ले।" ... "और हाँ... आरव सो गया है। ... तेरी वो पुरानी फ़ोटो सीने से लगा कर, जिसमें तू हँस रही है। ... मैंने कहा मुम्मा काम से लौटेगी, तो मुस्कुरा कर सो गया।"

"तो बटरा आज रात सिर्फ़ इसलिए ज़िंदा है क्योंकि एक नदी चढ़ गई।" ... "और सुबह जिसका पानी पहले उतरेगा, वो पहले पहुँचेगा। ... मुझे सूरज से पहले उस पुल पर होना है, बेला।"

अमारा कुछ और कहती, उससे पहले लाइन कट गई। ... स्क्रीन पर सिग्नल की आख़िरी लकीर भी बुझ गई, और अब उस गाड़ी के अंदर सिर्फ़ दो लोग बचे थे, बारिश, अँधेरा, और वो सारी बातें जो छह बरस से दोनों के बीच अनकही खड़ी थीं।

पुल से थोड़ा पहले सड़क ख़त्म हो गई। ... हेडलाइट की रौशनी में आगे सिर्फ़ काला, बहता पानी था, जिस पर बारिश की बूँदें चाँदी के काँटों की तरह गिर रही थीं। ... एक अकेला ढाबा, टिमटिमाती एक बत्ती, और उसके पीछे एक छोटा सा कमरा, इस पूरी काली रात में इंसानों की यही आख़िरी निशानी थी।

"ढाबे वाले ने कहा, ऊपर एक कमरा है। ... एक ही कमरा।" ... "और उसकी छत ऐसी टेढ़ी है जैसे किसी बच्चे ने आँख बंद करके बनाई हो। ... पर आज रात इस पूरे मुल्क में यही हमारी सबसे बड़ी हवेली है, अमारा। इसी में गुज़ारा करना होगा।"

कमरा छोटा था, एक झूलती हुई पीली बत्ती, एक टूटी खाट, कोने में मिट्टी का घड़ा। ... छत के एक कोने से पानी टप टप टपक रहा था, और कबीर ने बेख़याली में उसके नीचे एक ख़ाली बर्तन सरका दिया, ठीक वैसे जैसे बरसों पहले उसी हवेली में कोई और किया करती थी। ... अमारा की नज़र उस बर्तन पर ठिठक गई, और एक पल के लिए उसका मुखौटा काँप उठा।

"ये लो। चाय है। ... ढाबे वाले ने भेजी है, कड़क और मीठी।" ... "पूरी रात जागना ही है, तो कम से कम कुछ गरम पेट में तो जाए। ... इस कमरे में बस यही एक चीज़ है जो ठंडी नहीं है।"

"शुक्रिया।" ... "तुम खाट पर आराम कर लो। मुझे सोना नहीं है।" ... "मुझे तो कभी सोना नहीं होता।"

कबीर खाट पर नहीं बैठा। ... वो उस झूलती बत्ती के नीचे खड़ा उस औरत को देखता रहा, जो खिड़की से लगी बाहर के अँधेरे को घूर रही थी, और जिसकी पीठ छह बरस की थकन से झुकी थी। ... वो जानता था कि आज रात, इस बंद कमरे में, इस बहती नदी के किनारे, वो बात कहने का वक़्त आ गया था, जो वो महीनों से अपने सीने में दबाए घूम रहा था।

"मैं तुम्हें एक कहानी सुनाना चाहता हूँ, अमारा। ... एक बहू की कहानी।" ... "छह बरस पहले उस घर में एक लड़की ब्याह कर आई थी। सबसे हँस कर मिलती थी, नौकरों को नाम से बुलाती थी, और शाम को छत पर खड़ी हो कर चाँद को यूँ देखती थी जैसे उससे कोई पुराना वादा हो।"

"मैं उस घर का इकलौता आदमी था जो जानता था कि वो चोर हो ही नहीं सकती। ... और मैं ही वो इकलौता आदमी था जिसने उसे बचाने के लिए कुछ नहीं किया।" ... "जिस रात उसे बारिश में घसीटा गया, मैं दिल्ली में नहीं था। मुझे ख़बर तब मिली जब सब ख़त्म हो चुका था।"

"और फिर मैं भाग गया, अमारा। इस पूरे ख़ानदान से, उस घर से, अपने आप से।" ... "क्योंकि मैं उस आईने में अपनी शक्ल नहीं देख सकता था, जिसमें एक बेगुनाह भाभी अकेली बारिश में मर रही थी, और उसका देवर कहीं दूर, आराम से सो रहा था।"

अमारा की पीठ अब भी उसकी तरफ़ थी, पर खिड़की के ठंडे काँच पर टिके उसके हाथ काँप रहे थे। ... छह बरस में उसने अपने चेहरे को पत्थर करना सीख लिया था, पर हाथों को नहीं। ... हाथ हमेशा सच बोल देते थे। कबीर की नज़र उन काँपते हाथों पर जा टिकी, और उसकी अपनी आवाज़ भी काँप गई।

"तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं, अमारा।" ... "पहली बार भी काँपे थे, जब रोशनी हाइट्स की फ़ाइल से गिरी वो बच्चे की 'मेरे पापा' वाली ड्रॉइंग तुमने उठाई थी। ... और उस अँधेरे बहीखाना कमरे में भी, जब तुमने बेख़याली में वो लोरी गुनगुनाई थी। ... चाँद वाली लोरी।"

"कबीर, बस।" ... "तुम नहीं जानते तुम क्या कह रहे हो।"

"जानता हूँ। ... उस रात मैं हवेली गया, अमारा, और मैंने पुराना एल्बम खोला।" ... "मैंने भाभी की आख़िरी तस्वीर निकाली, और उसे साइट से चुराई तुम्हारी तस्वीर के बराबर रख दिया। ... और उन दो चेहरों के बीच के छह बरस, राख की तरह, भरभरा कर झड़ गए।"

"मैं जानता हूँ तुम कौन हो। ... शायद उसी दिन से जानता हूँ जिस दिन तुमने पहली बार उस घर की देहरी लाँघी थी, और मेरा दिल बिना किसी वजह के एक पल को ठहर गया था।" ... "तुम अमारा नहीं हो। ... तुम तारा हो। मेरी भाभी। वो लड़की जिसे ये ख़ानदान मार कर भी नहीं मार पाया।"

कमरे में सिर्फ़ बारिश की आवाज़ थी, और उस टपकते बर्तन में गिरती बूँदों की टप, टप, टप। ... छह बरस में पहली बार किसी ने उसका असली नाम, उसके अपने चेहरे के सामने खड़े हो कर पुकारा था। ... और वो नाम, तारा, उसकी सारी बर्फ़ में एक लंबी, गहरी दरार की तरह उतर गया।

"तुमने ये किसी और से कहा?" ... "बेला से? समर से? इस घर के किसी एक इंसान से?"

"किसी से नहीं। ... छह बरस मैं इस ख़ानदान के मुँह पर एक बात कहने को तरसा, कि तुमने ग़लत किया, कि वो बेगुनाह थी।" ... "और अब जब वो बेगुनाह मेरे सामने ज़िंदा खड़ी है, तो मैं उसे उन्हीं भेड़ियों के हवाले कर दूँ? ... मैं मर जाऊँगा, तारा, पर तुम्हारा नाम अपने होंठों से बाहर नहीं जाने दूँगा।"

तारा। ... दूसरी बार उसने वो नाम कहा, और इस बार अमारा का मुखौटा पूरी तरह फिसल गया। ... वो औरत जो बोर्डरूम में सौ लोगों को एक नज़र से बर्फ़ बना देती थी, इस टूटे कमरे में, एक अकेली झूलती बत्ती के नीचे, धीरे धीरे फिर से तारा हो रही थी।

"तुम्हें पता है, छह बरस में मुझे किसी ने तारा कह कर नहीं बुलाया?" ... "कुसुम माँ 'बेटी' कहती थीं। बेला 'अमारा' कहती है। आरव 'मुम्मा'।" ... "तारा तो उसी रात मर गई थी, कबीर। उसे उसी ख़ानदान ने बारिश में दफ़ना दिया था। ... जो लौटी है, वो सिर्फ़ उसकी राख है।"

"तो आज रात मुझे बुलाने दो। ... सिर्फ़ इस कमरे में, सिर्फ़ इस एक रात के लिए।" ... "तारा।"

"और ये मत कहो कि तुम सिर्फ़ राख हो।" ... "मैंने राख देखी है, तारा। राख ठंडी होती है, बुझी हुई। ... और तुम... तुम अब भी जल रही हो। इतनी तेज़, कि पास खड़ा आदमी भी झुलस जाए।"

"वो बच्चा... आरव।" ... "उस दिन साइट पर जब वो मेरी गोद में आ गिरा, तो लगा जैसे बरसों बाद किसी ने मेरे सीने की कोई बंद खिड़की खोल दी हो। ... वो तुम्हारा है, तारा। और मुझे लगता है, वो इस घर का भी कुछ लगता है। ... है ना?"

"वो सिर्फ़ मेरा है।" ... "किसी और का नहीं। ना उस घर का, ना उस नाम का, ना उस ख़ून का।" ... "तुमने मेरा नाम अपने सीने में दफ़ना रखा है ना, कबीर? ... तो उस बच्चे को उसी क़ब्र में, सबसे नीचे दबा देना। ... उसकी हर साँस इसी ख़ामोशी में बँधी है। एक लफ़्ज़ फिसला, और उन्हीं भेड़ियों को उसका पता मिल जाएगा।"

"ठीक है। ... वो सिर्फ़ तुम्हारा है। ... और उसका नाम मेरे साथ उसी क़ब्र में दफ़न रहेगा।" ... "पर एक बात सुन लो, तारा। छह बरस पहले मैं तुम्हारे लिए खड़ा नहीं हुआ। ... आज मैं खड़ा हूँ। तुम्हारे साथ। हर उस आदमी के ख़िलाफ़, जिसे मैं कभी अपना ख़ून कहता था।"

बाहर बारिश और तेज़ हो गई, और वो दोनों अब एक दूसरे से सिर्फ़ एक साँस की दूरी पर खड़े थे। ... छह बरस का ग़म, छह बरस का अपराधबोध, और वो भूख जिसे दोनों ने आज तक कोई नाम नहीं दिया था, सब उस छोटे से कमरे में एक साथ उमड़ आए। ... कबीर का काँपता हाथ धीरे धीरे उठा, और उसकी उँगलियाँ तारा के जबड़े की लकीर को छू गईं।

"छह बरस मैंने तुम्हें मरा समझ कर मातम किया, तारा।" ... "और अब, जब तुम मेरे सामने साँस ले रही हो, तो लगता है मैं छह बरस से नहीं, पूरी उम्र से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था। ... या तो मुझे रोक लो। ... या मुझे इजाज़त दे दो।"

एक पल के लिए तारा की आँखें बंद हो गईं। ... उसका चेहरा उसकी तरफ़ झुका, उसकी साँस उसकी साँस से टकराई, और छह बरस में पहली बार वो किसी की गर्मी की तरफ़ झुकी, ना मालकिन की तरह, ना क़ातिल की तलाश में, बस एक औरत की तरह जो बहुत देर से ठंडी पड़ी थी। ... और ठीक उसी पल, कहीं बहुत गहरे, आरव का सोता हुआ चेहरा, और रतन की उँगलियों की वो थाप, एक, दो, तीन, उसकी बंद आँखों के पीछे कौंध गई।

"नहीं।" ... "मैं यहाँ मोहब्बत के लिए नहीं लौटी, कबीर।" ... "मैं उन लोगों को दफ़नाने लौटी हूँ जिन्हें तुम अपना ख़ानदान कहते हो। ... एक एक कर के। ... और जो मेरे साथ इस रास्ते पर चलेगा, उसे उन्हीं की क़ब्रें खोदनी होंगी, अपने ही हाथों से।"

"तो अब फ़ैसला कर लो, कबीर अहूजा।" ... "उस ख़ून को चुनो, जिसने मुझे मारा। ... या उस राख को, जो उन सबको जला कर ही चैन लेगी। ... दोनों एक साथ तुम्हारे नहीं हो सकते।"

कबीर का काँपता हाथ हवा में वहीं जम गया, तारा के चेहरे से बस एक इंच की दूरी पर। ... बाहर नदी चढ़ रही थी, पुल पानी में डूब रहा था, और उस टूटे कमरे में एक औरत अपने ही टूटते दिल पर बर्फ़ की एक और परत जमा रही थी। ... उसने अपना सबसे पुराना हथियार फिर उठा लिया था, वो जो मोहब्बत तक को हिसाब के तराज़ू में तौल देता है। ... अब फ़ैसला कबीर के हाथ में था, और उस काली, बहती रात में उसके पास सुबह तक का वक़्त था, ये तय करने के लिए, कि वो अपने ख़ून के साथ खड़ा हो, या उस औरत के साथ जो उन सबको राख कर देगी।

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