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Chapter 11 of 30

झूठे काग़ज़

राख से उठी by Avni Oberoi

बहीखाना कमरे के दरवाज़े पर अब अहूजा ख़ानदान की नहीं, हुमा कैपिटल के फ़ॉरेंसिक ऑडिट की मुहर लगी थी। ... दस बरस का हर लेनदेन उस मेज़ पर खुला पड़ा था, और सिरहाने रतन चाचा हाथ जोड़े मुस्कुरा रहे थे। ... इस घर में सिर्फ़ एक आदमी अब जानता था कि ये लेनदार असल में कौन है, पर कबीर आज यहाँ नहीं था। ... आज मेज़ के दोनों तरफ़ बस शिकारी और शिकार बैठे थे, दोनों मुस्कुराते हुए।

"दस बरस, चाचा जी। ... मुझे पिछले दस बरस का हर एक लेनदेन चाहिए, मिलान किया हुआ, और हर पन्ने पर आपके अपने दस्तख़त के साथ।" ... "इस महीने के आख़िर तक। ... वरना हुमा अगली सुबह पूरा क़र्ज़ वापस माँग लेगी, और ये हवेली नीलाम की फ़ेहरिस्त में सबसे ऊपर होगी।"

"अरे बेटी, इतनी जल्दी क्या है? ... दस बरस के काग़ज़ हैं, कोई एक रात की बात तो नहीं।" ... "और फिर, इतनी पुरानी बातें कुरेदने से मिलेगा भी क्या? ... कुछ हिसाब वक़्त के साथ अपने आप बंद हो जाते हैं, बेटी। ... उन्हें बंद ही रहने देना चाहिए।"

और उसी वक़्त, मेज़ की उस ठंडी संगमरमरी सतह पर, रतन चाचा की उँगलियों ने वो पुरानी थाप दी। ... एक... दो... तीन। ... तारा ने वो थाप छह बरस पहले भी सुनी थी, ठीक उस रात, जब इसी घर ने उसे चोर कहा था। ... मेज़ के नीचे उसकी अपनी उँगलियाँ मुट्ठी में जकड़ गईं, पर उसका चेहरा बर्फ़ की तरह सपाट रहा।

"जो हिसाब अपने आप बंद हो जाते हैं, चाचा जी, वो अक्सर किसी के दबा देने से बंद होते हैं।" ... "और मैं अधूरे हिसाब बर्दाश्त नहीं करती। ... ना काग़ज़ों में, ना ज़िंदगी में।"

"अमारा जी, चाचा जी शायद ठीक कह रहे हैं, इतने पुराने काग़ज़ इकट्ठा करने में..." ... "पर अगर आपको हर पन्ना चाहिए, तो मैं ख़ुद निकलवा दूँगा। ... इस घर के पास छुपाने को कुछ नहीं है।"

"अच्छा। ... तो आप ही निकलवाइए, मिस्टर अहूजा। हर एक पन्ना, अपने हाथ से।" ... "फिर देखते हैं, इस घर के पास छुपाने को सच में कुछ नहीं है... या बहुत कुछ है।"

"आप बहुत... पुराने सवाल पूछती हैं, अमारा जी।" ... "इस घर में एक बात सीखने वाली है। ... जो लोग बहुत गहरे तक खोदते हैं, उन्हें कभी कभी वहीं दफ़्न भी होना पड़ता है।" ... "ख़ैर। महीने के आख़िर तक हो जाएगा, बेटी। आप फ़िक्र मत कीजिए।"

रतन चाचा उस कमरे से यूँ निकले जैसे कोई थका बूढ़ा, पर उनके दिमाग़ में एक पुराना नक़्शा फिर खुल चुका था। ... उस हिसाब में मेहरबान ट्रेडर्स का धागा सीधे उन्हीं तक पहुँचता था। ... उसे काटने का उनके पास एक ही आज़माया हुआ तरीक़ा था। ... एक मुर्दा औरत, जो अब सफ़ाई देने वापस नहीं आ सकती थी। कम से कम, उन्हें यही यक़ीन था।

उसी रात, रतन चाचा ने समर को अपने उसी अँधेरे कमरे में बुलाया, जहाँ छह बरस पहले एक मासूम बहू के नाम पर पहली झूठी मुहर लगी थी। ... मेज़ पर एक पुरानी फ़ाइल रखी थी, धूल से पीली पड़ी, और चाचा उस पर हाथ यूँ रखे बैठे थे जैसे कोई किसी क़ब्र के पत्थर पर रखता है।

"बैठो, बेटा। ... ये हुमा वाली औरत दस बरस का हिसाब माँग रही है, और उनमें कुछ साल हमारे हक़ में नहीं जाएँगे।" ... "पर घबराने की बात नहीं। हमारे पास एक जवाब है, जो हमेशा से था।" ... "मेहरबान ट्रेडर्स का सारा हिसाब तारा के नाम पर खुला था, उसी ने वो शेल कंपनी बनाई। ... बस यही ऑडिटरों को बता देना, और फ़ाइल बंद।"

"फिर से तारा?" ... "चाचा जी, उस औरत को मरे पूरे छह बरस हो गए। हम एक बार उसे चोर कह कर बारिश में फेंक चुके हैं। ... अब फिर, एक मुर्दा औरत के सिर पर..." ... "मुझे... मुझे ये ठीक नहीं लगता।"

"ठीक और ग़लत बाद में सोचना, बेटा। पहले घर बचाओ।" ... "और सुन। वो बीमा वाला देसाई तारा के मरने का सबूत माँग रहा है ना? ... हम उसे भी यही देंगे। अदालत में एक ही काग़ज़ पर उसे मुर्दा भी घोषित कर देंगे, और चोर भी। ... एक तीर से दो शिकार।" ... "तारा को अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। मुर्दे बेआबरू नहीं होते।"

"पर चाचा जी, एक बात मुझे आज तक समझ नहीं आई।" ... "जिस औरत पर हमने अस्सी लाख की चोरी का इल्ज़ाम लगाया, वो तो मंदिर के चढ़ावे में अपनी चूड़ियाँ तक उतार कर रख देती थी। ... जिसके पास अपना कुछ नहीं था, उसने इतना बड़ा हाथ कैसे मारा?" ... "ये सवाल छह बरस से मेरे सीने में गड़ा है।"

"वो सवाल तुम्हें छह बरस पहले पूछना चाहिए था, समर। उस रात, जब तुम एक दूसरी औरत की बाँहों में थे।" ... "अब बहुत देर हो चुकी है। अब सिर्फ़ एक रास्ता है, और वो इस फ़ाइल में। ... ले जाओ, पढ़ो, और वही कहना जो ख़ानदान के हक़ में हो। ... तुम बड़े बेटे हो। अपना फ़र्ज़ निभाओ।"

समर वो पीली फ़ाइल ले कर अपने कमरे लौट आया, पर उस रात उसे नींद नहीं आई। ... छह बरस से उसने ख़ुद को यही यक़ीन दिलाया था कि तारा चोर थी, क्योंकि उस यक़ीन के बिना अपने ही गुनाह का बोझ उठाना नामुमकिन था। ... पर आज पहली बार, उस यक़ीन की मोटी दीवार में एक बाल जितनी बारीक दरार पड़ गई थी। ... और दरारें, ठीक तारा की तरह, कभी अपने आप बंद नहीं होतीं।

अगली सुबह समर वो फ़ाइल ले कर अमारा के पास पहुँचा। ... वो ख़ुद नहीं जानता था कि वो उसकी मंज़ूरी लेने आया है, या उसकी नज़रों में गिरने से डरता है। ... छह बरस पहले उसने एक औरत को बिना सुने सज़ा दे दी थी, और अब इस अजनबी के सामने उसे लगता था जैसे कोई उसे तराज़ू में तौल रहा हो।

"अमारा जी, ऑडिट के लिए ख़ानदान की तरफ़ से एक सफ़ाई तैयार है।" ... "मेहरबान ट्रेडर्स का पूरा मामला... एक पुरानी मुलाज़िम के नाम पर था, जो अब नहीं रही। ... चाचा जी कहते हैं, बस इतना रिकॉर्ड में डाल दें, और मामला बंद।" ... "आप क्या कहती हैं?"

"आप एक मरे हुए नाम पर बहुत भरोसा कर रहे हैं, मिस्टर अहूजा।" ... "फ़ॉरेंसिक ऑडिट सफ़ाई नहीं सुनता, सबूत पढ़ता है। ... मेहरबान का हिसाब किसी और के नाम था, तो मुझे उस नाम के पीछे का हर असली काग़ज़ चाहिए। हर तबादला, हर तारीख़।" ... "पूरा रिकॉर्ड निकालिए। अधूरे काग़ज़ किसी को नहीं बचाते।"

"आप... आप इस घर के बाक़ी सब से अलग हैं, अमारा जी।" ... "यहाँ हर कोई चाहता है कि ये बात दब जाए। आप अकेली हैं जो कहती हैं, खोदो, और सच निकालो। ... छह बरस पहले अगर कोई ऐसा कहने वाला होता..." ... "माफ़ कीजिए। ये आपका मसला नहीं है।"

"एक मुर्दे पर इल्ज़ाम लगाना सबसे आसान काम है, मिस्टर अहूजा। ... क्योंकि मुर्दे अदालत में सफ़ाई नहीं देते।" ... "पर हर झूठे काग़ज़ के पीछे एक ज़िंदा हाथ होता है, जिसने उसे गढ़ा। ... और हाथ, नामों के उलट, हमेशा ज़िंदा रहते हैं। ... आप मुर्दे को खोदना बंद कीजिए, और उस हाथ को ढूँढिए जिसने उसकी क़ब्र खोदी थी।"

"आप... आप ऐसे बोलती हैं जैसे आप ख़ुद उस रात वहाँ मौजूद थीं, अमारा जी।" ... "आप एक अजनबी हैं, फिर भी इस घर के छह बरस पुराने ज़ख़्मों को आप मुझसे बेहतर जानती हैं। ... ऐसा कैसे?"

"मैं क़र्ज़ ख़रीदती हूँ, मिस्टर अहूजा। और हर डूबे हुए ख़ानदान के क़र्ज़ के साथ, मैं उसके सारे दबे हुए राज़ भी ख़रीद लेती हूँ।" ... "मुझे इस घर के ज़ख़्म पढ़ने नहीं आते, इसके झूठ पढ़ने आते हैं। ... और आपके इस घर में झूठ, हवा में तैरते हैं।"

उस लाइन ने समर के अंदर कुछ हिला दिया। ... वो फ़ाइल ले कर लौटा, और पहली बार, उसने उन आँकड़ों को एक मुजरिम की तरह नहीं, एक जज की तरह पढ़ा। ... और जितना वो पढ़ता गया, मेहरबान ट्रेडर्स का हर तबादला उसे तारा से दूर, और अपने ही घर के किसी अँधेरे कोने की तरफ़ इशारा करता नज़र आने लगा।

"ये तो अजीब है।" ... "तारा के नाम वाली कुछ एंट्रियाँ... इनकी तारीख़ें तो उसके जाने के बाद की हैं। ... एक मरी हुई औरत किसी तबादले पर दस्तख़त कैसे कर सकती है?" ... "चाचा जी ने कहा था ये सब उसी ने किया था। पर ये तो नामुमकिन है।"

"आधे सवाल का आधा जवाब मत ढूँढिए, मिस्टर अहूजा।" ... "छह बरस पुरानी असली ऑडिट फ़ाइल निकालिए, उसी साल की, जिस साल आपकी वो मुलाज़िम गई थी। ... सच अधूरे काग़ज़ों में नहीं मिलता। ... वो हमेशा उसी पन्ने में दबा होता है, जिसे किसी ने सबसे नीचे, सबसे गहरे छुपाया हो।"

खिड़की की तरफ़ मुँह किए, तारा की मुट्ठियाँ काँप रही थीं। ... जिसने उसे बिना एक लफ़्ज़ सुने दफ़्न किया था, वो उसी को अपने चाचा की क़ब्र ख़ुद खुदवाने भेज रही थी। ... पर हर बार जब समर उसके क़रीब आता, एक ख़तरा भी क़रीब आ जाता। ... इस आदमी की आँखें छह बरस पहले भी उसकी थीं, और नफ़रत, ये तारा ने सीखा था, कभी कभी पहचानने में मुहब्बत से भी तेज़ होती है।

उस रात, बहुत देर गए, समर अकेले उसी बहीखाना कमरे में लौट आया, जहाँ हुमा के ऑडिट की मुहरें लगी थीं। ... उसने चाचा की दी हुई वो पीली फ़ाइल एक तरफ़ पटक दी, और वो पुरानी लोहे की अलमारी खोली जिसे छह बरस से किसी ने छुआ तक नहीं था। ... उसी साल का असली ऑडिट रिकॉर्ड, जिस बरस तारा गई थी।

"चाचा जी कहते हैं मेहरबान तारा का था।" ... "तो फिर उस साल की असली ऑडिट रिपोर्ट में उसी का नाम सबसे ऊपर होगा। ... बस एक बार वो काग़ज़ मिल जाए, और मेरा ये सवाल हमेशा के लिए दफ़्न हो जाए।" ... "मुझे यही चाहिए। ... कि वो सच में चोर निकले।"

और फिर, सबसे नीचे, बाक़ी सब काग़ज़ों के बोझ तले, एक भूरे लिफ़ाफ़े में उसे वो मिल गया। ... छह बरस पुरानी असली ऑडिट फ़ाइल, जिस पर उसी मनहूस साल की तारीख़ थी, और जिसे किसी ने बड़ी सफ़ाई से सबसे नीचे दबा दिया था। ... समर के हाथ काँपने लगे, पर वो रुका नहीं। उसने वो लिफ़ाफ़ा खोला।

"ये... ये तो बटरा की लिखाई है।" ... "वही बटरा, जो उसी साल अचानक ग़ायब हो गया था। ... ये उसके अपने हाथ का नोट है, ठीक उसी हफ़्ते का, जब ये सब हुआ था।"

वो नोट किसी बहू के नाम का नहीं था। ... बटरा ने अपने काँपते, ईमानदार हाथ से, उस साल के ऑडिट में एक ही नाम पर लाल घेरा लगाया था। बार बार, हर पन्ने पर, हर एंट्री के आगे। ... और वो नाम तारा का नहीं था।

"मेहरबान ट्रेडर्स... असली मालिक..." ... "ये तारा नहीं है।" ... "ये रतन चाचा का नाम है। ... हर पन्ने पर, लाल घेरे में, चाचा जी का नाम।"

छह बरस से समर ने जिस औरत को चोर कह कर अपने गुनाह की क़ब्र पर मिट्टी डाली थी, वो चोर थी ही नहीं। ... उसके अपने हाथ में, ग़ायब हुए बटरा की लिखाई में, सच लाल घेरे में दहक रहा था, और वो सच एक ही नाम ले रहा था। ... जिस उँगली ने आज सुबह मेज़ पर एक, दो, तीन थाप दी थी, उसी उँगली ने अस्सी लाख चुराए थे, और एक बेगुनाह, पेट से बहू को बारिश में मरने के लिए फिंकवा दिया था।

"हे भगवान।" ... "तारा चोर नहीं थी। ... हमने... मैंने... एक बेगुनाह औरत को बारिश में मरने के लिए फेंक दिया।" ... "और असली चोर... आज भी इसी घर में, मेरे अपने सिरहाने बैठा है।"

उस एक पीले पन्ने ने छह बरस के झूठ को एक पल में राख कर दिया था। ... पर समर अहूजा अभी ये नहीं जानता था कि उसके हाथ में अब सिर्फ़ एक सच नहीं, एक मौत का परवाना भी था। ... क्योंकि इस घर में एक ही उसूल चलता आया था। ... जो लोग इस सच के बहुत क़रीब पहुँच जाते हैं, वो अक्सर किसी रात, किसी ट्रेन के साथ, हमेशा के लिए ग़ायब हो जाते हैं।

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