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अध्याय 12 / 30

गुम गवाह

राख से उठी द्वारा Avni Oberoi

बहीखाना कमरे की उस अकेली बत्ती के नीचे समर अहूजा अब भी खड़ा था, हाथ में बटरा का वो पीला नोट थामे, जिस पर हर पन्ने पर एक ही नाम लाल घेरे में दहक रहा था। ... रात का तीसरा पहर बीत चुका था, पर उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। ... छह बरस से वो जिस दीवार के सहारे खड़ा था, वो अभी अभी उसके अपने हाथों में राख हो कर भुरभुरा गई थी।

"अगर तारा चोर नहीं थी..." ... "तो उस रात हमने एक बेगुनाह को बारिश में फेंका। ... एक पेट से औरत को। ... मेरी अपनी बीवी को।" ... "और असली चोर छह बरस से इसी छत के नीचे, मेरे सिरहाने बैठ कर, मुझे 'बेटा' कह कर बुलाता रहा।"

"उस रात, घसीटे जाने से पहले, उसने मुझसे सिर्फ़ एक बात कही थी।" ... "'समर, बस एक बार मेरी आँखों में देख लो। ... फिर कह देना कि मैंने चुराया है, और मैं चुपचाप चली जाऊँगी।'" ... "और मैं उसकी आँखों में देख भी नहीं पाया था। ... मैंने मुँह फेर लिया। ... क्योंकि उन आँखों में सच था, और उस रात मुझे सिर्फ़ अपना झूठ चाहिए था।"

पर इस पूरे घर में अब वो किस पर भरोसा करता? ... माजी ने ख़ुद उसे चोर कहा था। और चाचा जी... चाचा जी तो ख़ुद वो लाल घेरा थे। ... इस काग़ज़ को सच में बदलने के लिए एक ज़िंदा गवाह चाहिए था, वो हाथ जिसने ये नोट लिखा था। ... बटरा। वही मुनीम, जो उसी मनहूस साल अचानक हवा हो गया था।

"बटरा।" ... "अगर तू ज़िंदा है कहीं, तो मुझे तुझे ढूँढना होगा। ... पर कहाँ? किस से पूछूँ?" ... "इस घर का हर आदमी झूठ पर खड़ा है। ... इस पूरी दुनिया में सिर्फ़ एक इंसान है जो कहती है, खोदो, और सच निकालो।"

उधर शहर के दूसरे कोने में, हुमा कैपिटल के दफ़्तर की रौशनी उस रात भी नहीं बुझी थी। ... एक बड़ी मेज़ पर छह बरस पुराने काग़ज़ों के पहाड़ फैले थे, और उनके बीच बेला एक लैपटॉप की नीली रौशनी में झुकी बैठी थी। ... जिस आदमी को वो ढूँढ रही थी, उसे इस दुनिया ने छह बरस पहले मरा मान लिया था। पर बेला मुर्दों को नहीं, उनके छोड़े हुए निशानों को ढूँढती थी।

"छह महीने हो गए हैं इस भूत का पीछा करते हुए, अमारा।" ... "बटरा नाम का आदमी उस साल हवा हुआ, और उसके बाद इस पूरे मुल्क में बटरा नाम का कोई ज़िंदा इंसान बचा ही नहीं। ... आदमी मरा नहीं, बस नाम बदल कर किसी सुराख़ में घुस गया।"

"आदमी नाम बदल सकता है, बेला। ... आदतें नहीं।" ... "वो एक मुनीम था। ईमानदार मुनीम। जिस आदमी ने उम्र भर हर पाई का हिसाब रखा हो, वो नए नाम के पीछे भी वही करेगा। ... बैंक, बीमा, किराए का काग़ज़, कहीं ना कहीं उसका वही पुराना हाथ दिखेगा। ... आदत ही सबसे बड़ा दस्तख़त होती है।"

"इसीलिए तुम मालकिन हो, और मैं नौकरी करती हूँ।" ... "एक छोटा सा क़स्बा। नया नाम, नई दुकान, पर काम वही, हिसाब-किताब का। गली गली के दुकानदारों के बहीखाते लिखता है।" ... "और पिछले महीने उसने एक बहुत पुरानी बीमा पॉलिसी की क़िस्त भरी। उसी पते से।"

"पर एक बात समझ ले, अमारा। सिर्फ़ पता काफ़ी नहीं होगा।" ... "बटरा छह बरस से डर के साये में जी रहा है। रतन ने उसे ख़रीदा भी था, और डराया भी। ... वो यूँ ही उठ कर अदालत में गवाही नहीं देगा। ... उसे या तो हिम्मत चाहिए, या हम सब से बड़ी कोई ढाल।"

"ढाल मैं बनूँगी, बेला।" ... "रतन ने उसे क़ब्र दिखा कर ख़रीदा था। मैं उसे गवाह का कठघरा दूँगी, और उसके सिर पर हुमा का हाथ। ... जिस आदमी को छह बरस एक कमज़ोर मुजरिम की तरह छुपना पड़ा हो, उसे बस एक बार ताक़तवर बनने का मौक़ा दो। ... वो सब उगल देगा। ... बस उस तक पहुँचना है, रतन से पहले।"

अमारा उस धुँधले पते को यूँ देखती रही जैसे छह बरस बाद कोई बंद दरवाज़ा एक इंच खुला हो। ... वो नोट, जो आज समर के हाथ लगा था, महज़ काग़ज़ था। पर बटरा, अगर ज़िंदा था, तो वो उस काग़ज़ को आवाज़ दे सकता था, एक ऐसी गवाही, जो रतन को फाँसी के तख़्ते तक ले जाती। ... पर इसी डोर का एक दूसरा सिरा भी था, और वो सिरा एक ख़तरे से बँधा था।

"मुझे उसका पक्का पता चाहिए, बेला। आज की रात। ... इससे पहले कि रतन का आदमी उसकी बू सूँघे।" ... "क्योंकि जिस दिन रतन को पता चलेगा कि बटरा ज़िंदा है, उस दिन बटरा दूसरी बार मरेगा। ... और इस बार, हमेशा के लिए।"

"अमारा... एक बात कहूँ?" ... "तुम आरव को अपने हाथों से सुला कर आई हो, और फिर भी आधी रात यहाँ इन काग़ज़ों में बैठी हो। ... वो आदमी छह बरस से नहीं मिला। एक रात और सो जा।" ... "पर तू नहीं सोएगी। हमेशा की तरह।"

"जिस रात मुझे बारिश में फेंका था, बेला, उस रात भी उस घर में कोई नहीं सोया था। ... बस सब सोने का नाटक करते रहे, जब तक मेरी चीख़ें बाहर की गड़गड़ाहट में डूब नहीं गईं।" ... "अब मेरी बारी है, जगाने की। ... पता ढूँढ, बेला। रात ढलने से पहले।"

अगली शाम, जब हुमा के दफ़्तर की रौशनियाँ एक एक कर बुझ रही थीं, समर अहूजा बिना कोई वक़्त लिए वहाँ आ पहुँचा। ... वो वो आदमी नहीं था जो बोर्डरूम की मेज़ पर अकड़ कर बैठता था। ... उसकी आँखें रात भर की जागी थीं, हाथ में वही भूरा लिफ़ाफ़ा था, और चेहरे पर छह बरस का दबा हुआ बोझ पहली बार नंगा दिख रहा था।

"अमारा जी, मैं... मैं आपसे सिर्फ़ एक सवाल पूछने आया हूँ।" ... "और मुझे लगता है, इस पूरी दुनिया में सिर्फ़ आप मुझे उसका सच्चा जवाब देंगी। ... आपने ही कहा था ना, हर झूठे काग़ज़ के पीछे एक ज़िंदा हाथ होता है। ... मैंने वो हाथ ढूँढ लिया, अमारा जी।"

"बैठिए, मिस्टर अहूजा।" ... "और बताइए। आपने क्या ढूँढा।"

"छह बरस पहले हमने एक औरत को चोर कहा। मेरी बीवी को। ... मैंने ख़ुद, अपने कानों से उसकी एक सफ़ाई सुने बिना, उसे इस घर से निकलवा दिया। बरसती बारिश में।" ... "और उसी रात वो चली गई। हमेशा के लिए। ... मैं छह बरस से हर रात ख़ुद को यही कह कर सोता रहा कि वो चोर थी, कि मैंने ठीक किया।"

"पर ये नोट कहता है कि वो चोर थी ही नहीं, अमारा जी। ... कि असली चोर मेरे अपने घर में बैठा था, और उसने एक बेगुनाह, पेट से औरत को अपनी चोरी दफ़नाने की क़ब्र बना दिया।" ... "मैंने एक मासूम को मारा। ... और उसके साथ, अपने उस बच्चे को भी, जिसकी शक्ल मैंने कभी देखी ही नहीं।"

अमारा के सामने वो आदमी टूट रहा था, जिसने उसे मरने के लिए सड़क पर फेंका था। ... और उसके अपने सीने में एक चीख़ दबी थी, जो चिल्ला कर कहना चाहती थी, वो बच्चा मरा नहीं, समर। वो ज़िंदा है, साँस लेता है, हँसता है, और वो तुम्हारा है। ... पर तारा ने वो चीख़ छह बरस से पत्थर के नीचे दबा रखी थी। आज भी उसने उसे दबाए रखा। ... आरव का हँसता चेहरा उसकी आँखों के आगे तैरा, और उसने मुखौटा और कस कर बाँध लिया।

"मुझे बस एक जवाब चाहिए, अमारा जी। ... आप डूबे हुए ख़ानदानों के राज़ ख़रीदती हैं, आप झूठ को उसकी शक्ल से पहचान लेती हैं।" ... "आप मेरी आँखों में देख कर बताइए। ... क्या मैंने एक बेगुनाह औरत को मार डाला?"

"आप मुझसे पूछ रहे हैं कि क्या आपने एक बेगुनाह को मारा।" ... "मैं आपको एक लेनदार की तरह जवाब दूँगी, मिस्टर अहूजा। ... कुछ क़र्ज़ खून के होते हैं। और खून का क़र्ज़ कभी माफ़ नहीं होता। ... चाहे क़र्ज़दार मर जाए, या ज़िंदा लौट आए।"

"तो आप भी यही कहती हैं।" ... "कि मैं क़ातिल हूँ।"

"मैं कहती हूँ कि हिसाब अभी अधूरा है, मिस्टर अहूजा।" ... "आपने जो किया, उसका हिसाब कोई मुर्दा औरत क़ब्र से नहीं माँगेगी। ... पर कुछ औरतें ऐसी होती हैं जो राख से भी उठ आती हैं, सिर्फ़ अपना अधूरा हिसाब पूरा करने के लिए। ... दुआ कीजिए, आपके वाली उनमें से ना निकले।"

"मैं इस सच को अब दबने नहीं दूँगा, अमारा जी।" ... "मैं ये काग़ज़ चाचा जी के मुँह पर दे मारूँगा। पूरे ख़ानदान के सामने। ... छह बरस पहले मैंने एक बेगुनाह के लिए आवाज़ नहीं उठाई। ... इस बार उठाऊँगा।"

"नहीं।" ... "आप ये काग़ज़ किसी के सामने नहीं रखेंगे, मिस्टर अहूजा। अभी नहीं।" ... "एक अकेला काँपता नोट अदालत में राख का ढेर है। जिस पल आप ये पत्ता खोलेंगे, असली चोर हर दूसरा सबूत, और हर ज़िंदा गवाह, उसी रात मिटा देगा।" ... "इस बार खोदिए मत। सिर्फ़ चुप रहिए, और मुझ पर भरोसा कीजिए। ... इस घर का हिसाब मैं चुकाऊँगी। पूरा।"

समर उस औरत को देखता रहा, जो खिड़की की तरफ़ मुँह किए खड़ी थी, और उसे समझ नहीं आया कि उसके सीने में ये क्या घुमड़ रहा है। ... एक तरफ़ अपने गुनाह की दहशत थी, और दूसरी तरफ़ इस अजनबी की तरफ़ वो खिंचाव, जिसे वो छह बरस से किसी का नाम नहीं दे पाया था। ... दोनों एक ही कमरे में, एक ही साँस में, उसका दम घोंट रहे थे।

"आप जब भी बोलती हैं, अमारा जी, मुझे लगता है जैसे कोई मुझे मेरे ही गुनाह का आईना दिखा रहा हो।" ... "और सबसे अजीब बात ये है, कि मुझे उस आईने से भागने का मन नहीं करता। ... मैं और क़रीब जाना चाहता हूँ। ... और मुझे ख़ुद नहीं पता, क्यों।"

"मत आइए क़रीब, मिस्टर अहूजा।" ... "मेरे इर्द गिर्द की हवा में सिर्फ़ राख है। ... जो उसके बहुत क़रीब आता है, वो जल जाता है। ... और मैं नहीं चाहती कि इस घर का एक और आदमी मेरी आग में जले।"

समर को पता नहीं था कि वो जिस बर्फ़ की दीवार से टकरा रहा था, उसके पीछे भी एक जंग छिड़ी थी। ... तारा का जी चाहा कि पलट कर चीख़ दे, हाँ समर, तुमने एक बेगुनाह को मारा, और वो बेगुनाह इसी कमरे में, तुम्हारे सामने साँस ले रही है। ... पर उस चीख़ के पीछे एक पाँच बरस का बच्चा सोता था, जिसकी सलामती इसी ख़ामोशी में बँधी थी। ... तो तारा ने वो चीख़, हमेशा की तरह, राख के नीचे दबा दी।

ठीक उसी पल अमारा का फ़ोन मेज़ पर काँपा। ... स्क्रीन पर बेला का नाम जगमगाया। ... अमारा ने समर की तरफ़ एक ठंडी, सधी नज़र डाली, फ़ोन उठाया, और कमरे के दूसरे कोने में चली गई, जहाँ उसकी आवाज़ फिर से पूरी तरह अमारा की, बर्फ़ की, हो गई।

"मिल गया, अमारा। पक्का पता। ... बटरा ज़िंदा है।" ... "उसी क़स्बे में, नए नाम के पीछे, एक छोटी सी दुकान के ऊपर। ... मैंने तीन अलग जगहों से मिलान किया है, कोई शक की गुंजाइश नहीं। ये वही आदमी है, जिसका नोट आज समर के हाथ लगा।"

"छह बरस।" ... "छह बरस बाद, वो एक इंसान जो पूरा सच जानता है, आज भी साँस ले रहा है।"

"पर अमारा... एक और बात है। और वो अच्छी नहीं है।" ... "तूने कहा था ना, हवेली के गैराज पर नज़र रखवा दूँ? मैंने रखवाई हुई थी। ... आज शाम, ठीक एक घंटा पहले, अहूजा गैराज से एक गाड़ी निकली है।"

"कहाँ के लिए?"

"उसी क़स्बे के लिए, अमारा। ... उसी पते के लिए, जो अभी अभी मेरे हाथ लगा है।" ... "रतन को किसी तरह पता चल गया है कि बटरा ज़िंदा है। ... और उसका आदमी हमसे पूरे एक घंटे आगे निकल चुका है।"

"गाड़ी निकालो, बेला। अभी।" ... "छह बरस पहले वो मुझ तक पहुँच गए थे, एक ट्रेन के साथ, और किसी ने उन्हें पहले नहीं रोका। ... इस बार मैं उन तक पहले पहुँचूँगी।"

अमारा के हाथ में फ़ोन जम गया। ... वो नोट जो समर के हाथ लगा था, वो गवाह जिसे छह बरस बाद उसने ढूँढ निकाला था, वो पूरा सच जो रतन को फाँसी तक ले जाता, सब एक ही पते पर आ कर टिक गए थे। ... और उस पते की तरफ़, अँधेरे में, अहूजा ख़ानदान की एक गाड़ी पहले ही निकल चुकी थी, उसी आज़माए हुए काम के लिए जो ये घर छह बरस पहले एक बहू के साथ कर चुका था। ... इस बार, गुम गवाह और उसकी मौत के बीच सिर्फ़ एक घंटे का फ़ासला बचा था।

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