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अध्याय 19 / 30

धुएँ का राज़

राख से उठी द्वारा Avni Oberoi

दहलीज़ पर वो चौड़ा, ठंडा साया टस से मस नहीं हुआ। ... रात की सर्द हवा कमरे में घुस आई, और उसके साथ ख़ून की वो कच्ची महक भी, जो फ़िक्सर की मुट्ठी में गिरेबान से लटके बटरा से रिस रही थी। बूढ़े मुनीम का सिर एक तरफ़ झूल रहा था, होंठ फटे हुए, और उसकी आँखें अमारा पर यूँ टिकी थीं जैसे किसी डूबते आदमी की आख़िरी उम्मीद।

“तो तुम हो वो हुमा वाली मालकिन।” ... “जिसने इस बूढ़े को उसके बिल से निकाल कर गवाह बनाने का सपना बेचा। बड़ी महँगी ख़रीदारी कर रही थीं तुम।” ... “अफ़सोस, जो काग़ज़ तुम ख़रीद रही थीं, वो अब मेरी जेब में है।”

“उसे छोड़ दो।” ... “जो चाहिए वो तुम्हें मिल गया। ये बूढ़ा अब किसी के काम का नहीं, न तुम्हारे, न रतन के।” ... “अपनी क़ीमत बोलो। हुमा हर चीज़ ख़रीद लेती है... एक साँस भी।”

“क़ीमत?” ... “मुझे पैसे के लिए नहीं भेजा गया। मुझे ये देखने भेजा गया कि वो कौन है जो छह बरस पुरानी राख कुरेद रही है।” ... “और ये चेहरा... मैंने कहीं देखा है। किसी बहुत पुरानी रात में।”

“आप मुझे नहीं जानते, और यही आपके हक़ में है।” ... “मैं वो औरत हूँ जिसके हाथ में इस पूरे अहूजा ख़ानदान के एक एक क़र्ज़ की डोर है। रतन ने आपको मेरा चेहरा देखने भेजा, तो देख लो।” ... “और जा कर उससे कहो, हुमा अब उसके अपने दरवाज़े तक आ पहुँची है।”

“मत सुनो इसकी, बेटी... भाग जाओ।” ... “इसने मुझसे सब छीन लिया... वो काग़ज़, सब कुछ। अब मेरी बारी है, तुम्हारी नहीं।” ... “मुझे छोड़ दो, बस उसे जाने दो।”

तभी बाहर बजरी पर एक गाड़ी के रुकने की आवाज़ आई, और एक दरवाज़ा ज़ोर से खुला। ... फ़िक्सर की गर्दन एक झटके से घूमी। अँधेरे को चीरता हुआ कबीर अहूजा तेज़ क़दमों से अंदर आया, और उसकी नज़र एक पल में पूरा मंज़र पढ़ गई, ख़ून, वो घायल बूढ़ा, और वो बेजान आँखों वाला ठंडा साया।

“उसे छोड़ दे। अभी।” ... “तूने जिस घर की तनख़्वाह खाई है, उस घर का बेटा तेरे सामने खड़ा है। एक क़दम और, और मैं ख़ुद पुलिस को हर बात बता दूँगा।” ... “उस बूढ़े को छोड़, वरना आज तू यहाँ से नहीं जाएगा।”

फ़िक्सर की जकड़ एक पल को ढीली पड़ी। ... उसकी बेजान आँखें कबीर से अमारा तक घूमीं, फिर उस अँधेरे दरवाज़े तक जहाँ से वो आया था। वो जानता था कि एक लाश ख़ामोश रहती है, पर तीन लाशें शोर मचाती हैं, और देसाई की खुली फ़ाइल पहले से इस औरत के इर्द गिर्द मंडरा रही थी। आज की रात दो और लाशें बहुत महँगी पड़तीं।

“आज तुम्हारी क़िस्मत अच्छी है, अहूजा साहब।” ... “ये लो अपना गवाह। इसकी गवाही अब भी सिर्फ़ हवा है, क्योंकि काग़ज़ मेरे पास है।” ... “और तुम, हुमा जी... मैं तुम्हारा चेहरा याद रखूँगा। कहीं देखा है, किसी बहुत पुरानी बारिश में।”

फ़िक्सर पीछे हटा, और एक पल में रात के अँधेरे में घुल गया। ... दूर एक गाड़ी स्टार्ट हुई, बजरी उड़ी, और वो चला गया, अपनी जेब में छह बरस का वो सबूत ले कर जिसके पीछे अमारा ने अपनी पूरी ज़िंदगी दाँव पर लगा दी थी। कबीर लपक कर गिरते हुए बटरा को थाम लिया, और बूढ़ा मुनीम उसकी बाँहों में ढेर हो गया।

कबीर ने बटरा को उसी सोफ़े पर लिटाया जहाँ कुछ देर पहले चाय के दो कप एक नई ज़िंदगी के इंतज़ार में रखे थे। ... अमारा ने काँपते हाथों से बूढ़े की क़मीज़ चीरी और ज़ख़्म पर अपना दुपट्टा दबाया। ख़ून उसकी उँगलियों के बीच से रिसता रहा, गर्म, और उसके साथ छह बरस की मेहनत भी बहती हुई महसूस हुई।

“काग़ज़ चला गया, कबीर।” ... “छह बरस। छह बरस मैंने एक एक धागा जोड़ा, और वो एक रात में मेरी अपनी दहलीज़ से उठा कर ले गया।” ... “मैं इतनी क़रीब थी। बस एक हाथ भर दूर।”

“सुनो मेरी बात।” ... “वो आदमी बटरा को मारने आया था, तारा। एक गवाह को, एक बूढ़े को, यूँ मिटाने जैसे कोई चिराग़ बुझा देता है।” ... “मेरे चाचा ने... मेरे अपने ख़ून ने... एक इंसान को क़त्ल का हुक्म दिया, बस एक काग़ज़ के लिए।”

“सिर्फ़ एक काग़ज़ के लिए नहीं।” ... “रतन चाचा चोर हैं, ये तो हम जानते थे। पर आज मैंने वो देखा जो मैं नहीं जानती थी, कबीर।” ... “वो सिर्फ़ चुराते नहीं। वो मारते हैं। और जो एक बार मार सकता है, वो दुबारा भी मारेगा।”

“तो अब मैं भी उस घर का नहीं रहा।” ... “वो मेरा ख़ून है, तारा, पर आज से मेरी हर साँस उसके ख़िलाफ़ है, और तुम्हारे साथ। मैंने वो पुल जला दिया है, और मुझे कोई अफ़सोस नहीं।” ... “जिस रात इस घर ने तुम्हें राख किया था, मैं चुप रहा। दुबारा नहीं।”

“तुम नहीं जानते तुम क्या चुन रहे हो, कबीर।” ... “उस तरफ़ तुम्हारा ख़ानदान है, तुम्हारा नाम, तुम्हारी हर पुरानी जड़। और इस तरफ़ सिर्फ़ राख है, और वो औरत जो उसी राख से उठी है।” ... “फिर भी तुम इसी तरफ़ खड़े हो।”

एक पल को दुनिया थम गई। ... कबीर की हथेलियाँ उसके चेहरे पर थीं, और अमारा की साँस उसके इतने क़रीब थी कि छह बरस की जमी बर्फ़ पिघलने को हुई। पर तभी सोफ़े पर बटरा कराहा, और वो लम्हा टूट गया, दोनों की नज़रें उस बूढ़े की तरफ़ लौट गईं जो अब भी उनके बीच, ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहा था।

“काग़ज़ गया, पर सच नहीं गया, कबीर।” ... “धुआँ कभी झूठ नहीं बोलता। जहाँ धुआँ उठता है, वहाँ किसी ने कुछ जलाया ज़रूर होता है।” ... “और जो उस रात जलाया गया था... वो मैं थी।”

“काग़ज़... वो सब कुछ नहीं था, बेटी।” ... “मैंने... मैंने एक चीज़ और छुपाई थी। उनसे भी छुपाई, रतन से भी।” ... “जिस रात उन्होंने उसे मारा... मैंने उसी रात जान लिया था... कि एक दिन मेरी भी बारी आएगी।”

उसी घड़ी, दिल्ली में, रतन अहूजा अपनी बैठक की मद्धम रौशनी में बैठे थे। ... फ़ोन बजा, और उन्होंने उसे बिना किसी जल्दी के कान से लगाया। उनकी दूसरी हथेली की उँगलियाँ मेज़ की लकड़ी पर वही पुरानी थाप दे रही थीं। एक। दो। तीन।

“काग़ज़?” ... “अच्छा। तो छह बरस पुरानी वो एक ग़लती आख़िरकार मेरी जेब में वापस आ गई।” ... “और बटरा? वो बूढ़ा चूहा किस हाल में है?”

“बटरा ज़िंदा है, साहब।” ... “छोटे अहूजा साहब वहाँ पहुँच गए। कबीर साहब। वो उस हुमा वाली औरत के साथ खड़े थे, उसके साथ।” ... “तीन को एक साथ ख़त्म करना आज की रात मुमकिन नहीं था।”

“कबीर।” ... “तो मेरा अपना भतीजा अब उस औरत की गोद में जा बैठा है।” ... “बटरा ज़िंदा रहे तो रहे। काग़ज़ के बिना उसकी गवाही एक बूढ़े का बड़बड़ाना है, दाँत के बिना मुँह। वो काग़ज़ अब राख हो जाएगा, और तारा के नाम वाले जाली काग़ज़ अब भी मेरी तिजोरी में हैं।”

“साहब, एक बात है।” ... “वो औरत, हुमा जी। मैंने उसका चेहरा बहुत क़रीब से देखा। और मुझे लगा... जैसे मैंने वो चेहरा पहले कभी देखा हो। किसी बहुत पुरानी रात में।” ... “पर याद नहीं आ रहा कि कहाँ।”

“किसी पुरानी रात में।” ... “काग़ज़ ले कर सीधे मेरे पास आओ। आज रात। और वो चेहरा, जो तुम्हें याद नहीं आ रहा, मुझे अपनी आँखों में देख कर बताना।” ... “क्योंकि इस घर की कुछ पुरानी रातें, मैंने अपने ही हाथों दफ़नाई हैं।”

फ़ोन कट गया, और रतन अहूजा ने आँखें मूँद लीं। ... उनकी उँगलियाँ फिर मेज़ पर थाप देने लगीं, एक, दो, तीन, जैसे कोई बहुत पुराना हिसाब आख़िरी पन्ने पर आ पहुँचा हो। उन्हें अब भी नहीं पता था कि जिस चेहरे की उन्हें तलाश थी, वो चेहरा उन्होंने ख़ुद एक बार बारिश में सड़क पर फेंका था।

शहर के छोर पर वो कमरा अब ख़ामोश था। ... बटरा का ज़ख़्म बँध चुका था, पर बुख़ार उसे किसी और ही दुनिया में खींच रहा था। वो कभी होश में आता, कभी अतीत के किसी अँधेरे कोने में खो जाता। अमारा उसके सिरहाने बैठी थी, और कबीर खिड़की के पास, बाहर की हर आहट पर कान लगाए।

“वो काग़ज़ मेरी ढाल था, बेटी। पर मैं जानता था कि काग़ज़ छीना जा सकता है।” ... “इसलिए मैंने एक और चीज़ रखी। एक आवाज़। जो कभी नहीं छिनेगी, जब तक मैं ख़ुद ना दूँ।” ... “उस रात की एक आवाज़... मेरे उस पुराने फ़ोन में।”

“कौन सी आवाज़, बटरा जी?” ... “कौन सी रात? मुझे बताइए।” ... “आपने किसकी आवाज़ रखी है उस फ़ोन में?”

“जिस रात उस बहू को घर से बारिश में निकाला गया... उसी रात रतन साहब ने फ़ोन पर किसी को हुक्म दिया।” ... “मैं बग़ल के कमरे में था। मैंने चुपके से रिकॉर्ड कर लिया, अपनी जान की ज़मानत के तौर पर।” ... “वो हादसा... वो ट्रेन का हादसा, हादसा नहीं था, बेटी। वो एक हुक्म था।”

अमारा के हाथ में बटरा का हाथ जम गया। ... उसने हमेशा माना था कि वो रात एक इत्तिफ़ाक़ थी, कि क़िस्मत ने उसे किसी तरह उस डूबती ट्रेन से बचा लिया। पर बटरा के इन टूटे लफ़्ज़ों ने वो एक सच खोद निकाला जिसे उसने ख़ुद अपने भीतर सबसे गहरे दफ़्न कर रखा था, कि उसका मरना कोई हादसा नहीं, एक फ़रमान था।

“वो मुझे मारना चाहते थे।” ... “मुझे सिर्फ़ घर से नहीं निकाला गया था, कबीर। मुझे उस ट्रेन पर भेजा गया था... मरने के लिए।” ... “छह बरस मैं सोचती रही कि मैं बच गई। पर मुझे बचना ही नहीं था।”

“सुनो मुझे, तारा।” ... “अगर ये सच है, अगर उन्होंने सच में तुम्हें मारने की कोशिश की, तो ये अब सिर्फ़ तुम्हारे नाम की लड़ाई नहीं रही। ये तुम्हारी जान की लड़ाई है।” ... “और मैं क़सम खाता हूँ, इस बार मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा। इस बार नहीं।”

“तो फिर सुन लो, कबीर।” ... “आज तक मैं ये लड़ाई अकेले लड़ती आई हूँ, अपने बेटे के लिए, अपने नाम के लिए। पर अगर उन्होंने सच में मुझे मार डालना चाहा था...” ... “...तो अब ये सिर्फ़ हिसाब नहीं रहा। अब ये जंग है। और जंग मैं हार कर नहीं लौटती।”

“बटरा जी।” ... “वो रिकॉर्डिंग... वो अब भी इस फ़ोन में है? वो आवाज़, वो उस रात का हुक्म?” ... “हमें अब उसे सुनना होगा।”

“आख़िरी फ़ोल्डर में... बिना नाम की एक फ़ाइल।” ... “छह बरस मैंने उसे सुनने की हिम्मत नहीं की। हर रात वो आवाज़ मेरे कानों में गूँजती रही, पर मैं उसे छू भी नहीं पाया।” ... “अब सुन लो। अब उसे रौशनी में आना ही होगा।”

कबीर ने काँपती उँगली से वो बेनाम फ़ाइल खोली। ... कमरे में एक पल को सिर्फ़ एक हल्की सी खरखराहट गूँजी, उस पुराने फ़ोन की, उस छह बरस पुरानी रात की। अमारा साँस रोके बैठी रही, और फिर वो आवाज़ जो अँधेरे से उभरी, उसे उसकी हड्डियों तक जमा गई।

“...ध्यान से सुनो। वो बहू आज रात की उस आख़िरी ट्रेन पर होनी चाहिए।” ... “और ये पक्का कर लेना कि वो उस ट्रेन से ज़िंदा उतर कर वापस ना आए। कोई सबूत नहीं, कोई लाश का सवाल नहीं।” ... “इस घर की एक ग़लती को हमेशा के लिए ख़त्म कर दो। समझे?”

वो आवाज़ कमरे के अँधेरे में फैलती चली गई, छह बरस पुरानी, पर उतनी ही ताज़ा जितनी उस बारिश की रात थी। ... अमारा का हाथ अपने मुँह पर जम गया, और उसकी आँखों के सामने वो पूरी रात लौट आई, बारिश, बालों से घसीटा जाना, वो डूबती ट्रेन। जो हादसा उसे छह बरस से हर रात सताता आया था, वो हादसा था ही नहीं। रतन अहूजा की वो ठंडी आवाज़ अब भी अँधेरे में बज रही थी, और कमरे में कोई साँस नहीं ले रहा था।

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