अध्याय 18 / 30
बटरा की वापसी
राख से उठी द्वारा Avni Oberoi
समर के हाथ में आरव की तस्वीर देख कर घिरी अमारा उस हूबहू अहूजा चेहरे को एक टूटे आदमी के अपने ज़मीर का वहम साबित कर के तस्वीर वापस छीन लेती है और उसका ग़ुस्सा सीधे मेहरबान ट्रेडर्स और रतन पर तान देती है, फिर छह बरस के पीछा के बाद डरे हुए मुनीम बटरा तक ख़ुद पहुँच कर उसे क़ब्र की जगह हिफ़ाज़त और गवाह का कठघरा दे कर सामने आने को राज़ी कर लेती है। उधर रतन मुखौटा उतार कर आज रात बटरा और वो काग़ज़ ख़त्म करने का हुक्म देता है, और जिस रात बटरा को महफ़ूज़ घर लाया जाना था, घंटी बजने पर अमारा बेला के बजाय रतन के फ़िक्सर को पाती है, जिसकी मुट्ठी में गिरेबान से पकड़ा लहूलुहान बटरा लटका है।
अमारा दरवाज़े की चौखट में जड़ थी, और समर की पीठ अब भी उसकी तरफ़ थी। ... उसके काँपते हाथों में वो क्रेयॉन की तस्वीर थी, एक घर, एक चाँद, और वो मुस्कुराता चेहरा जिसके नीचे टेढ़े अक्षरों में लिखा था, 'मेरे पापा।' एक माँ का दिल हलक़ में अटका था, पर अमारा को अब उसी तारा को दुबारा उस क़ब्र में दबाना था, जहाँ से वो अभी अभी उठने को थी।
“ये आँखें देखिए, अमारा जी।” ... “ये जबड़ा, ये माथा। किसी बच्चे ने क्रेयॉन से बनाया है, पर ये चेहरा इस घर की हर पुरानी तस्वीर में है।” ... “ये मेरा चेहरा है। ये अहूजा का ख़ून है।”
“वो सिर्फ़ एक बच्चे की क्रेयॉन है, समर जी।” ... “मेरे एक मुवक्किल की फ़ाइल से आई है। बच्चे रिसालों में, दीवारों पर जो चेहरा देखते हैं, वही बना देते हैं।” ... “और आप उसमें अहूजा ख़ानदान ढूँढ रहे हैं।”
“नहीं। ये इत्तिफ़ाक़ नहीं हो सकता।” ... “छह बरस से मैं आईने में अपना चेहरा नहीं देख पाता, और आज एक बच्चे के काग़ज़ पर वही चेहरा मुझ पर हँस रहा है।” ... “ये किसका बच्चा है, अमारा जी? आप जानती हैं, है ना?”
“मैं जानती हूँ कि आप एक बीमार आदमी हैं, समर जी।” ... “जिसका ज़मीर डूब रहा हो, उसे हर आईने में, हर लकीर में अपना ही गुनाह दिखता है। ये चेहरा आपका नहीं, आपके डर का है।” ... “ये मेरी फ़ाइल का काग़ज़ है। मैं इसे वापस ले जा रही हूँ।”
तस्वीर अमारा की मुट्ठी में आ गई, और उसने उसे अपने कोट के भीतर, अपने सीने के पास सरका लिया, ठीक वहाँ जहाँ वो पाँच बरस से एक और राज़ छुपाती आई थी। ... एक क्रेयॉन की लकीर पर उसके बेटे की पूरी ज़िंदगी झूल गई थी, और वो एक बाल की दूरी से बच गई। समर की पीठ अब भी झुकी थी, टूटी हुई।
“माफ़ कीजिए।” ... “मैं पागल हो रहा हूँ, अमारा जी। जब से पता चला कि तारा ज़िंदा है, मुझे हर जगह वही दिखती है। हर बच्चे में, हर चेहरे में।” ... “मुझे बस एक बार उससे माफ़ी माँगनी है। बस एक बार।”
“तो माफ़ी काग़ज़ों में मत ढूँढिए, समर जी। सच में ढूँढिए।” ... “जो पुराना ऑडिट नोट आपको उन फ़ाइलों में मिला, उसे दुबारा पढ़िए। बटरा के हाथ का वो नोट तारा की तरफ़ उँगली नहीं उठाता।” ... “वो उस आदमी की तरफ़ उठाता है जो बरसों से इस घर का एक एक पैसा गिनता आया है।”
“जो हिसाब रखता है...” ... “आप... चाचा की बात कर रही हैं? रतन चाचा की?” ... “नहीं। वो तो इस घर के सबसे भरोसेमंद इंसान हैं। उन्होंने तो ख़ुद तारा के ख़िलाफ़ सबसे पहले...”
“मैं किसी का नाम नहीं ले रही, समर जी।” ... “मैं बस इतना कहती हूँ, कुछ लोग सबसे भरोसेमंद इसलिए दिखते हैं क्योंकि उन्होंने अपने सबसे बड़े झूठ को सच का लिबास पहना रखा है।” ... “मेहरबान ट्रेडर्स के पीछे जाइए। जो सच तारा को बेगुनाह करेगा, वही उस चेहरे को भी बेनक़ाब करेगा जिसे आप ढूँढ रहे हैं।”
अमारा बैठक से निकली, हर क़दम नापा हुआ, चेहरा पत्थर। ... हवेली के उसी सूने गलियारे में, जहाँ छह बरस पहले उसे बालों से घसीटा गया था, उसके घुटने एक पल को काँप गए। उसके कोट के भीतर उसके बेटे का चेहरा धड़क रहा था, और उस चेहरे को उसके अपने बाप ने अभी अभी छू कर छोड़ दिया था, बिना पहचाने।
रात गहरी थी जब अमारा हुमा के उस बंद कमरे में लौटी, जहाँ बहीखातों की ठंडी नीली रौशनी में बेला अपनी स्क्रीनों के पीछे बैठी थी। ... मुखौटा अब भी चढ़ा था, पर बेला उन गिनी चुनी लोगों में थी जिनके सामने वो एक साँस ढीली छोड़ सकती थी।
“मिल गया।” ... “बटरा। उसी क़स्बे में, नए नाम के पीछे, एक किराए के कमरे में दुबका बैठा है। छह महीने का पीछा, और आख़िरकार चूहा अपने बिल में मिल गया।” ... “पर वो अकेला हमें नहीं मिला, अमारा। रतन का आदमी भी उसी बिल के चक्कर काट रहा है।”
“और वो काग़ज़?” ... “रतन के असली दस्तख़त वाला वो अधिकार-पत्र, जो बटरा ने अपनी जान की ज़मानत के तौर पर छुपा रखा है। वो अब भी उसके पास है?”
“उसके पास है, पर उसकी मुट्ठी में बंद है।” ... “वो कहता है, जब तक रतन को गिरता ना देख ले, न गवाही देगा, न काग़ज़। एक डरा हुआ आदमी है, अमारा। और डरा हुआ आदमी दुनिया का सबसे ज़िद्दी जीव होता है।” ... “शांति ने भी अंदर से ख़बर भेजी है। रतन का आदमी दो दिन से हवेली के गैराज से ग़ायब है। वो निकल चुका है।”
“तो हमें उससे पहले पहुँचना होगा।” ... “रतन उस आदमी को सिर्फ़ एक चीज़ दे सकता है, बेला। एक क़ब्र। मैं उसे वो दूँगी जो रतन कभी नहीं दे सकता।” ... “हिफ़ाज़त। क़ब्र की जगह एक गवाह का कठघरा। और मैं ख़ुद जाऊँगी।”
“आप ख़ुद जाएँगी।” ... “एक डरे हुए चूहे को बिल से बाहर बुलाने, जबकि बाहर बिल्ली घात लगाए घूम रही है। वाह, क्या तरकीब है।” ... “अमारा, ये चारा है, और आप ख़ुद उस पर बैठ रही हैं। अगर रतन का आदमी वहाँ पहुँच गया...”
“तो वो एक और गवाह को दफ़ना देगा, और मेरा नाम छह बरस और राख में दबा रहेगा।” ... “ये आख़िरी टुकड़ा है, बेला। जिस दिन बटरा का काग़ज़ रौशनी में आएगा, उस दिन रतन गिरेगा। और उस दिन मेरा आरव पहली बार खुली हवा में साँस लेगा।” ... “मैं आज रात जा रही हूँ।”
क़स्बे का वो किराए का कमरा एक बल्ब की पीली रौशनी में डूबा था। ... बटरा उसमें किसी परछाईं की तरह बैठा था, दुबला, थका, हर आहट पर उछलता हुआ। जब दरवाज़ा खुला, तो उसका हाथ काँप कर मेज़ पर पड़े चाकू की तरफ़ बढ़ा, फिर रुक गया।
“कौन हैं आप? यहाँ तक कैसे पहुँचीं?” ... “मैंने कह दिया, मैं कुछ नहीं जानता। बटरा तो कब का मर चुका। मैं कोई और हूँ।” ... “मुझे अकेला छोड़ दीजिए, बड़ी मेहरबानी होगी।”
“बैठिए, बटरा जी। मैं वो नहीं हूँ जिससे आप छह बरस से भाग रहे हैं।” ... “मैं वो हूँ जो आपको वो चीज़ दे सकती है जो रतन अहूजा ने आपको कभी नहीं दी। एक क़ब्र नहीं। एक गवाह का कठघरा।” ... “ज़िंदगी, बटरा जी। मौत की जगह।”
“गवाही?” ... “जिस दिन मैं मुँह खोलूँगा, उसी दिन रतन साहब मुझे मिट्टी में मिला देंगे। आप उस आदमी को नहीं जानतीं।” ... “छह बरस से मैं हर दस्तक पर मरता हूँ। और अब आप कहती हैं कि मैं ख़ुद चल कर सब बोल दूँ?”
“मैं उस आदमी को जानती हूँ, बटरा जी। मुझसे बेहतर शायद कोई नहीं जानता।” ... “छह बरस पहले आपने एक काग़ज़ पर झूठे दस्तख़त होने दिए। एक पेट से बहू के नाम पर। उसे चोर कहा गया, बारिश में फेंका गया, और वो मर गई।” ... “रातों को उसका चेहरा नहीं आता आपको?”
“आता है।” ... “हर रात आता है। वो लड़की... उसने मुझसे कहा था, बटरा जी, आप तो जानते हैं मैंने कुछ नहीं किया।” ... “आपकी आवाज़ में एक पल को... नहीं। छह बरस हो गए। मैं थक गया हूँ, बस यही है।”
“तो उसका क़र्ज़ उतारिए, बटरा जी।” ... “जो काग़ज़ आपने अपनी जान बचाने के लिए छुपाया, आज वो एक बेगुनाह का नाम बचा सकता है। मैं आपको महफ़ूज़ जगह दूँगी, नया नाम, नई ज़िंदगी। पर सच के बदले।” ... “रतन ने आपको ख़ामोशी के बदले मौत देनी थी। मैं आपको सच के बदले साँस दे रही हूँ।”
“अगर... अगर मैं आ गया।” ... “वो काग़ज़ मेरे पास है। रतन के असली दस्तख़त, मेहरबान ट्रेडर्स का पूरा सच, सब उसी एक अधिकार-पत्र में है। पर वो मैं तभी दूँगा जब मैं महफ़ूज़ हो जाऊँ। जब मैं रतन को अपनी आँखों से गिरता देख लूँ।” ... “मैं आऊँगा। भगवान मुझे माफ़ करे, मैं आऊँगा।”
छह बरस से जो सबूत एक डरे हुए आदमी की मुट्ठी में दफ़्न था, वो पहली बार रौशनी की तरफ़ मुड़ा। ... अमारा के भीतर तारा एक पल को काँपी, पर उसने उसे बाहर नहीं आने दिया। बटरा उसे घूरता रहा, जैसे किसी बहुत पुरानी याद का सिरा उसके हाथ से बार बार फिसलता जा रहा हो।
“आज रात, बटरा जी।” ... “मेरी सबसे भरोसेमंद इंसान, बेला, आपको यहाँ से ले कर आएगी। शहर के बाहर एक महफ़ूज़ घर है, वहाँ मैं ख़ुद आपका इंतज़ार करूँगी।” ... “बस आज की रात काट लीजिए। कल से आपकी नई ज़िंदगी शुरू होगी।”
उसी रात, दिल्ली में, रतन अहूजा की बैठक में वो हँसमुख, दुलारने वाला चाचा कहीं नहीं था। ... मेज़ पर एक ही फ़ोन रखा था, और उसकी उँगलियाँ लकड़ी पर वही पुरानी थाप दे रही थीं। एक। दो। तीन।
“तो बूढ़ा बटरा ज़िंदा है।” ... “छह बरस मैंने उसे एक भूला हुआ, दबा हुआ चूहा समझा। और अब वो मुँह खोलने को तैयार है, उस हुमा वाली औरत के कहने पर।” ... “ये औरत बहुत पुराने काग़ज़ खोद रही है। बहुत पुराने।”
दूसरी तरफ़ से कोई धीमी आवाज़ आई, और रतन ने आँखें मूँद लीं, जैसे किसी बहुत पुराने हिसाब का आख़िरी पन्ना पलट रहा हो। ... वो जानता था कि एक ज़िंदा गवाह और एक जाग चुका भतीजा, दोनों एक ही रस्सी के दो सिरे हैं, और वो रस्सी सीधे उसके अपने गले तक आती है।
“तो उसे उस महफ़ूज़ घर तक पहुँचने से पहले रोको।” ... “जैसे छह बरस पहले एक बहू ट्रेन के साथ ग़ायब हुई थी, वैसे एक बूढ़ा मुनीम भी ग़ायब हो सकता है। कोई नहीं पूछेगा।” ... “और जो काग़ज़ वो छुपाए बैठा है, वो मुझे चाहिए। आज रात, हर हाल में। समझे?”
फ़ोन कट गया। रतन ने कुर्सी की पीठ से सिर टिका लिया, और उसकी उँगलियाँ फिर मेज़ पर थाप देने लगीं। एक। दो। तीन। ... क़स्बे की तरफ़ जाती एक सुनसान सड़क पर, एक गाड़ी की हेडलाइटें अँधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ीं, उसी कमरे की तरफ़, जहाँ एक डरा हुआ आदमी अपनी आख़िरी रात काट रहा था।
शहर के छोर पर वो महफ़ूज़ घर ख़ामोश था, बस एक खिड़की में रौशनी जल रही थी। ... अमारा वहाँ अकेली इंतज़ार कर रही थी। बेला बटरा को ले कर बस पहुँचने ही वाली थी। मेज़ पर दो कप चाय रखी थी, और एक पुराना बहीखाता, जिसमें छह बरस की भूख दर्ज थी।
“बस एक रात और।” ... “आज वो काग़ज़ इसी मेज़ पर होगा, और कल रतन का पूरा महल ताश के पत्तों की तरह गिरेगा।” ... “फिर तेरी माँ का हिसाब पूरा, आरव। फिर हम दोनों खुली हवा में साँस लेंगे।”
उसने बेख़याली में वही चाँद वाली लोरी गुनगुनाई, वही जो कभी तारा गाती थी। ... और शांति की भेजी वो ख़बर याद कर के एक पल को मुस्कुराई, कि बूढ़ी नौकरानी ने आज फिर अपनी जान जोखिम में डाल कर रतन के आदमी की हर हरकत की टोह उस तक पहुँचाई थी। इस अकेली जंग में भी, कुछ हाथ चुपचाप उसके साथ खड़े थे।
तभी दरवाज़े की घंटी बजी। ... अमारा का दिल एक पल को हल्का हो गया। बेला आ गई थी, और उसके साथ वो आख़िरी टुकड़ा, वो गवाह जिसका इंतज़ार उसने पूरे छह बरस किया था। उसने चाय की तरफ़ एक नज़र डाली, मुखौटा चढ़ाया, और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी।
“आ गईं तुम, बेला।” ... “मुझे लगा रास्ते में देर हो गई। बटरा जी को जल्दी अंदर ले आओ, बाहर ठंड है।” ... “सब ठीक तो है ना...”
पर दहलीज़ पर बेला नहीं थी। ... अँधेरे में एक चौड़ा, ठंडा सा साया खड़ा था, बेजान आँखों वाला वही आदमी जिसने छह बरस पहले एक पेट से औरत को ट्रेन की तरफ़ धकेला था। और उसकी मुट्ठी में, गिरेबान से पकड़ा हुआ, काँपता, लहूलुहान, वो बटरा लटका था, जिसका इंतज़ार अमारा कर रही थी।
“छोड़ो उसे।” ... “वो बूढ़ा आदमी तुम्हारे किसी काम का नहीं।” ... और उसके आगे कोई लफ़्ज़ नहीं बचा, क्योंकि फ़िक्सर की मुट्ठी सिर्फ़ और कसती गई, और उसकी बेजान आँखें बटरा के चेहरे से हट कर धीरे धीरे अमारा के चेहरे पर आ ठहरीं, जैसे छह बरस बाद वो कोई बहुत पुराना हिसाब वसूलने आया हो।
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