अध्याय 8 / 30
बच्चे की परछाईं
राख से उठी द्वारा Avni Oberoi
आरव को हर निगाह से दूर बेला की देखरेख में बंद रखने के बावजूद वो नन्हा तूफ़ान माँ की पुरानी फ़ोटो वाला 'बड़ा घर' और अपने कभी ना देखे पापा को ढूँढने भाग निकलता है, और सीधा रोशनी हाइट्स की साइट पर पहुँच कर कबीर की गोद में जा गिरता है, जहाँ ख़ून बिन नाम के ख़ून को पहचान लेता है; दोनों को हँसते देख कर तारा का छह बरस से जमा सीना चटक जाता है, और उसी रात वो बेला से कहती है कि अब वो हर कौर तेज़ी से परोसेगी, क्योंकि इस ख़ानदान के पास रहना उसके बेटे को उन्हीं हाथों की पहुँच में ला रहा है जो कभी उसे मिटाना चाहते थे।
जिस रात रागिनी की गोद में एक बच्चे के जन्म का काग़ज़ आ गिरा था, उस बच्चे को भनक तक नहीं थी। ... वो बेटा इस वक़्त हुमा कैपिटल के बंद फ़्लैट में, एक कुर्सी को घोड़ा बना कर, पूरे कमरे में सरपट दौड़ रहा था। ... छह बरस से जिस राज़ को तारा ने हर साँस से सँभाला था, वो इस सुबह अपने दूध के दाँतों से खिलखिला रहा था।
"बेला मौसी, बेला मौसी! ... देखो मैं कितना तेज़ भागता हूँ! ... मुझे कोई नहीं पकड़ सकता!" ... "मौसी, आप भूत बनो ना, और मुझे पकड़ो। ... बस एक बार।"
"आरव बाबा, ये आज की चौथी कुर्सी है जिसे आपने घोड़ा बनाया है। ... और मैं भूत नहीं बनूँगी।" ... "भूतों की भी इज़्ज़त होती है, बाबा। वो लैपटॉप पर काम करते हैं, बच्चों को नहीं दौड़ाते।"
दरवाज़े पर तारा आ खड़ी हुई। और उसे देखते ही उसका वो 'अमारा' वाला ठंडा नक़ाब इन दीवारों के अंदर पिघल कर गिर गया। ... यहाँ वो कोई लेनदार नहीं थी, हुमा कैपिटल की मालकिन नहीं थी। ... यहाँ वो सिर्फ़ एक माँ थी।
"बस, बस, मेरे शेर। ... बेला मौसी को छोड़ दे, वरना वो सचमुच भूत बन कर तेरा होमवर्क करवाएगी।" ... "इधर आ ज़रा। ... इतनी सुबह इतनी शैतानी कहाँ से लाता है तू?"
"मुम्मा, आज मैं बड़े वाले घर चलूँगा।" ... "आपकी पुरानी फ़ोटो वाला घर। वो बड़ा सा, सोने जैसा चमकने वाला, जहाँ आप छोटी थीं।" ... "और वहाँ मेरे पापा भी तो होंगे ना? ... मैंने उनकी ड्रॉइंग बनाई है। मैं उन्हें ढूँढ लूँगा।"
बच्चा हल्का था, पर उसका ये सवाल छह बरस का बोझ उठाए हुए था। ... वो 'बड़ा सोने वाला घर,' जिसे आरव माँ के एल्बम में देखता था, वही अहूजा हवेली थी, जहाँ से उसकी माँ को चोर कह कर, पेट से, बारिश में घसीटा गया था। ... और जिस पापा को वो ढूँढना चाहता था, वो उसी घर में साँस ले रहा था, इस बात से बेख़बर कि जिस बच्चे को उसने मरा समझ लिया था, वो ज़िंदा है।
"आरव। ... मेरी बात ध्यान से सुन, बेटा।" ... "वो बड़ा घर अच्छे लोगों का घर नहीं है। वहाँ जो लोग रहते हैं, वो हमारे अपने नहीं हैं। तू वहाँ नहीं जाएगा।" ... "और पापा को मुम्मा ख़ुद ढूँढ रही है। सही वक़्त आया, तो मैं ख़ुद तुझे उनके पास ले चलूँगी। ... पर अभी नहीं, मेरे चाँद।"
"आप हमेशा यही कहती हैं। 'सही वक़्त, सही वक़्त।'" ... "मुझे तो लगता है ये सही वक़्त कभी आता ही नहीं। ... शायद ये कहीं रास्ते में खो गया है।"
"आरव बाबा, एक राज़ बताऊँ? ... जो बच्चे ज़िद नहीं करते, उन्हें सही वक़्त पर दो चॉकलेट मिलती हैं।" ... "और जो ज़िद करते हैं... उन्हें भूत वाली मौसी के साथ पूरा होमवर्क।"
तारा ने हँसते बच्चे को बेला के हवाले किया, पर सीने में एक ठंडी लकीर खिंच गई। ... इस पूरी दुनिया में यही एक चीज़ थी, जिसे वो हार नहीं सकती थी। देसाई की फ़ाइल, रतन की थाप देती उँगलियाँ, वो सब वो अपने हाथों से सँभाल सकती थी। ... पर ये पाँच साल का तूफ़ान उसने हर निगाह से दूर, हर दीवार के पीछे छुपा रखा था। और वो जानती थी, दीवारें कभी कभी बिक जाती हैं।
उसी दोपहर, रोशनी हाइट्स के साइट दफ़्तर में, कबीर उसके सामने था। ... वो अब उन बैठकों में सिर्फ़ काम के लिए नहीं आता था, ये वो ख़ुद से भी छुपा नहीं पा रहा था। वो आता था, क्योंकि वो ख़ुद को इस ठंडी, अनबूझ औरत से दूर नहीं रख पा रहा था। और यही बात उसे ख़ुद पर सबसे ज़्यादा खीझ दिलाती थी।
"आप हर दूसरी फ़ाइल पर 'ना' लिख देती हैं, मिस अमारा।" ... "मैंने इस प्रोजेक्ट का पूरा नक़्शा दुबारा बनाया है। मज़दूरों की सुरक्षा, लागत, हर चीज़, ईमानदारी से।" ... "पर आप मंज़ूर नहीं करतीं। आख़िर मुझसे क्या साबित करवाना चाहती हैं?"
"मैं आपसे कुछ साबित नहीं करवाना चाहती, मिस्टर कबीर अहूजा।" ... "मैं बस देखना चाहती हूँ कि इस डूबते ख़ानदान में एक आदमी ऐसा भी है या नहीं, जो हर काम ईमानदारी से करता हो।" ... "अब तक... आप मुझे निराश नहीं करते।"
कबीर एक पल को ठिठक गया। इस औरत के लफ़्ज़ों में कभी कभी एक ऐसी गरमाहट झलक जाती थी, जो उसकी बर्फ़ से मेल नहीं खाती थी। ... और तब वो फाँस फिर उसके सीने में हरकत करती। वो लोरी, जो उसने उस रात इसी के होंठों पर सुनी थी। ... जो इस दुनिया में सिर्फ़ उसकी भाभी गाया करती थी। जो छह बरस पहले मर चुकी थी।
"आप जानती हैं, अमारा... कभी कभी लगता है आप इस घर को मुझसे भी बेहतर जानती हैं।" ... "और उस रात, गलियारे में, वो लोरी जो आपके होंठों पर थी। ... मैंने बहुत कोशिश की, पर मैं उसे भूल नहीं पाया।"
"लोरियाँ सबकी एक जैसी होती हैं, मिस्टर अहूजा। ... चाँद, सितारे, माँ की गोद। ... इसमें भूलने या याद रखने जैसा क्या है?" ... "पर आप उसे भूले नहीं। ... मतलब, आप उस इंसान को बहुत चाहते थे, जो वो लोरी गाती थी।"
"चाहता था।" ... "मेरी भाभी थीं। तारा। ... इस पूरे घर में सिर्फ़ वही एक इंसान थीं, जिन्होंने मुझे कभी पराया नहीं समझा। ... और जिस दिन इस घर ने उन्हें चोर कह कर बारिश में फेंका, मैं वहाँ नहीं था। मैं उन्हें बचा नहीं पाया।" ... "मैं नफ़रत में नहीं भागा था। मैं इसलिए भागा, क्योंकि मैं ख़ुद को माफ़ नहीं कर पा रहा था।"
उसके सामने वो आदमी खड़ा था, जो छह बरस से उसका मातम मना रहा था, जिसने उसके लिए अपना घर छोड़ दिया था। ... और वो उसे बता नहीं सकती थी कि जिसका वो मातम कर रहा है, वो ठीक उसके सामने, एक मेज़ की दूरी पर ज़िंदा साँस ले रही है। ... कमरे की हवा भारी हो गई। एक ही ज़ख़्म के दो किनारे, और बीच में सिर्फ़ छह बरस की चुप्पी।
"आपकी भाभी... बहुत खुशनसीब रही होंगी। ... जो इस पत्थर के घर में उन्हें आप जैसा कोई मिला।" ... "नक़्शा यहीं छोड़ जाइए। मैं देख लूँगी। ... पर आज नहीं। आज मैं और कुछ नहीं सुन सकती।"
और उसी शाम, वो हुआ जिसका तारा को सबसे ज़्यादा डर था। ... आरव को उसकी आया साइट के पास तक लाई थी, ताकि तारा उसे ख़ुद घर ले जाए। पर तारा ट्रैफ़िक में फँसी थी। और आरव, जो माँ की गाड़ी को दूर से पहचान लेता था, आया का हाथ छुड़ा कर, उसी 'बड़े घर' की तलाश में भाग लिया। उसका दिमाग़ बस इतना जानता था कि मुम्मा रोशनी हाइट्स जाती हैं। और वो सीधा अधबने दरवाज़े से अंदर घुस गया।
"ये तो वही घर है... नहीं, ये तो अभी बन रहा है।" ... "कितना ऊँचा है! ... आसमान को छू रहा है।" ... "ऐ, अंकल! ... आप यहाँ काम करते हो? ये इतनी बड़ी बिल्डिंग आप बना रहे हो?"
"अरे, अरे! रुको बेटा, यहाँ मत भागो।" ... "ये जगह बहुत ख़तरनाक है, समझे? यहाँ ऊपर से चीज़ें गिरती हैं।" ... "तुम यहाँ अकेले कैसे आ गए? तुम्हारी मम्मी, पापा कहाँ हैं?"
"मैं अकेला नहीं डरता। मैं बहादुर हूँ।" ... "पापा तो हैं ही नहीं। ... मतलब, हैं, पर मैंने उन्हें कभी देखा नहीं। मुम्मा कहती हैं वो कहीं बहुत दूर हैं।" ... "पर मैंने उनकी ड्रॉइंग बनाई है! उनकी बड़ी बड़ी आँखें हैं। बिल्कुल मेरी जैसी।"
कबीर उस बच्चे को देखता रह गया। ... उन बड़ी बड़ी, गहरी आँखों में कुछ था। कोई जानी-पहचानी सी चीज़, किसी पुरानी तस्वीर का कोना, जिसे वो पकड़ नहीं पा रहा था। ... पर उसने वो ख़याल झटक दिया। ... उसे नहीं पता था कि जिस चेहरे का कोना वो ढूँढ रहा था, वो उसके अपने ख़ून का था।
"अच्छा? इतनी बड़ी बड़ी आँखें?" ... "तो तुम भी बहादुर, और तुम्हारे पापा भी। बड़े शेरों का ख़ानदान है तुम्हारा।" ... "चलो, जब तक तुम्हारी मुम्मा नहीं आतीं, मैं बताता हूँ कि इतनी ऊँची इमारत कैसे खड़ी होती है। पर एक शर्त पर, मेरा हाथ पकड़ कर।"
"सच में? ... आप मुझे इतना ऊपर ले चलोगे?" ... "अंकल, आप मुम्मा से भी अच्छे हो। ... मुम्मा तो कहती हैं हर चीज़ ख़तरनाक है। आप कह रहे हो चलो देखते हैं।"
"तुम्हारी मुम्मा बिल्कुल सही कहती हैं, छोटे शेर। ... ये दुनिया सचमुच बहुत ख़तरनाक है।" ... "पता नहीं क्यों... तुमसे बात कर के लगता है, जैसे मैं तुम्हें बरसों से जानता हूँ। कोई अपना सा हो तुम।"
और ठीक उसी पल, तारा साइट के गेट पर पहुँची। ... दिल हलक़ में अटका था। आया का घबराया फ़ोन आया था कि आरव भाग गया है, और वो सीधे उसी जगह दौड़ी आई थी जिसका उसे सबसे ज़्यादा डर था। ... पर जो उसने देखा, उसने उसकी साँस रोक दी।
उसका बेटा, कबीर की उँगली थामे, गर्दन उठा कर उस अधूरी इमारत को देख रहा था, और दोनों खिलखिला कर हँस रहे थे। ... वो चाचा-भतीजे जैसे लग रहे थे, जो असल में थे, पर जिसे नाम देने वाला वहाँ कोई नहीं था। ... और तारा के सीने में छह बरस से जमी कोई चीज़ अचानक चटक कर टूट गई। ये वो परिवार था, जो उसका हो सकता था। जो उससे एक झूठे इल्ज़ाम में छीन लिया गया था।
"आरव!" ... "तुमने आया का हाथ क्यों छोड़ा? पता है मैं कितनी डर गई थी?" ... "माफ़ कीजिए, मिस्टर अहूजा। ... ये मेरी सहयोगी बेला का बेटा है। बहुत शैतान है। ... मैं इसे ले जाती हूँ।"
"बेला का बेटा?" ... "बहुत प्यारा बच्चा है। और बहादुर भी। इससे बातें कर के अच्छा लगा।" ... "फिर मिलेंगे, छोटे शेर। ... अपनी मुम्मा का, मतलब, मौसी का हाथ मत छोड़ना।"
तारा आरव को गोद में उठा कर तेज़ क़दमों से बाहर निकल गई, और गाड़ी तक उसका दिल धड़कता रहा। ... डर से नहीं। उस एक तस्वीर से, जो अब उसकी आँखों में जड़ गई थी। उसका बेटा, और वो अकेला अहूजा जो कभी सच के साथ खड़ा था, एक साथ हँसते हुए। ... ये कितना ख़तरनाक था। और, हे भगवान, ये कितना सही लगता था। ... और यही, दोनों बातों का एक साथ सच होना, सबसे डराने वाली बात थी।
उस रात, हुमा कैपिटल के दफ़्तर में सारी बत्तियाँ बुझ चुकी थीं। सिर्फ़ एक मेज़ की लैंप जल रही थी। बेला के सामने अहूजा ख़ानदान के क़र्ज़ की फ़ाइलें बिखरी थीं, और तारा खिड़की के पास खड़ी, दूर चाँदनी चौक की रोशनियों को यूँ देख रही थी, जैसे किसी पुराने ज़ख़्म को देख रही हो।
"देसाई ने आज फिर फ़ोन किया था।" ... "वो हादसे की फ़ाइल बंद करने को तैयार नहीं। कहता है, जब तक लाश या ख़ुद वो औरत सामने ना आए, फ़ाइल खुली रहेगी।" ... "और मेहरबान ट्रेडर्स का धागा घूम कर रतन चाचा तक जाता है। पर बटरा की गवाही के बिना, अदालत में एक पत्ता भी नहीं हिलेगा।" ... "और आज आरव वाली बात के बाद... मुझे लगता है तुम्हें थोड़ा रुकना चाहिए।"
"रुकना।" ... "बेला, आज मैंने अपने बेटे को उसी ख़ानदान के एक आदमी की उँगली थामे, खिलखिला कर हँसते देखा। ... उसी ख़ानदान के, जिसने मुझे चोर कह कर, पेट से, बारिश में फेंक दिया था। ... मेरा बेटा उस घर से बस एक हाथ की दूरी पर था। एक हाथ की।"
"और यही तो मैं कह रही हूँ, तारा। ... तुम इस परिवार के जितने पास रहोगी, आरव उतना ही ख़तरे में होगा।" ... "रतन का आदमी अब भी शहर में घूम रहा है। देसाई हर तरफ़ सूँघ रहा है। ... अगर किसी को भी शक हुआ कि वो बच्चा किसका है... तो हम उसे नहीं बचा पाएँगे।"
"इसीलिए मैं रुकूँगी नहीं, बेला। ... मैं और तेज़ चलूँगी।" ... "मैंने सोचा था, ये बदला मैं इत्मीनान से लूँगी। एक-एक कौर, महीनों में, बरसों में। ... पर अब वक़्त बदल गया है। जब तक ये ख़ानदान खड़ा है, मेरा बेटा उनकी पहुँच में है। ... तो अब मैं और इंतज़ार नहीं करूँगी।"
"हर कौर, जो मुझे महीनों में परोसना था, वो अब मैं हफ़्तों में परोसूँगी। ... एक-एक करके, इस पूरे अहूजा ख़ानदान को उधेड़ दूँगी, इससे पहले कि इनकी परछाईं भी मेरे बच्चे तक पहुँचे।" ... "ये अधूरा हिसाब अब जल्दी पूरा होगा। ... क्योंकि अब सिर्फ़ मेरी राख दाँव पर नहीं है। ... अब मेरे चाँद का टुकड़ा दाँव पर है।"
और उस एक फ़ैसले के साथ, वो धीमी, सधी हुई चाल, जो तारा ने छह बरस की राख में बैठ कर बुनी थी, अचानक आग पकड़ गई। ... अब बस एक माँ थी, और उसके और उसके बेटे के बीच खड़ा एक पूरा ख़ानदान, जिसे वो अब हफ़्तों में गिरा देना चाहती थी। ... बेला को पहली बार उसकी ठंडक से नहीं, उसकी इस जल्दबाज़ी से डर लगा, क्योंकि जल्दबाज़ शिकारी ख़ुद भी फंदे के क़रीब आ जाता है। ... और शहर के दूसरे सिरे पर, रागिनी की दराज़ में एक बच्चे के जन्म का काग़ज़ बंद पड़ा था, उसी जल्दबाज़ी का इंतज़ार करता हुआ, जो अभी अभी शुरू हुई थी।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।