अध्याय 27 / 30
आख़िरी कौर
राख से उठी द्वारा Avni Oberoi
तारा और आरव गिर कर इक्कीसवीं मंज़िल के टूटते फ़र्श पर बच तो जाते हैं, पर उसी क़ब्रनुमा मलबे में रतन के साथ क़ैद हो जाते हैं, जहाँ तारा गिड़गिड़ाने के बजाय एक फ़ैसला सुनाती है, कि हुमा उसका एक-एक क़र्ज़ ले चुकी है, बटरा ज़िंदा है, और रतन की अपनी आवाज़ वाली रिकॉर्डिंग आज रात पुलिस समेत सौ हाथों में पहुँच चुकी है। कबीर और समर बटरा और पुलिस के साथ टूटी इमारत चढ़ कर उस तक पहुँचते हैं पर गड्ढे के उस पार बेबस रह जाते हैं, और बर्बाद पर घातक रतन तारा की छत थामे आख़िरी सरिये पर हाथ रख कर आख़िरी सौदा रखता है, बच्चे की उम्र भर की हिफ़ाज़त के बदले उसकी ख़ामोशी और हमेशा की गुमनामी।
गिरना एक पल का नहीं, एक पूरी उम्र जितना लंबा था। तारा ने गिरते-गिरते आरव को अपने सीने में यूँ भींच लिया जैसे कोई अपनी आख़िरी साँस को भींचता है, अपने बदन को अपने बच्चे और आती मौत के बीच एक ढाल बना कर। और फिर वो काला ख़ालीपन नहीं आया, बल्कि एक अधूरी, आधी ढली छत, बाईसवीं के नीचे इक्कीसवीं का वो टुकड़ा, जिस पर वो दोनों एक टूटी गठरी की तरह आ गिरे। चारों तरफ़ धूल एक रुकी हुई साँस की तरह लटकी थी, और पूरी इमारत एक घायल जानवर की तरह कराह रही थी।
“मुम्मा...” ... “मुम्मा, मेरे मुँह में मिट्टी आ गई। और मेरा घुटना... मेरा घुटना छिल गया।” ... “पर मैं रोया नहीं। देखा? मैं बहादुर हूँ ना, बिल्कुल तुम्हारी तरह।”
“हाँ, मेरे चाँद, तू बहादुर है। सबसे बहादुर।” ... “हिल पा रहा है? हाथ, पैर, सब? हाँ... शाबाश। बस घुटना छिला है, उसे मुम्मा ठीक कर देगी।” ... “मैं यहीं हूँ, तेरे साथ। हम गिरे ज़रूर हैं, बेटा, पर हम दोनों साथ गिरे, और अब हम दोनों साथ उठेंगे।”
पर जिस छत ने उन्हें थामा था, वो ख़ुद एक टूटता हुआ वादा थी। इक्कीसवीं का वो अधूरा टुकड़ा एक कोने से चटख़ चुका था, चंद नंगे सरियों के सहारे झूलता, और उसके परे सिर्फ़ इक्कीस मंज़िलों का काला, भूखा ख़ालीपन। छत एक उँगली भर और झुकी, और उसके किनारे से कंकड़ों की एक लकीर सरक कर उस अँधेरे में गिरती चली गई, बिना किसी आवाज़, जैसे अँधेरे ने उन्हें चुपचाप निगल लिया हो।
“मुम्मा, ये ज़मीन भी हिल रही है, बिल्कुल ऊपर वाली की तरह।” ... “वो बुड्ढे अंकल ने फिर से कुछ किया ना? वो अच्छे नहीं हैं। मुझे तो पहले ही दिन से पता था।”
“हाँ बेटा, वो अच्छे नहीं हैं। पर तू अब आँखें बंद कर, और मेरी गर्दन में मुँह छुपा ले, बस।” ... “मुम्मा को एक आख़िरी काम करना है, बस एक। और फिर हम घर जाएँगे, पक्का वाला पक्का।”
और बैठती धूल में से, बिना किसी जल्दी के, वो आदमी नीचे उतरा। बाईसवीं के उसी भरभराए किनारे की ढलान से रतन अहूजा उसी अधूरी छत पर उतर आया, अपने कोट से धूल झाड़ता, जैसे किसी दावत की मेज़ से उठ कर आया हो। उसके पीछे एक और लेंटर टूट कर गिरा और उस टूटी जगह के इकलौते मुँह को बंद कर गया, और अब वो तीनों एक कंक्रीट की क़ब्र में क़ैद थे। ऊपर वो अकेला पीला बल्ब अब भी झूल रहा था, और झुकती छत पर उनके सायों को लंबा खींच रहा था।
“हद है। छह बरस पहले भी तुम मरते-मरते बच गई थीं, और आज भी।” ... “तुम्हारे अंदर कोई चीज़ है, तारा, जो मरना ही नहीं जानती। कोई बात नहीं। मैं आज उसी चीज़ को अपने हाथों से बंद करने आया हूँ, इस बार अपनी आँखों से।”
और तारा उठ खड़ी हुई, एक बाँह अपने बेटे के आगे एक दीवार की तरह ताने। काँपती माँ एक पल में तह हो कर पीछे चली गई, और आँखों में छह बरस की राख लिए वो लेनदार सामने आ खड़ी हुई, जिसके एक लफ़्ज़ पर पूरा अहूजा ख़ानदान झुकता था। ना डरी हुई, ना गिड़गिड़ाती। यही वो चेहरा था जिसे पहनने के लिए वो छह बरस से राख से उठती आई थी।
“तुम मुझे बंद करने आए हो, रतन? तुम बहुत देर से आए। मैं तो कब की बंद हो चुकी थी, उसी रात, उसी ट्रेन पर।” ... “जो औरत तुम्हारे सामने खड़ी है ना, ये सिर्फ़ तारा नहीं है। ये हुमा कैपिटल है। और हुमा के हाथ में अहूजा ख़ानदान का एक-एक क़र्ज़, इस डूबती इमारत का एक-एक सरिया है।” ... “तुम्हारे पास आज की रात अपना कहने को कुछ नहीं बचा, सिवाय इस अँधेरे के, जिसमें तुम मुझे धकेलने आए थे।”
“पैसा।” ... “पैसा तो सिर्फ़ काग़ज़ है, तारा। और काग़ज़ इसी इमारत के साथ राख हो जाएगा। तुम्हारा हुमा, तुम्हारे सबूत, सब इसी मलबे में दफ़्न हो जाएँगे, तुम्हारे और तुम्हारे इस पिल्ले के साथ।” ... “कल सुबह अख़बार बस इतना कहेगा कि एक अधूरी इमारत गिर गई, और शहर एक बार फिर मुझ पर तरस खाएगा।”
“तुम्हें अब भी लगता है ये काग़ज़ों की लड़ाई है?” ... “बटरा ज़िंदा है, रतन। बेला के पहरे में, महफ़ूज़। और वो रिकॉर्डिंग, जिसमें तुम्हारी अपनी आवाज़ मेरी मौत का हुक्म देती है, वो अब सिर्फ़ बटरा के फ़ोन में नहीं है। वो आज रात सौ हाथों में पहुँच चुकी है, वकीलों और अख़बारों के पास...” ... “...और ठीक इस वक़्त, नीचे, तुम्हारी अपनी दावत के दरवाज़े पर, पुलिस के हाथों में। तुम इस इमारत को गिरा भी दो, तो भी अब मुझे नहीं मिटा सकते। मैं वो आग हूँ जो पहले ही हर तरफ़ फैल चुकी है।”
और छह बरस में पहली बार, वो मेहरबान मुस्कान वापस नहीं आई। रतन के माथे पर वो सिलवट पड़ी जो एक शतरंज के खिलाड़ी के चेहरे पर तब पड़ती है जब उसे दिखता है कि मात दो चाल पहले ही हो चुकी थी। वो आदमी, जिसने पूरे ख़ानदान को एक-एक कर के दफ़नाया था, आज उस एक क़ब्र को देख रहा था जो बंद होने से इनकार कर चुकी थी।
“तुमने ये सब... सिर्फ़ मुझे बर्बाद करने के लिए किया।” ... “गाला में मेरा वो झूठा आँकड़ा, कबीर की वापसी, समर का टूटना, एक-एक कौर... ये कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं था। तुम छह बरस से मेरी ही मेज़ पर बैठ कर, मेरी ही दावत को, कौर-दर-कौर, मेरे ही ख़िलाफ़ पका रही थीं।”
“अब समझे, रतन? हर दावत का एक आख़िरी कौर होता है।” ... “और वो आख़िरी कौर हमेशा मेज़बान ख़ुद खाता है, अपनी ही मेज़ पर, अपने ही हाथों परोसा हुआ। तुमने छह बरस पहले मेरे नाम पर जो झूठ लिखा था, आज उसी झूठ ने तुम्हारा असली चेहरा सौ लोगों के सामने रख दिया।” ... “और तुम्हारा सबसे गहरा गुनाह, बाबूजी का क़त्ल, वो तुमने अभी, इसी छत पर, अपने मुँह से क़बूल किया है, और समर और कबीर, दोनों ने सुना है। तुम्हारा हिसाब कब का पूरा हो चुका है। मैं तो बस आख़िरी दस्तख़त करने आई हूँ।”
“मुम्मा...” ... “तुम जीत गई ना? तुमने बोला था ना कि हम दोनों साथ उठेंगे।” ... “अब हम घर चलें? मुझे नींद आ रही है, मुम्मा।”
“नहीं, मेरे चाँद, अभी सोना नहीं। आँखें खुली रखना, बस मेरे लिए, थोड़ी देर और।” ... “तुम्हारा वक़्त पूरा हुआ, रतन। छह बरस पहले भी, और आज भी।”
और ठीक उसी पल, उस सील क़ब्र के परे, रौशनी और शोर एक साथ फट पड़े। नीचे दावत के हॉल से चीख़ें उठ रही थीं, और पुलिस के सायरन की नीली-लाल रौशनी इमारत के नंगे कंकाल पर नाच रही थी। बेला ने वो आख़िरी, सबसे कठिन काम कर दिया था, घायल बटरा को, वो रिकॉर्डिंग, और दिल्ली पुलिस को, तीनों को उसी दावत के दरवाज़े पर एक साथ ला खड़ा किया था। और उसी टूटी इमारत की रीढ़ पर कबीर और समर, अपने डर से भी तेज़, उसी अँधेरी छत की तरफ़ चढ़े आ रहे थे।
“तारा! तारा, तुम वहाँ हो? आवाज़ दो, ख़ुदा के लिए!” ... “मैं देख रहा हूँ तुम्हें... रुको, हिलना मत! तुम्हारे और मेरे बीच पूरा फ़र्श गिर चुका है। बस वहीं रुको, आरव को पकड़े रहो, मैं कोई रास्ता निकालता हूँ, मैं तुम दोनों को ज़िंदा निकालूँगा!”
“आरव!” ... “आरव, बेटा, मैं आ रहा हूँ तुम्हारे पास। तुम्हें कुछ नहीं होगा, मैं क़सम खाता हूँ, तुम्हें छूने से पहले किसी को मुझसे गुज़रना होगा।” ... “तारा, उसे मत छोड़ना। कुछ भी हो जाए, उसका हाथ मत छोड़ना।”
पर उन दोनों आदमियों और उस माँ के बीच एक काला गड्ढा था, जिसे कोई मोहब्बत एक छलाँग में पार नहीं कर सकती। कबीर और समर उस पार खड़े, हाथ बढ़ाए, बेबस। और तारा की तरफ़, उसके और बचने के इकलौते रास्ते के बीच, सिर्फ़ एक चीज़ खड़ी थी, रतन। उसके पैरों तले छत एक इंच और झुकी, और उसे थामे आख़िरी सरिये एक बारीक, खिंची हुई आवाज़ में गाने लगे।
“मुम्मा...” ... “वो अंकल मुझे मेरे नाम से क्यों बुला रहे हैं? वो... वो बिल्कुल मेरी ड्रॉइंग जैसे दिखते हैं। जैसे मेरे पापा।”
“बस मुझे देख, बेटा। सिर्फ़ मुझे।” ... “वो सब बाद में, मेरे चाँद, बहुत सारी बातें बाद में। अभी सिर्फ़ इतना कर, कि मुम्मा को कस के पकड़ ले, और साँस लेता रह, बस साँस लेता रह।”
और रतन ने, बर्बाद हो कर भी, वो एक ताक़त देख ली जो एक ख़त्म हुए आदमी के पास आख़िर तक बचती है, ये कि वो अब भी चुन सकता है कि किसे अपने साथ ले डूबेगा। वो बचने के इकलौते रास्ते, उस मज़बूत गर्डर पर जा खड़ा हुआ, और अपना एक हाथ, लगभग नरमी से, तारा की छत को थामे उस आख़िरी सरिये पर रख दिया। गड्ढे के उस पार से कबीर एक चेतावनी चीख़ा, और सिवाय देखने के कुछ नहीं कर सका।
“एक आख़िरी सौदा, तारा।” ... “तुम सही कहती हो, मैं ख़त्म हो चुका हूँ। जेल जाऊँगा, शायद फाँसी। पर एक ख़त्म हुआ आदमी भी चुन सकता है कि वो क्या पीछे छोड़ जाए।” ... “मेरे आदमी अब भी बाहर हैं। मैं सलाख़ों के पीछे से भी उस बच्चे तक पहुँच सकता हूँ, आज नहीं तो दस बरस बाद। या... मैं उन्हें हमेशा के लिए रोक सकता हूँ। बदले में सिर्फ़ इतना, कि तारा फिर से मर जाए, अमारा हमेशा के लिए ग़ायब हो जाए। तुम अपने बेटे को ले कर इस शहर से निकल जाओ।” ... “तुम्हारा छह बरस का इंसाफ़, या तुम्हारे बेटे की पूरी ज़िंदगी, दोनों एक साथ हाथ नहीं आएँगे। जल्दी सोचो, ये सरिया और मेरा सब्र, दोनों ज़्यादा देर नहीं टिकेंगे।”
और वो सवाल उस झुकती छत पर उन दोनों के बीच आ कर रख दिया गया, वो एक हिसाब जिसे वो चुका नहीं सकती थी। एक तरफ़ छह बरस का इंसाफ़, एक बेगुनाह का साफ़ हुआ नाम, और पूरे शहर के सामने खुला सच। और तराज़ू के दूसरे पलड़े में, सिर्फ़ एक नन्ही धड़कन, उसके अपने सीने से लगी, तेज़-तेज़ चलती हुई। और इस पूरी कायनात में ये चुनाव करने वाला सिर्फ़ एक इंसान था, वो ख़ुद।
“मुम्मा...” ... “तुम फ़िक्र मत करो। तुम जो भी करोगी, वो सही ही होगा। तुम हमेशा सही होती हो।”
“रतन...” ... “तुम जानते हो ना कि तुम मुझसे क्या माँग रहे हो। एक माँ से या तो उसका इंसाफ़, या उसका बच्चा।” ... “छह बरस... मैं छह बरस सिर्फ़ इसी एक रात के लिए राख से उठती रही, रतन। और अब तुम मुझसे कह रहे हो कि उस राख को फिर से अपने ऊपर ओढ़ लूँ।”
और पूरी टूटी इमारत जैसे उसके जवाब के लिए साँस रोक कर रुक गई। झूलता बल्ब, गाते सरिये, और उसके सीने से लगी एक तेज़ धड़कन, सब उस एक लफ़्ज़ पर आ कर ठहर गए जो अभी तारा के होंठों पर काँप रहा था। और उसने अपने बेटे को और कस के भींचा, अपने क़ातिल की आँखों में आँखें डालीं, और अपना आख़िरी फ़ैसला सुनाने के लिए मुँह खोला...
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