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अध्याय 6 / 30

आईने में चेहरा

राख से उठी द्वारा Avni Oberoi

देसाई की क़लम हवा में टँगी रह गई, और उस सवाल का बोझ पूरे दालान पर बैठ गया। ... कोई हिला नहीं। माजी का हाथ अपने ही गले के हार पर जम गया, समर पत्थर बना खड़ा रहा, और रागिनी फाटक के पास साँस रोके खड़ी थी। पर सबसे ज़्यादा जिसका ख़ून जमा, वो दालान के बीचोबीच खड़ी थी। अमारा। जिस औरत के मरने का हलफ़नामा ये लोग अभी उठाने वाले थे, वो अगर एक साँस भी ग़लत लेती, तो छह साल की राख फिर से आग बन जाती।

और अमारा जानती थी, ये फ़ाइल सिर्फ़ एक काग़ज़ नहीं थी। एक मुर्दा तारा इस घर के लिए एक किस्सा थी। पर एक ज़िंदा तारा... एक निशाना थी। जिस दिन ये जाँच उस रात की तह तक जाती, उस दिन दुनिया को पता चलता कि हादसा कोई हादसा नहीं था। और रतन को पता चलता कि जिसे उसने ट्रेन के साथ दफ़नाया था, वो साँस ले रही है। ये क़ब्र किसी और के हाथ में नहीं रहनी चाहिए थी। सिर्फ़ उसके।

"एक मिनट, मिस्टर देसाई।" ... "आप जिस फ़ाइल की बात कर रहे हैं, वो अब सिर्फ़ इस ख़ानदान का मामला नहीं है। ... इस घर की हर ईंट, हर काग़ज़, हर अधूरा मुक़दमा, आज हुमा कैपिटल की ज़मानत पर टिका है। और एक लापता इंसान की खुली फ़ाइल, मेरी उसी ज़मानत पर एक दाग़ है। ... सो ये मामला अब से हुमा की क़ानूनी टीम देखेगी।"

ख़ानदान ने एक पल को राहत की साँस ली, जैसे बीच में कोई ढाल आ गई हो। पर देसाई की थकी आँखें अमारा के चेहरे पर एक पल ज़्यादा ठहर गईं। वो इतने बरसों से सवाल पूछता आया था कि उसे झूठ की नहीं, जल्दबाज़ी की बू आती थी। और ये अजनबी लेनदार एक बहू की क़ब्र और उसके बीच यूँ आ खड़ी हुई थी, जैसे उसे घरवालों से भी ज़्यादा उसकी फ़िक्र हो।

"अजीब बात है, मैडम। ... इस घर के अपने लोग तो इस नाम पर पत्थर हो गए, और एक अजनबी लेनदार को इसकी इतनी चिंता है।"

"ख़ैर, मुझे कोई एतराज़ नहीं। आपकी क़ानूनी टीम से बात कर लूँगा। ... पर एक बात साफ़ कर दूँ। ये फ़ाइल तब तक बंद नहीं होगी, जब तक मुझे तीन में से एक चीज़ ना मिले। एक लाश। या मौत का पक्का सबूत। ... या फिर वो औरत, ख़ुद, ज़िंदा।"

'या फिर वो औरत, ख़ुद, ज़िंदा।' ... वो लफ़्ज़ दालान में यूँ गिरे, जैसे किसी ने अनजाने में ठीक उसी ताले पर हाथ रख दिया हो। अमारा के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आई, पर आँचल के नीचे उसकी मुट्ठी भिंच गई। सामने खड़ा ये थका सा आदमी नहीं जानता था, कि उसके सवाल का जवाब उसी कमरे में, उसी की आँखों के सामने, साँस ले रहा था।

"आपको आपकी तीनों में से एक चीज़ ज़रूर मिलेगी, मिस्टर देसाई। ... मैं आपको यक़ीन दिलाती हूँ।" ... "कुछ हिसाब बरसों बंद पड़े रहते हैं, फिर भी अधूरे रह जाते हैं। जब तक आख़िरी पाई ना चुके, कोई फ़ाइल सच में बंद नहीं होती। ... और मैं अधूरे हिसाब यूँ ही नहीं छोड़ती। ... ये भी पूरा हो कर रहेगा।"

देसाई ने सिर हिलाया, अपनी घिसी फ़ाइल बग़ल में दबाई, और उसी थकान भरी चाल से दालान से बाहर निकल गया। ख़ानदान ने राहत में एक दूसरे को देखा, हुमा ने एक और तूफ़ान टाल दिया था। पर किसी ने वो नहीं देखा जो अमारा के आँचल के नीचे हो रहा था, जहाँ उसका हाथ, छह साल में पहली बार, थम नहीं पा रहा था। जिस राख से वो उठी थी, अब उस पर एक आदमी कुदाल ले कर खड़ा हो गया था।

उसी रात, शहर के दूसरे सिरे पर, हुमा कैपिटल की सबसे ऊँची मंज़िल पर, वो चेहरा उतर गया जिसे दुनिया अमारा कहती थी। ... यहाँ कोई अहूजा नहीं देखता था। यहाँ वो कोई ठंडी लेनदार नहीं, बस एक थकी हुई औरत थी। और उसकी इकलौती हमराज़, बेला, बहीखातों का ढेर लिए उसका इंतज़ार कर रही थी।

"अच्छी ख़बर पहले सुनोगी या बुरी?" ... "अच्छी ये कि तुम्हारे उस अस्सी करोड़ वाले तमाशे के बाद पूरा बाज़ार मेहरबान ट्रेडर्स का नाम फुसफुसा रहा है। रतन की तिजोरी में दरार आ गई है।"

"और बुरी ये... कि वो देसाई कोई मामूली बाबू नहीं है, तारा। एक बंद हादसा एक भूत होता है। एक खुला हादसा... एक तलाश होती है। और तलाश एक दिन उस औरत तक पहुँच सकती है, जिसे राख हो जाना था।"

"मैं जानती थी, बेला। ये फ़ाइल एक दिन ज़रूर जागेगी।" ... "छह साल मैंने इसी डर के साथ साँस ली है, कि कोई ना कोई एक दिन उस रात की तह खोदेगा। ... पर मैं इसीलिए तो अंदर आई हूँ। बाहर बैठ कर मैं इन्हें डुबो सकती थी। पर बाहर बैठ कर मैं अपना नाम साफ़ नहीं करा सकती थी। ना उस आदमी तक पहुँच सकती थी, जिसने मुझे उस ट्रेन पर चढ़ाया।"

"पर उस आदमी को भी तो तुम्हारी बू आने लगी है। ... गाला में तुमने ख़ुद देखा, रतन की उँगलियाँ मेज़ पर वो एक... दो... तीन कर रही थीं। वो जान गया है कि किसी ने उसकी तिजोरी को हाथ लगाया है।"

"और तुम भूली नहीं होगी, वो अपने आदमी से पहले ही कह चुका है, कि जैसे एक बहू ट्रेन के साथ ग़ायब हुई थी, वैसे एक लेनदार भी हो सकती है। ... अब उसमें ये देसाई और उसकी खुली फ़ाइल जोड़ दो। तारा, थोड़ा रुक जाओ। कौर धीरे परोसो। फ़ाइल को ठंडा पड़ने दो।"

"नहीं।" ... "अगर मैं रुकी, तो रतन मेहरबान ट्रेडर्स का हर धागा जला देगा। और फिर वही करेगा जो छह साल पहले किया था। एक मरी हुई तारा के नाम पर अपनी चोरी दुबारा मढ़ देगा। मैं उसे अपना नाम दुबारा गंदा नहीं करने दूँगी। ... मैं छह साल राख के नीचे दबी पड़ी रही, बेला। अब जब आँच उठी है, तो मैं इसे बुझने नहीं दूँगी। ... चाहे इस आँच में मैं ख़ुद क्यों ना झुलस जाऊँ।"

बेला ने एक लंबी साँस छोड़ी। वही पुरानी बहस, वही ज़िद। वो जानती थी, इस औरत को रोकना उस आँच को नंगी हथेली से रोकने जैसा था। ... और एक फाँस और थी, जो अमारा ने अभी बेला से भी नहीं कही थी। कबीर। जिसने उस रात, उस अँधेरे गलियारे में, लोरी पहचान ली थी। वो नन्हा सा शक अब भी उसके देवर के सीने में धँसा था, और अमारा उसे पूरी तरह निकाल नहीं पाई थी।

"ठीक है। ... जैसा तुम कहो।" ... "मैंने तुम्हें एक बार उस ट्रेन के मलबे से खींच निकाला था, याद है? आधी मरी, बे-नाम। तब भी तुमने मेरी नहीं सुनी थी, ज़िंदा रहने की ज़िद पकड़ ली थी। ... तो अब भी नहीं सुनोगी।" ... "पर याद रखना। इस बार अगर तुम मलबे में दबीं, तो अकेली नहीं दबोगी। एक और भी है, जो उधर पर्दे के पीछे सो रहा है।"

उस एक लफ़्ज़ पर अमारा की सारी ज़िद एक पल को पिघल गई। वो उठ कर उस दरवाज़े तक गई, जहाँ पर्दे के पीछे उसका पाँच साल का बेटा गहरी नींद में सोया था। उसकी साँसों की हल्की आवाज़ से कमरे का सारा तनाव जैसे धुल गया।

"आज शाम भर कुछ बनाता रहा, बेला। ... मैंने पूछा तो काग़ज़ छाती से लगा कर छुपा लिया। कहता है, 'ये मुम्मा के लिए सरप्राइज़ है।'" ... "ये सारी आग, ये सारा बदला, बेला, सब इसी एक चाँद के टुकड़े के लिए है। ... बस थोड़ा और। माँ हर कौर चुका कर आएगी।"

अगली दोपहर, अहूजा हवेली। रोशनी हाइट्स के काग़ज़ात के सिलसिले में अमारा एक बार फिर उन्हीं दीवारों के अंदर थी, जिन्होंने कभी तारा को बाहर फेंका था। ... पुरानी बैठक में, जहाँ एक ऊँचा, सुनहरे फ़्रेम वाला क़दीमी आईना दीवार घेरे खड़ा था, रागिनी ने उसे अकेला पा लिया।

"अमारा जी। ... आप इस घर में यूँ घूमती हैं, जैसे यहाँ का हर कोना आपका जाना-पहचाना हो।" ... "मैं कब से सोच रही थी, आख़िर आप हैं कौन? हुमा कैपिटल, हुमा कैपिटल... पर उसके पीछे का चेहरा तो कोई नहीं जानता। ... आप जैसी औरतें आसमान से तो नहीं टपकतीं। कहाँ से आती हैं आप?"

"मैं वहाँ से आती हूँ, रागिनी जी..." ... "...जहाँ आप जैसे लोग किसी को बे-नाम कर के फेंक आते हैं, और उसी रात चैन से सो जाते हैं। ... दुनिया में ऐसी बहुत सी जगहें हैं। भरी पड़ी हैं, उन लोगों से जिन्हें किसी ने कभी राख समझ कर झाड़ दिया था।"

रागिनी कुछ कहने को हुई, पर तभी दोनों की नज़र सामने उस पुराने आईने में जा टकराई। ... एक पल को, सुनहरे फ़्रेम के उस काँच में, दो औरतों की आँखें यूँ मिलीं, जैसे किसी और ही ज़माने में मिली हों। रागिनी की रीढ़ में एक ठंडी लहर उतर गई। उसे लगा, ये आँखें उसने पहले भी देखी हैं। इसी घर में। शायद इसी आईने के सामने। किसी एक बरसाती रात के आस पास।

"आपकी आँखें..." ... "...ख़ैर, छोड़िए। ... मैं आपको बस एक बात समझाने आई थी, अमारा जी। ये घर होशियार औरतों को हज़म नहीं कर पाता। ... जो यहाँ ज़रूरत से ज़्यादा समझदार बनती है ना, उसका पत्ता किसी ना किसी बरसात में साफ़ हो ही जाता है। ... सोच समझ कर क़दम रखिएगा।"

"शुक्रिया, इस फ़िक्र के लिए।" ... "पर एक बात आप भी याद रखिए, रागिनी जी। इन पुराने आईनों की याददाश्त बहुत लंबी होती है। ... इन्होंने इस घर में बहुत कुछ देखा है, जो लोग अब भूल जाना चाहते हैं। ... सँभल कर देखिएगा। कहीं किसी दिन इसी आईने में आपको वो चेहरा ना दिख जाए, जिसे आपने बरसों पहले मिटा दिया था।"

अमारा पलट कर बैठक से निकल गई, और रागिनी वहीं, उस बड़े आईने के सामने, अकेली रह गई। ... उसने अपना ही अक्स देखा, और एक पल को सिहर उठी, जैसे काँच के उस पार से कोई और उसे घूर रहा हो। उसने ख़ुद को झिड़का। 'मरे हुए लौटते नहीं,' उसने मन ही मन दोहराया। पर उसकी आवाज़ में अब पहले जैसा यक़ीन नहीं था।

उसी दोपहर, जब अमारा हवेली के उस छोटे से कमरे में लौटी, जिसे उसने पुनर्गठन के काम के लिए अपना दफ़्तर बना रखा था, बेला का फ़ोन बजा। ... बेला ने सुना, और उसका हमेशा शांत रहने वाला चेहरा एक पल में बदल गया। ... "आरव के स्कूल से है।"

"टीचर कह रही थी... आज क्लास में बच्चों से उनका परिवार बनवाया गया। ... आरव ने अपने पापा बनाए, तारा।" ... "इस बार बिना चेहरे वाले नहीं। ... एक चेहरा। पूरा, साफ़, जैसे उसने उसे कहीं देखा हो।"

"टीचर हँस रही थी कि बच्चे ने कितनी मेहनत से बनाया। पर मैंने वो ड्रॉइंग देखी है, तारा... और वो चेहरा... वो इसी घर का चेहरा है। बिल्कुल अहूजा।"

"ये कैसे मुमकिन है, बेला?" ... "उसने आज तक समर की सूरत तक नहीं देखी। एक तस्वीर तक नहीं। ... फिर उसने वो चेहरा बनाया कैसे?"

"ख़ून, बेला। ख़ून अपने ख़ून को पहचान लेता है, चाहे आँखों ने उसे कभी ना देखा हो। ... वो ड्रॉइंग मुझे चाहिए। अभी। किसी और की नज़र उस पर पड़े, उससे पहले।"

कुछ ही देर में वो ड्रॉइंग अमारा के उस छोटे कमरे की मेज़ पर थी। एक बच्चे की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों में बना एक चेहरा, वही अहूजा जबड़ा, वही आँखें, जो हूबहू समर की थीं। और उसके साथ, एक माँ, और सिर के ऊपर एक बड़ा सा चाँद, जिसका एक टुकड़ा माँ बच्चे की तरफ़ बढ़ा रही थी। ... अमारा उस काग़ज़ को देखती रह गई, जैसे उसका बेटा वो सच काग़ज़ पर उतार लाया हो, जिसे वो छह साल से छुपाती आई थी।

तभी नीचे से आवाज़ आई, हुमा की क़ानूनी टीम देसाई के मामले में उसका इंतज़ार कर रही थी। ... एक पल की हड़बड़ी में, अमारा ने वो ड्रॉइंग मेज़ पर बाक़ी काग़ज़ों के बीच छोड़ी, और तेज़ क़दमों से नीचे उतर गई। बस एक पल के लिए। वो लौट कर उसे उठा ही लेने वाली थी। ... पर इस घर में, एक पल भी कभी किसी को माफ़ नहीं करता।

और ठीक उसी वक़्त, शाम ढले, बूढ़ी शांति अपनी झाड़न लिए उस कमरे में आई। ... वही शांति, जो हफ़्तों से अमारा के चेहरे में किसी खोई हुई सूरत को टटोलती आ रही थी, और हर बार ख़ुद को समझा लेती थी कि ये बुढ़ापे का वहम है। कुछ गुनगुनाती हुई, उसने मेज़ के बिखरे काग़ज़ समेटने शुरू किए। और तभी उसका हाथ उस एक ड्रॉइंग पर पड़ा।

"अरे, ये किसका नन्हा-मुन्ना बना गया भला..." ... "कैसा प्यारा सा घर बनाया है, और ये माँ, और ये ऊपर चाँद... हाय, कितना सोहना बच्चा होगा, जिसने ये बनाया होगा।"

और फिर शांति का हाथ रुक गया। ... उस काग़ज़ में, माँ वो चाँद बच्चे की तरफ़ यूँ बढ़ा रही थी, जैसे उसका एक टुकड़ा तोड़ कर दे रही हो। ... और शांति के कानों में, बरसों बाद, वो लोरी अपने आप गूँज उठी। वही लोरी, जो इस पूरे घर में सिर्फ़ एक ज़बान गाया करती थी।

'सो जा मेरे चाँद, तेरे लिए चाँद का टुकड़ा तोड़ लाऊँ।' ... शांति का दिल एक धड़कन के लिए रुक गया। ये लकीरें, ये चाँद, ये लोरी... छह साल पहले की एक सूरत उसकी आँखों के सामने आ खड़ी हुई।

"ये लोरी..." ... "...ये तो मेरी तारा गाया करती थी। ... सिर्फ़ मेरी तारा।" ... "...तारा।"

और उस छोटे से कमरे में, छह साल में पहली बार, वो नाम फिर से साँस ले उठा। तारा। ... एक बूढ़ी औरत के काँपते होंठों पर, एक बच्चे की ड्रॉइंग के ऊपर, वो सच जो पूरे घर से छुपा था, एक पल के लिए रोशनी से बस एक साँस भर दूर आ खड़ा हुआ। ... शांति को नहीं पता था, कि जिस तारा का नाम उसने अभी लिया, वो इसी छत के नीचे, ज़िंदा, साँस ले रही थी। और उस एक फुसफुसाहट ने, अनजाने में, वो दरवाज़ा खटखटा दिया था, जिसके पीछे राख फिर से आग बनने को तैयार बैठी थी।

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