Chapter 28 of 30
आग फिर से
रतन के आख़िरी सौदे को ठुकरा कर तारा उसका अपना जाल उसी पर पलट देती है; बर्बाद रतन सबको साथ ले डूबने के लिए वो आग जगाता है जो उसने कभी तारा के लिए भरवाई थी, और वो सबसे पहले उसी को अपनी लपटों में ले लेती है। समर पहली बार आग में क़दम रख कर अपने बेटे और मौत के बीच आ खड़ा होता है, कबीर सबूत को लपटों से बचा लेता है, और सबसे ऊपर वाली शहतीर एक कड़ाक के साथ टूटती है, धुएँ में इस राज़ को दबाए कि उस पार कौन ज़िंदा बचा।
उस झूलते पीले बल्ब की रौशनी में, अपने बेटे को सीने से चिपकाए, तारा ने वो एक लफ़्ज़ कहा जिसके लिए वो छह बरस राख से उठती आई थी। ना गिड़गिड़ाहट, ना काँपती हुई आवाज़। वो एक लफ़्ज़ किसी अदालत के फ़ैसले की तरह उस झुकती टूटी छत पर आ कर गिरा, और आग लगने से पहले पूरी इमारत एक पल को ठहर गई।
“नहीं।” ... “मैं तेरा सौदा नहीं ख़रीदूँगी, रतन। क्योंकि तू मुझे जो बेच रहा है ना, वो मेरे पास पहले से है।” ... “मेरे बेटे की हिफ़ाज़त तेरे उन आदमियों के हाथ में नहीं है। वो आज रात उस सच के हाथ में है जो सौ लोगों तक पहुँच चुका है। और तेरे वो बाहर वाले आदमी...” ... “...उन्हें बेला ने घंटे भर पहले पुलिस के हवाले कर दिया। तेरी अपनी दावत के दरवाज़े पर अब हथकड़ियाँ खड़ी हैं, रतन, तेरे आदमी नहीं।”
“झूठ। तुम झूठ बोल रही हो। मेरे आदमी बाहर हैं, वो अभी भी...” ... “...नहीं। नहीं। तुमने पहले ही हर दरवाज़ा घेर लिया। हर आदमी। हर रास्ता।” ... “तुमने मुझे मेरी ही मेज़ पर मात दे दी।”
“हर दरवाज़ा, रतन। हर आदमी। हर रास्ता।” ... “तूने छह बरस पहले एक पेट से बहू को आग में झोंका था, इसलिए कि तेरा हिसाब कोई कभी न पढ़ सके। पर आग एक चीज़ कभी नहीं जलाती... सच। सच राख के नीचे और गरम होता जाता है।” ... “और आज वो सच तेरे अपने ही पैरों तले दहक रहा है। उतर आ उस सरिये से। तेरा हिसाब कब का पूरा हो चुका।”
“मुम्मा...” ... “वो अंकल अब भी वैसे ही दिख रहे हैं, बिल्कुल मेरी ड्रॉइंग जैसे। पर उनकी आँखें अच्छी नहीं हैं।” ... “वो कुछ बहुत बुरा करने वाले हैं ना, मुम्मा?”
“तू बस मेरी गर्दन में मुँह छुपाए रख, मेरे चाँद, और आँखें बंद कर ले।” ... “मुम्मा यहीं है, तेरे और उस अँधेरे के बीच। कोई तुझ तक नहीं पहुँचेगा। कोई नहीं।”
और जब आख़िरी पत्ता भी उसके हाथ में राख हो गया, तो रतन अहूजा ने वो चुना जो एक ख़त्म हुआ आदमी आख़िर में चुनता है, बचना नहीं, सबको साथ ले डूबना। उसके अपने आदमियों ने इस अधूरी इमारत के नीचे वाले खोखों में डीज़ल भर रखा था, ताकि जब छत गिरे तो पूरी इमारत आग में यूँ जले कि न कोई सबूत बचे, न कोई तारा। यही उसके 'हादसे' को मुकम्मल करने का आख़िरी इंतज़ाम था। और अब, बर्बाद हो कर, उसने वही आग अपने ही हाथों जगाने के लिए हाथ बढ़ा दिया।
“अगर आज मैं जल रहा हूँ, तारा...” ... “...तो तू भी मेरे साथ जलेगी। तेरा बेटा, तेरा सच, तेरी वो राख से उठने वाली कहानी, सब आज इसी एक आग में हमेशा के लिए ख़त्म।”
और उसने पूरी ताक़त से वो आख़िरी सरिया खींचा, और उसी झटके में झूलते बल्ब का वो नंगा तार भी छत से उखड़ आया। एक अकेली चिंगारी उस कटे तार से छूटी, और नीचे उतरती चली गई, ठीक उसी डीज़ल में जो उसने अपने आदमियों से तारा के लिए भरवाया था। और वो आग, जो उसने तारा को मिटाने के लिए बनाई थी, एक गरजती नारंगी दीवार बन कर उठी, और सबसे पहले उसी आदमी को अपनी लपटों में ले लिया जिसने उसे जलाया था।
“नहीं! नहीं...!” ... “ये आग... ये आग मेरी थी! ये मेरा हथियार था, मेरा!” ... “ये मुझे नहीं जला सकती... मुझे नहीं...!”
“तूने मुझे आग समझा था, रतन।” ... “पर मैं आग नहीं थी। मैं वो राख थी जो तेरी आग के बाद भी बची रह गई। और राख को दुबारा जलाया नहीं जा सकता।” ... “ये आग तेरी थी। तूने ख़ुद अपने लिए परोसी है। अब इसे तू ही ओढ़।”
और वहाँ, उस गरजती आग की रौशनी में, छह बरस एक पूरा घेरा बना कर वापस आ गए। जिस औरत को उसने आग समझ कर बुझाना चाहा था, वो जलती इमारत के बीच अपने बेटे को सीने से लगाए ज़िंदा खड़ी थी। और जिस आदमी ने आग को अपना नौकर समझा था, वो उसी आग की गोद में चीख़ रहा था। और तारा ने नज़र नहीं फेरी। यही वो एक मंज़र था जिसे अपनी आँखों से देखने के लिए वो छह बरस राख से उठती आई थी।
“तारा! आग... आग चारों तरफ़ फैल रही है, तुम्हें वहाँ से निकलना होगा, अभी, इसी वक़्त!” ... “कोई रास्ता... कोई तो रास्ता होगा! रुको मत, तारा, आरव को कस के पकड़े रहो, मैं आ रहा हूँ, मैं तुम दोनों तक आ रहा हूँ!”
और उसी आग ने, इमारत को चीरते हुए, वो पुल गिरा दिया जो अब तक कोई मोहब्बत नहीं बना पाई थी। ऊपर से एक जलता हुआ लोहे का गर्डर टूट कर उस काले गड्ढे के आर-पार आ गिरा, दोनों किनारों को जोड़ता एक काँपता, दहकता रास्ता। और इससे पहले कि डर कुछ कह पाता, एक आदमी उस जलते गर्डर पर अपना पहला क़दम रख चुका था। समर।
“आरव! रुको, बेटा, मैं आ रहा हूँ, मैं आ रहा हूँ तुम्हारे पास!” ... “तारा, हट जाओ उसके आगे से, मुझे उस तक पहुँचने दो! आज उस बच्चे और इस आग के बीच मैं खड़ा हूँगा, कोई और नहीं!”
और तारा ने वो देखा जो कभी उसे नहीं मिला था। छह बरस पहले जिस देहरी पर कोई एक हाथ उसके और बरसती बारिश के बीच नहीं आया था, आज उसी ख़ानदान का एक आदमी आग में क़दम रख कर एक बच्चे और मौत के बीच आ खड़ा हो रहा था। जिस समर ने कभी एक झूठ चुना था, वो आज एक जलता पुल चुन रहा था, अपने ही ख़ून के लिए, और तारा की छह बरस जमी बर्फ़ एक पल को उस आग में पिघल गई।
“आ जा, बेटा, आ जा मेरे पास, मैं पकड़े हूँ तुझे।” ... “मैंने तुझे छह बरस नहीं देखा, आरव, पर आज इस दुनिया की कोई आग तुझे छू भी नहीं सकती, कोई नहीं।” ... “तारा, तुम आगे बढ़ो, गर्डर की तरफ़, मैंने आरव को थाम लिया है, तुम सिर्फ़ अपना ख़याल रखो!”
“तुम...” ... “तुम बिल्कुल वैसे ही दिखते हो जैसे मैंने अपनी ड्रॉइंग में बनाया था। हूबहू वैसे ही।” ... “तुम... तुम मेरे पापा हो ना?”
और वो सवाल, जिसे पूरी कहानी छह बरस से अपने सीने में थामे बैठी थी, उस गरजती आग के शोर में आ कर गिरा। समर की आँखें भर आईं, उसका गला रुँध गया, और तारा का दम एक पल को थम गया। पर आग ने किसी को वो कहने का एक पल भी नहीं दिया जो वो छह बरस से कहने के लिए तरस रहे थे।
और गड्ढे के उस पार, कबीर ने वो एक काम किया जो इस आग से भी आगे तक ज़िंदा रहेगा। बटरा का वो असली दस्तख़त वाला काग़ज़, वो अकेला सबूत जो अदालत के सामने रतन को असली चोर और क़ातिल दोनों साबित करेगा, आग की एक लपट उसके किनारे को चाट चुकी थी। और कबीर ने ख़ुद को उस पर झोंक दिया, जलती लपटों में से उस काग़ज़ को खींच कर अपने सीने में भींच लिया, और अपनी क़मीज़ की आस्तीन से उसकी सुलगती कोर को बुझा डाला।
“मिल गया, तारा! काग़ज़ मेरे पास है, महफ़ूज़ है! तेरा नाम, तेरा सच, ये आग इसे नहीं ले जा सकती, कभी नहीं!” ... “अब तुम निकलो, ख़ुदा के लिए, समर के साथ, आरव को ले कर निकलो! ये छत अब बस चंद पल की मेहमान है!”
और अब वो इमारत बस उतना ही थाम सकती थी जितना उसने थाम लिया था, उससे एक साँस ज़्यादा नहीं। हर तरफ़ आग, नीचे सायरन, और उस झुकती छत के नीचे आख़िरी सरिये अब गा नहीं रहे थे, चीख़ रहे थे। समर ने आरव को वापस उसकी माँ की बाँहों में दे दिया, ठीक वहीं, जहाँ ये पूरी दुनिया उन दोनों को हमेशा से ढूँढती आई थी, और फिर तीनों उस काँपते, जलते पुल की तरफ़ बढ़े।
“मुम्मा...” ... “तुमने बोला था ना, हम दोनों साथ गिरे थे, और अब हम दोनों साथ उठेंगे।” ... “हम उठ रहे हैं ना, मुम्मा? हम साथ उठ रहे हैं ना?”
“हाँ, मेरे चाँद। हम साथ उठ रहे हैं।” ... “तू आँखें बंद कर, और मुझे इतनी कस के पकड़ ले कि दुनिया की कोई आग हमें अलग न कर सके। मुम्मा तुझे कभी नहीं गिरने देगी, बेटा। कभी नहीं।” ... “बस एक क़दम और, मेरे चाँद। सिर्फ़ एक क़दम और, और हम घर।”
और वो तीनों उस दहकते गर्डर पर एक साथ थे, आग नीचे, आग ऊपर, आग हर तरफ़, और गड्ढे के उस पार से कबीर का बढ़ा हुआ हाथ अब बस एक बित्ते की दूरी पर रह गया था। सिर्फ़ एक क़दम और, और छह बरस की वो सारी राख उनके पैरों तले ठोस, महफ़ूज़ ज़मीन बन जाती। तारा ने साँस भरी, और वो आख़िरी क़दम उठाया।
और ठीक उसी पल, उनके सबसे ऊपर, वो एक चीज़ जो अब तक ख़ामोश थी, बोल उठी। जलती इमारत की सबसे ऊपर वाली शहतीर, जो पूरी छत का बोझ छह बरस के इस आख़िरी हिसाब की तरह अकेले थामे खड़ी थी। आग की गरज और सायरन की चीख़ के ऊपर, एक अकेली आवाज़ उभरी, एक लंबी, चीरती हुई... कड़ाक। और फिर पूरी दुनिया धुएँ और अँधेरे में डूब गई, और किसी को नहीं पता चला, ना कबीर के बढ़े हुए हाथ को, ना समर की खाई क़सम को, ना नीचे खड़े पूरे शहर को, कि जब वो शहतीर टूटी, तो उस धुएँ के उस पार कौन खड़ा बचा।
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