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अध्याय 16 / 30

आधी सच्चाई

राख से उठी द्वारा Avni Oberoi

छत पर हवा के सिवा कोई आवाज़ नहीं थी। ... समर की मुट्ठी अब भी अमारा की कलाई पर कसी थी, वही हाथ जो अभी उसे मौत के कगार से खींच लाया था। तीन लोग, एक छत, और बीच में एक सच जो अब अँधेरे में नहीं लौट सकता था।

"तुमने..." ... "तुमने उसे इसी छत से धकेलने की कोशिश की, रागिनी। और छह बरस पहले भी तुम्हीं थीं। वो कंठी, वो झूठे काग़ज़, वो ट्रेन। जिसे मैंने चोर समझा, चोर तुम थीं।"

"समर, रुको, सुनो।" ... "ये औरत, जिसे तुम बचा रहे हो, ये अमारा नहीं है। ये तारा है! तुम्हारी तारा, ज़िंदा, तुम्हारे सामने! मैंने इसका चेहरा धूप में देखा है!"

वो नाम समर के सीने में किसी कील की तरह उतर गया। छह बरस से दफ़न एक शक, जो इस अजनबी को देख कर सिर उठा रहा था, अचानक भड़क उठा। ... उसने पलट कर अमारा को देखा, और एक पल को उस चेहरे में उसे कोई और दिख गई।

"तारा..." ... "क्या ये सच है? क्या ये मुमकिन है?" ... "तुम्हारी आँखें, तुम्हारे बोलने का ढंग... मैं पहले दिन से ये क्यों नहीं समझ पाया कि तुम्हें देख कर मेरे भीतर कुछ क्यों टूटता है..."

"रुकिए, समर जी।" ... "सोचिए, ये बात आप किसके मुँह से सुन रहे हैं। अभी, इसी छत पर, इसी औरत ने कबूल किया कि उसने एक बेगुनाह बहू को फँसाया और एक ट्रेन में उसे मरवाने की साज़िश रची।" ... "और अभी अभी, इसी ने मुझे इसी छत से धकेलने की कोशिश की।"

"जो औरत खून करने से नहीं हिचकी, वो अपनी फाँसी टालने के लिए क्या नहीं कहेगी, समर जी? एक मुर्दा नाम। एक भूत। कुछ भी।" ... "आपकी बीवी चाहती है कि आप एक लेनदार में अपनी मरी बहू देख लें, ताकि आपका ग़ुस्सा इसकी गर्दन से हट जाए।"

"नहीं! ये झूठ बोल रही है!" ... "मैं जानती हूँ जो मैंने देखा। धूप में, साफ़, इसी का चेहरा। ये तारा है!" ... "तुम मेरी बात क्यों नहीं मान रहे? मैं तुम्हारी बीवी हूँ!"

समर दो आगों के बीच खड़ा था। एक तरफ़ वो शक, दूसरी तरफ़ ये सच कि जो औरत उससे ये कह रही थी, वो अभी अभी एक क़ातिल साबित हो चुकी थी। ... और उसके भीतर का टूटा आदमी यही चाहता था कि अमारा तारा ना हो। क्योंकि तारा होती, तो मतलब वो छह बरस उसके सामने से गुज़रती रही और वो पहचान तक ना सका। ये बोझ वो नहीं उठा सकता था।

"आपकी बीवी को तारा से इतना डर है, समर जी, कि अब उसे हर औरत के चेहरे में तारा दिखती है।" ... "आज मैं हूँ, कल कोई नौकरानी होगी, परसों आईने में उसका अपना अक्स। ये औरत डर से पागल हो चुकी है।"

"बस, रागिनी।" ... "एक और लफ़्ज़ नहीं। तुमने एक बेगुनाह को मरवाया, और अब एक मरी औरत का नाम ले कर मुझे बहलाना चाहती हो?" ... "जिस दिन से तुम इस घर में आई, तुमने सिर्फ़ ज़हर बोया है।"

"ठीक है, समर।" ... "तुम इस अजनबी पर यक़ीन करो, अपनी बीवी पर नहीं। पर याद रखना, इस घर में मैं अकेली गुनहगार नहीं हूँ। डूबता इंसान अकेले नहीं डूबता।"

और रागिनी समझ गई कि उसका सबसे बड़ा हथियार अब उसके अपने ही हाथ में राख हो चुका था। उसने ख़ुद अपने मुँह से अपने को क़ातिल साबित कर दिया था। ... वो लड़खड़ाती हुई अँधेरी सीढ़ियों में उतर गई, और पीछे रह गई सिर्फ़ हवा, दो लोग, और एक अनकहा नाम।

रागिनी के क़दम अँधेरे में खो गए, और छत पर सिर्फ़ समर और अमारा रह गए। समर एक टूटे आदमी की तरह उसी मुँडेर के सहारे बैठ गया, जिसके पार से छह बरस पहले उसकी बीवी धकेली गई थी। ... और अमारा के भीतर तारा और अमारा दोनों काँप रही थीं, एक को नफ़रत, दूसरी को तरस, और उसे किसी को चेहरे पर लाने की इजाज़त नहीं थी।

"तो वो ज़िंदा है।" ... "तारा ज़िंदा है। रागिनी पागल है, पर उस एक बात में मेरा दिल कहता है कि शायद सच था।" ... "और आप उसे जानती हैं, है ना? ये सब, हुमा, ये बदला, आप ये सब उसी के लिए कर रही हैं।"

"हाँ, समर जी। तारा ज़िंदा है।" ... "जिस रात आपने उसे चोर कह कर बारिश में फेंका, वो मरी नहीं। कोई था जिसने उसे राख से उठाया और एक नया नाम दिया।" ... "और मैं उसी का हाथ हूँ, जिसे उसने इस घर का हिसाब चुकाने भेजा है। तारा ख़ुद नहीं आ सकती।"

"आप उसे कैसे जानती हैं?" ... "वो कैसी दिखती है अब? वो ठीक तो है? खुश है? ... छह बरस मैं एक ऐसी औरत का मातम करता रहा जो कहीं ज़िंदा साँस ले रही थी, और मुझे बताया तक नहीं गया।"

"वो कैसी दिखती है?" ... "वो उस औरत की तरह दिखती है जो तूफ़ान में सब खो कर, राख से अपने आप को दुबारा गढ़ती है। जिसकी आँखों में अब आँसू नहीं, सिर्फ़ हिसाब बचा है।" ... "और खुशी? वो शायद उसी बारिश में कहीं छूट गई।"

"मुझे उसके पास ले चलिए। एक बार, सिर्फ़ एक बार।" ... "मुझे उसके पैरों में गिरना है, कहना है कि मैं जानता हूँ मैंने क्या किया।" ... "मैं उससे माफ़ी माँगे बिना अब सो नहीं सकता। बताइए वो कहाँ है।"

अमारा उस आदमी को अपने ही पैरों में गिरने की भीख माँगते देखती रही, जो नहीं जानता था कि जिसे वो ढूँढ रहा है वो एक साँस की दूरी पर खड़ी है। तारा उसके भीतर चीख़ रही थी, यहीं हूँ मैं। और अमारा ने उस चीख़ को हथेली में दहकते कोयले की तरह भींच लिया। ... इस आदमी को माफ़ी उतारने के लिए एक तारा चाहिए थी, सो उसने उसे एक तारा दे दी, जो कभी नहीं मिलेगी।

"नहीं, समर जी। वो आपका चेहरा दुबारा नहीं देखना चाहती।" ... "जिसे आपने एक झूठ के बदले बारिश में फेंक दिया, वो अब आपकी माफ़ी की भूखी नहीं।" ... "मुर्दे माफ़ी नहीं माँगते, समर जी। मुर्दे सिर्फ़ हिसाब माँगते हैं।"

"तो मैं क्या करूँ? मुझे बताइए, मैं कुछ भी करूँगा।" ... "मेरे पास अब खोने को कुछ नहीं बचा, अमारा जी। ना बीवी, ना इज़्ज़त, ना वो झूठ जिसके सहारे मैं छह बरस सोता रहा। बोलिए, उसका हिसाब कैसे चुकाऊँ?"

"कुछ क़र्ज़ माफ़ी से नहीं चुकते, समर जी।" ... "कुछ सिर्फ़ खून से चुकते हैं, और कभी अपने ही खून से।" ... "उस आदमी को ढूँढिए जिसने इसी घर में सालों चोरी की और इल्ज़ाम एक पेट से बहू पर मढ़ दिया। तारा को माफ़ी नहीं, सच चाहिए, वो सच जो अभी भी आपके अपने सिरहाने बैठा है।"

और समर ने वो लफ़्ज़ किसी क़समनामे की तरह उठा लिए। उसे नहीं पता था कि जिस सच को वो तारा के लिए खोदेगा, वो इस पूरे घर की नींव गिरा देगा। ... वो बिना पलटे सीढ़ियों में उतर गया, और अमारा अकेली उसी छत पर रह गई, जहाँ आज उसने अपने क़ातिल पति को अपना हथियार बना लिया था।

उसी रात, हुमा के दफ़्तर में एक अकेली स्क्रीन के पार बेला बैठी थी। और नीचे, हवेली की रसोई में बूढ़ी शांति हाथ जोड़े बैठी थी, उस भगवान के आगे जिसने आज उसकी घबराई फुसफुसाहट ऐन वक़्त पर समर तक पहुँचा दी थी, और अमारा को उस मुँडेर के पार गिरने से बचा लिया था। ... और जब अमारा का फ़ोन जगमगाया, बेला ने पहली ही घंटी पर उठा लिया।

"आपने मुझे बताना भी ज़रूरी नहीं समझा कि रागिनी ने आपको छत से धकेल दिया था?" ... "मैं आपको दो दिन अकेला छोड़ती हूँ, और आप एक क़ातिल के साथ छत पर टहलने चली जाती हैं। ... अगली बार जाएँ, तो कम से कम बता जाइएगा कि लाश कहाँ ढूँढनी है।"

"तुम्हें मेरी इतनी फ़िक्र है, बेला? मुझे तो लगता था तुम्हें सिर्फ़ बहीखातों से मोहब्बत है।" ... "मैं ठीक हूँ। समर को आधा सच मिल गया है। वो जानता है कि तारा ज़िंदा है, पर नहीं जानता कि तारा कौन है, कहाँ है, या... उसके साथ कौन है।"

"मुझे बहीखातों से नहीं, आपसे मोहब्बत है, अमारा। बहीखाते तो सिर्फ़ इसलिए अच्छे लगते हैं क्योंकि वो झूठ नहीं बोलते। आपकी तरह नहीं, जो छत से गिरने की बात छुपा जाती हैं।" ... "ख़ैर। अब आगे क्या?"

अमारा ने वो आख़िरी लफ़्ज़ अधूरा छोड़ दिया। उसके साथ कौन है। ... आरव। वो पाँच बरस का चाँद का टुकड़ा, उसका सबसे बड़ा राज़, और सबसे बड़ी कमज़ोरी भी। उस घर के किसी को ये पता चलना कि उस औरत का एक बेटा है, और वो बेटा अहूजा का खून है, उसके चाँद को सीधे उन्हीं भेड़ियों के मुँह में धकेल देता।

"आधा सच एक फिसलन भरी सीढ़ी है, अमारा।" ... "समर आज तारा को ढूँढने निकलेगा, और टूटा आदमी हर पत्थर उलट देता है। दुआ कीजिए कि वो जो खोदे, वो रतन तक पहुँचे, आप तक नहीं।" ... "और देसाई की फ़ाइल अब भी खुली है। हमें बटरा तक आपसे पहले पहुँचना होगा।"

"तो हम पहले पहुँचेंगे, बेला।" ... "अब तक मैं हर कौर महीनों में परोस रही थी। अब हफ़्तों में परोसूँगी। रागिनी का हिसाब लगभग पूरा है, अगली बारी उस आदमी की है जिसने ये सब शुरू किया।" ... "और उसके बाद, सिर्फ़ उसके बाद, मेरा चाँद खुली हवा में साँस लेगा।"

उसी रात, रतन की बैठक में एक दिया अकेला जल रहा था, जहाँ इस घर के असली हिसाब रखे जाते थे। रागिनी बिना दस्तक दिए भीतर आ गई। समर की नज़रों में वो अब एक क़ातिल थी, और घिरा जानवर सबसे ख़तरनाक तभी होता है जब उसके पास खोने को कुछ ना बचे। ... और इस घर में एक ही आदमी उसके जितना गुनहगार था। रतन।

"अरे, रागिनी बेटा। इस वक़्त?" ... "इतनी रात गए, और चेहरा ऐसा उड़ा हुआ। समर के साथ कोई अनबन?" ... "बैठो। बताओ, अपने चाचा से क्या छुपाना।"

"छुपाना?" ... "हम दोनों ने तो इस घर में सिर्फ़ छुपाया ही है, रतन जी। छह बरस से।" ... "मैं एक सौदा करने आई हूँ, और आप ठुकरा नहीं सकते। क्योंकि जो मैं जानती हूँ, वो अगर उस हुमा वाली के ऑडिट तक पहुँचा, तो मेरे साथ आप भी फंदे तक पहुँचेंगे।"

"सौदा।" ... "तुम्हें अंदाज़ा भी है, बेटा, तुम किस लहजे में बात कर रही हो? ... पर चलो, एक बूढ़ा आदमी सुन तो सकता है।" ... "बोलो। तुम क्या जानती हो, और चाहती क्या हो।"

"क्यों अभी, यही पूछ रहे हैं ना?" ... "क्योंकि आज रात समर ने मुझे उस औरत को छत से गिराने की कोशिश करते पकड़ लिया। अब वो मुझ पर से यक़ीन उठा चुका है, और उसी हुमा वाली के इशारों पर नाचने लगा है। इस घर में अब मेरे पास ना ताक़त बची है, ना ढाल।"

"मैं मेहरबान ट्रेडर्स को जानती हूँ, रतन जी। वो पैसा किसके हाथ से घूमा, ये भी। छह बरस पहले हमने मिल कर एक बहू पर वही चोरी मढ़ी थी। और वो झूठ तब तक ज़िंदा है, जब तक वो हुमा वाली औरत ज़िंदा है।" ... "मैं चाहती हूँ वो औरत हमेशा के लिए ग़ायब हो जाए। ये मेरे बस का नहीं, पर आपके बस का है।"

रागिनी ने अपना सबसे गहरा पत्ता मेज़ पर नहीं रखा। उसने रतन को नहीं बताया कि वो हुमा वाली औरत वही तारा है जिसे इन दोनों ने मिल कर मारा था, क्योंकि जिस दिन ये नाम खुलता, सबसे पहले फाँसी रागिनी की चढ़ती। ... और रतन, बिना जाने, ठीक उसी औरत को मिटाने की बात सुन रहा था, जिसे वो छह बरस पहले ख़ुद ट्रेन के हवाले कर आया था।

"तो तुम भी आख़िर वहीं आ पहुँचीं, बेटा, जहाँ मैं हफ़्तों से खड़ा हूँ।" ... "ये हुमा वाली औरत बहुत पुराने सवाल पूछती है, बहुत गहरे खोदती है। और तुम ठीक कहती हो, इस घर में कुछ चीज़ें ग़ायब होना जानती हैं।" ... "एक बहू ग़ायब हुई थी कभी, एक ट्रेन के साथ। एक लेनदार भी हो सकती है।"

उस अकेले दिये की रौशनी में, दो गुनहगारों ने अपने पुराने गुनाह को ढकने के लिए एक नया गुनाह गढ़ लिया। दोनों में से किसी को पता नहीं कि जिस औरत को वो मिटाना चाहते हैं, वो पहले ही एक बार मर कर, राख से उठ कर लौटी है। ... रतन ने उसी आदमी को फ़ोन मिलाया, जिसने छह बरस पहले तारा को उस ट्रेन तक धकेला था, और तारा के अपने ससुराल के दो लोग, उसी छत के नीचे उसकी दूसरी मौत का सौदा कर रहे थे, जहाँ एक दिन उसका बेटा खेलने वाला था।

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