अगस्त्य मल्होत्रा दिल्ली का सबसे ठंडा आदमी है। बर्फ़ और मिठाइयों का साम्राज्य "हिमराज" उसके नाम है, पर बारह साल पहले जिस रात एक हादसे में उसका पूरा परिवार छिन गया, उसी रात उसकी ज़ुबान का ज़ायका भी मर गया। तब से हर मिठास बेमानी है, हर खाना राख जैसा। फिर आती है महिका, कैंटीन की हँसमुख, कंगाल लड़की जिसके हाथ का बना खाना ही एकमात्र चीज़ है जो उसे चखने में आता है, और उसे नहीं पता क्यों। वो बहाने बना-बनाकर उसे अपने पास रखता है, वो समझती है कि यह अकड़ू "बर्फ़ का बादशाह" अंदर ही अंदर भूखा मर रहा है और उसे खिलाना उसका फ़र्ज़ है। उधर रिश्ते से तय हुई मंगेतर संजना इस कैंटीन वाली को रास्ते से हटाना चाहती है। पर जिस ज़ायके ने अगस्त्य को बरसों बाद जीना सिखाया, उसके पीछे एक दबा हुआ राज़ है, एक ऐसा राज़ जो महिका के परिवार को उसी रात से बाँधता है जिस रात अगस्त्य की दुनिया उजड़ गई थी। ग़ुरूर और भूख, अमीरी और फ़ाक़ा, और एक ऐसी मोहब्बत जिसकी बुनियाद दोनों घरों के सबसे गहरे ज़ख़्म पर रखी है।
विषय-सूची
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बारह साल पहले एक बरसाती रात, दिल्ली के एक फ़्लाईओवर से गिरी गाड़ी और एक अस्पताल के गलियारे में, नाइट शिफ़्ट की एक नर्स ने काँपते हुए बीस साल के अगस्त्य के हाथ में अपना टिफ़िन थमाया, उससे ठीक पहले कि उसका पूरा परिवार छिन जाए और उसकी ज़ुबान का ज़ायका हमेशा के लिए मर जाए। आज बारह साल बाद बर्फ़ का बादशाह अगस्त्य मल्होत्रा अपनी ही कुल्फ़ी नहीं चख पाता, और तभी हिमराज की कैंटीन में पहले दिन आई कंगाल लड़की महिका उसे बेहोश होने से बचाने के लिए अपने हाथ का दाल-चावल थमा देती है, और बारह मुर्दा सालों बाद उसे पहली बार कुछ चखने में आता है, यह जाने बिना कि यह ज़ायका उसी नर्स के हाथ का है।
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जो हुआ उसे अगस्त्य न समझा सकता है न भुला सकता है, इसलिए वो एक झूठा 'क्वालिटी-टेस्टर' का ओहदा गढ़ता है ताकि कैंटीन वाली महिका उसके पास रहे, और सच किसी को नहीं बताता। महिका को लगता है कि एक ज़ालिम अमीर आदमी उससे खेल रहा है, और आख़िर में अगस्त्य एक हुक्मनामे पर दस्तख़त करता है जो महिका को कैंटीन से उठा कर उसके निजी फ़्लोर पर तैनात कर देता है, जिसे वो तोहफ़ा नहीं, एक धमकी समझ कर पढ़ती है।
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महिका पहली बार अगस्त्य के निजी फ़्लोर पर क़दम रखती है और वो देखती है जो किसी ने नहीं देखा, कि ये आदमी कुछ नहीं खाता, हर पाँच सितारा थाली ठुकरा देता है, बस काली कॉफ़ी और ग़ुस्से पर ज़िंदा है, और सिर्फ़ उसके हाथ का खाना ही उसके होंठों से लगता है। वो एक ग़लत, कोमल नतीजे पर पहुँचती है, कि ये बर्फ़ का बादशाह ख़ुद को भूखा मार रहा है, और उसे खिलाना अब उसका फ़र्ज़ है, तभी बंसी उसे चेताता है और एक ठंडी, तराशी हुई औरत फ़्लोर पर आ कर पूछती है कि ये कैंटीन वाली उसके दफ़्तर में क्या कर रही है।
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बादशाह की मंगेतर संजना खुल कर सामने आती है, कैंटीन वाली को एक दाग़ की तरह परखती है और चुपके से रिश्वत देकर हटाना चाहती है, पर महिका झुकती नहीं। उधर त्रिलोकपुरी के तंग घर में महिका की असली दुनिया खुलती है, छोटा भाई चिंटू, बीमार नानी और सिर पर क़र्ज़, और जैसे ही महिका 'मल्होत्रा' नाम लेती है, नानी का चेहरा फ़क़ पड़ जाता है और वो बेटी को उस घर से दूर रहने की चेतावनी देती है, और अगले दिन लॉबी में ख़ुद दिग्विजय राणा सगाई पक्की करने आ कर बेख़बर महिका के पास से गुज़र जाता है।
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राणा बोर्ड रूम में मीठे लफ़्ज़ों की आड़ में अगस्त्य से हिमराज की चाबी और सगाई की तारीख़ माँगता है, पर बारह साल में पहली बार जागा हुआ बादशाह फ़ाइल पढ़ कर उसकी चाल पकड़ लेता है और दस्तख़त टाल देता है, और तभी बेख़बर महिका राजमा का टिफ़िन लिए बोर्ड रूम में घुस कर अनजाने में राणा की पूरी चाल तोड़ देती है। वीर भाँप लेता है कि बादशाह का ये बदलाव उन्हीं दिनों से है जब से वो कैंटीन वाली का खाना खा रहा है, और उधर जली हुई संजना महिका को हटाने के लिए एग्ज़ीक्यूटिव किचन में चोरी का जाल बिछा देती है, जिसमें बेख़बर महिका ख़ुद चल कर जा फँसती है।
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बर्फ़ का बादशाह बारह साल में पहली बार सबके सामने एक कैंटीन वाली के लिए अपनी मंगेतर को झुठला कर संजना का चोरी का जाल तोड़ देता है, और अकेले में हुई पहली सच्ची बात में उसके मुँह से निकल जाता है कि उसे बारह साल से कोई स्वाद नहीं आता, जिससे महिका समझ जाती है कि ये अकड़ नहीं, एक ज़ख़्म है। उसी रात महिका की मरहूम माँ के ज़िक्र से छुई एक बेवजह सर्दी अगस्त्य को उस अस्पताल की नर्स के टिफ़िन के ढक्कन तक ले जाती है, और वो सन्न रह जाता है कि आज चखा ज़ायका बिल्कुल वही है।
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कल की हार का बदला लेने के लिए संजना एक चमकदार टेस्टिंग की महफ़िल में सबके सामने महिका को उसकी औकात याद दिलाती है, पर जब बादशाह को अपनी बेस्वाद कुल्फ़ी पर मुहर लगानी होती है और संजना महिका को निकलवाना चाहती है, तो अगस्त्य उसे रोक कर अनजाने में ज़ाहिर कर देता है कि उसे इस लड़की की कितनी गहरी ज़रूरत है। रात, सूनी पार्किंग में संजना मुस्कुरा कर वो तारीख़ बता देती है जिस दिन वो मल्होत्रा बनेगी और महिका उसकी ज़िंदगी से हमेशा के लिए मिटा दी जाएगी।
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अपने ज़ायके का राज़ समझने को बेचैन अगस्त्य चोरी-छुपे नयूरोलॉजिस्ट डॉक्टर सेठी के पास जाता है, जो बताता है कि उसका स्वाद ज़ुबान पर नहीं, सदमे से बंद हुए एक ज़हनी दरवाज़े के पीछे क़ैद है, और उसे सिर्फ़ उसी काली रात से जुड़ी कोई एक याद, कोई एक रहम खोल सकता है। अगस्त्य समझ जाता है कि जो अकेला ज़ायका उसे चखने में आता है वो चाबी है और महिका किसी तरह उसी याद पर खड़ी है, और वीर के 'पता करो ये लड़की है कौन' पर वो रात में एक फ़ैसला कर लेता है।
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तूफ़ानी रात, बत्ती गुल, और ख़ाली टावर में बर्फ़ का बादशाह उस लड़की का राज़ पढ़ने कैंटीन उतरता है, पर बंसी की छत के पुराने चूल्हे पर महिका के हाथ का दाल-चावल खाते-खाते जासूस पिघल जाता है, अपनी बंद ज़ुबान का सच कबूल कर बैठता है, और बारह साल में पहली बार दोनों के बीच भाप उठती है। उधर राणा और संजना अगस्त्य के तारीख़ न देने को हथियार बना कर सगाई के कार्ड छपवा देते हैं, और ठीक उसी पल छत की बत्तियाँ भक से जलती हैं और दरवाज़े पर संजना खड़ी है, हाथ में सत्रह तारीख़ वाले छपे हुए कार्ड, जो अगस्त्य ने कभी दिए ही नहीं थे।
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सगाई के छपे कार्डों के साथ संजना महिका को उसकी औकात याद दिलाती है, और महिका पहली बार अपना हिसाब लगा कर समझ जाती है कि बादशाह के लिए वो सिर्फ़ एक दवाई, एक ज़ायका, एक कैंटीन वाली है, कोई ऐसी चीज़ नहीं जो किसी शादी के बाद बची रहे, इसलिए वो अपने आप को समेट कर पीछे हट जाती है। घर पर डरी हुई नानी उसे वो नौकरी और मल्होत्रा का नाम छोड़ने की मिन्नत करती है और एक दबे राज़ की तरफ़ इशारा करते-करते रुक जाती है, और अगले दिन महिका बंसी काका को अपना इस्तीफ़ा थमा कर कह देती है कि वो एक ऐसे आदमी के लिए और खाना नहीं बनाएगी जिसकी नज़र में वो एक चम्मच से ज़्यादा कभी नहीं हो सकती।
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महिका के इस्तीफ़े और उसकी ख़ामोश उदासी से बेचैन अगस्त्य आख़िरकार वीर की बात मान कर यह पता करने निकलता है कि वो लड़की आख़िर है कौन, और डॉक्टर सेठी के इशारे पर उस रात के अस्पताल के पुराने काग़ज़ मँगवा लेता है। उधर त्रिलोकपुरी में नौकरी छोड़ कर टूटी बैठी महिका के ग़म में घिरी नानी बारह साल बाद पहली बार अपनी बेटी का नाम लेती है, निर्मला वर्मा, जो लापरवाही के झूठे इल्ज़ाम में बदनाम हो कर बेगुनाह मरी और मरते दम तक एक अजनबी लड़के के लिए रोती रही, और आधी रात अगस्त्य अस्पताल की फ़ाइल और महिका की फ़ाइल आमने-सामने रख कर देखता है कि दोनों एक ही नाम पर मिलती हैं, निर्मला वर्मा, महिका की माँ, और जिस हाथ के
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पूरा सच सीने में लिए अगस्त्य महिका को घर के क़र्ज़ का बहाना बना कर वापस बुला लेता है पर बता नहीं पाता, और बेख़बर महिका उसी को अपनी माँ की उस अजनबी लड़के वाली कहानी सुना कर उसे अंदर तक हिला जाती है, जबकि उधर संजना दो हूबहू कटोरियों का जाल बिछा कर जान लेती है कि बादशाह सिर्फ़ महिका के हाथ का खाना चख पाता है और ये राज़ अपने पिता राणा को बता देती है, जो गुस्सा करने के बजाय ठंडी मुस्कान के साथ वही ख़ामोश मशीन दोबारा चला देता है जिसने बारह साल पहले निर्मला वर्मा को कुचला था।
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राणा के एक फ़ोन की मशीन सुबह चल पड़ती है, अँधेरे में महिका की भट्टी के पीछे ज़हर की शीशी और छेड़ा हुआ रजिस्टर रख दिया जाता है, और जब बेख़बर महिका सबके सामने अपने हाथ से बादशाह को खिलाती है तो अगस्त्य को बीमार दिखा कर उस पर ज़हर देने का इल्ज़ाम मढ़ दिया जाता है, बोर्ड रूम में एक कंगाल का लफ़्ज़ राणा ख़ानदान के सामने बेमोल हो जाता है, ठीक उसी झूठ की शक्ल में जिसने बारह साल पहले उसकी माँ निर्मला वर्मा को कुचला था, और अकेला अगस्त्य जो सच जानता है एक लफ़्ज़ नहीं बोल पाता, आख़िर में राणा पुलिस बुलवा देता है और डरी हुई महिका समझ जाती है कि उसे बचाने वाला अकेला हाथ उसी आदमी का है जिसे वो छोड़ आई थी, औ
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बर्फ़ का बादशाह बारह साल की चुप्पी तोड़ कर बोर्ड रूम में सबके सामने राणा का बिछाया ज़हर का झूठ राख कर देता है, महिका को बेगुनाह साबित कर के पहली बार अपने बाप समान गार्जियन और सत्रह तारीख़ की सगाई, दोनों से खुल कर टूट जाता है। ख़ाली कमरे में बारह साल की बर्फ़ पिघलती है और दोनों का पहला बोसा होता है, पर उसी साँस में दबा हुआ राज़ अगस्त्य के गले तक चढ़ आता है और वो महिका से उसकी माँ का नाम, निर्मला, पूछ बैठता है, एक ऐसा नाम जो महिका ने उसे कभी बताया ही नहीं था।
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पहले बोसे के तुरंत बाद अगस्त्य महिका से उसकी माँ का नाम जानने का सच छुपा कर, 'तुम्हारी फ़ाइल में पढ़ा' कह कर टाल देता है और फिर से बर्फ़ बन जाता है, जिससे टूट कर महिका उससे दूरी बना लेती है। उधर बारह साल में पहली बार उस काली रात की तरफ़ पलटते हुए अगस्त्य वीर को अपना अनिच्छुक साथी बना कर पुराने अस्पताल के काग़ज़ मँगवाता है, और आधी रात उसे पता चलता है कि नर्स निर्मला पर लगा लापरवाही का केस एक ही दिन में दबा दिया गया था, और उस ट्रस्ट कमेटी को उस साल सबसे बड़ा चंदा देने वाला आदमी दिग्विजय राणा था।
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अगस्त्य को यक़ीन हो जाता है कि नर्स निर्मला वर्मा पूरी तरह बेगुनाह थी, किसी और का गुनाह छुपाने के लिए उसे बलि का बकरा बनाया गया, और जिसे वो बारह साल 'बाप' कहता रहा उसी राणा के पैसे ने उस रहम वाले हाथ को कुचला। महिका को बताए बिना वो चुपचाप त्रिलोकपुरी उसके घर पहुँच जाता है, जहाँ बूढ़ी नानी शांति देवी उसके चेहरे के पुराने दर्द और गलियारे वाली उसकी कहानी को जोड़ कर समझ जाती हैं कि ये कौन है, और काँपती आवाज़ में कह देती हैं कि जिस अकेले अमीर लड़के के लिए उनकी मरती बेटी आख़िरी दम तक रोई थी, वो लड़का यही है।
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नानी की बिगड़ती सेहत और मौत से पहले राज़ न ले जाने का डर उन्हें वो चीज़ महिका को सौंपने पर मजबूर कर देता है जो उन्होंने बारह साल छुपाई थी, निर्मला के आख़िरी महीनों की डायरी, जिसमें महिका अपनी माँ के अपने हाथ से पढ़ती है कि उसका घर शर्म से नहीं, एक झूठ से टूटा था। और डायरी का आख़िरी पढ़ा जा सकने वाला पन्ना उस रात दूसरी गाड़ी से बेदाग़, नशे में निकाले गए आदमी का नाम खोलता है, दिग्विजय राणा, और ठीक उसी पल कोने में चलता टीवी वही नाम पूरे कमरे में भर देता है।
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अपनी माँ की बेगुनाही का सबूत ढूँढने महिका उसी पुराने अस्पताल के तहख़ाने में पहुँचती है जहाँ बारह साल पहले वो हादसा हुआ था, और वहीं अपने ही सच का आधा हिस्सा ढूँढते अगस्त्य से टकरा जाती है। एक ही अँधेरे में, एक ही रात का सच खोजते हुए, दोनों पूरी तस्वीर से बस एक फ़ासले पर खड़े होते हैं, पर दोनों अपना-अपना आधा सच छुपाए रखते हैं। और जैसे ही वो उस रात की असली फ़ाइल तक पहुँचते हैं, आलमारी के उस ख़ाने में सिर्फ़ ताज़ा टूटी धूल और एक ख़ाली जगह मिलती है, और दूर बारिश में किसी की जाती हुई गाड़ी की आवाज़ गूँजती रह जाती है।
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बारह साल पुराना सच अब भी महिका की डायरी में ज़िंदा है और उसी साझा ग़म में बारिश की रात दोनों के बीच खिंचावट फिर सुलग उठती है, पर हिसाब पहले चुकता होता है, जब अपने सवाल ले कर ऊपर पहुँची महिका अगस्त्य की मेज़ पर हफ़्तों पुरानी लिखावट में अपनी माँ निर्मला वर्मा का नाम गोल घेरे में देख लेती है और समझ जाती है कि बर्फ़ का बादशाह हफ़्तों से जानता था कि वो किसकी बेटी है और उसे चूमते वक़्त भी चुप रहा। टूटी हुई महिका काँपते हुए वो अकेला सवाल पूछती है, कि उसने उसे अपने पास इसलिए रखा क्योंकि उसे बरसों बाद कुछ महसूस करना था या इसलिए कि वो पहले से जानता था कि वो किसकी बेटी है, और अगस्त्य के जवाब देने से पहल
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बर्फ़ का बादशाह बारह साल में पहली बार किसी के पीछे भागता है, पर टूटी हुई महिका उसे साफ़ कह देती है कि वो न उसकी दवाई है, न उसका हथियार, न उसका पश्चाताप, और अपना खाना किसी और के हाथ भिजवाने का फ़ैसला कर के उससे पूरी तरह कट जाती है, जबकि दरार को भाँप कर संजना एक तरफ़ अगस्त्य पर सत्रह तारीख़ की सगाई थोपती है और दूसरी तरफ़ कैंटीन में उतर कर महिका को उसके परिवार की सलामती का वास्ता दे कर दिल्ली ही छोड़ जाने की ठंडी धमकी देती है, जबकि उसी संजना के भीतर पहली बार अपने पिता की बेरहमी का एक बारीक शक करवट लेता है। रात, अकेला अगस्त्य सगाई के काग़ज़ और निर्मला की फ़ाइल के बीच खड़ा तय करता है कि अब वो झुकेग
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दीवारें घिरती देख कर राणा अपना सबसे बड़ा दाँव चलता है, मर्जर और सगाई दोनों को आगे खिसका कर हिमराज को अगस्त्य के दस्तख़त के बिना ही अपने नाम करने की चाल चलता है, और बारह साल पुराने सच को हमेशा के लिए दफ़्न करने अपना एक आदमी त्रिलोकपुरी भेज देता है कि वो निर्मला के छोड़े हर काग़ज़ को उठा लाए और बूढ़ी नानी तथा नन्हे चिंटू को डरा आए। अपने पिता का काम करते हुए संजना पहली बार भाँपती है कि वो कितनी दूर तक जा सकता है और उसके भीतर एक बारीक डर करवट लेता है, जबकि वीर मर्जर की इस अचानक रफ़्तार को पकड़ कर राणा से भिड़ता है और मीठा बोलने वाला चेयरमैन पहली बार अपना एक दाँत दिखा देता है। उधर उसी रात, जब भागने
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त्रिलोकपुरी के उस टूटे दरवाज़े पर राणा का भेजा बेचेहरा आदमी घुस आता है और निर्मला के काग़ज़ ढूँढते हुए महिका की कलाई तक पहुँच जाता है, जबकि बीमार नानी और नन्हा चिंटू बेबस देखते रह जाते हैं और महिका अपनी माँ की डायरी को अपनी जान से लगा कर उसे देने से इनकार कर देती है। उधर हिमराज के टावर में वीर से त्रिलोकपुरी की ख़बर सुन कर बारह साल का जमा हुआ अगस्त्य पहली बार पिघल कर एक साफ़ फ़ैसला कर लेता है, वो हिमराज, सगाई और राणा का बेटा होना, सब एक साँस में छोड़ कर उस घर को बचाने और निर्मला का नाम साफ़ करने निकल पड़ता है। ऐन वक़्त पर गली में पहुँच कर वो ख़ून से सना उस आदमी को राणा के ही नाम से भगा देता है
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बारह साल पुरानी उस रात का पूरा सच आख़िरकार दोनों के बीच खुल कर बोला जाता है, जब नानी के इशारे पर अगस्त्य महिका को अस्पताल के उस गलियारे की, उस टिफ़िन की, और उस अकेली रहम की कहानी सुनाता है जिसने उसकी बंद ज़ुबान के पीछे बस एक ज़ायका ज़िंदा रखा, और महिका समझ जाती है कि जिस अजनबी लड़के के लिए उसकी मरती माँ बरसों रोती रही वो यही बर्फ़ का बादशाह है और उसकी माँ का प्यार, हूबहू, बारह साल से इसे ज़िंदा रखे है। इसके बाद अगस्त्य वो आख़िरी दफ़्न सच भी कह देता है, कि उस रात फ़्लाईओवर से गिरी गाड़ी उसके अपने परिवार की थी और निर्मला को उसी के घर की मौत का बलि का बकरा बनाया गया, जिससे जो ग़म दोनों को बाँटना
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बंसी काका की चीख़ के तुरंत बाद अगस्त्य और महिका हिमराज के कोल्ड चेन कॉम्प्लेक्स पहुँचते हैं, जहाँ नानी नंबर तीन के फ़्रीज़र में सील हैं और लॉकडाउन सिर्फ़ हेड ऑफ़िस के कोड से खुल सकता है, यानी दिग्विजय राणा से, और अगस्त्य समझ जाता है कि जिस जगह को उसने सबसे महफ़ूज़ चुना था उसी को राणा ने एक जमा देने वाला जाल बना दिया है। उधर राणा की हवेली में हफ़्तों से एक बारीक शक पाले बैठी संजना अपने पिता के स्टडी में निर्मला की डायरी का वो फटा पन्ना पढ़ लेती है जो राणा का आदमी त्रिलोकपुरी से नोच लाया था, और पिता को फ़ोन पर 'बुढ़िया अंदर है, लगेगा बस एक हादसा' कहते सुन कर उसे यक़ीन हो जाता है कि उसका बाप सिर्
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घिरा हुआ राणा अपनी सबसे ख़तरनाक चाल चलता है और नानी की जान को उसी बर्फ़ के जाल में क़ीमत बना देता है, फ़ोन पर अगस्त्य से माँगता है कि दरवाज़े का कोड चाहिए तो निर्मला के सारे सबूत, मर्जर और सगाई उसके हवाले कर दे, और यूँ एक ही घड़ी में एक ज़िंदगी और एक इंसाफ़, दोनों उसकी मुट्ठी में आ जाते हैं। महिका सबूत छोड़ने को तड़प उठती है पर अगस्त्य झुकने के बजाय बर्फ़ का बादशाह होते हुए ख़ुद उस जमे हुए चैम्बर में नानी को बचाने उतर जाता है, जबकि उधर हवेली में संजना फटा पन्ना छुपाए, अपना फ़ैसला टाल कर निकल जाती है और राणा फ़ाइलें ख़त्म करने का हुक्म दे देता है। आख़िर में इंजीनियरों के ज़ोर पर जमा हुआ दरवाज़ा
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बर्फ़ के मुँह से नानी और अगस्त्य दोनों ज़िंदा निकल आते हैं, और उसी सुबह बोर्ड रूम में अगस्त्य रिकॉर्डिंग, अस्पताल के रिकॉर्ड और निर्मला की डायरी के साथ राणा का बारह साल पुराना झूठ खोल देता है। ऐन वक़्त पर संजना वो फटा पन्ना ले कर अपने ही बाप के ख़िलाफ़ आ खड़ी होती है, निर्मला वर्मा बेगुनाह साबित होती है, पर गिरफ़्तार होते राणा हँस कर कह जाता है कि उस रात से फ़ायदा उठाने वाला वो अकेला नहीं था।
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इंसाफ़ हो चुका है, पर अब सबसे बड़ा रोड़ा ख़ुद वो ज़ख़्म है, कि क्या महिका उस आदमी से प्यार कर सकती है जिसकी दुनिया ने उसकी माँ को उजाड़ा। बेटी का नाम साफ़ होने पर सुकून पाई नानी दोनों को आशीर्वाद देती हैं, अगस्त्य महिका को हर मजबूरी से आज़ाद कर देता है, और अगली सुबह महिका हिमराज के गेट पर खड़ी ये तय नहीं कर पाती कि अंदर क़दम रखे या मुड़ जाए।
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हिमराज के गेट पर उठा क़दम आगे गिरता है और महिका किसी मजबूरी में नहीं, अपनी पूरी मर्ज़ी से बराबरी से अगस्त्य को चुन लेती है, और बारह साल की जमी बर्फ़ पहले सच्चे बोसे में पिघल जाती है। मेमोरियल विंग, नानी, चिंटू, बंसी और विदा लेती संजना के आख़िरी नोट के बाद, उसी कैंटीन में अगस्त्य मान लेता है कि महिका का खाना कभी दवाई नहीं, हमेशा मोहब्बत था, और वो बर्फ़ उसका तख़्त नहीं, एक पिंजरा थी जिसे उसने पिघला दिया।