Chapter 27 of 28
आख़िरी ज़ख़्म
बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi
इंसाफ़ हो चुका है, पर अब सबसे बड़ा रोड़ा ख़ुद वो ज़ख़्म है, कि क्या महिका उस आदमी से प्यार कर सकती है जिसकी दुनिया ने उसकी माँ को उजाड़ा। बेटी का नाम साफ़ होने पर सुकून पाई नानी दोनों को आशीर्वाद देती हैं, अगस्त्य महिका को हर मजबूरी से आज़ाद कर देता है, और अगली सुबह महिका हिमराज के गेट पर खड़ी ये तय नहीं कर पाती कि अंदर क़दम रखे या मुड़ जाए।
बोर्ड रूम ख़ाली हो चुका था, राणा को हथकड़ियों में ले जाया जा चुका था, और शहर के हर टीवी पर एक ही ख़बर चल रही थी... 'बारह साल बाद, नर्स निर्मला वर्मा बेगुनाह।' राणा जाते-जाते जो दूसरा नाम छोड़ गया था, वो एक ठंडी परछाईं की तरह अब भी कहीं इंतज़ार कर रहा था, पर आज रात बादशाह ने उस परछाईं से भी पीठ मोड़ ली थी। जीत के उस सबसे ऊँचे काँच के कमरे में अगस्त्य अकेला खड़ा था, और तभी सीढ़ियों से महिका ऊपर आई, हाथ में एक थाली... वही दाल-चावल, वो अकेली चीज़ जो इस पूरी दुनिया में उसे चखने में आती थी।
"सब चले गए, अगस्त्य। तुमने... तुमने कर दिखाया। पूरा शहर आज मेरी माँ का नाम इज़्ज़त से ले रहा है। और तुमने सुबह से कुछ नहीं खाया। ये लो, गरम है, मेरे हाथ का है। चुपचाप खा लो।"
अगस्त्य की नज़र उस थाली पर गई, और पहली बार उस थाली में उसे खाना नहीं, एक इल्ज़ाम दिखा। उसने अपने कोट से वो बारह साल पुराना स्टील का ढक्कन निकाला और उसे धीरे से उसकी थाली के बगल में रख दिया। और उसकी आवाज़ में वो बर्फ़ नहीं थी जो महिका जानती थी, कुछ और था, कहीं ज़्यादा भारी।
"बारह साल, महिका। बारह साल मैंने इस ढक्कन को सीने से लगाए रखा, ये जाने बिना कि ये किसका है। उस रात, उस गलियारे में, तुम्हारी माँ ने एक अजनबी, टूटे हुए लड़के के हाथ में अपना खाना रखा था। और उसी रात, मेरे अपने घर की मौत का इल्ज़ाम उन्हीं के सर मढ़ दिया गया। जिस हाथ ने मुझे ज़िंदा रखा, उसी हाथ को मेरी अपनी दुनिया ने बर्बाद कर दिया।"
"और मैं बारह साल तुम्हारी माँ की उसी मोहब्बत को खाता रहा, तुम्हारे हाथों से। उन्हें बचा नहीं पाया, तुम्हें बचा नहीं पाया, और आज तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, उस औरत का कर्ज़दार जिसे मेरे लोगों ने उजाड़ा। मैं किस मुँह से तुम्हारे हाथ का एक और निवाला खाऊँ, महिका? मैं तुम्हारे लायक़ नहीं हूँ।"
"मत कहो ऐसा... पर अगस्त्य, तुम अकेले नहीं हो जिसके सामने एक दीवार खड़ी है। मैं तुम्हें देखती हूँ, तो मुझे वो लड़का दिखता है जिसके लिए मेरी माँ मरते दम तक रोई। और ठीक उसी पल मुझे वो रात दिखती है जिसने मेरी माँ को, मेरे बचपन को, मेरे घर को राख कर दिया। तुम्हारा चेहरा, तुम्हारी दुनिया, वही तो है जिससे मेरी माँ का सब कुछ बँधा है।"
"अमीरी और ग़रीबी की दीवार तो मैं रोज़ फलाँग सकती थी, अगस्त्य, वो मुझे कभी नहीं डराती थी। पर ये ज़ख़्म... इसका क्या करूँ? मैं तुम्हारा हाथ थामूँ, और मेरी माँ की क़ब्र बीच में आ जाए? मैं तुम्हारे साथ हँसूँ, और मुझे लगे कि मैं अपनी माँ की मौत पर हँस रही हूँ?"
दो लोग, एक ही ज़ख़्म के दो सिरे, एक साँस की दूरी पर, और बीच में बारह साल की एक पूरी काली रात। अगस्त्य का हाथ एक पल को उसकी तरफ़ उठा, फिर रुक गया, जैसे उसे छूने का हक़ भी उस रात ने छीन लिया हो। और महिका, आँखों में आँसू लिए, एक क़दम पीछे हट गई, वो थाली और वो सवाल दोनों के बीच छोड़ कर।
"आज मुझे घर जाना है, अगस्त्य, नानी के पास। मुझे सोचना है। ये खाना यहीं है। ठंडा होने से पहले खा लेना... मेरी माँ के लिए ही सही।"
दो दिन बाद, शहर के दूसरे छोर पर, त्रिलोकपुरी के उस एक कमरे के घर में, बारह साल बाद पहली बार हवा हल्की थी। कोल्ड स्टोरेज की उस बर्फ़ से बचाई गई नानी रज़ाई में लिपटी बैठी थीं, जिस्म अब भी कमज़ोर, पर आँखें बारह साल में पहली बार हल्की। और उनके पास बैठा ग्यारह साल का चिंटू, टीवी की तरफ़ उँगली किए, रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था।
"नानी, नानी, देखो फिर से! टीवी वाले फिर बोल रहे हैं माँ का नाम! 'नर्स निर्मला वर्मा बेगुनाह'! मैंने आज स्कूल में सबको बता दिया, मेरी माँ हीरो थीं, उन्होंने किसी को मारा नहीं था, उन्होंने तो एक लड़के को बचाया था! अब कोई मुझे कुछ नहीं बोल सकता, है ना दीदी?"
महिका ने एक मुस्कान ओढ़ ली जो उसके अंदर थी ही नहीं, और चिंटू के बालों में उँगलियाँ फेर दीं। पर नानी, जिन्होंने उसे गोद में पाला था, उसकी उस झूठी मुस्कान के आर-पार देख गईं।
"चिंटू, बेटा, जा तो, रसोई से नानी के लिए पानी और दवाई ले आ। ज़रा धीरे, गिरा मत देना। अब बता, मेरी बच्ची। तेरा नाम आज साफ़ हो गया, तेरी माँ का नाम भी। फिर तेरी आँखों में ये बर्फ़ कैसी? किसने डाली?"
"नानी, मैंने सोचा था इंसाफ़ मिल जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा। माँ का नाम साफ़ हो गया, वो आदमी जेल चला गया। पर सीने में एक काँटा है जो निकलता ही नहीं। अगस्त्य। नानी, वो लड़का जिसके लिए माँ मरते दम तक रोती रही, वही अगस्त्य है। और उसी की दुनिया, उसी के घर की वो मौत, वही तो है जिसके लिए माँ को बलि का बकरा बनाया गया।"
"मैं उससे मोहब्बत करती हूँ, नानी, छुपाऊँ भी तो किससे? पर जब भी मैं उसका हाथ थामने चलती हूँ, मुझे लगता है मैं माँ की क़ब्र पर पैर रख रही हूँ। क्या मुझे हक़ है उस आदमी के साथ हँसने का, जिसकी वजह से मेरी माँ ज़िंदगी भर रोती रही?"
नानी एक लंबे पल तक ख़ामोश रहीं। फिर उन्होंने बारह साल में पहली बार वो किया जो वो भूल ही चुकी थीं... बिना किसी डर के मुस्कुराईं। उन्होंने महिका के वो हाथ, जो खाना बनाते-बनाते खुरदुरे हो गए थे, अपने काँपते हाथों में ले लिए।
"सुन, मेरी बच्ची। तेरी माँ ने उस रात उस लड़के को खाना दिया था, ये जानते हुए कि आगे क्या होने वाला है? नहीं। उसने बस एक टूटे हुए बच्चे को भूखा देखा, और खिला दिया, बिना नाम पूछे, बिना ये सोचे कि वो अपना है या पराया। वो प्यार बेशर्त था, बेटी। तेरी माँ का हाथ किसी का दुश्मन नहीं था, किसी का हिसाब नहीं था, वो बस मोहब्बत था।"
"और वही मोहब्बत आज तेरे हाथों में उतरी है। तू सोचती है उस लड़के से मोहब्बत कर के तू अपनी माँ की क़ब्र पर पैर रखेगी? उल्टा है, पगली। तेरी माँ बारह साल उस लड़के के लिए रोई, दुआ करती रही कि वो जिए, वो ठीक हो जाए। और आज तेरे हाथ का खाना उसे बारह साल बाद ज़िंदा किए है। तू अपनी माँ की उस अधूरी दुआ को पूरा कर रही है, बच्ची, उसे तोड़ नहीं रही।"
और ठीक उसी पल, उस टूटे दरवाज़े पर एक दस्तक हुई। महिका ने पलट कर देखा, और दहलीज़ पर वही खड़ा था... बर्फ़ का बादशाह, अपने काँच के टावर से उतर कर, त्रिलोकपुरी की उस तंग गली में, और उसके हाथ में वही पुराना स्टील का ढक्कन था, जो बारह साल से उसकी अकेली अमानत थी।
"शांति देवी। मैं वो लड़का हूँ जिसे उस रात आपकी बेटी ने गलियारे में खाना खिलाया था। और मैं उसी घर से हूँ जिसकी मौत का इल्ज़ाम आपकी बेटी पर मढ़ा गया। बारह साल मैंने ये सँभाला, ये जाने बिना कि ये किसका है। ये आपकी निर्मला का है। मैं इसे लौटाने आया हूँ, और आपसे माफ़ी माँगने। मेरे लोगों ने आपकी बेटी को उजाड़ा।"
नानी ने उस ढक्कन को देखा, फिर उस अमीर, टूटे हुए आदमी को जो उनके कच्चे फ़र्श पर झुका बैठा था, और बारह साल का सारा डर, सारा ग़ुस्सा एक पल में झर गया। उन्होंने वो ढक्कन नहीं लिया। उन्होंने काँपते हाथों से उस बादशाह का चेहरा थाम लिया, ठीक जैसे कोई माँ थामती है।
"रख इसे अपने पास, बेटा। ये मेरी निर्मला की आख़िरी निशानी है, और उसने ये तुझे दिया था, किसी और को नहीं। तू माफ़ी माँगने आया है? तूने उस रात मेरी बेटी को नहीं उजाड़ा था। तू तो ख़ुद एक बच्चा था, जिसका उस रात सब कुछ छिन गया था। मेरी बेटी जिस लड़के के लिए मरते दम तक रोई, वो तू है। अगर आज वो होती, तो तुझे सीने से लगाती, तुझसे माफ़ी नहीं मँगवाती।"
"और तू, मेरी महिका, इधर आ। मेरी बेटी का प्यार इस लड़के को बारह साल से ज़िंदा रखे है, और तेरा प्यार इसे बाक़ी की उम्र ज़िंदा रखेगा। तुम दोनों उस एक काली रात के दो बचे हुए बच्चे हो। एक दूसरे का ज़ख़्म तुमसे बेहतर कौन भर सकता है? जा, बच्ची, अपनी माँ की दुआ पूरी कर। मेरा आशीर्वाद तेरे साथ है।"
उसी रात, जब पूरी गली सो चुकी थी, वो दोनों उस तंग घर की छत की सीढ़ियों पर बैठे थे, जहाँ से दूर हिमराज के टावर की बत्तियाँ टिमटिमाती दिखती थीं। नानी के आशीर्वाद ने कुछ पिघलाया था, पर सब कुछ नहीं। दोनों के बीच वो खिंचावट अब भी थी, गरम, पर एक अनकही झिझक से बँधी हुई।
"नानी ने तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में दे दिया, महिका। पर मैं जानता हूँ, ये काफ़ी नहीं है। तुम मेरे पास इसलिए नहीं आ सकतीं क्योंकि नानी ने कहा। या इसलिए कि तुम्हारे घर को पैसों की ज़रूरत है। या इसलिए कि मैं तुम्हारे बिना फिर से बेस्वाद, मुर्दा हो जाऊँगा। ये सब वजहें एक पिंजरा हैं, महिका, मोहब्बत नहीं।"
और फिर बर्फ़ के बादशाह ने वो किया जो उसने ज़िंदगी में कभी नहीं किया था... उसने अपनी क़ैदी को आज़ाद कर दिया। उसने अपने कोट से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला और उसके हाथ में रख दिया।
"ये तुम्हारे परिवार के नाम एक ट्रस्ट है। चिंटू की पढ़ाई, नानी की दवाई, तुम्हारा घर, सब उम्र भर के लिए महफ़ूज़। और अस्पताल में तुम्हारी माँ के नाम एक नर्सिंग फ़ंड, 'निर्मला वर्मा मेमोरियल', जिस पर मेरे नहीं, तुम्हारे दस्तख़त होंगे। ये सब तुम्हारा है, चाहे तुम मेरी तरफ़ आओ या नहीं। अब तुम्हें मेरी कोई ज़रूरत नहीं। इसलिए अगर कल तुम मेरे पास आओ, तो सिर्फ़ इसलिए आना क्योंकि तुम आना चाहती हो, किसी मजबूरी में नहीं।"
"तुम... तुम मुझे आज़ाद कर रहे हो? बारह साल जिस आदमी ने मुझे बहानों से, हुक्मनामों से अपने पास बाँधे रखा, वो आज कह रहा है कि जाओ, चाहो तो मत आना? अगस्त्य, ये... तुमने आज पहली बार सच में मोहब्बत की है।"
"शायद बारह साल बाद पहली बार मैं कुछ महसूस कर पा रहा हूँ, महिका, और ये तुम्हारे खाने की वजह से नहीं है। मैं तुम्हें एक दवाई की तरह नहीं चाहता, एक ज़ायके की तरह नहीं चाहता। मैं तुम्हें बस तुम्हारी तरह चाहता हूँ। पर वो फ़ैसला मेरा नहीं, तुम्हारा है। कल सुबह, हिमराज के गेट पर, मैं रहूँगा। तुम आओ या न आओ, मैं तुम्हारी माँ का नाम हमेशा इज़्ज़त से लूँगा।"
उसका माथा उसके माथे से आ लगा, और पूरी बर्फ़ीली दुनिया एक पल को थम गई। बारह साल की बर्फ़, पिघलने से बस एक साँस दूर, और दोनों में से किसी ने वो साँस पार नहीं की। क्योंकि उस बोसे से पहले एक फ़ैसला आना था, साफ़, सिर्फ़ उसका अपना। अगस्त्य पीछे हटा, वो काग़ज़ उसके हाथ में और वो पूरी रात उसके नाम छोड़ कर, सीढ़ियाँ उतर गया।
अगली सुबह दिल्ली पर एक साफ़, सलेटी रौशनी के साथ उतरी। और महिका हिमराज के उस बड़े लोहे के गेट के सामने खड़ी थी, एक हाथ में वो ट्रस्ट का काग़ज़, अपने पूरे परिवार का महफ़ूज़ कल, और दूसरे हाथ में माँ की वो डायरी। एक तरफ़ वो खुला गेट था, और उसके पार वो आदमी, वो टावर, एक ऐसा कल जिसमें वो बादशाह के साथ बराबरी से खड़ी होती। और दूसरी तरफ़ खुली सड़क थी, जहाँ वो अपने परिवार को ले कर, आज़ाद, चली जाती, और अगस्त्य को हमेशा के लिए बस अपनी माँ की एक परछाईं बना छोड़ जाती।
"गलियारे वाला वो लड़का, और टावर वाला वो आदमी... अगर मैं इस गेट के अंदर क़दम रखती हूँ, तो क्या मैं अपनी माँ का ज़ख़्म भर रही हूँ, या उसे रोज़ अपनी आँखों के सामने ज़िंदा रखूँगी? माँ... तुम आज होतीं, तो मुझसे क्या कहतीं? इस गेट के अंदर जाऊँ, या यहीं से मुड़ जाऊँ?"
एक हाथ में माँ की दुआ थी, दूसरे हाथ में माँ की परछाईं, और उसका पूरा कल उस एक क़दम पर टिका था। उसने अपनी नज़र उस ऊँचे काँच के टावर की तरफ़ उठाई, एक लंबी साँस भरी, और अपना क़दम उठाया... और ठीक उस एक उठे हुए क़दम पर, उस अनकिए फ़ैसले पर, बर्फ़ के बादशाह की कहानी ने अपनी साँस रोक ली।
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