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Chapter 24 of 28

संजना का शक

बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi

बंसी काका की वो चीख़ फ़ोन पर बीच में ही कट गई थी, पर वो अगस्त्य के कानों में अब तक गूँज रही थी। सुबह की पहली सफ़ेदी दिल्ली के आसमान पर फैल ही रही थी जब अगस्त्य की गाड़ी हिमराज के कोल्ड चेन कॉम्प्लेक्स के फाटक को चीरती हुई अंदर घुसी। जिस जगह को कल रात सबसे महफ़ूज़ चुना गया था, वो आज अलार्म की लाल रौशनी में डूबी चीख़ रही थी।

"बंसी काका! नानी कहाँ हैं? वो दरवाज़ा किधर है? मुझे उस फ़्रीज़र तक ले चलो, अभी, इसी वक़्त!"

"साहब, आप आ गए, ऊपर वाले का शुक्र है! नानी अंदर हैं, नंबर तीन वाले बड़े फ़्रीज़र में। मैं रात भर उनके कमरे के बाहर पहरा दे रहा था, बस दो घड़ी को आँख लगी थी साहब, और जब उठा तो नानी वहाँ नहीं थीं!"

"नानी! नानी, आप सुन रही हैं? मैं महिका हूँ, मैं आ गई! ये दरवाज़ा... ये खुल क्यों नहीं रहा! अगस्त्य, ये हिल तक नहीं रहा, जैसे किसी ने इसे बाहर से जकड़ दिया हो!"

वो मोटा स्टील का दरवाज़ा एक इंच भी नहीं सरका। अगस्त्य ने अंदर से खुलने वाला वो इमरजेंसी हैंडल घुमाया, पर वो घूमा ही नहीं, जैसे किसी ने उसे बाहर से जाम कर दिया हो। और दरवाज़े की दरारों से बर्फ़ जैसी सर्द हवा एक साँस की तरह बाहर रिस रही थी।

"साहब, कंट्रोल रूम पर भी बाहर से ताला पड़ा है! चिंटू कह रहा है, रात को दो अजनबी आए, नानी को दवाई का बहाना देकर इसी तरफ़ ले गए। चिंटू मेरे पास महफ़ूज़ है साहब, पर नानी उस बर्फ़ में बंद हैं और अंदर का तापमान गिरता जा रहा है!"

"कोई तो रास्ता होगा, अगस्त्य! इंजीनियर, चाबी, गैस कटर, कुछ भी! मेरी नानी पहले ही बीमार हैं, वो इतनी ठंड नहीं झेल पाएँगी, वो इतनी ठंड में एक घंटा भी नहीं निकाल पाएँगी!"

"ये कोई हादसा नहीं है, महिका। इस पूरे कॉम्प्लेक्स का सिक्योरिटी लॉकडाउन सिर्फ़ हेड ऑफ़िस के एक कोड से लगता है, और वो कोड सिर्फ़ दो आदमियों के पास है। एक मेरे पास, और दूसरा... दिग्विजय राणा के पास।"

अगस्त्य की रगों में बारह साल पुरानी वही बर्फ़ लौट आई, पर इस बार वो डर नहीं, एक ठंडी समझ थी। जिस जगह को उसने अपने हाथों से सबसे महफ़ूज़ चुना था, राणा ने उसी को एक जमा देने वाला जाल बना दिया था।

"बंसी काका, हिमराज का हर इंजीनियर, हर टेक्नीशियन इसी वक़्त यहाँ चाहिए। मैं हेड ऑफ़िस का ये लॉकडाउन तुड़वाता हूँ, चाहे इसके लिए मुझे पूरा शहर जगाना पड़े। राणा ने बर्फ़ को हथियार बनाया है ना... तो देखता हूँ, इस बार बर्फ़ किसकी क़ैद बनती है।"

पर इस जमे हुए जाल की चाबी हिमराज के इस अहाते में नहीं, शहर के दूसरे छोर पर, राणा की उस आलीशान हवेली में पड़ी थी। और उसी हवेली में, उसी पहर, एक बेटी जाग रही थी, जिसके सीने में हफ़्तों से पल रहा एक बारीक शक अब धीरे धीरे एक पत्थर बनता जा रहा था।


संजना राणा को हफ़्तों से चैन की नींद नहीं आ रही थी। जिस दिन उसने पिता को महिका का वो राज़ बताया था, कि बादशाह सिर्फ़ उसी का खाना चख पाता है, उसी दिन से उसे पिता की मुस्कान में एक ऐसी ठंडक दिखने लगी थी जो पहले कभी नहीं दिखी। आज रात पिता किसी फ़ोन पर देर तक बरामदे में टहल रहे थे, और हवेली आधी अँधेरे में डूबी थी।

"पापा रात के इस पहर किससे इतनी देर बात कर रहे हैं... हिमराज के कोल्ड स्टोरेज में कोई हादसा, आधी रात को? नहीं... पापा ऐसा कुछ नहीं कर सकते। वो सिर्फ़ एक सख़्त कारोबारी हैं। बस एक कारोबारी, और कुछ नहीं।"

और वो पिता के उस स्टडी में क़दम रख गई जहाँ बचपन से उसे बिन इजाज़त आने की मनाही थी। मेज़ पर एक खुली फ़ाइल पड़ी थी, और उसके भीतर किसी पुरानी डायरी से नोचा हुआ एक फटा, मुड़ा-तुड़ा पन्ना। ये वही पन्ना था जो राणा का आदमी चंद रातें पहले त्रिलोकपुरी की तंग गली में महिका की डायरी से छीन लाया था।

"ये लिखावट... किसी औरत की है, बहुत पुरानी। 'उस रात दूसरी गाड़ी से एक आदमी निकला, शराब में धुत, पर उस पर एक ख़रोंच तक नहीं थी। और उसी आदमी ने अपने पैसे और रसूख़ से एक पूरे परिवार की मौत का इल्ज़ाम मुझ बेगुनाह के सिर मढ़ दिया।' ये कौन लिख रहा है? किस आदमी की बात हो रही है इसमें?"

और उस पन्ने की आख़िरी पढ़ी जा सकने वाली लकीर पर एक नाम लिखा था, उसी मरती हुई औरत के काँपते हाथ से घसीटा हुआ। संजना की आँखें उस नाम पर आ कर जम गईं, और उसका अपना ख़ून उसके कानों में गरजने लगा। वो नाम था... दिग्विजय राणा।

"पापा... नहीं। ये किसी की कोई पुरानी रंजिश होगी, कोई झूठा इल्ज़ाम, बस इतना ही। मेरे पापा भला एक परिवार को, एक बेगुनाह नर्स को... मैं तो सिर्फ़ एक अच्छी शादी चाहती थी, एक मर्जर, हिमराज की मालकिन बनना। मैंने आज तक किसी की जान नहीं माँगी थी।"

और तभी बरामदे से पिता की धीमी आवाज़ फ़ोन पर तैरती अंदर आई, और संजना के हाथ का वो पन्ना पत्थर हो गया। 'बुढ़िया अंदर है, दरवाज़ा सील है, सुबह तक काम ख़त्म, और लगेगा किसी को बस एक हादसा।' बारह साल पुराना वो झूठा 'हादसा' और आज रात का ये 'हादसा', दोनों एक ही ज़ुबान से, एक ही ठंडक में निकले।

संजना ने वो पन्ना फुर्ती से अपने आँचल में, अपने दिल के ठीक पास छुपा लिया, और जब राणा फ़ोन रख कर स्टडी में लौटा, तो उसकी बेटी वहीं खड़ी उसका इंतज़ार कर रही थी। बाप और बेटी, एक ही बर्फ़ के दो चेहरे, अब आमने-सामने थे।

"संजना? बेटा, इस वक़्त, यहाँ मेरे कमरे में? तुझे इस तरह बिन बताए यहाँ नहीं आना चाहिए, तुझे पता है ना। जा, जा कर सो जा। कल तेरी सगाई की तैयारियाँ हैं, तुझे तरोताज़ा दिखना है।"

"पापा, हिमराज के कोल्ड स्टोरेज में आख़िर हुआ क्या है? मैंने अभी आपको फ़ोन पर सुना। कोई बूढ़ी औरत अंदर बंद है। ये वही औरत तो नहीं... उस कैंटीन वाली महिका की नानी?"

"तू इन छोटी बातों में अपना दिमाग़ क्यों ख़राब करती है? ये बड़े कारोबार के मामले हैं, बेटा। इस ख़ानदान में काँटे हमेशा एक ही ख़ामोश तरीक़े से हटाए जाते हैं, चुपचाप। तू बस मल्होत्रा की बहू बनने का सपना देख, बाक़ी सब अपने बाप पर छोड़ दे।"

"काँटे? पापा, वो एक बीमार, बूढ़ी औरत है, और उसके साथ एक ग्यारह साल का बच्चा है। आप उन्हें... आप सच में उन्हें उस बर्फ़ में जमा कर मार डालेंगे, और उसे दुनिया के सामने बस एक 'हादसा' कह देंगे?"

"संजना। तू दिग्विजय राणा की बेटी है। इस साम्राज्य की हर ईंट किसी न किसी ऐसे ही 'हादसे' पर रखी है। और जिस दिन तूने ख़ुद आ कर मुझे उस लड़की का राज़ बताया था, उसी दिन तूने ये खेल शुरू किया था। अब बीच खेल में नाज़ुक बनने का हक़ तुझे नहीं है। जो होना है, वो हो कर रहेगा।"

और वहीं, पिता की उस बेरहम, ठंडी शांति में, संजना को वो पूरा सच दिख गया जिससे वो हफ़्तों से आँखें चुराती आई थी। उसका पिता कोई सख़्त कारोबारी नहीं, एक क़ातिल था, बारह साल पहले भी और आज इस रात भी। और वो, संजना, उसकी शरीक-ए-जुर्म बनने से बस एक क़दम दूर खड़ी थी।

"आप... आप ठीक कहते हैं, पापा। मैं बेवजह घबरा गई थी। मैं सोने जाती हूँ। कल का दिन सबसे बड़ा है, है ना।"

पर उन झुकी हुई पलकों के पीछे कुछ हमेशा के लिए बदल चुका था। और उसके सीने से लगा वो पन्ना, निर्मला वर्मा के हाथ का लिखा, अब एक ऐसी चीज़ था जो न महिका जानती थी कि उसके पास है, न ख़ुद राणा। इस पूरी बिसात पर वो एक मोहरा दोनों तरफ़ की नज़रों से छुपा था, और वो संजना की मुट्ठी में था।


उधर कोल्ड स्टोरेज में इंजीनियरों की टीम उस लॉकडाउन से जूझ रही थी, तार-दर-तार, कोड-दर-कोड, पर हेड ऑफ़िस का वो ताला टूट नहीं रहा था। फ़्रीज़र के भीतर का तापमान अब भी गिर रहा था, और हर मिनट नानी की काँपती साँसों पर भारी होता जा रहा था। उस लाल रौशनी में महिका माँ की डायरी सीने से लगाए खड़ी थी, और अगस्त्य उसके साथ।

"अगस्त्य... इस डायरी का एक पन्ना... ये फटा हुआ है। उस रात, जब वो आदमी घर में घुसा था, जब मैं इसे जान से लगाए बैठी थी... उसने खींचातानी में इसका एक पन्ना नोच लिया था। और ये वही पन्ना है जिसमें माँ ने उस आदमी का पूरा नाम लिखा था।"

"तो वो पन्ना अब राणा के हाथ लग चुका है। कोई बात नहीं, महिका। तुम्हारी डायरी में सिर्फ़ वही एक पन्ना नहीं है। अस्पताल की पीली फ़ाइलें मेरे पास हैं, तहख़ाने का रिकॉर्ड है, और हिमराज के वो काग़ज़ भी जो राणा के चंदे की पोल खोलते हैं। सुबह होते ही हम ये सब लेकर सीधे बोर्ड के सामने जाएँगे, फिर पुलिस के पास। राणा का एक-एक झूठ सबके सामने रख देंगे।"

"पर सबसे पहले नानी, अगस्त्य। हम राणा को बेनक़ाब भी कर दें, और मेरी नानी उसी बर्फ़ में जम जाएँ, तो मैं वो इंसाफ़ ले कर क्या करूँगी? नहीं। पहले वो दरवाज़ा खुलेगा। पहले मेरी नानी।"

"वो दरवाज़ा खुलेगा, महिका। मैं तुमसे वादा करता हूँ। तुम्हारी माँ ने बारह साल पहले उस गलियारे में मुझे अकेला मरने नहीं छोड़ा था। आज मैं तुम्हारी नानी को इस बर्फ़ में अकेला नहीं छोड़ूँगा। हम दोनों साथ हैं। और अब राणा की हर चाल का जवाब हमारे पास है।"

पर इस पूरी लड़ाई का सबसे भारी पत्ता न अगस्त्य के हाथ में था, न महिका के। वो एक पत्ता शहर के दूसरे छोर पर, राणा की अपनी बेटी के सीने से लगा हुआ था। और अब उस बेटी को एक ऐसा फ़ैसला करना था जो इस पूरी जंग का रुख़ पल भर में मोड़ सकता था।


राणा की हवेली पर सुबह की पहली किरन उतर रही थी, और संजना अपने कमरे में उस फटे पन्ने को हाथों में लिए बैठी थी। उसके सामने दो ही रास्ते थे, और दोनों किसी न किसी खाई की तरफ़ जाते थे।

"अगर मैं ये पन्ना पापा को दे दूँ... तो मैं वही रहूँगी जो अब तक थी। राणा की बेटी, हिमराज की होने वाली मालकिन, और एक क़ातिल की शरीक-ए-जुर्म। और अगर मैं ये पन्ना उस कैंटीन वाली महिका तक पहुँचा दूँ, तो मैं अपने ही बाप को, अपने ही घर को अपने इन्हीं हाथों से मिट्टी में मिला दूँगी।"

जिस लड़की ने कभी सिर्फ़ एक अच्छी शादी और एक साफ़-सुथरे साम्राज्य का ख़्वाब देखा था, वो आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थी जहाँ हर रास्ता उसके अपने ख़ून पर से गुज़रता था। और उस पल कोई नहीं जानता था, हम भी नहीं, कि वो पन्ना उसके पिता के हाथ में जाएगा, या उसके ख़िलाफ़ मुड़ जाएगा।

संजना उठी, वो पन्ना मुट्ठी में कस कर भींचा, और पिता के स्टडी की तरफ़ बढ़ी, जहाँ दिग्विजय राणा सुबह की चाय के साथ अख़बार खोले, उस रात के 'हादसे' की ख़बर का इत्मीनान से इंतज़ार कर रहा था। उसका हाथ दरवाज़े पर रुका, दिल छुरी की धार पर। और फिर वो अंदर क़दम रख गई।

"पापा..."

"आ गई, बेटा? बैठ। कुछ कहना है क्या तुझे मुझसे?"

और संजना की वो भिंची हुई मुट्ठी धीरे धीरे ऊपर उठने लगी, उस एक पन्ने के साथ जो एक तरफ़ एक बेगुनाह का इंसाफ़ था, और दूसरी तरफ़ एक बाप की पूरी बर्बादी। वो अपने बाप की बेटी थी या अपनी अंतरात्मा की, उसने कौन सा राणा चुना था, ये सिर्फ़ अगली एक साँस बताने वाली थी। और ठीक उसी एक रुकी हुई साँस पर, कहानी ने अपनी आँखें मूँद लीं।

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