Chapter 21 of 28
राणा की चाल
बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi
दीवारें घिरती देख कर राणा अपना सबसे बड़ा दाँव चलता है, मर्जर और सगाई दोनों को आगे खिसका कर हिमराज को अगस्त्य के दस्तख़त के बिना ही अपने नाम करने की चाल चलता है, और बारह साल पुराने सच को हमेशा के लिए दफ़्न करने अपना एक आदमी त्रिलोकपुरी भेज देता है कि वो निर्मला के छोड़े हर काग़ज़ को उठा लाए और बूढ़ी नानी तथा नन्हे चिंटू को डरा आए। अपने पिता का काम करते हुए संजना पहली बार भाँपती है कि वो कितनी दूर तक जा सकता है और उसके भीतर एक बारीक डर करवट लेता है, जबकि वीर मर्जर की इस अचानक रफ़्तार को पकड़ कर राणा से भिड़ता है और मीठा बोलने वाला चेयरमैन पहली बार अपना एक दाँत दिखा देता है। उधर उसी रात, जब भागने
चिंटू का वो सवाल उस एक कमरे के घर की हवा में अब भी टँगा हुआ था, बल्ब की उस मद्धम रौशनी में तैरता हुआ। और महिका, जिसके हाथ अभी-अभी अपनी माँ की डायरी को कपड़े में लपेट रहे थे, वहीं रुक गए, और उसने वो लिपटा हुआ कपड़ा धीरे से वापस खोल दिया।
"तू ठीक कह रहा है, चिंटू। डर कर भाग जाने से वो बुरे लोग सच में जीत जाएँगे। और माँ का सच... वो हमेशा एक झूठ ही बना रहेगा।"
"तो हम नहीं जा रहे, दीदी? हम यहीं रहेंगे? और उन बुरे लोगों से लड़ेंगे?"
"हम कहीं नहीं जा रहे। हम यहीं रहेंगे, अपने घर में, और मैं माँ का सच पूरी दुनिया के सामने ला कर रहूँगी। चाहे उसके लिए मुझे कितने भी बड़े आदमी से क्यों न लड़ना पड़े। बस, अब कोई भागना नहीं।"
उस एक कमरे के घर में, एक बूढ़ी बीमार नानी की नींद के पास, एक बच्चे और एक लड़की ने तय कर लिया कि वो नहीं भागेंगे। पर उन्हें नहीं पता था कि दिल्ली के दूसरे छोर पर, जिस आदमी से वो लड़ने चली थीं, वो अपनी सबसे बड़ी चाल पहले ही चल चुका था।
लुटियंस दिल्ली की एक सुनसान सड़क पर, ऊँची दीवारों के पीछे, दिग्विजय राणा की हवेली में उस रात रौशनी जल रही थी। बोर्ड का चेयरमैन, अगस्त्य का मुँहबोला बाप, अपने अध्ययन-कक्ष में अकेला बैठा था, अपने सामने हिमराज के काग़ज़ों का एक ढेर फैलाए।
और उसके सामने वाली कुर्सी पर संजना बैठी थी, वही जो पिछले हफ़्तों से अपने पिता का काम कर रही थी, अगस्त्य पर सगाई थोपती, कैंटीन वाली को धमकाती। पर आज उसके पिता के चेहरे पर वो पिता वाली नरमी नहीं थी, जो हमेशा उसका नक़ाब रहती थी।
"अगस्त्य ने कार्ड फाड़ दिया, संजना। मुझे ख़बर मिल गई है। मैंने जो सगाई का कार्ड छपवाया था, हमारे लाडले ने उसे मुट्ठी में मसल कर फेंक दिया। और सुना है, आजकल वो पुरानी फ़ाइलें खँगालने लगा है। बारह साल पुरानी।"
"वो कैंटीन वाली लड़की के चक्कर में पागल हो गया है, पापा। मैंने उसे साफ़ कह दिया है कि वो दिल्ली छोड़ दे। वो डर जाएगी, चली जाएगी। ये सब अपने आप ठीक हो जाएगा।"
"अपने आप कुछ ठीक नहीं होता, बेटा। इस ख़ानदान में कुछ भी अपने आप ठीक नहीं होता। जो चीज़ें ख़तरा बन जाएँ, उन्हें ठीक करना पड़ता है। चुपचाप, हमेशा के लिए।"
और संजना ने वो सुना, उस मख़मली आवाज़ के नीचे दबा हुआ वो सुर, जो उसने कल आधी रात फ़ोन पर सुना था। वही ठंडक, जो किसी को हटाने की नहीं, किसी को मिटा देने की थी।
"अब और इंतज़ार नहीं। मैं मर्जर की बोर्ड मीटिंग आगे खिसका रहा हूँ, इसी हफ़्ते। हिमराज का ट्रस्ट, उसकी चाबियाँ, सब मेरे नाम होंगी, अगस्त्य के दस्तख़त के बिना भी। और सगाई... सगाई अब उसकी मर्ज़ी से नहीं, हालात से होगी।"
"और वो लड़की? उसका क्या करें? मैंने उसे शहर छोड़ने को कहा है, पर वो बड़ी ज़िद्दी है।"
"उस मरी हुई नर्स ने अपने पीछे जो कुछ छोड़ा है, वही चीज़ मेरी नींद उड़ाए हुए है, संजना। कोई काग़ज़, कोई लिखा-पढ़ी, जो बारह साल पहले ही राख हो जानी चाहिए थी। और वो सब उसी लड़की के त्रिलोकपुरी वाले घर में पड़ा है। जब तक वो वहाँ है, ये पुरानी आग बुझेगी नहीं।"
और फिर राणा ने वो फ़ोन उठाया, और दूसरी तरफ़ किसी को वो हुक्म दिया जो संजना दोबारा सुन रही थी। उस पूरी बातचीत का सिर्फ़ एक सिरा उस कमरे में गूँजा, पर वो एक सिरा ही काफ़ी था।
"हाँ। वही त्रिलोकपुरी वाला घर, उस तंग गली के आख़िर में। एक बूढ़ी बीमार औरत है, और एक छोटा बच्चा। लड़की ज़िद्दी है, इसलिए रात को जाना, जब घर में सब हों। उस घर से हर पुराना काग़ज़ चाहिए, हर पन्ना, हर तस्वीर। और उस बुढ़िया को नरमी से समझा देना, कि इस उमर में डर कर जीने से अच्छा है, चुप रह कर जीना।"
"पापा... एक बूढ़ी औरत और एक बच्चा। आप बस काग़ज़ की बात कर रहे हैं ना? सिर्फ़ काग़ज़?"
"बस काग़ज़, बेटा। तू भी क्या सोचती है अपने पापा के बारे में? मैं तो बस इस ख़ानदान की सलामती चाहता हूँ। तेरी, अगस्त्य की, हिमराज की। कुछ पुराने काग़ज़ हैं जो हम सबके बीच खड़े हैं, बस उन्हें रास्ते से हटा रहा हूँ।"
पर संजना वहीं बैठी रह गई, और उसके भीतर वो बारीक दरार, जो कल रात पड़ी थी, आज ज़रा और चौड़ी हो गई। उसने एक अच्छी शादी चाही थी, दो साम्राज्यों का मिलना चाहा था। एक बूढ़ी औरत के दरवाज़े पर रात के अँधेरे में भेजा गया एक आदमी, ये उसने कभी नहीं चाहा था। और बारह साल में पहली बार, उसने सोचा कि जिस आदमी को वो पापा कहती है, वो असल में है कौन।
अगली सुबह हिमराज के काँच के टावर में राणा की वो मशीन चलनी शुरू हो चुकी थी। मर्जर के काग़ज़, बोर्ड के ई-मेल, वकीलों के फ़ोन, सब अचानक तेज़ रफ़्तार पकड़ चुके थे, और इस रफ़्तार को सबसे पहले भाँपा वीर ओबेरॉय ने, अगस्त्य के इकलौते सच्चे दोस्त और हिमराज के सी-ओ-ओ ने।
"राणा साहब, ये मर्जर की मीटिंग अचानक इसी हफ़्ते? कल तक तो अगले महीने की बात हो रही थी। और इन काग़ज़ों में तो अगस्त्य के दस्तख़त की जगह ही नहीं छोड़ी गई। बड़ी जल्दी है आपको।"
"जल्दी नहीं, वीर, फ़िक्र है। अगस्त्य आजकल ठीक नहीं है। तुमने ख़ुद देखा होगा, न ठीक से खाता है, न सोता है, बोर्ड की मीटिंगों में उसका मन नहीं लगता। ऐसे में एक बाप का फ़र्ज़ है कि वो आगे बढ़ कर कंपनी सँभाल ले, है ना?"
और सबसे कड़वी बात ये थी कि राणा का ये झूठ आधा सच था। जब से महिका ने उसका खाना किसी और के हाथ भिजवाना शुरू किया था, अगस्त्य वापस वही बर्फ़ बन चुका था। उसकी थाली फिर अछूती लौट जाती थी, और उसका मुँह फिर उसी पुरानी राख से भर गया था।
"अगस्त्य ठीक नहीं है, ये तो सच है, साहब। पर उसकी थाली इसलिए लौट रही है क्योंकि जिस हाथ का खाना उसे लगता था, वो हाथ अब उसे नहीं मिल रहा। और आप उसके इसी कमज़ोर पल का फ़ायदा उठा कर पूरा हिमराज अपने नाम कर रहे हैं। ये फ़िक्र नहीं है, साहब। ये कुछ और है।"
"सँभल कर, वीर। तुम एक अच्छे सी-ओ-ओ हो, अगस्त्य के अच्छे दोस्त हो। पर दोस्ती और वफ़ादारी के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है। उस लकीर के ग़लत तरफ़ मत चले जाना। इस ख़ानदान में जो लोग ग़लत तरफ़ चले जाते हैं, वो... ज़्यादा दिन नहीं टिकते।"
और वीर ने महसूस किया कि उस कमरे का तापमान अचानक गिर गया। जिस आदमी को वो बारह साल से सिर्फ़ एक मीठा बोलने वाला चेयरमैन समझता आया था, उसने पहली बार अपना एक दाँत दिखा दिया था। और वीर समझ गया कि ये दीवारें सिर्फ़ अगस्त्य की तरफ़ नहीं, उन सब की तरफ़ बढ़ रही थीं जो उसके साथ खड़े थे।
"अगस्त्य को सब बताना पड़ेगा, और आज ही। मैंने ही उससे कहा था, पता करो ये लड़की आख़िर है कौन। पर अब लगता है, असली सवाल कभी वो लड़की थी ही नहीं। असली सवाल हमेशा से ये राणा था।"
उसी शाम संजना दोबारा अपने पिता के पास गई, एक ऐसी तसल्ली ढूँढते हुए जो उसे मिलनी नहीं थी। उसे बस अपने पापा के मुँह से एक बार ये सुनना था कि ये सब सिर्फ़ कारोबार है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।
"पापा, वो आदमी जो आपने त्रिलोकपुरी भेजा है... वो बस काग़ज़ ले कर आएगा ना? उस बूढ़ी औरत को, उस बच्चे को कुछ नहीं होगा? मैं उस लड़की को हराना चाहती हूँ, पापा। उसे... उसे मिटाना नहीं।"
"तू बहुत सवाल पूछने लगी है, संजना। तेरी माँ भी यही ग़लती करती थी, हर बात में हाथ डालना। कुछ चीज़ें जानने में नहीं, न जानने में सलामती होती है। तू बस सत्रह तारीख़ की तैयारी कर। बाक़ी सब मुझ पर छोड़ दे।"
और वो जवाब न देना, संजना के लिए सबसे ठंडा जवाब था। और अपनी मरहूम माँ का यूँ अचानक ज़िक्र, वो एक चेतावनी थी जिसे उसके पिता ने एक याद का लिबास पहना दिया था। बारह साल में पहली बार, संजना अपने ही पिता से ज़रा सी डर गई।
"...ठीक है, पापा। जैसा आप कहें। मैं सगाई की तैयारी देखती हूँ।" "बस काग़ज़ होंगे। सिर्फ़ काग़ज़। और कुछ नहीं।"
उसने ख़ुद को वही कहानी सुनाई जो डरे हुए लोग ख़ुद को सुनाते हैं, कि सब ठीक है, कि उसके पापा बस कुछ काग़ज़ मँगवा रहे हैं। पर ठीक उसी वक़्त, हवेली के फाटक से एक काली गाड़ी निकल चुकी थी, और उस गाड़ी में बैठा आदमी किसी कहानी पर यक़ीन नहीं करता था। वो सिर्फ़ हुक्म बजाता था।
उधर त्रिलोकपुरी की उस तंग गली में, जहाँ दो रिक्शा भी मुश्किल से साथ निकलते थे, रात अपने सबसे गहरे पहर में थी। उस एक कमरे के घर में एक अकेला बल्ब अब भी जल रहा था, और उसकी रौशनी में महिका अपनी माँ की डायरी को एक नई, महफ़ूज़ जगह छुपा रही थी।
"अब मैं इसे कभी नहीं छोड़ूँगी, नानी। तुम बेफ़िक्र हो कर सो जाओ। तुम्हारी बेटी का सच अब मेरे पास सलामत है। कल से मैं इसे ले कर सही लोगों के पास जाऊँगी, वकील के पास, अख़बार के पास, जहाँ भी मेरी सुनवाई हो।"
और तभी उस गली में एक आवाज़ आई जो उस गली की नहीं थी। एक इंजन की मद्धम गड़गड़ाहट, बहुत नरम, बहुत महँगी, जो उन टूटी सड़कों और खुली नालियों के बीच किसी और ही दुनिया की लगती थी। और सबसे पहले चिंटू खिड़की पर पहुँचा।
"दीदी... दीदी, इधर आओ। देखो कितनी बड़ी काली गाड़ी है, एकदम चमकती हुई। अपनी गली में तो ऐसी गाड़ी कभी नहीं आती। किसी बहुत बड़े आदमी की लगती है।"
"इतनी रात को इस गली में ऐसी गाड़ी? चिंटू, खिड़की से हट जा। चुपचाप अंदर आ जा, मेरे पीछे।"
गाड़ी ठीक उनके दरवाज़े के सामने आ कर रुक गई, जैसे उसे पहले से मालूम हो कि उसे कहाँ रुकना है। उसकी हेडलाइटें बुझीं, और पिछला दरवाज़ा धीरे से खुला। और उसमें से एक आदमी उतरा, बिना किसी जल्दी के, जैसे वो पूरी रात उसी की हो।
और उस आदमी को उस पूरी गली में सिर्फ़ हम पहचानते थे। वही चौड़े कंधे, वही बेफ़िक्र चाल, वही हाथ जो कुछ ही रातें पहले, बारिश में, उसी अस्पताल के तहख़ाने से महिका की माँ का सच चुपचाप उठा ले गए थे। राणा की वो मशीन, जिसने बारह साल पहले निर्मला वर्मा को कुचला था, आज उसी निर्मला की बेटी के दरवाज़े पर आ खड़ी हुई थी।
वो आदमी उस छोटे से आँगन को पार कर के उनके टूटे दरवाज़े तक आया, और एक पल रुका, जैसे वो जानता हो कि अंदर कौन-कौन जाग रहा है। अंदर, महिका ने चिंटू को अपने पीछे कर लिया, और नानी की नींद के पास खड़ी हो कर उस दरवाज़े को घूरती रही, जिस पर अभी दस्तक होने वाली थी।
"कौन... इतनी रात को कौन हो सकता है? चिंटू, नानी के पास खड़ा रह। हिलना मत, आवाज़ मत करना।"
और फिर वो दस्तक हुई। ज़ोर से नहीं, ग़ुस्से से नहीं, बल्कि बहुत धीमे, बहुत इत्मीनान से, जैसे उस दरवाज़े के पार खड़े आदमी को पूरा यक़ीन हो कि ये दरवाज़ा उसके लिए खुलेगा ही। एक दस्तक, फिर दो, और उन दो दस्तकों के पीछे बारह साल पुरानी वो पूरी काली रात खड़ी थी। जिस मशीन ने माँ को मिटाया था, वो अब बेटी के दरवाज़े पर दस्तक दे रही थी, और महिका का काँपता हुआ हाथ, धीरे-धीरे, उस कुंडी की तरफ़ बढ़ने लगा।
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