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Chapter 19 of 28

तुम जानते थे

बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi

तहख़ाने की वो टूटी धूल पीछे छोड़ कर वो दोनों ऊपर आए, तो बाहर बारिश और तेज़ हो चुकी थी। जिस काग़ज़ के लिए महिका बारह साल की चुप्पी तोड़ने आई थी, वो किसी और के हाथ जा चुका था।

"चला गया... कोई मेरी आँखों के सामने से मेरी माँ का सच उठा ले गया, साहब। बारह साल मैंने इंतज़ार किया, और मैं बस कुछ मिनट से चूक गई।" "आप बड़े लोग जब किसी को मिटाना चाहते हैं, तो उसकी राख तक नहीं छोड़ते, है ना?"

"जिसने वो फ़ाइल उठाई है, वो ठीक जानता था कि उसे क्या चाहिए और कहाँ मिलेगा। ये किसी चोर का काम नहीं, महिका। ये किसी ऐसे आदमी का काम है जिसके पास इस शहर के पुराने राज़ दबाने की ताक़त है।" "और ऐसे आदमी से तुम अकेली नहीं लड़ सकतीं।"

पर जो उस चोर के हाथ नहीं लगा, वो अब भी महिका के थैले में उसके सीने से लगा था। माँ की डायरी, निर्मला वर्मा की अपनी लिखावट। एक फ़ाइल खोई थी, पर सबूत मरा नहीं था, और उसी अधूरे काग़ज़ में उनकी लड़ाई अब भी साँस ले रही थी।

"तुम भीग रही हो, महिका। इस हालत में मैं तुम्हें आधी रात इस सुनसान जगह अकेले नहीं छोड़ूँगा। गाड़ी में बैठो, मैं त्रिलोकपुरी तक छोड़ दूँगा। ये मेरा कोट ओढ़ लो, ठंड लग जाएगी।"

"मुझे न आपकी गाड़ी चाहिए, साहब, न आपका कोट। मैं ऐसे ही अकेली आई थी, और ऐसे ही अकेली चली जाऊँगी।"

पर उसके पैर वहीं जमे रहे, उस आदमी के सामने खड़े, जिससे वो नफ़रत करना चाहती थी और कर नहीं पा रही थी। एक ही रात का ग़म दोनों को उस बारिश में इतने पास खींच लाया था कि दोनों की साँसें एक-दूसरे को छू रही थीं।

"महिका... आज तुमने अपनी माँ की जो कहानी सुनाई, वो मेरे भीतर बहुत गहरे जा कर लगी है। मैं जानता हूँ एक झूठे इल्ज़ाम के साथ जीना क्या होता है, एक ऐसी रात के साथ जो कभी ख़त्म नहीं होती।" "काश मैं तुम्हें बता पाता कि..."

"क्या? क्या बता पाते, साहब? आप ऐसे बात करते हैं जैसे उस रात में आपका भी कुछ खोया हो। पिछले कुछ दिनों से लगता है जैसे आपकी बर्फ़ के नीचे कोई और ही आदमी दबा है।"

और वो एक पल था जब अगस्त्य सब कह सकता था, कि उस गाड़ी में उसका अपना परिवार था, कि उसकी माँ का आख़िरी ज़ायका आज महिका के हाथों में ज़िंदा है। पर उसने वो लफ़्ज़ निगल लिया, और महिका को बस गाड़ी तक छोड़ कर, अपना राज़ एक रात और सीने में दफ़्न किए, लौट गया।

उधर त्रिलोकपुरी के उस एक कमरे के घर में नानी शांति देवी दरवाज़े पर आँख गड़ाए बैठी थीं, जब तक महिका भीगी हुई लौटी। और महिका के चेहरे को एक नज़र देखते ही उन बूढ़ी आँखों ने भाँप लिया कि आज कोई बात हद से आगे निकल चुकी है।

"इतनी रात, इस बारिश में कहाँ थी तू, महिका? तेरा चेहरा ऐसा क्यों है? कुछ हुआ है, मुझसे मत छुपा।" खाँस... खाँस... बता मुझे, आख़िर कहाँ गई थी?"

"नानी, मैं उस पुराने अस्पताल गई थी, जहाँ माँ नर्स थीं। उनकी बेगुनाही का कोई काग़ज़ ढूँढने। पर वो फ़ाइल कोई मुझसे पहले ही उठा ले गया।" "और नानी... वहाँ, आधी रात को, मल्होत्रा साहब भी मौजूद थे। वही हिमराज वाले अगस्त्य मल्होत्रा।"

मल्होत्रा। वो नाम सुनते ही नानी का हाथ, जो महिका के सिर पर था, वहीं काँप कर रुक गया। बूढ़े चेहरे से बचा-खुचा ख़ून भी उतर गया, और उनकी साँस एक पल गले में ही अटक गई।

"वो आदमी वहाँ क्यों था? उसने तुझसे क्या कहा? बेटी, तू उस मल्होत्रा के घर से जितनी दूर रहे उतना अच्छा, मैं कब से यही कह रही हूँ।" "उन लोगों से हमारा नाता सिर्फ़ आँसुओं का है, और किसी चीज़ का नहीं।"

"नानी, आप ऐसे काँप क्यों रही हैं? पर एक बात अजीब थी। जब मैंने माँ की उस रात का ज़िक्र किया, तो वो पत्थर जैसा आदमी अचानक... जैसे भीतर से टूट सा गया।" "उस साहब को माँ की उस रात से आख़िर क्या लेना-देना हो सकता है?"

और यही वो सवाल था जिसका जवाब सिर्फ़ नानी के पास था। वो जानती थीं कि वो अमीर लड़का, जिसके लिए उनकी बेटी मरते दम तक रोती रही, आज इसी अगस्त्य में बड़ा हो कर बैठा है। पर ये सच वो अपनी इस अनजान पोती के सामने अभी नहीं खोल सकती थीं।

"कुछ लेना-देना नहीं, बेटी, बड़े लोगों के आँसू भी नक़ली होते हैं। तू बस मुझसे एक वादा कर, उस आदमी पर भरोसा मत करना।" और बाक़ी सब... मैं किसी दिन ख़ुद तुझे बता दूँगी।"

महिका ने नानी को सुला तो दिया, पर वो सवाल उसके भीतर काँटे की तरह अटका रह गया। जिस आदमी को अपनी बेस्वाद कुल्फ़ी तक की परवाह नहीं, उसकी आँखें उसकी माँ की उस रात पर क्यों भीग आईं? और महिका ने ठान लिया कि इसका जवाब वो उसी बादशाह की आँखों में देख कर लेगी।

अगली दोपहर, हिमराज के उस काँच के केबिन में, जहाँ से पूरी दिल्ली एक नक़्शे जैसी दिखती थी, अगस्त्य अपनी मेज़ पर झुका बैठा था। और वीर एक पुरानी, पीली फ़ाइल मेज़ पर रखते हुए भीतर आया, जिसके हर पन्ने पर बारह साल पुरानी धूल की गंध थी।

"जो तूने मँगवाया था, वो सब इसमें है, अगस्त्य। उस अस्पताल के रिकॉर्ड, उस साल की नर्सों की ड्यूटी लिस्ट, सब। और वो नाम भी, जिस पर उस रात की सारी लापरवाही मढ़ी गई थी। निर्मला वर्मा।"

"निर्मला वर्मा।" "नाइट ड्यूटी नर्स। उसी रात हाज़िर थी जब वो हादसा हुआ। और अगले ही महीने उस पर लापरवाही का केस।" "और वीर... इसी निर्मला वर्मा की बेटी आज मेरी कैंटीन में रोटियाँ सेंकती है।"

जो अगस्त्य जानता था और वीर आधा ही समझ पाता था, वो ये कि जिस गाड़ी को बचाने में ये नर्स नाकाम रही, उसमें अगस्त्य का अपना परिवार था। जिस हाथ ने उस रात गलियारे में उसे टिफ़िन दिया, और जो आज उसे खिला रहा है, वो एक ही औरत का, और अब उसकी बेटी का हाथ है।

"अगस्त्य, मैं तुझे बरसों से जानता हूँ, इसलिए साफ़ कहूँगा। तू उस लड़की को चूम चुका है। और तू हफ़्तों से जानता है कि वो किसकी बेटी है, फिर भी तूने उससे एक लफ़्ज़ नहीं कहा।" "ऐसे राज़ दबे नहीं रहते, दोस्त। ये उसे तेरी ज़ुबान से पता चलें, इससे पहले कि वो ख़ुद जान जाए।"

"और मैं उसे बताऊँ भी तो क्या, वीर? सिर्फ़ उसकी माँ का नाम? कि उसकी माँ बेगुनाह थी? इस धागे का एक सिरा भी खींचा, तो पूरी वो रात खुल जाएगी, वो सब जो मैं ख़ुद बारह साल से पलट कर देखने से डरता रहा हूँ।"

"तो फिर जल्दी कर, क्योंकि तू अकेला नहीं है इस रात के पीछे। जो आदमी कल रात उस अस्पताल से फ़ाइल उठा ले गया, वो किसी और के इशारे पर काम कर रहा था। और इस शहर में ऐसे काम बस एक ही आदमी कराता है।" "तू अच्छी तरह जानता है मैं किसकी बात कर रहा हूँ।"

और वो आदमी दिग्विजय राणा था, जिसकी ताक़त बारह साल पहले भी इसी सच को दबा चुकी थी। उसी की बेटी संजना ने पहली बार अपने पिता को आधी रात फ़ोन पर किसी को कोई ठंडा हुक्म देते सुना था, और पहली बार उसके भीतर एक अनजाना शक करवट ले कर सोया था। वीर चला गया, पर वो पीली फ़ाइल मेज़ पर उस नाम के पन्ने पर खुली रह गई।

उसी शाम, मेज़ पर खुली उस फ़ाइल से बेख़बर, महिका ख़ुद टिफ़िन ले कर ऊपर आई। आज उसने वो टिफ़िन छोटू के हाथ नहीं भेजा था, आज वो ख़ुद आई थी, अपने वो सवाल ले कर जो कल रात से उसके भीतर सुलग रहे थे।

"आपका खाना, साहब।" "मुझे आपसे एक बात पूछनी है। कल रात आप उस अस्पताल में सच में क्यों थे? आपका वो कौन सा 'हिमराज का पुराना मामला' ठीक उसी रात के काग़ज़ों में दबा था, जिस रात मेरी माँ की दुनिया उजड़ी?"

अगस्त्य कुछ कहता, उससे पहले महिका की नज़र मेज़ पर खुली उस पीली फ़ाइल पर जा पड़ी। और उस पन्ने पर, अगस्त्य की अपनी लिखावट में, एक गोल घेरे में एक नाम लिखा था, वो नाम जो इस केबिन में होना ही नहीं चाहिए था। निर्मला वर्मा।

"ये... ये तो मेरी माँ का नाम है। निर्मला वर्मा। आपके काग़ज़ों में, आपकी अपनी लिखावट में। और ये तारीख़ें... ये तो हफ़्तों पुरानी हैं।" "साहब, आपके पास मेरी माँ का नाम कहाँ से आया?"

"महिका, वो फ़ाइल रख दो। मैं तुम्हें सब समझाता हूँ, बस पहले वो काग़ज़ मेज़ पर रख दो।"

"समझाइए। अभी, इसी वक़्त। आप, बर्फ़ के बादशाह, राणा साहब के मुँहबोले बेटे, आपके पास मेरी मरहूम माँ का नाम, उसकी नर्स वाली ड्यूटी, वो पूरी रात, हफ़्तों से लिखी हुई क्यों पड़ी है?"

और तभी उसके भीतर वो सारे टुकड़े जुड़ने लगे, वो रात जब उसने महिका को चूमा और फिर अचानक पूछा था, तुम्हारी माँ का नाम क्या निर्मला था। और उसका जवाब, कि उसने ये नाम तुम्हारी फ़ाइल में पढ़ा, जबकि ये तो हफ़्तों की खोज थी।

"उस रात... जिस रात आपने मुझे चूमा, आपने पूछा था कि क्या मेरी माँ का नाम निर्मला था। मैंने आपको वो नाम कभी नहीं बताया था। और आपने कहा था कि आपने मेरी फ़ाइल में पढ़ा।" "पर इसमें तो आप बरसों पीछे जा कर मेरी माँ को ढूँढ रहे थे, साहब।"

"हाँ। मैं जानता था। मैं हफ़्तों से जानता हूँ कि तुम्हारी माँ निर्मला वर्मा थीं, वही नर्स जिसे एक झूठे इल्ज़ाम में बर्बाद किया गया। मैंने ये तुमसे छुपाया, और उसकी एक वजह थी, एक ऐसी वजह जो मैं..."

और अगस्त्य के उन अधूरे लफ़्ज़ों के पीछे वो पूरी रात खड़ी थी जो वो नहीं खोल सकता था, कि वो ख़ुद उस गलियारे का लड़का है, कि उस गाड़ी में उसका अपना परिवार मरा था। सच बोलते ही वो लड़की जान जाती कि उसकी माँ की बर्बादी की जड़ें उसी के अपने घर तक जाती हैं।

"आप जानते थे। हफ़्तों से। जब आप मुझसे अपनी मेज़ पर खाना खाते थे, तब भी। जब आपने मेरा हल्दी लगा हाथ थामा था, तब भी। जब आपने मुझे चूमा था, तब भी। आप जानते थे कि मैं किसकी बेटी हूँ, और आपने एक लफ़्ज़ नहीं कहा।"

"महिका, सुनो, ये वैसा नहीं है जैसा तुम समझ रही हो। मैंने जो छुपाया, वो तुम्हें चोट पहुँचाने के लिए नहीं था। एक बार मेरा यक़ीन करो..."

"यक़ीन? आप उसी राणा के घराने के हैं जिसने मेरी माँ को कुचला, और आप चोरी-छुपे उसी नाम को खोद रहे थे, और मुझे अपनी नज़रों के ठीक सामने रखे हुए थे।" "मैं तो अब समझ ही नहीं पा रही कि आप मुझे अपने पास रखते किसलिए रहे।"

और सच्चा जवाब वो था जो अगस्त्य कभी दे ही नहीं सकता था, कि उसने उसे इसलिए पास रखा क्योंकि उसके हाथ का खाना ही उसे बारह मुर्दा सालों बाद फिर जीना सिखा रहा था, और क्योंकि वो उससे मोहब्बत कर बैठा था। पर महिका की नज़र में वो सब एक जाल जैसा दिख रहा था।

"मुझे बस एक बात का सच्चा जवाब दे दीजिए, साहब, बस एक। आपने मुझे अपने पास इसलिए रखा क्योंकि आपको बरसों बाद फिर से कुछ महसूस करना था... या इसलिए कि आप पहले से जानते थे कि मैं किसकी बेटी हूँ?"

अगस्त्य ने कुछ कहने को होंठ खोले, और उन दोनों के बीच बारह साल की वो पूरी रात एक पल के लिए काँप कर ठहर गई। एक भी सच्चा लफ़्ज़ उसे रोक सकता था, पर वो लफ़्ज़ अपने साथ वो सब खींच लाता जिसे कहने की उसमें अभी हिम्मत नहीं थी।

"रहने दीजिए। आपकी ये ख़ामोशी ही आपका जवाब है, साहब।"

और अगस्त्य के एक लफ़्ज़ बोलने से पहले, महिका उस काँच के दरवाज़े से निकल गई, अपनी माँ की डायरी सीने से लगाए। अमीरी और ग़रीबी की सारी दूरी आज इस एक चोट के सामने बौनी पड़ गई थी, कि जिस आदमी पर उसने भरोसा करना शुरू किया था, वो शुरू से सब जानता था, और चुप रहा। और वो काँच का दरवाज़ा बारह सालों की बर्फ़ पर एक फुफकार के साथ बंद हुआ, जवाब उसी पार अनकहा क़ैद रह गया।

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