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Chapter 1 of 28

बेस्वाद बादशाह

बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi

बारह साल पहले। आधी रात। दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल का गलियारा, और बाहर बारिश ऐसे बरस रही थी जैसे आसमान किसी का मातम कर रहा हो।

उस गलियारे में एक बीस साल का लड़का भाग रहा था। भीगा हुआ, काँपता हुआ, एक स्ट्रेचर के पीछे जिसे नर्सें तेज़ी से अंदर धकेल रही थीं।

"पापा! ... माँ! ... डॉक्टर, प्लीज़, वो मेरी छोटी बहन है, नित्या, सिर्फ़ नौ साल की है! कोई तो बताओ वो ठीक है ना!"

किसी के पास उसके लिए रुकने का वक़्त नहीं था। मशीनें, दौड़ते पैर, बंद होते दरवाज़े।

रिंग रोड के ऊँचे फ़्लाईओवर पर एक गाड़ी रेलिंग तोड़ कर नीचे गिरी थी। मल्होत्रा परिवार। और ये लड़का, अगस्त्य, बस इसलिए बच गया था क्योंकि उस रात वो उनके साथ नहीं था।

वो गलियारे की ठंडी दीवार से टिक कर बैठ गया, घुटनों में सिर देकर, किसी टूटे परिंदे की तरह काँपता हुआ।

और तभी एक हाथ उसके कंधे पर आया।

"बेटा... ऐ बेटा। ऐसे मत काँप। ठंड लग जाएगी तुझे।"

नाइट शिफ़्ट की एक नर्स थी। अधेड़ उम्र, थकी आँखें, पर आवाज़ में वो गर्माहट जो बड़े अस्पतालों में सबसे मुश्किल से मिलती है।

"सुबह से कुछ खाया है? ... नहीं ना। देख, खाली पेट पर डर दुगुना हो जाता है। ये ले।"

उसने अपने बैग से अपना टिफ़िन निकाला। घर का खाना, जो शायद वो अपने बच्चों के लिए ले जा रही थी। दाल, चावल, थोड़ा सा अचार।

"गरम तो नहीं रहा अब, पर माँ के हाथ का है। एक कौर खा ले। मेरे लिए।"

"मुझसे... नहीं खाया जाएगा।"

"एक कौर, बस। ज़िंदगी कैसी भी हो, बेटा, पेट को भूख लगती ही है। खा ले।"

और उस काँपते हाथ ने, न जाने क्यों, एक कौर उठा लिया। दाल, चावल, नमक, और उस अजनबी औरत के हाथ की गर्माहट।

उस पूरी काली रात में, वो एक कौर ही अगस्त्य मल्होत्रा की ज़ुबान पर पड़ी आख़िरी मेहरबानी थी।

क्योंकि ठीक उसी वक़्त, गलियारे के दूसरे छोर से एक डॉक्टर उसकी तरफ़ आ रहा था। और उसके चेहरे पर वो ख़ामोशी थी जो सबसे बुरी ख़बर से पहले आती है।

अविनाश मल्होत्रा। सुधा मल्होत्रा। और नन्ही नित्या। तीनों जा चुके थे।

उस एक पल में अगस्त्य के अंदर कुछ बंद हो गया। हमेशा के लिए।

कहते हैं सदमा इंसान से बहुत कुछ छीन लेता है। अगस्त्य से उसने उसका ज़ायका छीन लिया। उस रात के बाद हर मिठास बेमानी हो गई, हर खाना राख।

सिवाय एक ज़ायके के। एक दाल-चावल का, एक नमक का, एक अजनबी हाथ का, जो उसकी टूटी ज़ुबान पर उस आख़िरी पल जम गया और बारह साल तक वहीं जमा रहा। उसे ख़ुद पता नहीं चला।

उस नर्स का नाम किसी ने पूछा भी नहीं। उसका नाम था... निर्मला। निर्मला वर्मा।

इस नाम को याद रखिए। क्योंकि ये पूरी कहानी इसी एक नाम के इर्द-गिर्द जमी हुई है।

आज। बारह साल बाद। दिल्ली, हिमराज फ़ूड्स का शीशे का टॉवर, जिसकी हर मंज़िल बर्फ़ जैसी ठंडी है।

बर्फ़ और मिठाइयों का पूरा साम्राज्य। और उसका बादशाह, अगस्त्य मल्होत्रा, बत्तीस साल का। अख़बार उसे कहते हैं... बर्फ़ का बादशाह।

और मज़े की बात? पूरे मुल्क को मिठास बेचने वाले इस आदमी ने बारह साल में एक चम्मच भी नहीं चखा।

बीसवीं मंज़िल की लैब में आज कंपनी की नई फ़्लैगशिप कुल्फ़ी का टेस्टिंग था। नाम, बर्फ़ का बादशाह, केसर-मलाई। R&D की पूरी टीम साँस रोके खड़ी थी, और बीच में स्टील की एक प्लेट पर वो कुल्फ़ी।

"रंग।"

उसने चखा नहीं। उसने सिर्फ़ देखा।

"केसर का रंग ऊपर बैठा है, अंदर नहीं गया। मतलब केसर दूध के साथ पका नहीं, बाद में मिलाया गया। ... टेक्सचर।"

उसने चम्मच उठाई, कुल्फ़ी को काटा, उसे गिरने दिया, और बस देखा।

"क्रिस्टल बन रहे हैं। मतलब फ़्रीज़िंग का तापमान ग़लत रखा गया। ये कुल्फ़ी नहीं है, ये बर्फ़ का चूरा है।"

R&D हेड ने हकलाते हुए कहा कि सर एक बार चख कर तो देखें, पूरे पैनल से टेस्ट करा लें।

पूरी लैब जम गई। क्योंकि सब जानते थे, अगस्त्य मल्होत्रा किसी की बनाई चीज़ चखता नहीं।

ये हिमराज का सबसे बड़ा मज़ाक़ था, जिसे कोई हँस कर कह नहीं सकता था। मिठाइयों के इस पूरे साम्राज्य का मालिक अपनी ही किसी मिठाई का स्वाद नहीं जानता था। वो हर चीज़ आँकड़ों से आँकता था, तापमान से, रंग से, बनावट से... क्योंकि ज़ुबान ने तो बारह साल पहले साथ छोड़ दिया था।

"मुझे चखने की ज़रूरत नहीं। मुझे आँखों से दिख रहा है कि ये घटिया है। तुम लोगों को छह महीने और बीस लाख रुपये दिए थे... इसके लिए?"

उसने प्लेट को एक उँगली से मेज़ के किनारे सरका दिया।

"पूरा बैच रोक दो। और अगली बार कुछ ऐसा लाना जो हिमराज के नाम के लायक़ हो। जाओ। सब।"

भीड़ छँटी तो एक ही आदमी रुका। वीर ओबेरॉय। हिमराज का COO, और अगस्त्य का इकलौता दोस्त, जो उसकी ख़ामोशियों का तर्जुमा करना जानता था।

"बधाई हो। तुमने अभी-अभी उस आदमी को रुला दिया जिसने तुम्हारी सबसे ज़्यादा बिकने वाली कुल्फ़ी बनाई थी।"

"वो घटिया थी।"

"तुम्हें कैसे पता, अगस्त्य? तुमने चखी ही नहीं। ... तुम कभी कुछ नहीं चखते।"

अगस्त्य ने जवाब नहीं दिया। यही उसका सबसे धारदार हथियार था। ख़ामोशी।

"एक दिन कोई तुम्हारे सामने ज़हर रख देगा, और तुम उसे भी बड़ी शान से कहोगे, टेक्सचर सही नहीं है, ले जाओ।"

"तो कम से कम मरते वक़्त प्रेज़ेंटेशन तो अच्छी होगी।"

वीर हँसे बिना न रह सका। यही अगस्त्य था, जो अपने ज़ख़्म को भी बर्फ़ की तरह तराश कर पेश करता था।

"यार, आख़िरी बार कब खाया था कुछ? कल रात बोर्ड मीटिंग, आज ये। सिर्फ़ ब्लैक कॉफ़ी और ग़ुस्से पर आदमी कब तक चलेगा?"

"मैं ठीक हूँ, वीर।"

पर तभी, जैसे उसके अपने जिस्म ने उसका झूठ पकड़ लिया हो, लैब की सफ़ेद रौशनी एक पल को काँपी। दीवारें तैरने लगीं। और बर्फ़ का बादशाह, हिमराज के बीसवें माले पर, हल्के से लड़खड़ाया।

"अगस्त्य! ... अरे कोई है? पानी लाओ, जल्दी!"

"कुछ... नहीं हुआ। बस थोड़ा..."

अपने आप को गिरने से रोकने के लिए उसने दीवार पकड़ ली। बादशाह गिरते नहीं। उसने वीर का हाथ झटका और सर्विस कॉरिडोर की तरफ़ बढ़ गया, जहाँ कोई कैमरा नहीं था, कोई बोर्ड नहीं था।

और ठीक उसी टॉवर के नीचे, जहाँ AC की ठंडक ख़त्म होती है और बर्तनों की खटपट शुरू होती है, हिमराज की स्टाफ़ कैंटीन थी। और वहाँ, आज अपने पहले दिन, खड़ी थी महिका।

महिका वर्मा। चौबीस साल। पतली कलाइयाँ, तेज़ ज़ुबान, और एक हँसी जो कंगाली में भी नहीं बुझती। घर में एक बूढ़ी नानी, एक ग्यारह साल का भाई चिंटू, और सिर पर क़र्ज़। ये नौकरी उसके पूरे परिवार की साँस थी।

कैंटीन का खाना वो अफ़ोर्ड नहीं कर सकती थी, इसलिए घर से अपना टिफ़िन लाई थी। दाल, चावल, थोड़ा सा अचार। माँ के नुस्ख़े का, जो माँ उसे सिखा कर गई थी।

पहला दिन था, पर महिका पहले ही आधी कैंटीन से हँस-हँस कर बात कर चुकी थी। उसका उसूल सीधा था, जिससे मिलो, पेट भर कर मिलो। भूखे पेट न किसी का दिल जीता जाता है, न किसी की दुआ मिलती है।

लंच के बाद बर्तन समेटते हुए वो गलत मोड़ मुड़ गई, और खुद को एक सुनसान सर्विस कॉरिडोर में पाया, हाथ में अपना आधा खाया टिफ़िन थामे।

और वहीं, दीवार से टिका, एक आदमी खड़ा था। महँगा सूट, पर चेहरा राख जैसा सफ़ेद। पसीने से तर, गिरने ही वाला।

"अरे! अरे सुनिए! ... ऐसे दीवार क्यों पकड़ रखी है? ... हे भगवान, चेहरा देखा है अपना? बिल्कुल पीला पड़ गया है!"

अगस्त्य ने आँखें खोलीं। कोई कैंटीन की लड़की, सस्ती वर्दी में, उसके इतने पास। किसी की ये हिम्मत।

"हटो... मेरे रास्ते से।"

"नहीं हटूँगी। पहले आप बैठिए, यहाँ। ... और सच बताइए, आज कुछ खाया भी है या नहीं?"

"तुम्हें पता है मैं कौन हूँ?"

"अभी तो आप बस वो आदमी हैं जो मेरे सामने गिरने वाला है। बाक़ी परिचय बाद में दे दीजिएगा, साहब। ... लीजिए।"

और उस लड़की ने, बिना सोचे, बिना डरे, अपना आधा खाया टिफ़िन उसके हाथों में ठूँस दिया।

"ठंडा है, पर घर का है। दाल-चावल। एक कौर खा लीजिए, खाली पेट पर चक्कर आता ही है। ... अरे खाइए ना!"

"मैं... कैंटीन का खाना नहीं खाता।"

"आज खा लीजिए, कल से मत खाइएगा। पर आज आप गिरे तो पहले ही दिन मेरी नौकरी जाएगी, और वो मुझे अफ़ोर्ड नहीं है। ... मेरी नानी कहती हैं, भूख में सूखी रोटी भी हलवा होती है। बस एक कौर।"

अगस्त्य ने प्लेट को देखा, फिर उस लड़की को। बारह साल में किसी ने उसे इस तरह हुक्म नहीं दिया था। और किसी अजनबी हाथ ने उसे इस तरह खाना नहीं थमाया था।

बस बेहोशी से बचने के लिए, बस उस एक कमज़ोर पल में, उसने एक कौर उठाया और मुँह में रख लिया।

और दुनिया रुक गई।

नमक। घी। हल्दी की गर्माहट। दाल की वो गाढ़ी, घरेलू मिठास। बारह साल से बंद एक दरवाज़ा, एक ही कौर में, चटख़ कर खुल गया।

उसकी ज़ुबान पर ज़ायका लौट आया। और उसके साथ लौट आया वो सब जो उसने बर्फ़ के नीचे दबा रखा था। एक अस्पताल का गलियारा। बारिश। एक अजनबी का हाथ। उसका काँपता हाथ अब फिर काँप रहा था।

बारह साल की जमी बर्फ़ के नीचे से, अचानक, आँखों में नमी आ गई। एक ऐसे आदमी की आँखों में जो रोना ही भूल चुका था। उसने झट से मुँह फेर लिया, पर वो एक कौर उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था।

"ये... ये क्या है? तुमने इसमें क्या डाला है?"

महिका ने कंधे उचकाए, उसकी हालत पर अब भी परेशान।

"बताया तो, घर का खाना है। कोई ख़ास बात नहीं। बस दाल-चावल... मेरी माँ के हाथ का नुस्ख़ा है। वो सिखा कर गई थीं मुझे।"

माँ। ये एक लफ़्ज़ बर्फ़ के बादशाह के सीने में कहीं गहरे उतर गया, और उसे ख़ुद नहीं पता चला क्यों।

क्योंकि बारह साल पहले भी एक माँ थी। एक और हाथ। एक और दाल-चावल। एक और नमक। और वो हाथ इसी लड़की की माँ का था। निर्मला वर्मा का। वही नर्स।

जिस औरत की मेहरबानी ने उस रात अगस्त्य की ज़ुबान पर आख़िरी ज़ायका छोड़ा था, आज उसी की बेटी उसे वही ज़ायका लौटा रही थी। और दोनों में से किसी को नहीं पता था।

"तुम्हारा नाम क्या है?"

"महिका। महिका वर्मा। ... और अब आपका रंग थोड़ा लौट रहा है, तो शुक्र है।"

बारह साल में पहली बार, बर्फ़ के बादशाह ने कुछ चखा था। एक कैंटीन की कंगाल लड़की के हाथ का दाल-चावल। और उसे नहीं पता था कि ये वही ज़ायका है जो उस अजनबी नर्स के हाथ में था, उस रात, उस गलियारे में।

उसकी जमी हुई दुनिया में, आज, पहली दरार पड़ चुकी थी। ... और बादशाह को पता ही नहीं चला कि पिघलना शुरू हो गया है।

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