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Chapter 20 of 28

अलग राहें

बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi

काँच का वो दरवाज़ा अभी ठीक से बंद भी नहीं हुआ था कि बर्फ़ के बादशाह ने वो कर दिखाया जो उसने पिछले बारह साल में किसी के लिए नहीं किया था। अपनी मेज़, अपना ग़ुरूर, अपनी सारी बर्फ़ पीछे छोड़ कर वो उस लड़की के पीछे लपका, जो अपनी माँ की डायरी सीने से चिपकाए लिफ़्ट की तरफ़ तेज़-तेज़ जा रही थी।

"महिका, रुको। बस एक बार, आख़िरी बार, मेरी पूरी बात सुन लो।" "मैंने ग़लत किया, मैं मानता हूँ। पर जो तुम समझ रही हो, बात ठीक वैसी नहीं है।"

"अब कौन सी बात बाक़ी रह गई है, साहब? आप हफ़्तों से मेरी मरहूम माँ का नाम अपनी दराज़ में दबाए बैठे थे, और मेरे सामने रोज़ यूँ बैठते रहे जैसे कुछ जानते ही न हों।"

और अगस्त्य, जो हर बात नाप-तोल कर बोलता था, उसके पास इस वक़्त एक भी नपा-तुला लफ़्ज़ नहीं था। क्योंकि सच्चा जवाब वही था जिसे कहते ही वो पूरी काली रात खुल जाती, कि उसी हादसे में, उसी गाड़ी में, अगस्त्य का अपना परिवार मरा था।

"हाँ, मैंने तुमसे तुम्हारी माँ का नाम छुपाया। पर अब उन्हें बेगुनाह साबित करना सिर्फ़ तुम्हारी लड़ाई नहीं रही, महिका। मुझे बस एक मौक़ा दो, और मैं उस आदमी को बेनक़ाब करूँगा जिसने तुम्हारी माँ को बर्बाद किया।"

"बस कीजिए, साहब। बारह साल पहले मेरी माँ को एक झूठे इल्ज़ाम ने मारा था। और आज मैं एक और बड़े आदमी के इल्ज़ाम और एहसान के बीच पिस कर नहीं मरूँगी।"

और फिर उसने वो लकीर खींच दी जिसने उस पूरी रात को नाम दे दिया। वो लड़की, जो कभी इसी आदमी को खाना खिलाने की ज़िद में उसके दरवाज़े पर डटी रहती थी, आज उसी दरवाज़े पर पत्थर बन कर खड़ी थी।

"मैं आपकी दवाई नहीं हूँ, साहब, जिसे आप जब जी चाहे चख लें। मैं आपका कोई हथियार भी नहीं, जिससे आप अपने राणा साहब से पुराना हिसाब चुकता करें। और मैं आपका पश्चाताप भी नहीं, जिसे उठा कर आप अपने भीतर का कोई बरसों पुराना बोझ हल्का कर लें।" "मैं बस महिका हूँ। और अब मैं आपके किसी काम की नहीं रही।"

"तुम्हारे हाथ का वो पहला निवाला... बारह साल में पहली बार मुझे किसी चीज़ का स्वाद आया था, महिका। वो सिर्फ़ खाना नहीं था। वो मेरे भीतर कोई ऐसा दरवाज़ा था जो..." "मेरी बात तो पूरी सुनो।"

एक पल को उसका हाथ महिका के हाथ के इतने पास आ गया कि बारह साल की बर्फ़ के नीचे से एक भाप सी उठी, वही खिंचावट जो दोनों को हर बार यहीं ला कर छोड़ती थी। पर इस बार महिका ने अपना हाथ खींच लिया, और वो भाप उठते ही जम गई।

"उस रात आपने मुझे चूमा था, साहब। और उसी साँस में पूछा था कि क्या मेरी माँ का नाम निर्मला था, और फिर झूठ बोला कि आपने वो नाम मेरी फ़ाइल में पढ़ा।" "जो आदमी चूमते हुए भी झूठ बोल सकता है, उसका सच अब मैं सुनना ही नहीं चाहती।"

"कल से आपका खाना बंसी काका किसी और के हाथ ऊपर भिजवा देंगे। आपकी दवाई आपको मिलती रहेगी, फ़िक्र मत कीजिए।" "पर मुझे अब अपनी नज़रों के सामने मत रखिए। बस इतना रहम कर दीजिए।"

और लिफ़्ट के दरवाज़े उस बेस्वाद बादशाह के सामने बंद हो गए, और उनके पीछे वो अकेला ज़ायका भी उतर गया जो उसे बारह मुर्दा सालों बाद ज़िंदा रखे था। अगस्त्य उस पूरे काँच के टावर में अकेला रह गया, और उसके मुँह में सिर्फ़ वही पुरानी राख लौट आई।

उस शाम की ख़बर हिमराज के काँच के गलियारों में हवा से भी तेज़ दौड़ी, कि कैंटीन वाली अब बादशाह का खाना ख़ुद ले कर ऊपर नहीं आती। और इस दरार को किसी नक़्शे की तरह पढ़ने वाली संजना राणा, ठीक उसी शाम, अगस्त्य के केबिन में आ खड़ी हुई, अपने होंठों पर एक बारीक जीत लिए।

"तुम्हारी वो कैंटीन वाली आज बड़ी जल्दी में नीचे उतरती दिखी, अगस्त्य। सुना है अब वो ख़ुद ऊपर नहीं आएगी। अच्छा हुआ। कुछ दाग़ अपने आप ही धुल जाएँ, तो हाथ गंदे नहीं करने पड़ते।"

"तुम्हें यहाँ किसने बुलाया, संजना?"

"अपने होने वाले पति के केबिन में आने के लिए मुझे बुलावे की ज़रूरत है क्या? ये देखो। पापा ने सत्रह तारीख़ की तैयारियाँ अभी से शुरू करवा दी हैं। फूल, मेहमान, प्रेस, सब तय हो रहा है।" "अब हमारे बीच न कैंटीन की कोई भाप है, न किसी सस्ते ज़ायके का शोर। सिर्फ़ हम दोनों और ये पूरा हिमराज।"

"मैंने न तुम्हें, न तुम्हारे पापा को, कोई तारीख़ दी है, संजना। न सत्रह, न कोई और। ये कार्ड जिसने भी छपवाया, उसने मेरी इजाज़त के बिना छपवाया है।"

"तारीख़ें अब तुम अकेले तय नहीं करते, अगस्त्य। हालात करते हैं। ये सिर्फ़ एक शादी नहीं, दो साम्राज्यों का मिलना है। और उस मिलने को अब न तुम रोक सकते हो, न वो कैंटीन में रोटियाँ सेंकने वाली लड़की।"

पर उस पूरे यक़ीन के नीचे, संजना के भीतर एक बारीक दरार भी थी, जो उसे ख़ुद अजीब लगती थी। कल आधी रात उसने अपने पापा को फ़ोन पर किसी को एक ठंडा हुक्म देते सुना था, ऐसी आवाज़ में जो उसने अपने बाप में पहले कभी नहीं सुनी थी। ऐसी, जैसे किसी को हटाया नहीं, चुपचाप मिटाया जा रहा हो।

"...ख़ैर। पापा जो भी करते हैं, हम सबके भले के लिए करते हैं।" "तुम बस तैयार रहो, अगस्त्य। सत्रह तारीख़ अब बहुत दूर नहीं है।"

संजना चली गई, और अगस्त्य उन सगाई के काग़ज़ों और अपने मुँह की उसी राख के साथ अकेला रह गया। पर संजना उस शाम अपने केबिन नहीं लौटी। उसके क़दम नीचे, उसी कैंटीन की तरफ़ मुड़ गए, उस दाग़ को ख़ुद अपने हाथों मिटाने, जिसे वो पूरी तरह अपने रास्ते से हटा देना चाहती थी।

"तो तुमने आख़िर थोड़ी अक़्ल से काम लिया, महिका। ऊपर आना बंद कर दिया। पर इतना काफ़ी नहीं है। इतने से मेरा काम नहीं चलेगा।"

"अब आप मुझसे और क्या चाहती हैं, संजना जी? मैंने तो ख़ुद ही पीछे हटने का फ़ैसला कर लिया है। आपकी दुनिया आपको मुबारक।"

"तुम समझदार लड़की हो, इसलिए एक समझदारी की बात सुनो। सिर्फ़ ऊपर आना बंद करने से बात नहीं बनेगी। तुम्हें इस शहर से ही चले जाना चाहिए। दिल्ली छोड़ दो, महिका। हमेशा के लिए।"

"दिल्ली छोड़ दूँ? मेरा घर, मेरा काम, मेरी नानी का इलाज, चिंटू का स्कूल, सब यहीं है। मैं यहाँ से कहाँ जाऊँगी?"

"तुम्हारी एक बूढ़ी, बीमार नानी हैं ना, और एक छोटा भाई? वहीं त्रिलोकपुरी की उस तंग गली में? मैं तुम्हें एक राज़ की बात बताती हूँ। इस घराने से जो पंगा लेते हैं, उनके अपने भी सलामत नहीं रहते। और मैं नहीं चाहती कि एक बूढ़ी औरत और एक बच्चे को तुम्हारी ज़िद की सज़ा भुगतनी पड़े।"

और वो धमकी, इतनी नरम आवाज़ में कही गई थी कि वो किसी और की सुनी हुई लगती थी। पर हम जानते थे कि ये वही मशीन थी जिसने बारह साल पहले निर्मला वर्मा को कुचला था, और आज उसी बेगुनाह की बेटी की बूढ़ी माँ और मासूम भाई की तरफ़ अपना ठंडा मुँह मोड़ चुकी थी।

"आप मेरे परिवार का नाम अपनी ज़ुबान पर मत लाइए, संजना जी। मेरी माँ ने भूखे रह कर भी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। और उसकी बेटी आपकी इस धमकी के आगे भी नहीं झुकेगी, चाहे वो कितनी भी नरम आवाज़ में क्यों न कही गई हो।"

"ये हाथ फैलाने की बात नहीं है, कैंटीन वाली। जान बचाने की बात है। सोच लो, अच्छी तरह सोच लो। कुछ लड़ाइयाँ, हार मान कर चुपचाप निकल जाने में ही समझदारी है।"

संजना के जाते ही महिका अपने आटे और भाप के बीच अकेली खड़ी रह गई, और वो धमकी धीरे-धीरे उसके भीतर बर्फ़ की तरह उतरती चली गई। उसे अपनी परवाह नहीं थी। पर आज पहली बार वो मशीन, जिसने उसकी माँ को मिटाया था, उसकी बूढ़ी नानी और नन्हे चिंटू की तरफ़ इशारा कर के जा चुकी थी।

उधर उसी रात, चालीस मंज़िल ऊपर, अगस्त्य अपने काँच के केबिन में अकेला खड़ा था। एक तरफ़ सत्रह तारीख़ की सगाई के वो छपे हुए काग़ज़ थे, दूसरी तरफ़ निर्मला वर्मा की वो पीली फ़ाइल, और तीसरी तरफ़ महिका की छोड़ी हुई वो ख़ामोशी, जो अब उसके पूरे टावर में गूँज रही थी।

"इंसाफ़... या वो लड़की... या ये सब जला कर राख कर देना। बारह साल मैं जिसे बाप कहता रहा, उसी की ताक़त ने उस हाथ को कुचला जिसने उस काली रात एक अजनबी लड़के को अपना टिफ़िन थमाया था।"

और फिर बर्फ़ के बादशाह ने वो सगाई का कार्ड उठाया, उसे एक पल देखा, और अपनी मुट्ठी में मसल दिया। उसने अभी सब कुछ तय नहीं किया था, पर एक बात तय कर ली थी। वो अब न झुकेगा, न राणा की तारीख़ पर दस्तख़त करेगा, चाहे इसके लिए उसे अपना पूरा साम्राज्य ही दाँव पर क्यों न लगाना पड़े।

और उसी रात, दिल्ली के दूसरे छोर पर, त्रिलोकपुरी के उस एक कमरे के घर में, एक अकेले बल्ब की रौशनी में, महिका अपनी नानी के पास आ बैठी। रास्ते भर जो फ़ैसला उसके भीतर पक रहा था, वो अब उसके होंठों तक आ चुका था।

"नानी, तुम हमेशा से ठीक कहती थीं। ये लड़ाई हमारे बस की नहीं है। हम दिल्ली छोड़ रहे हैं। हमेशा के लिए। किसी दूर, छोटे शहर चलेंगे, जहाँ न मल्होत्रा होगा, न राणा, न कोई हमें जानता होगा।"

"सच कह रही है, बेटा? तू सच में ये सब छोड़ने को तैयार है? भगवान का लाख-लाख शुक्र है... मैं कब से यही चाहती थी कि तू उन बड़े लोगों से जितनी दूर हो सके, उतनी हो जा।" "पर तेरी आँखों में ये हार कैसी है, महिका? तू जीत कर भी हारी हुई क्यों लग रही है?"

"हार ही सही, नानी। माँ का सच मेरे सीने में रहेगा, इस डायरी में रहेगा, पर मैं इसे ले कर अब किसी इतने बड़े आदमी से नहीं लड़ूँगी।" "तुम्हारी और चिंटू की एक-एक साँस मेरी माँ के इंसाफ़ से बड़ी है। मैं तुम दोनों को खो कर वो इंसाफ़ नहीं चाहती। बस।"

और चटाई पर लेटा चिंटू, जिसे सब सोया हुआ समझ रहे थे, अँधेरे में जागा हुआ ये सब सुन रहा था। वो ग्यारह साल का था, पर उसने आज दीदी और नानी की बातों में उससे कहीं ज़्यादा समझ लिया था जितना वो सोच रही थीं।

"दीदी... हम कहीं जा रहे हैं? मेरा स्कूल? मेरे दोस्त गोलू और रिंकू? और वो सब जिनके लिए तुम रोज़ इतना अच्छा खाना बनाती हो?"

"किसी नई, अच्छी जगह चलेंगे, मेरे छोटे। वहाँ तेरे लिए इनसे भी अच्छे दोस्त होंगे। और वहाँ मैं तेरे लिए रोज़ सुबह गरम-गरम आलू के परांठे बनाऊँगी, ढेर सारा मक्खन लगा कर, बिल्कुल तेरी पसंद के। अब सो जा, चुपचाप।"

पर चिंटू सोया नहीं। उसके भीतर एक सवाल था जो उस पूरे कमरे से बड़ा था, और उसने वो सवाल पूछ ही लिया। वही मासूमियत, जो अक्सर सबसे सीधे, सबसे गहरे जा कर लगती है।

"पर दीदी... तुमने ही तो कहा था कि माँ ने कोई ग़लती नहीं की थी। कि किसी बहुत बुरे आदमी ने माँ को झूठा फँसाया था। अगर हम ऐसे ही डर कर, चुपचाप भाग गए, तो वो बुरे आदमी जीत जाएँगे ना? माँ का सच फिर हमेशा झूठ ही रह जाएगा।" "हम उन बुरे लोगों को जीतने क्यों दें, दीदी?"

और महिका के हाथ, जो अपनी माँ की उस डायरी को कपड़े में लपेट रहे थे, वहीं बीच में जम गए। ग्यारह साल के एक बच्चे ने वो अकेला सवाल पूछ लिया था जिसका जवाब न भाग जाने में था, न रुक जाने में। दिल्ली छोड़ने का वो पक्का फ़ैसला, अचानक उसके हाथों में उस अधूरी लिपटी डायरी की तरह, बीच में ही अटका रह गया, और वो नन्हा सवाल उस अँधेरे कमरे की हवा में यूँ ही टँगा रह गया। हम उन बुरे लोगों को जीतने क्यों दें, दीदी?

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