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Chapter 26 of 28

इंसाफ़ की घड़ी

बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi

महिका की चीख़ अभी उस बर्फ़ीली धुँध में गूँज ही रही थी कि वो, हर ख़तरा भूल कर, खुले दरवाज़े के अंदर लपकी। जमे हुए फ़र्श पर घुटनों के बल गिरते उसके हाथ उस निश्चल देह तक पहुँचे, और तभी उसे कोने में दूसरी परछाईं दिखी, दीवार से टिकी, नीली, पर... हल्के से हिलती हुई।

"नानी! ... अगस्त्य! तुम दोनों... कोई तो आँख खोलो! नानी, आपकी आँखें... अगस्त्य, तुम्हारे होंठ नीले पड़ गए हैं! बंसी काका, कंबल! डॉक्टर को बुलाओ, अभी के अभी!"

"मैं... ठीक हूँ, महिका। पहले नानी को देखो। मैंने इन्हें अपनी बची-खुची गरमाहट दे दी... इनकी साँस अभी चल रही है... इन्हें बाहर निकालो, जल्दी..."

बंसी काका और इंजीनियरों ने दोनों को उस जमे हुए मुँह से खींच कर बाहर, गरम हवा में, कंबलों के नीचे ले लिया। और वहीं, कई थमी हुई साँसों के बीच, नानी के बूढ़े सीने ने अचानक एक लंबी, खुरदुरी खाँसी के साथ हवा भर ली, और महिका की रुकी हुई दुनिया फिर चलने लगी।

"साँस ले रही हैं! नानी साँस ले रही हैं! और तुम... तुम पागल हो क्या, अगस्त्य मल्होत्रा! किसने कहा था तुमसे उस बर्फ़ में हीरो बनने को? चुपचाप ये कंबल ओढ़ो, और ये गरम चाय पियो... एक लफ़्ज़ नहीं, बस पियो।"

"तुम... तुम अब भी मुझे डाँट रही हो? मैं बारह साल बाद अपने पैरों से उस बर्फ़ में उतरा, महिका, उसी बर्फ़ में जिसने उस रात मुझसे मेरा सब कुछ छीन लिया था। और आज मैं उसमें से तुम्हारी नानी को वापस छीन लाया। अब वो रात मुझ पर हावी नहीं है।"

पर वो राहत बस एक साँस की थी। शहर के दूसरे छोर पर राणा की दूसरी मशीन अब भी चल रही थी, तहख़ाने की पीली फ़ाइलें राख होने को थीं, और मर्जर की वो बोर्ड मीटिंग, जिसमें हिमराज हमेशा के लिए राणा के नाम होने वाला था। अगस्त्य ने नानी के सर पर एक काँपता हाथ रखा, और धीरे से उठ खड़ा हुआ।

"अगस्त्य! तू ज़िंदा है, शुक्र है ऊपर वाले का... पर हमारे पास वक़्त नहीं है, यार। राणा ने आज सुबह ठीक ग्यारह बजे इमरजेंसी बोर्ड बुला ली है। वो पूरे शहर में कह रहा है कि तू 'मानसिक रूप से अस्थिर' है, कि तूने आधी रात कोल्ड स्टोरेज पर धावा बोला, और इसी बहाने वो मर्जर पास करवा कर पूरा हिमराज अपने नाम करने जा रहा है।"

"मतलब... वो जीत रहा है? मेरी नानी को उस बर्फ़ में मारने की कोशिश करने के बाद भी? अगस्त्य, बस करो अब। उसे वो सारे सबूत दे दो, वो फ़ाइलें दे दो, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मेरा परिवार बच गया, यही काफ़ी है।"

"नहीं, महिका। आज नहीं। बारह साल पहले भी इसी 'बस बच गए, यही काफ़ी है' के डर ने तुम्हारी माँ को अकेला छोड़ दिया था। उस आदमी ने आज सुबह फ़ोन पर एक बूढ़ी, बीमार औरत की जान की क़ीमत लगाई थी। और मैं वो आदमी हूँ जिसने उस पूरी बातचीत का एक-एक लफ़्ज़ रिकॉर्ड कर लिया है।"

"तूने वो पूरी कॉल रिकॉर्ड कर ली? अगस्त्य, इसका मतलब हमारे पास ख़ुद दिग्विजय राणा की आवाज़ है, जिसमें वो एक ज़िंदा इंसान की जान का सौदा कर रहा है। ये कोई अफ़वाह नहीं, कोई पुरानी डायरी नहीं जिसे वो एक झटके में 'झूठ' कह कर उड़ा दे। ये उसकी अपनी ज़ुबान है।"

"बस यही एक चीज़ काफ़ी नहीं है, वीर। राणा हर अकेले इल्ज़ाम का एक जवाब गढ़ लेगा। इसलिए आज उस बोर्ड रूम में हम एक नहीं, तीन सच रखेंगे। एक, ये रिकॉर्डिंग।"

"दो, अस्पताल का वो रिकॉर्ड कि निर्मला वर्मा पर लगा लापरवाही का केस बिना किसी जाँच के ठीक एक ही दिन में बंद हुआ, और उस साल उस ट्रस्ट को सबसे बड़ा चंदा देने वाला आदमी दिग्विजय राणा था। और तीन... ख़ुद निर्मला वर्मा की डायरी।"

"माँ की डायरी। मेरी माँ ने अपने आख़िरी महीनों में जो देखा, जो सहा, वो सब उन्हीं पन्नों में है। अगर मेरी माँ की अपनी लिखावट उस आदमी को बेनक़ाब कर सकती है, तो मैं ख़ुद वो डायरी उस पूरे बोर्ड के सामने रखूँगी।"

"पर अगस्त्य... डायरी का सबसे ज़रूरी पन्ना, जिस पर उस आदमी का नाम लिखा था, वो तो राणा का आदमी उस रात त्रिलोकपुरी से नोच कर ले गया था। हमारे पास तो अधूरा सच है।"

वो एक फटा पन्ना, जिस पर राणा का नाम था, अब पूरे सच के बीचोंबीच एक ख़ाली जगह की तरह था। पर वो पन्ना खोया नहीं था। इस वक़्त वो राणा की ही हवेली में, उसी की बेटी संजना की मुट्ठी में भिंचा हुआ था, और संजना, अपने बाप के स्टडी की दहलीज़ पर खड़ी, एक फ़ैसला कर चुकी थी।


ठीक ग्यारह बजे, हिमराज के सबसे ऊँचे काँच के कमरे में बोर्ड जमा था। मेज़ के सिरे पर दिग्विजय राणा एक शोक-संतप्त सरपरस्त का नक़ाब ओढ़े बैठा था, सामने मर्जर के काग़ज़ और एक तरफ़ बुलाई हुई पुलिस, ताकि आधी रात 'धावा बोलने वाले' अस्थिर अगस्त्य को क़ाबू में दिखाया जा सके। पर जिस दरवाज़े से एक मुजरिम के घसीटे जाने का इंतज़ाम था, उसी से अगस्त्य एक मुद्दई की तरह अंदर आया, पीछे वीर, और माँ की डायरी सीने से लगाए महिका।

"आ गया बेटा, बैठ जा। सम्मानित सदस्यो, मुझे बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि मेरे बेटे जैसे अगस्त्य की मानसिक हालत अब ठीक नहीं रही। इसने आज रात एक कोल्ड स्टोरेज पर धावा बोला, कंपनी की करोड़ों की संपत्ति ख़तरे में डाली, एक कैंटीन की नौकरानी के लिए। इसीलिए अब ज़रूरी हो गया है कि हिमराज की बागडोर..."

"बागडोर की बात बाद में होगी, राणा। पहले इस बोर्ड को वो सुनने दो जो तुमने आज सुबह ठीक साढ़े पाँच बजे मुझसे फ़ोन पर कहा था। वीर।"

वीर ने अपना फ़ोन उस चमकती मेज़ के बीचोंबीच रखा, और एक बटन दबाया। और उस काँच के कमरे में दिग्विजय राणा की अपनी आवाज़ गूँज उठी, वही मीठी, इत्मीनान भरी आवाज़, जो चंद घंटे पहले एक बूढ़ी, बीमार औरत की जान का सौदा कर रही थी।

"...बस तू निर्मला वर्मा की वो सारी पीली फ़ाइलें मेरे हवाले कर दे, मर्जर पर दस्तख़त कर, और मैं ये कोड इसी पल भेज देता हूँ। एक बेकार सी जान के बदले तुझे बस अपनी ये ज़िद छोड़नी है..."

उस रिकॉर्डिंग के हर लफ़्ज़ के साथ बोर्ड के चेहरों का रंग उड़ता गया, और पल भर को राणा के शोक-संतप्त नक़ाब के नीचे वो जमा हुआ पत्थर दिख गया। फिर उसने ख़ुद को सँभाला, और एक हल्की, अफ़सोसनाक हँसी हँस दिया।

"एडिट की हुई रिकॉर्डिंग, बेटा? इतने नीचे गिर जाओगे? कोई भी आजकल दो आवाज़ें जोड़ कर ऐसी टेप बना लेता है। ये तो मेरे बेटे की बीमार ज़हनियत का सबूत है, और कुछ नहीं। इसके पास मेरे ख़िलाफ़ एक भी ठोस काग़ज़ है?"

"ठोस काग़ज़? ये लो। बारह साल पहले नर्स निर्मला वर्मा पर लापरवाही का जो केस लगाया गया, वो बिना किसी जाँच के ठीक चौबीस घंटे में बंद कर दिया गया। और जिस अस्पताल ट्रस्ट ने उसे रफ़ा-दफ़ा किया, उस पूरे साल उसका सबसे बड़ा दानदाता तुम थे, दिग्विजय राणा। एक बेगुनाह नर्स को एक ही दिन में क़ातिल बना कर दफ़्न कर दिया गया, और उस दफ़न का बिल तुम्हारे पैसे ने भरा।"

"इत्तिफ़ाक़! मैं इस शहर के पचास ट्रस्टों को चंदा देता हूँ, तो क्या हर मरने वाले का क़ातिल मैं ही हूँ? एक पुरानी, गुमनाम नर्स, एक कंगाल कैंटीन वाली की माँ। तुम एक मुर्दा औरत के अधूरे काग़ज़ों पर मेरा बारह साल पुराना नाम..."

और ठीक उसी पल, बोर्ड रूम का वो काँच का दरवाज़ा खुला, और कमरे की हर नज़र उधर मुड़ गई। दहलीज़ पर संजना राणा खड़ी थी, चेहरा सफ़ेद, आँखें लाल, और उसकी काँपती उँगलियों के बीच एक पुराना, फटा, पीला पन्ना दबा था।

"संजना? बेटा, इस वक़्त, इस कमरे में तू क्या कर रही है? ये बोर्ड की बात है, तू घर जा। जो तेरे हाथ में है, वो चुपचाप मुझे दे और घर जा, बेटा।"

"मैं घर से ही आ रही हूँ, पापा। सीधे आपके स्टडी से। इस पन्ने को आपने अपनी तिजोरी में छुपा रखा था, और मैंने उसे पढ़ लिया है। ये निर्मला वर्मा की डायरी का वही फटा पन्ना है, जो आपका आदमी त्रिलोकपुरी से नोच कर आपके पास लाया था।"

"और इस पन्ने पर, उस मरती हुई नर्स की अपनी लिखावट में, उस रात का सच लिखा है। जिस दूसरी गाड़ी के आदमी को उस रात शराब में धुत, पर एक ख़रोंच तक आए बिना हादसे की जगह से निकाला गया था, उसका नाम है, दिग्विजय राणा। मेरे अपने पापा।"

"संजना... तू जानती भी है तू क्या कर रही है? तू अपने बाप को इन ग़ैरों के सामने... मैंने ये सब किसके लिए किया था? तेरे लिए! तेरी सल्तनत के लिए! और आज तू एक मुर्दा नर्स के लिए, एक कैंटीन वाली के लिए, मुझे बेच रही है!"

"मैंने आज रात अपने ही कानों से आपको फ़ोन पर एक बूढ़ी औरत को बर्फ़ में बंद रखने का हुक्म देते सुना है, पापा। मैं बस एक अच्छी शादी चाहती थी, एक साफ़-सुथरी ज़िंदगी। मैं एक क़ातिल की बेटी बन कर, एक और क़त्ल में शरीक हो कर वो नहीं चाहती। बस पापा, अब बहुत हो गया।"

उस एक पन्ने ने, उस बेटी की उस एक गवाही ने, बारह साल की जमी हुई बर्फ़ को बीच से चीर दिया। रिकॉर्डिंग, अस्पताल का रिकॉर्ड, और अब ख़ुद राणा की बेटी के हाथ में डायरी का वो खोया हुआ पन्ना, तीनों सच एक ही नाम पर आ कर जुड़ गए। और दरवाज़े पर खड़ी महिका ने सुना कि बारह साल में पहली बार, सबके सामने, उसकी माँ का नाम बेगुनाही के साथ लिया जा रहा था।

"मेरी माँ का नाम निर्मला वर्मा था। वो एक नर्स थीं, जो रात-रात भर अजनबियों की सेवा में जागती थीं। बारह साल तक आप सबकी इस दुनिया ने उन्हें एक लापरवाह क़ातिल कहा, और वो बेगुनाह, घुल-घुल कर मर गईं। आज आप सब गवाह हैं। मेरी माँ ने किसी की जान नहीं ली थी। मेरी माँ बेगुनाह थीं।"

"और मैं भी गवाह हूँ। उस रात, उसी अस्पताल के गलियारे में, एक नर्स ने एक टूटे हुए, अकेले, डरे हुए लड़के को अपने हाथ का खाना खिलाया था, ठीक उससे पहले कि उस लड़के की पूरी दुनिया उजड़ जाए। वो लड़का आज इसी कमरे में खड़ा है। निर्मला वर्मा ने उस रात मौत नहीं बाँटी थी, उसने ज़िंदगी बाँटी थी। और आज, इस कंपनी के मालिक की हैसियत से, मैं उनका नाम हमेशा के लिए साफ़ करता हूँ।"

पुलिस के अफ़सर आगे बढ़े, और बारह साल में पहली बार, दिग्विजय राणा के वो चौड़े कंधे झुक गए। अब बोर्ड की हर नज़र अगस्त्य पर थी, और हर किसी को डर था कि ग़ुस्से से भरा बादशाह अब इस पूरी कंपनी को जला कर राख कर देगा।

"मैं ये कंपनी नहीं गिराऊँगा। ये हिमराज मेरे पिता अविनाश मल्होत्रा ने अपने हाथों से खड़ा किया था, और इसमें हज़ारों मज़दूरों, हज़ारों बंसी काकाओं की रोज़ी-रोटी बसती है। एक आदमी के गुनाह की सज़ा मैं इन बेगुनाह लोगों को नहीं दूँगा। मैं अविनाश मल्होत्रा का बेटा हूँ, और आज मैं ठीक वही कर रहा हूँ जो वो करते।"

और जैसे ही अफ़सर उस गिरे हुए बादशाह को अगस्त्य के पास से गुज़ार कर ले जाने लगे, राणा ठिठक कर रुक गया। उसके चेहरे पर न ग़ुस्सा था, न पछतावा, बस एक ठंडी, हैरान कर देने वाली मुस्कान। और फिर वो धीरे से हँसा, जैसे कोई जुआरी आख़िर में अपना सबसे अच्छा पत्ता खोल रहा हो।

"शाबाश, बेटा। बहुत अच्छा खेला तूने। पर तूने ये सोच कैसे लिया कि उस काली रात से सिर्फ़ मैं ही फ़ायदे में रहा? मैं तो बस एक मोहरा था, अगस्त्य। उस रात तुम्हारे बाप की मौत से जिसकी तिजोरी असल में भरी, उसका हाथ मुझसे कहीं ऊँचा है, कहीं ज़्यादा ताक़तवर।"

"और मज़े की बात ये है, कि वो आदमी आज भी तुम्हारे इतने क़रीब खड़ा है कि नाम सुन कर भी तुझे यक़ीन नहीं होगा। पूछ मत, बेटा। उस नाम तक पहुँचने से पहले तेरी ये नई-नई मोहब्बत भी इसी बर्फ़ में जम जाएगी।"

और वो हँसता हुआ, उन अफ़सरों के साथ, उस काँच के दरवाज़े से बाहर निकल गया, वो दूसरा नाम अपने सीने में दबाए हुए। जीत के उस कमरे में अचानक एक अनजाना ख़ौफ़ तैर गया, एक दूसरा, अब भी ताक़तवर नाम, जो किसी की ज़ुबान पर तो नहीं आया, पर हर एक के ज़हन में एक ठंडी परछाईं की तरह उतर गया। और उस एक अनकहे नाम पर, बारह साल का सच खुलने के ठीक बाद, कहानी एक बार फिर बर्फ़ बन कर ठहर गई।

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