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Chapter 10 of 28

सिर्फ़ एक नौकरी

बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi

उस सफ़ेद रौशनी में तीनों जैसे पत्थर के हो गए। छत के गीले फ़र्श पर सगाई के कार्ड बिखरे पड़े थे, और हर कार्ड पर वही एक तारीख़ चमक रही थी, सत्रह। एक मिनट पहले जिस चूल्हे की आँच में बर्फ़ पिघल रही थी, वो आँच अब बुझी हुई लग रही थी। महिका की नज़र उन काग़ज़ों पर जमी थी, और उसे पहली बार समझ आ रहा था कि जिसे वो एक अफ़वाह समझती थी, वो एक पक्की, छपी हुई सच्चाई है।

"क्यों, हैरान रह गई?" "तुझे लगता था ये सब क्या है? कोई कहानी?" "ये सगाई आज की नहीं है, लड़की। दो ख़ानदानों का फ़ैसला है, बरसों पुराना। ... और तू? तू बस इस बीच में गिरा हुआ एक दाग़ है, जिसे पोंछ दिया जाएगा।"

"मैं... मैंने कभी..." "साहब... ये सच है? आपकी... शादी?" "आपने तो मुझे कभी..."

"ये तारीख़ मैंने नहीं दी, संजना।" "ये तुम्हारे बाप की चाल है, अख़बार के ज़रिए मुझ पर सगाई थोपने की। मैंने आज तक न कोई तारीख़ दी है, न दूँगा। ... ये कार्ड झूठे हैं।"

"झूठे? कल सुबह पूरी दिल्ली इन्हें सच मानेगी, अगस्त्य। और सच वही होता है जो अख़बार में छपता है।" "और तू, कैंटीन वाली... तू इस आदमी की भूख है, मोहब्बत नहीं। आज इसका जी तुझसे बहला हुआ है, कल किसी और से बहल जाएगा। ... अमीरों के लिए तुम जैसे लोग खिलौने होते हैं।"

"तुम्हारे बाप ने मेरी ख़ामोशी को अपनी इजाज़त समझ लिया, ये उसकी सबसे बड़ी भूल है।" "ये सगाई तब होगी जब मैं कहूँगा, अगर कहूँगा। कोई छपा हुआ काग़ज़ मेरी ज़िंदगी का फ़ैसला नहीं करेगा। ... ये संदेश अपने बाप तक पहुँचा देना, संजना।"

और महिका ने ग़ौर किया, कि बादशाह अपनी तारीख़ के लिए लड़ रहा था, अपने ग़ुरूर के लिए, अपने ख़ानदान के नाम के लिए। पर उन तमाम लफ़्ज़ों में एक भी लफ़्ज़ उसके लिए नहीं था। ... न 'ये लड़की मेरे लिए मायने रखती है', न 'इसे यूँ मत कहो'। बर्फ़ का बादशाह एक झूठे काग़ज़ से लड़ रहा था, और उस काग़ज़ के नीचे कुचली जा रही लड़की उसे दिख ही नहीं रही थी।

और महिका वहीं खड़ी-खड़ी अपना हिसाब लगाने लगी। छत की वो भाप, वो हल्दी लगा हाथ, वो कबूलनामा, सब एक तरफ़, और ये छपी हुई तारीख़ एक तरफ़। उसने जोड़ा, घटाया, और नतीजा वही निकला। इस आदमी के लिए वो एक ज़ायका थी, एक दवाई, एक कैंटीन वाली। ऐसी कोई चीज़ नहीं जो किसी शादी के बाद बची रह जाए। ... और उसके अंदर कुछ चुपचाप बंद हो गया।

"आप ठीक कहती हैं, मैडम।" "मैं कैंटीन वाली हूँ। खाना बनाती हूँ, खिलाती हूँ, और अपने घर चली जाती हूँ। बस इतनी सी है मेरी औकात।" "माफ़ी चाहती हूँ जो मैं इस छत पर अपनी हद भूल गई।"

"महिका... रुको।" "ये वो नहीं है जो तुम समझ रही हो। छत पर जो था, वो..." "..."

"खाना अच्छा लगा आपको, यही बहुत है साहब। मेरा काम हो गया।" "आगे से आपकी थाली वक़्त पर, नीचे कैंटीन में लगी मिलेगी। ... ऊपर छत पर आने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"

और महिका बर्तन उठा कर, उन बिखरे कार्डों के बीच से गुज़रती, सीढ़ियों के अँधेरे में उतर गई। पीछे छत पर बर्फ़ का बादशाह रह गया, अपने ही क़दमों में छपे हुए एक झूठ के साथ, और एक जीत की मुस्कान ओढ़े संजना। बारह साल बाद जो बर्फ़ एक टूटी छत पर पिघली थी, वो एक ही रात में फिर जमने लगी थी।

अगले कुछ दिन हिमराज के शीशे के महल में अजीब से गुज़रे। महिका अब भी रोज़ आती थी, अब भी बादशाह की थाली उसके केबिन तक पहुँचती थी। पर वो पहले वाली महिका नहीं थी। न वो चहकना, न वो बॉस बनना, न वो 'खाइए साहब' की ज़िद। बस एक ख़ामोश लड़की, जो थाली रखती और बिना नज़र मिलाए लौट जाती। और बादशाह, जो बारह साल से ख़ामोशी का आदी था, पहली बार किसी की ख़ामोशी से बेचैन था।

"तुमने आज दाल में कुछ बदला है।" "...पहले जैसी नहीं है।" "तुम पहले जैसी नहीं हो, महिका।"

"नमक कम कर दिया है, साहब। सुना है बड़े लोगों को ज़्यादा नमक नुक़सान करता है।" "और कुछ चाहिए हो तो बंसी काका को बोल दीजिएगा। मैं निकलती हूँ।"

"छत पर जो हुआ..." "वो कोई कमज़ोर पल नहीं था। मेरे लिए वो बारह साल में पहली बार था।"

"वो एक भूखे आदमी का पल था, साहब। आप भूखे थे, मैंने खिला दिया। बस इतनी सी बात थी, और मैंने उसे कुछ और समझ लिया। ये मेरी ग़लती थी, और मैं इसे सुधार रही हूँ।"

"ये सगाई मेरी मर्ज़ी से नहीं है, महिका। राणा ने मेरी सबसे बुरी हालत का फ़ायदा उठा कर..." "...ये पेचीदा है। तुम नहीं समझोगी।"

"आप सही कह रहे हैं, साहब। मैं नहीं समझूँगी। मैं तो बस कैंटीन वाली हूँ। पेचीदा बातें बड़े लोगों की होती हैं। ... मेरी बात सीधी है, दाल में नमक, और घर में दो पेट।"

और वो चली गई, और बर्फ़ का बादशाह अपने काँच के केबिन में अकेला रह गया। उसे डॉक्टर सेठी के लफ़्ज़ याद आए, कि उसका ज़ायका ज़ुबान पर नहीं, किसी बंद याद के पीछे क़ैद है, जिसे सिर्फ़ कोई एक रहम खोल सकती है। वीर ने कहा था, पता करो ये लड़की आख़िर है कौन। पर अब वो लड़की, जो उसी बंद याद पर खड़ी थी, उसके सामने दरवाज़ा बंद कर के जा रही थी। और वो, जो लफ़्ज़ों का बादशाह था, उसे रोकने का एक लफ़्ज़ नहीं जुटा पाया।

उधर त्रिलोकपुरी की तंग गली के उस एक कमरे के घर में रात उतर आई थी। कोने में चिंटू अपनी फटी किताब पर सिर रखे सो चुका था, कल के इम्तिहान की रट लगाते-लगाते। और चारपाई पर नानी शांति देवी, बूढ़ी आँखें दरवाज़े पर टिकाए, अपनी नातिन की राह देख रही थीं। जब महिका अंदर आई, तो नानी की सधी हुई नज़र ने एक पल में भाँप लिया कि आज कुछ टूटा है।

"अरे मेरे शेर..." "फिर किताब पर ही सो गया, पूरे पहाड़े मुँह पर छाप कर।" "...इसी एक शैतान की फ़ीस के लिए तो मैं वो सारी ठंड रोज़ पी जाती हूँ।"

"आ गई मेरी बच्ची... रुक ज़रा, ये चेहरा क्यों उतरा हुआ है? आँखें क्यों सूजी हैं? किसी ने कुछ कहा तुझे? उस बड़े दफ़्तर में किसी ने मेरी बच्ची को कुछ..."

"कुछ नहीं नानी। बस दिन लंबा था।" "वो बड़े लोगों की दुनिया है ना... वहाँ हम जैसों की जगह बस उतनी होती है जितनी वो नाप कर दे दें। ... आज मुझे मेरी नाप बता दी गई, बस।"

"किसने बताई तेरी नाप? वो... मल्होत्रा वाला लड़का? अगस्त्य मल्होत्रा?"

"उसकी सगाई है नानी, राणा साहब की बेटी से। बड़े लोगों की बड़ी शादी। और मैं वहाँ बस खाना बनाती हूँ। पता नहीं मैंने कैसे सोच लिया था कि..." "छोड़िए। आप बताइए, शाम की दवाई खाई कि नहीं?"

"महिका, मेरी बात ध्यान से सुन।" "वो नौकरी छोड़ दे। उस मल्होत्रा के घर से, उस नाम से जितनी दूर रहेगी उतना अच्छा। ... मैं आज तक चुप रही, पर उस घर और हमारे घर के बीच एक... एक ऐसी रात है, जो..."

"कैसी रात, नानी? आप हर बार उस नाम पर यूँ काँप क्यों जाती हैं? जिस दिन मैंने पहली बार बताया था कि मैं वहीं काम करती हूँ, उस दिन भी आपका चेहरा फ़क़ पड़ गया था। ... क्या है वो जो आप बरसों से मुझसे छुपा रही हैं?"

" कुछ नहीं... कुछ नहीं, बच्ची।" "बस एक बूढ़ी औरत का डर है। मैंने इस दुनिया में अपनी बेटी को खोया है, तेरी माँ को। और मैं जानती हूँ, बड़े लोगों की दुनिया हम जैसों को इस्तेमाल करती है, निचोड़ती है, और फेंक देती है। मैं तुझे भी उसी दुनिया में नहीं खोना चाहती। बस, तू वो जगह छोड़ दे।"

और महिका ने अपनी नानी के डर को एक ग़रीब घर का डर समझ कर टाल दिया। पर सिर्फ़ हम जानते थे कि उस बूढ़ी छाती में एक ऐसा राज़ दबा है जो 'मल्होत्रा' और 'वर्मा', दोनों घरों को एक ही काली रात से बाँधता है। दो घरों के बीच का पूरा सच, आज रात भी, एक बूढ़ी ज़ुबान की नोक पर आ कर रुक गया।

"आप फ़िक्र मत कीजिए, नानी। मैं भी अब उस जगह नहीं रहना चाहती। चिंटू की फ़ीस, आपकी दवाई, इनके लिए मैं कहीं और काम ढूँढ लूँगी। पर उस आदमी के लिए, जो मुझे सिर्फ़ एक चम्मच समझता है, अब और नहीं। ... बस, फ़ैसला हो गया।"

अगली सुबह हिमराज की कैंटीन उसी तरह भाप और बर्तनों के शोर से भरी थी। बंसी काका हमेशा की तरह एक साथ दस काम कर रहे थे। और महिका एक कोने में चुपचाप खड़ी थी, हाथ में एक तह किया हुआ काग़ज़ थामे, जिस पर रात उसने काँपते हाथों से चंद लाइनें लिखी थीं।

"अरे महिका! वहाँ मुर्दे की तरह क्यों खड़ी है, इधर आ। आज राजमा ग़ज़ब बना है, ज़रा चख के बता।" "और सुन, कल की हेडलाइन पता है क्या थी? बादशाह छत पर दाल-चावल। ... तेरे हाथ में सचमुच कोई जादू है, लड़की!"

"काका... ये लीजिए।" "ये मेरा इस्तीफ़ा है। आज से मैं ये नौकरी छोड़ रही हूँ।"

"इस्ती... क्या?" "इस्तीफ़ा? महिका, दिमाग़ तो ठीक है तेरा? इस नौकरी के बिना तेरा घर कैसे चलेगा, हाँ? चिंटू की फ़ीस कौन भरेगा, नानी की दवाई कहाँ से आएगी? ... ये सब छोड़ किस बात पर?"

"मिल जाएगा कहीं और काम, काका। मैं हाथ-पैर वाली हूँ, भूखी नहीं मरूँगी। बस अब यहाँ नहीं, इस टावर में नहीं।"

"ये उस बादशाह की वजह से है ना? उस रात छत पर मैं तुझे उसके साथ अकेला छोड़ कर गया था... बेटी, अगर उस आदमी ने तेरे साथ कोई बदतमीज़ी..."

"उस आदमी ने कोई बदतमीज़ी नहीं की, काका। बस मुझे मेरी असली जगह दिखा दी।" "उसके लिए मैं इंसान नहीं हूँ। मैं एक चम्मच हूँ। एक चम्मच, जिससे वो बारह साल से बंद अपनी कोई दवाई खाता है। ... और मैं उस आदमी के लिए एक और निवाला नहीं बनाऊँगी, जिसकी नज़र में मैं ज़िंदगी भर एक चम्मच से ज़्यादा कुछ नहीं हो सकती। कभी नहीं।"

और बंसी काका उस तह किए हुए काग़ज़ को थामे वहीं जड़ हो कर रह गए, कैंटीन की सारी भाप, सारा शोर जैसे एक पल को थम गया। महिका ने अपना दुपट्टा सँभाला और उस भाप उगलती कैंटीन से, उस टावर से, निकलने को मुड़ गई। और ऊपर काँच के केबिन में बैठे बर्फ़ के बादशाह को अभी ख़बर तक नहीं थी कि बारह साल बाद उसे ज़िंदा करने वाला अकेला हाथ अभी-अभी उसकी दुनिया से इस्तीफ़ा दे कर जा रहा है। ... सत्रह तारीख़ की उलटी गिनती अब दो तरफ़ चलने लगी थी।

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