इशिता सिन्हा ने अपने पिता को अपनी आँखों के सामने बर्बाद होते देखा। मशहूर आविष्कारक किशोर सिन्हा की सारी मेहनत, उनके पेटेंट, एक ही रात में वर्धान इंडस्ट्रीज़ के नाम हो गए, और अदालत ने उस अकेले आदमी को उस दैत्य के सामने हरा दिया। दस साल बाद इशिता उसी कंपनी में सबसे चमकती इंटर्न बनकर दाख़िल होती है, एक ही मक़सद के साथ: वो सबूत ढूँढना जो उसके पिता को इंसाफ़ दिलाएगा। कंपनी का कमज़ोर समझा जाने वाला वारिस आदित्य वर्धान उसे अपनी ख़ुफ़िया रिसर्च टीम के लिए चुन लेता है, क्योंकि वो अकेला है जो उस पर सच में यक़ीन करता है। पर जैसे-जैसे इशिता गहराई में उतरती है, सच का चेहरा बदलने लगता है: चोरी वर्धान ने नहीं, उसके अपने ख़ानदान के किसी अपने ने की थी। अब हर झूठ भारी पड़ता है, हर धड़कन दो आक़ाओं के बीच बँटी है, और जिस आदमी से उसे मोहब्बत हो रही है, उसी से उसे सबसे बड़ा राज़ छिपाना है। दफ़्तर की सियासत, एक तिल-तिल कसता हुआ जाल, और एक ऐसी मोहब्बत जिसकी बुनियाद ही एक जासूस का झूठ है। जब असली गद्दार का नक़ाब उतरेगा, तो टूटेगा दिल भी और झूठ भी।
विषय-सूची
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दस साल पहले, वर्धान इंडस्ट्रीज़ ने भरी भीड़ के सामने वो तकनीक अपने नाम कर ली जो आविष्कारक किशोर सिन्हा ने बनाई थी, अदालत गिरा दी गई, लैब सील कर दी गई, और एक बारह साल की इशिता ने अपने पिता को टूटते देख एक वादा किया। आज, दस साल बाद, वही इशिता वर्धान की सबसे मुश्किल इंटर्नशिप जीत कर, अपने पिता और चाचा रतन के भेजे एक ही मक़सद के साथ कंपनी के अंदर घुसती है: सीलबंद आर्काइव से चोरी का सबूत निकालना। दर्शक जानते हैं वो एक जासूस है। पर पहले ही दिन, काँच के दरवाज़ों पर, कंपनी का वारिस आदित्य वर्धान उसे रोक कर वो कहता है जो वो सबसे कम सुनना चाहती थी।
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अपने पहले दिन इशिता वर्धान के टावर को अंदर से नापती है, नकुल वर्धान की इंटर्नों के लिए खुली नफ़रत झेलती है, और जुगनू नाम का चाय-और-चाबियों वाला फ़ैसिलिटीज़ आदमी अनजाने में उसे सीलबंद तहख़ाने तक का नक़्शा थमा देता है, फिर एक फ़ेल होते इन्वेस्टर डेमो को वो फ़र्श से चुपचाप ठीक कर के पूरे हॉल की नज़रों में आ जाती है। उसकी इसी चमक से जलता नकुल उसकी फ़ाइल खोलता है, उसके अतीत में छिपाया गया दो साल का सूराख़ पकड़ लेता है, और उस पर लाल पेन से एक गोला खींच देता है।
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इशिता की चमक ही उसका सबसे बड़ा ख़तरा बन जाती है: वो जितना ज़्यादा चमकती है, असली फ़ाइलों के उतना क़रीब पहुँचती है और उतनी ही नज़रों में आती है। जुगनू की चाय-ख़बर उसे लीगल माले के ख़ाली होने का वक़्त और नकुल के लाल घेरे की भनक थमा देती है, फिर आदित्य वर्धान उसके सामने एक नामुमकिन पहेली रखता है, जिसे वो एक आविष्कारक की बेटी की तरह मिनटों में सुलझा देती है, और 'मेरे पापा' कहते-कहते बाल-बाल बचती है। दोनों के बीच गर्माहट और सावधानी की एक चिंगारी उठती है। आख़िर में आदित्य एक फ़ैसला कर लेता है: उसे इंटर्न बे से निकाल कर उस टीम में डालना, जिसे बनाने की उसे कंपनी में इजाज़त ही नहीं है।
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इशिता उस दरवाज़े में दाख़िल होती है जिसका किसी नक़्शे पर नाम नहीं, आदित्य की ख़ुफ़िया लैब, जहाँ रीमा और एक छोटी सी बाग़ी टीम बोर्ड की नज़रों से छुप कर भविष्य गढ़ रही है। ये वही पहुँच है जिसकी उसे तलाश थी, और वही जाल जिससे वो डरती थी। आदित्य भरोसे की निशानी के तौर पर उसे ऊपर की मंज़िलों का बैज थमा देता है, जिसे वो एक जासूस की चाबी की तरह लेती है, और सीलबंद तहख़ाना बस दो क़दम दूर खड़ा है। रात को अपने पिता को अंदर पहुँचने की ख़बर देते हुए वो ख़ुद को दोनों तरफ़ झूठ बोलते पाती है, और फिर प्रोजेक्ट फ़ाइलें खोलती है। आख़िर में सच फट पड़ता है: आदित्य का सबसे प्यारा सपना ठीक उसी चुराए हुए आविष्कार पर ख
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आदित्य की ख़ुफ़िया लैब में, अपने पिता के चुराए आविष्कार के दिल पर उसी के साथ काम करते हुए, इशिता देखती है कि आदित्य वो दैत्य नहीं जिसकी कहानी वो सुनती आई थी, और हर घंटे उसका झूठ भारी होता जाता है, जबकि एक बार 'मेरे पापा' कहते-कहते वो फिर बाल-बाल बचती है। रात के गुप्त फ़ोन पर पापा उसे उसी अदालती डाके की कहानी दोहराते हैं और रतन चाचा उसे और तेज़ चलने, सिर्फ़ वही एक फ़ाइल छूने और किसी भी वर्धान के क़रीब न जाने की चेतावनी देते हैं, एक ऐसी हिदायत जिसका अजीब सुर उसे हौले से खटकता है। अगली शाम जुगनू की अनजान मदद और बैज के सहारे वो लीगल माले के एक रिकॉर्ड्स टर्मिनल से दस साल पुरानी अधिग्रहण फ़ाइल का ए
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अपनी टूटती दुनिया को थामने के लिए इशिता ख़ुद को यक़ीन दिलाती है कि वो विक्रय-पत्र वर्धान का गढ़ा हुआ नक़ली सौदा है, चोरी को क़ानूनी दिखाने की एक चाल, और असली दस्तख़त तक पहुँचने के लिए उसे तहख़ाने में उतरना है। उधर स्कंकवर्क्स का एक डिज़ाइन बाहर लीक हो जाता है, नकुल एक औपचारिक जाँच बैठा देता है और मोल-हंट सीधे इशिता की तरफ़ मुड़ने लगता है, जबकि वो भाँप लेती है कि ये लीक दरअसल आदित्य को फँसाने की साज़िश है। जुगनू अनजाने में बता देता है कि हर बैज की एंट्री का हिसाब निकल रहा है, और आख़िरी खिड़की समझकर इशिता उसी रात फिर लीगल माले पर उतरती है, जहाँ नकुल के गश्त में लगभग पकड़ी जाती है और आदित्य बिना
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नकुल इशिता को बुलाकर बैज-लॉग का जाल उसके सामने रख देता है, पर वो एक ऐसे ठंडे, तराशे हुए झूठ से निकल जाती है जो ख़ुद उसे डरा देता है, कि वो धीरे-धीरे सच में एक जासूस बनती जा रही है। शाम को ख़ाली लैब में आदित्य पहली बार अपना दिल खोलता है, अपने खोए भाई रोहन और उस बोझ की बात जो एक कम आँके गए बेटे पर आ गिरा, और दो सच्चे लोगों के बीच की दीवार दरकती है, जबकि इशिता 'मेरे पा...' कहते-कहते फिर बाल-बाल बचती है। रात को वो विक्रय वाला दस्तख़त उसे सोने नहीं देता, तो वो चुपके से अपने पापा से उस 'ख़रीद के काग़ज़' के बारे में पूछती है, और किशोर एक ऐसी बेचैनी से उसे जाली बताते हैं जो इशिता ने पहले कभी नहीं देखी
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पिछली रात के शक से बेचैन इशिता समझ जाती है कि पापा ने वो विक्रय-पत्र अदालत में ख़ुद देखा था, इसलिए वो बारीकियाँ जानते थे, पर जो मूल अधिग्रहण दस्तावेज़ उन्हें कभी नहीं दिखाया गया, वो अब भी सीलबंद तहख़ाने में बंद है, और उसे यही तय करना है। वर्धान के तीस साल के जलसे की भीड़ और आधी-ख़ाली इमारत का फ़ायदा उठाकर, जुगनू की चाबियों और अनजान मदद से, इशिता आख़िरकार सीलबंद फ़िज़िकल आर्काइव में उतरती है और वो मूल फ़ाइल पा लेती है जो उसके पापा को कभी देखने नहीं दी गई। पर जो दस्तख़त उसके पापा की तकनीक वर्धान को बेच गया, वो न पापा का है, न जाली, वो एक ऐसे सह-मालिक का असली, क़ानूनी दस्तख़त है जिसने पेटेंट पापा
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आठवीं रात के राज़ से टूटती इशिता पहली बार अपने ही घर से झूठ बोलती है, आधे फटे 'सिन्हा' नाम को पापा और चाचा रतन से छुपाकर, और ठान लेती है कि उस नाम का पहला हिस्सा वो ख़ुद ढूँढेगी। उधर लीगल माला सील हो जाता है, आदित्य की मँगेतर समझी जाने वाली देविका मलिक आकर भाँप लेती है कि आदित्य इस इंटर्न को किस नज़र से देखता है, और नकुल चीख़ने की जगह मीठा होकर उसे अपनी जाँच में शामिल कर लेता है, यानी इशिता तीन तरफ़ से घिर जाती है। रात को अपने ख़ानदान का अतीत टटोलते हुए वो चाचा तक पहुँचकर, प्यार में, उन्हें बरी कर देती है, और तभी उसे असली जाल दिखता है: आदित्य ने भरोसे में जो सबसे गहरा भेद सिर्फ़ उसे सौंपा था,
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नकुल के हनीपॉट का सामना करने पर इशिता जाल से भागने के बजाय उसे पलट देती है: एक आविष्कारक की बेटी की नज़र से वो पकड़ लेती है कि आदित्य को सौंपा गया 'सबसे गहरा राज़' असल में एक नक़ली चारा है जो असली प्रोजेक्ट में कभी था ही नहीं, और जुगनू की चाय-ख़बर उसे उसका सिरा नकुल की अपनी कमेटी तक पहुँचा देती है। निवेशक-जलसे में जब नकुल इशिता को लीक का ज़िम्मेदार ठहराने खड़ा होता है, तो वो उसी की जाँच में शामिल एक ईमानदार जासूस बनकर सबके सामने साबित कर देती है कि वो राज़ कभी था ही नहीं, और शिकारी ख़ुद अपने गढ़े हुए झूठ पर नंगा खड़ा रह जाता है, जिससे आदित्य और पूरी टीम का भरोसा उसके साथ आ खड़ा होता है। इसी बी
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जलसे में रतन सिन्हा वर्धानों के बीच पूरी सहजता से घुल जाते हैं, और इशिता उनकी और खुराना की आँखों में एक ऐसी नज़र पकड़ लेती है जो अजनबी कभी नहीं बदलते। अकेले में चाचा उसे प्यार से हिदायत देते हैं कि परिवार के नाम वाला कोई भी पुराना काग़ज़ मिले तो उसे मिटा दे, 'पापा की हिफ़ाज़त के लिए', और इशिता को एहसास होता है कि उसका मिशन सबूत ढूँढना नहीं, उसे दफ़नाना था।
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इशिता चाचा की बात मानने का नाटक करते हुए, असल में वही सबूत बचाने में जुट जाती है जिसे रतन मिटाना चाहते हैं, और अब वो अपने ही ख़ेमे के ख़िलाफ़ एक दोहरी जासूस बन जाती है। आदित्य के साथ उसकी नज़दीकी और गहरी होती है, दो सच्चे लोगों के बीच वो झूठ अब चुभन नहीं, अज़ाब बन जाता है, जबकि खुराना पुरानी फ़ाइलों में हलचल भाँपकर चुपचाप अपनी अलग तलाश शुरू कर देता है। हर सीन में वो दो हिस्सों में बँटी रहती है। रात को इशिता किसी पर भरोसा न करने का फ़ैसला ले लेती है और पूरी फ़ाइल एक ऐसी ड्राइव पर उतार लेती है जिस पर सिर्फ़ उसका क़ाबू है, और जैसे ही आख़िरी फ़ाइल उतरती है, खुराना के फ़ोन पर एक ऐसा आर्काइव अलार्म
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आदित्य की ख़ुफ़िया लैब का डेमो पूरे बोर्ड के सामने कामयाब हो जाता है और जीत की गरमाहट में इशिता और आदित्य पहली बार चूमते हैं। पर उसी रात अपना सबूत जोड़ते हुए इशिता उस आधे फटे नाम को पहचान लेती है, वो हस्ताक्षर उसके अपने चाचा रतन सिन्हा का है, और ठीक तभी फ़ोन पर वही नाम पुकारता हुआ चमक उठता है।
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फ़ोन पर चाचा रतन की गर्मजोशी सुनते हुए इशिता को पहली बार उनकी आवाज़ में एक झूठ की तह दिखती है, और एक HR फ़ॉर्म की आड़ में वो उन्हें पुराने लोन के बारे में परखती है। पापा से बात करते हुए मिले एक अकाउंटेंट के नाम का पीछा करते हुए वो एक शेल कंपनी तक पहुँचती है, जिसकी आख़िरी परत के नीचे ख़ुराना का दस्तख़त छिपा निकलता है।
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मनी-ट्रेल काफ़ी नहीं मानकर इशिता ख़ुराना के अपने केबिन में एक पुरानी डायरी से 'आर.एस.' के दोहराते इशारे तक पहुँचती है, पर ठीक उसी पल ख़ुराना ख़ुद वापस आ जाते हैं और उसे अपने केबिन से निकलते देख लेते हैं। इसी बीच देविका की मदद से मिले बैज-लॉग पैटर्न के साथ नकुल ख़ुराना तक पहुँचता है, और दोनों सूत्र एक साथ जुड़ जाते हैं। ख़ुराना जाँच अपने हाथ में लेते हैं और हर इंटर्न का पूरा एक्सेस लॉग माँगते हैं, इशिता की फ़ाइल सबसे ऊपर रखने और ख़ुद उससे मिलने की धमकी के साथ।
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ख़ुराना नकुल के ज़रिए मिले बैज-लॉग के साथ इशिता को अपने केबिन में बुलाकर आमने-सामने परखते हैं, जबकि आदित्य उसकी घबराहट भाँप कर बिना जाने मदद की पेशकश कर देता है। ख़ुराना के एक पल के लिए ग़ैरहाज़िर होते ही इशिता उनके खुले लैपटॉप पर एक ईमेल में चाचा रतन को अब भी जाती मासिक क़िस्त और एक नए कोडनाम 'प्रोजेक्ट फ़ीनिक्स' का सुराग़ पा लेती है। रात को तस्वीर डिकोड करते हुए उसे एहसास होता है कि दस साल पुरानी चोरी कभी रुकी ही नहीं, और 'फ़ीनिक्स' कोई और नहीं, ख़ुद आदित्य का स्कंकवर्क्स है, जो अगले महीने बिकने के लिए तैयार खड़ा है।
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इशिता को एहसास होता है कि जिन आदमियों ने उसके पापा को बर्बाद किया, वही अब आदित्य का फ़ीनिक्स चुराने वाले हैं, इसलिए उसे बचाना अब पापा का बदला लेना बन जाता है, और वो ख़ुद को ज़ाहिर किए बिना एक गुमनाम पैग़ाम से आदित्य को चेताती है और डिलीवरी को चुपचाप रोक देती है। पर जब वो 'अंदरूनी साझेदार' का चेहरा ढूँढती है, तो सच सामने आता है, कि आदित्य को उसके अपने ख़ून, चचेरे भाई नकुल ने बेचा है, जो ऊँची कुर्सी के लिए बोर्ड के सामने फ़ीनिक्स बंद कराने और आदित्य को बदनाम करने उतर आता है।
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बोर्ड नकुल की चाल पर फ़ौरन फ़ैसला नहीं लेता, बल्कि दो हफ़्तों की समीक्षा थोप देता है, और आदित्य, ये मानकर कि लीक उसकी टीम से नहीं बल्कि ऊपर से है, इशिता को अपनी जवाबी लड़ाई का सबसे भरोसेमंद हाथ बना लेता है, वही जासूस जिसे वो बेनक़ाब करना चाहिए था। इशिता उसे एक हाथ से बचाती है और दूसरे से अपना राज़ छिपाती है, जबकि रतन चाचा घर पर किशोर को डरा कर उसे वापस बुलवाने की चाल चलते हैं, और आधी रात एक डरे हुए पापा का फ़ोन उसे आदित्य और अपने घर के बीच एक नामुमकिन फ़ैसले पर ला खड़ा करता है।
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डरे हुए पापा के बुलावे पर घर पहुँची इशिता चाचा रतन को वहीं पाती है, और अकेले में पापा को सच बताती है कि असली चोर उनका अपना भाई है, जिससे किशोर दूसरी बार टूटते हैं पर आज़ाद भी हो जाते हैं। गुत्थी सुलझने पर वो इशिता को मूल सह-मालिकाना दस्तावेज़ सौंप देते हैं, और इशिता जासूस से गवाह बनने का फ़ैसला कर लेती है, यानी आदित्य को सब सच बताने का।
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इशिता रात भर के फ़ैसले के बाद सुबह ख़ुद अपनी शर्तों पर आदित्य को सच बताने निकलती है, पर उससे पहले ही ख़ुराना और नकुल पूरी टीम के सामने बैज-लॉग, रेज़्युमे का पुराना ख़ाली अंतराल और जलसे की रात का अलार्म जोड़कर उसे एक जासूस साबित कर देते हैं, हर तथ्य सच होते हुए भी। आदित्य कमरे भर के सामने उससे सीधा सवाल करता है और चुप्पी ही उसका जवाब बन जाती है।
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आदित्य इशिता को टीम और लैब से बेदख़ल कर देता है, नकुल उसी दोपहर स्कंकवर्क्स को बंद कराने और आदित्य को बदनाम करने की चाल चला देता है, और देविका उसकी जगह चुपचाप भर लेती है। भाग जाने के पापा के अनुरोध को ठुकरा कर इशिता तय करती है कि अगर आदित्य उसकी बात नहीं सुनेगा, तो वो अपना सबूत सीधे चेयरमैन कैलाश वर्धान के पास ले जाएगी, और रात के उस पहर उनके फ़ार्महाउस के दरवाज़े पर दस्तक देती है।
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कैलाश वर्धान के फ़ार्महाउस में इशिता सबूत सामने रखकर उन्हें उनकी दस साल की ख़ामोशी का आईना दिखाती है, और कैलाश आख़िरकार मान लेते हैं कि वो हमेशा से जानते थे। एक परखने वाली फ़ोन-कॉल पर ख़ुराना की एक फिसलन से पता चलता है कि आख़िरी सबूत आज रात ही जलाया जाना है।
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पंद्रह मिनट की मोहलत में इशिता, जुगनू, और एक हिचकिचाता फिर पूरी तरह साथ देता आदित्य आख़िरी हार्ड कॉपी को मशीन से बचा लेते हैं, और आदित्य को आख़िरकार पूरा सच पता चलता है, कि उसकी खुदाई हमेशा खुराना-रतन के ख़िलाफ़ थी, उसके ख़िलाफ़ कभी नहीं। पर जीत की उसी घड़ी में खुराना-नकुल इशिता और किशोर पर आपराधिक शिकायत दर्ज करा देते हैं, और नीचे लॉबी में चाचा रतन ख़ुद आ पहुँचते हैं।
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चाचा रतन इशिता के सामने अपना असली चेहरा उतार फेंकते हैं, कि उन्होंने ही खुराना को पेटेंट बेचे और उसे एक ऐसी जासूस की तरह भेजा जो कभी गहराई तक न पहुँचे, फिर पैसों से और अपने पिता के कमज़ोर दिल के डर से उसकी चुप्पी ख़रीदने की कोशिश करते हैं। इशिता चाचा के प्यार पर पापा का सच चुनती है, और आदित्य, ये सब देखकर, उसे पूरी तरह अपना लेता है। हार मानने की बजाय रतन आख़िरी और सबसे ख़तरनाक चाल चलते हैं: जाली काग़ज़ों से इशिता और किशोर दोनों को जासूसी और साज़िश में फँसाकर जेल भिजवाने की धमकी।
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बोर्डरूम में नकुल और खुराना इशिता को जासूस साबित कर फ़ीनिक्स बंद कराने की चाल चलते हैं, पर इशिता आरोपी से मुद्दई बन जाती है और आदित्य के साथ मिलकर सह-मालिकाना काग़ज़, सर्वोदय ट्रेडिंग का पैसा, खुराना के दस साल के चोरी के धंधे और नकुल की मौजूदा गद्दारी, सब मेज़ पर रख देती है। कैलाश वर्धान आख़िरकार कंपनी की इज़्ज़त पर सच को चुनकर खुराना को निलंबित और इशिता की शिकायत वापस करा देते हैं। पर बर्बाद और बेबस खुराना सर्वर फ़्लोर पर आख़िरी, ख़तरनाक चाल चलता है, अलार्म चीख़ उठते हैं, रौशनी बुझ जाती है, और कोई नहीं जानता अँधेरे में कौन खड़ा है और कौन गिरा।
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सर्वर फ़्लोर के घुप अँधेरे में आदित्य इशिता को धक्का देकर बचा लेता है और खुराना ख़ुद गिरे रैक के नीचे दबकर पकड़ा जाता है, फिर क़ानून का पहिया घूमता है, खुराना गिरफ़्तार, नकुल बाहर, और चाचा रतन का जुर्म सुर्ख़ियों में खुल जाता है। इशिता बदले की जगह इंसाफ़ चुनकर पछताते कैलाश को नहीं जलाती और अपने पापा किशोर का छीना हुआ नाम काग़ज़ों में वापस दर्ज करा लेती है। मिशन ख़त्म और पापा आज़ाद, तो छत पर आदित्य उससे एक ऐसा सवाल पूछ बैठता है जिसका इशिता के पास पहली बार कोई तराशा हुआ जवाब नहीं, रुक जाओ, मेरे साथ, अपने नाम से।