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Chapter 18 of 26 8 min read

घर की चिट्ठी

अंदर की बात by Avni Oberoi

बोर्डरूम में तालियाँ नहीं बजीं, पर हवा उतनी ही भारी थी जितनी किसी फ़ैसले के बाद होती है। नकुल की बात हवा में लटकी रह गई, फ़ीनिक्स बंद हो, जाँच ख़ुद आदित्य से शुरू हो, और कोई उसे वापस लेने वाला नहीं था। ... कैलाश वर्धान उस दिन शहर से बाहर थे, और उनकी ग़ैरहाज़िरी में बोर्ड ने बीच का रास्ता चुना, फ़ीनिक्स बंद नहीं, पर दो हफ़्ते की औपचारिक समीक्षा, हर फ़ाइल, हर बजट, हर बैज-एंट्री आदित्य के नाम पर खुलेगी।

"दो हफ़्ते।" ... "दो हफ़्तों में मुझे साबित करना है कि मेरी टीम में कोई गद्दार नहीं, वरना फ़ीनिक्स की जगह मेरा नाम मिटेगा।"

बोर्ड मेम्बर एक-एक कर बाहर निकलने लगे, कोई आदित्य की तरफ़ नज़र भर देख नहीं पाया, जैसे हार पहले से तय हो। ... नकुल दरवाज़े पर रुका, आदित्य की तरफ़ मुस्कुराया, एक भाई की मुस्कान, इतनी साफ़ कि उसके नीचे का ज़हर सिर्फ़ इशिता को दिखा।

"इशिता... एक मिनट मिलेगा?" ... "मुझे तुम्हारी ज़रूरत है। असली वाली।"

"सर, इशिता, सुना मैंने... दो हफ़्ते? ऊपर वाले तो चाय पर भी दो हफ़्ते नहीं देते!" ... "पर एक बात कहूँ? जो आदमी दरवाज़े पर मुस्कुरा कर निकलता है, वो अंदर से जीत का जश्न मना रहा होता है। मुस्कान पर मत जाइए, उसके पीछे देखिए।"

"तुम्हारी नज़र से तो, जुगनू भैया, अच्छे-अच्छे जासूस शरमा जाएँ।" ... "जाओ, अपनी चाय बचाओ। आज हमें लंबी रात चाहिए होगी।"

रात गहराते ही स्कंकवर्क्स लैब ख़ाली हो गई, बस दो कुर्सियाँ, एक स्क्रीन, और वो चुप्पी जो किसी बड़े फ़ैसले से पहले उतरती है। ... आदित्य ने दरवाज़ा बंद किया, और जब वो मुड़ा, तो उसके चेहरे पर वो हिम्मत नहीं थी जो बोर्ड के सामने थी, सिर्फ़ एक थका हुआ आदमी बचा था।

"मैं बोर्ड के सामने मज़बूत खड़ा रहा, इशिता, पर सच कहूँ तो अंदर से हिल गया हूँ।" ... "अगर लीक मेरी टीम से नहीं है... तो कहाँ से है? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।"

"आदित्य, सोचो... वो लीक हुई फ़ाइल, तुम्हारी टीम के किसी जूनियर इंजीनियर के पास कैसे पहुँच सकती थी? उसमें बोर्ड-लेवल नंबर थे।" ... "ये किसी नीचे वाले का काम नहीं, आदित्य। ये किसी ऐसे का काम है जो पहले से ऊपर बैठा है।"

"ऊपर से..." ... "अगर तुम सही हो, तो जिसने मुझे बेचा है, वो मेरे साथ उसी मेज़ पर बैठा था, हर मीटिंग में, हर जश्न में। ये किसी अजनबी का काम नहीं है।"

आदित्य उसकी तरफ़ मुड़ा, और उसकी आँखों में वो भरोसा था जो इशिता ने पहले कभी इतना खुला नहीं देखा। ... "मुझे नहीं पता ये कौन है, इशिता। पर मुझे पता है मैं किस पर भरोसा कर सकता हूँ," उसने कहा, और वो वहीं रुक गई, जैसे साँस भूल गई हो।

"आज से तुम सिर्फ़ मेरी टीम का हिस्सा नहीं, तुम मेरा दायाँ हाथ हो। जो भी सबूत निकले, हर फ़ाइल, हर नाम, पहले तुम्हारे पास आएगा, फिर बोर्ड के पास।" ... "मैं अपनी पूरी लड़ाई तुम्हारे हाथ में सौंप रहा हूँ, इशिता।"

इशिता एक पल के लिए साँस लेना भूल गई। जिस लड़ाई से बचने के लिए उसने अब तक झूठ बोला था, आदित्य ने वही लड़ाई उसकी गोद में रख दी थी। ... और अब जीतने का मतलब था नकुल को बेनक़ाब करना, अपने ही राज़ को बचाते हुए, दो आक़ाओं की एक ही जंग।

"आदित्य, अगर हम इसे सुलझाना चाहते हैं, तो हमें उन लोगों को देखना होगा जो हफ़्ते में दो बार... जो बोर्ड के पास... जो..." ... "...जो हर मीटिंग में बैठते हैं, हर फ़ैसले के पीछे। हमें ऊपर से नीचे देखना होगा, नीचे से ऊपर नहीं।"

"तुम हर बार वो देख लेती हो जो मुझे दिखता ही नहीं।" ... "पता नहीं मैं तुम्हारे बिना ये लड़ाई कैसे लड़ता, इशिता।"

उसका हाथ हल्के से उसके हाथ पर आ टिका, कोई जल्दी नहीं, कोई इरादा नहीं, बस दो थके हुए लोग जो एक-दूसरे के सिवा किसी पर भरोसा नहीं कर सकते। ... इशिता ने हाथ नहीं हटाया। उसे हटाने की हिम्मत नहीं बची थी।

अगली सुबह आदित्य ने बोर्ड को एक औपचारिक निवेदन भेजा, प्राइवेट लिफ़्ट के बैज-लॉग और पिछले तीन महीनों की बाहरी मुलाक़ातों की सूची, अपनी ही जाँच के सबूत के तौर पर। ... उसे नहीं पता था कि ये वही रास्ता है जिस पर इशिता की उँगली एक हफ़्ते से घूम रही थी।

"अगर कोई हफ़्ते में दो बार बाहर वालों से मिल रहा है, वो लॉग में होगा। मैंने रिक्वेस्ट भेज दी है।" ... "दो दिन में जवाब आ जाएगा। फिर हमें नाम मिल जाएगा।"

इशिता को पता था वो नाम क्या निकलेगा। पर दो दिन का इंतज़ार उसे दो दिन का वक़्त भी देता था, ये सोचने का कि जब नाम सामने आएगा, तब उसका अपना राज़ कितनी देर बचेगा। ... दो घड़ियाँ अब एक साथ चल रही थीं, एक नकुल के नाम की, दूसरी उसके अपने नक़ाब की, और दोनों की सुइयाँ एक ही तरफ़ बढ़ रही थीं।

"तुम हार नहीं मानोगे, आदित्य। मैंने बहुत कम लोगों को इतनी हिम्मत से लड़ते देखा है, मेरे पा..." ... "...मेरे पास जो भरोसा तुम्हारे लिए है, वो झूठा नहीं है। बाक़ी सब झूठा हो सकता है, ये नहीं।"

"साहब, मैडम, रात के दो बज गए, ये लो चाय, वरना कल थके हुए जासूस बनोगे।" ... "पूरी बिल्डिंग में बस तुम दोनों की बत्ती जल रही है। जीतोगे तो साथ जीतो, हारोगे तो भी।"

रात गहरी हो गई, कमरे की बत्तियाँ धीमी, और दोनों के बीच जो भरोसा बना, वो उतना ही सच था जितना उसके नीचे दबा झूठ। ... दो हफ़्ते की घड़ी अब उनके साथ चल रही थी, और उन्हें नहीं पता था कि वो एक जंग नहीं, दो अलग जंगें लड़ रहे थे।

उसी रात, शहर के दूसरे कोने में, सिन्हा के पुराने घर की बत्ती जल रही थी, और रतन चाचा किशोर के सामने बैठे थे, वही मुस्कान, पर आवाज़ में एक नई ठंडक। ... बाहर से देखने पर वो एक भाई अपने भाई से मिलने आया लगता था, अंदर से वो एक निगरानी थी, ख़ुद अपने ख़ून पर।

"किशोर भाई, मैं ये बात हल्के में नहीं कह रहा। इशिता उस कंपनी में कुछ ऐसे पानी में उतर रही है, जो उसे डुबो देगा।" ... "मुझे लोगों से ख़बर मिली है, वो वहाँ किसी ऐसी चीज़ के बहुत क़रीब जा रही है, जो तुम्हें, हम सबको, तबाह कर देगी।"

"तबाह... रतन, साफ़-साफ़ बता, हुआ क्या है? इशिता को कोई ख़तरा है?" ... "तूने कभी मुझसे ऐसे बात नहीं की। कुछ तो है जो तू छुपा रहा है।"

"कुछ छुपा नहीं रहा, भाई, बस डर रहा हूँ। तुझे उसे वापस बुलाना होगा, आज, अभी। इस से पहले कि बहुत देर हो जाए।" ... "वर्धानों के घर में उसका रुकना अब सिर्फ़ ख़तरा है, तेरा और उसका, दोनों का।"

किशोर का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। दस साल पहले जिस लफ़्ज़ ने उसकी दुनिया तोड़ी थी, वो लफ़्ज़ रतन ने आज फिर दोहरा दिया, तबाह। ... उसे नहीं पता था कि जिस आदमी से वो डर रहा था, वो ख़ुद उसके सामने बैठा था, मीठी आवाज़ में, अपनी ही चाल चलते हुए।

"मैं अभी उसे फ़ोन करता हूँ। आज ही घर बुलाता हूँ, रतन। तेरी बात सही होगी, तूने कभी झूठ नहीं बोला मुझसे।" ... "तू ही तो है जिसने हमें दस साल पहले टूटने से बचाया था। तेरी बात मानूँगा।"

लैब में, फ़ाइलों के बीच, इशिता के फ़ोन की स्क्रीन जगमगा उठी, पापा। ... आदित्य के सामने बैठी, उसके भरोसे का पूरा बोझ अपने कंधों पर लिए, इशिता ने फ़ोन देखा, और जान गई कि इस वक़्त का फ़ोन कभी अच्छी ख़बर नहीं लाता।

"सब ठीक है? इतनी रात को..." ... "अगर घर से कुछ है, जाओ, ये फ़ाइलें कहीं नहीं भाग रहीं।"

"पापा हैं। शायद बस हाल-चाल।" ... "एक मिनट में आती हूँ।"

"बेटा, अभी घर आ जाओ। आज ही, अभी। मुझे... मुझे तुमसे कुछ कहना है, फ़ोन पर नहीं।" ... "प्लीज़ इशिता, बहस मत करना। बस आ जाओ।"

इशिता ने फ़ोन काटा और आदित्य की तरफ़ देखा, जो अब भी फ़ाइलों में डूबा उसकी मदद पर भरोसा किए बैठा था। ... अगर वो अभी उठ कर चली गई, तो आदित्य को इसी अधूरी जंग के बीच अकेला छोड़ देगी, भेड़ियों के सामने।

और अगर उसने मना किया, अगर उसने अपने ही डरे हुए पापा को ना कहा, तो शायद पहली बार वो पूछ बैठें, जो उन्होंने कभी नहीं पूछा, आख़िर उसे रुकना किसके लिए इतना ज़रूरी है। ... घर की चिट्ठी आ चुकी थी, और इशिता को नहीं पता था कि उसका जवाब किसे बचाएगा, और किसे डुबो देगा।

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