Chapter 4 of 26 12 min read
ख़ुफ़िया लैब
इशिता उस दरवाज़े में दाख़िल होती है जिसका किसी नक़्शे पर नाम नहीं, आदित्य की ख़ुफ़िया लैब, जहाँ रीमा और एक छोटी सी बाग़ी टीम बोर्ड की नज़रों से छुप कर भविष्य गढ़ रही है। ये वही पहुँच है जिसकी उसे तलाश थी, और वही जाल जिससे वो डरती थी। आदित्य भरोसे की निशानी के तौर पर उसे ऊपर की मंज़िलों का बैज थमा देता है, जिसे वो एक जासूस की चाबी की तरह लेती है, और सीलबंद तहख़ाना बस दो क़दम दूर खड़ा है। रात को अपने पिता को अंदर पहुँचने की ख़बर देते हुए वो ख़ुद को दोनों तरफ़ झूठ बोलते पाती है, और फिर प्रोजेक्ट फ़ाइलें खोलती है। आख़िर में सच फट पड़ता है: आदित्य का सबसे प्यारा सपना ठीक उसी चुराए हुए आविष्कार पर ख
अगली सुबह इशिता उस दरवाज़े की तरफ़ नहीं गई, जहाँ अब तक जाती आई थी। ... इंटर्न बे पीछे छूट गया, लिफ़्ट ऊपर की मंज़िलों की तरफ़ चढ़ती चली गई, और हर मंज़िल के साथ हवा थोड़ी और भारी, थोड़ी और महँगी होती गई।
आदित्य ने जो पता दिया था, वो किसी नक़्शे पर नहीं था। एक लंबा गलियारा, एक बिना नाम की प्लेट वाला दरवाज़ा, जिसके आगे इमारत का वो हिस्सा शुरू होता था जिसे कंपनी ने जान-बूझ कर भुला रखा था। ... और एक जासूस के लिए, जिस दरवाज़े पर कोई नाम न लिखा हो, उससे क़ीमती चीज़ शायद ही कोई होती है।
उसने बैज छुआया, ताला हौले से क्लिक हुआ, और दरवाज़ा खुला। ... अंदर वो चमचमाता, ठंडा दफ़्तर नहीं था जिसकी उसे उम्मीद थी। ये कुछ और ही था।
एक छोटा सा, बिखरा हुआ कमरा। मेज़ों पर आधे खुले पुर्ज़े, दीवारों पर टेढ़े-मेढ़े स्केच, कहीं सोल्डर की गंध, कहीं ठंडी चाय के कप। ... ऊपर की मंज़िलों की वो बेजान चमक यहाँ नहीं थी। यहाँ कुछ ज़िंदा था, कुछ साँस लेता हुआ।
"आ गईं। ... स्वागत है। देख लो अच्छी तरह, क्योंकि कंपनी के किसी काग़ज़ में ये कमरा है ही नहीं। ... बोर्ड की फ़ाइलों में यहाँ बस एक ख़ाली स्टोर रूम है। और मुझे यही सबसे ज़्यादा पसंद है।"
"अच्छा, तो यही है वो लड़की जिसने कल सर के तीन हफ़्ते पुराने भूत को तीन मिनट में भगा दिया! ... मैं रीमा। इस पागलख़ाने की अकेली इंजीनियर जो अभी तक भागी नहीं है। ... सुन ले, यहाँ तनख़्वाह कम है, चाय चोरी की है, और बॉस पूरा पागल है। पर मज़ा आएगा। स्वागत है।"
"शुक्रिया, दीदी। ... और वो कल वाली बात... वो बस तुक्का था। मुझे सच में कुछ ख़ास नहीं आता।"
"हाँ हाँ, तुक्का। ... यहाँ हम सब तुक्के ही तो मारते हैं। बस हमारे तुक्के बोर्ड वालों की करोड़ों की टीम से बेहतर बैठते हैं, इसीलिए हमें सबकी नज़रों से छुपा रखा है।"
इशिता हँसती रही, सिर झुकाए, शर्मीली इंटर्न बनी रही। ... पर अंदर उसकी आँखें कमरे को नाप रही थीं। कितने टर्मिनल। कौन सा नेटवर्क। कौन सा दरवाज़ा किधर खुलता है। ... ये वो जगह थी जिसका उसने दस साल सपना देखा था। असली पहुँच। ऊपर की मंज़िलों की चाबी।
पर उसी कमरे में एक और सच भी खड़ा था। ... यहाँ बैठे ये लोग, ये हँसती हुई रीमा, ये आदमी जो उसे 'आ गईं' कह कर मुस्कुराया था, ये सब उसी वर्धान के लोग थे जिसने उसके पिता को मिट्टी में मिला दिया था। ... उसने ख़ुद को याद दिलाया। ये दोस्त नहीं हैं, इशिता। ये सिर्फ़ रास्ते हैं।
"तुम्हें पता है ये टीम मैंने क्यों बनाई? ... क्योंकि ऊपर बैठे लोग कहते हैं कि आदित्य वर्धान सपने देखने के अलावा कुछ नहीं कर सकता। ... तो मैं यहाँ, इसी भुला दिए गए कमरे में, वो भविष्य गढ़ रहा हूँ जिसे गढ़ने से उन्होंने मुझे रोका था।"
"पर एक बात कान में रख लो। ... अगर बोर्ड को, या खुराना सर को इसकी भनक भी लग गई ना, तो ये कमरा एक ही रात में बंद हो जाएगा। ... इसलिए यहाँ की हर चीज़ इसी कमरे में रहती है। बाहर, ये जगह है ही नहीं।"
खुराना। ... वही नाम जो जुगनू की चाय के साथ उसके कानों तक पहुँचा था। वही आदमी, जिसके लीगल माले पर वो सीलबंद तहख़ाना था, वो सबूत जिसके लिए वो यहाँ आई थी। ... और अब उसे पता चल गया कि आदित्य का ये सपना और उसका दफ़नाया हुआ सच, दोनों एक ही छत के नीचे साँस ले रहे थे।
फिर आदित्य ने अपनी जेब से एक चीज़ निकाली। एक छोटा सा, नीला सिक्योरिटी बैज, जिस पर एक चाँदी की पट्टी चमक रही थी। ... और उसे इशिता की तरफ़ बढ़ा दिया।
"ये तुम्हारा है। ... इससे ऊपर की वो मंज़िलें खुलती हैं, जहाँ आम इंटर्न तो छोड़ो, कई सीनियर भी नहीं जा सकते। ... मेरी टीम में हर किसी को ये नहीं मिलता, इशिता। तुम्हें दे रहा हूँ, क्योंकि मुझे तुम पर भरोसा है।"
इशिता ने वो बैज हाथ में लिया, और वो ठंडी धातु उसकी हथेली में किसी अंगारे की तरह दहक उठी। ... उसके लिए ये भरोसे की निशानी थी। और उसके लिए, ये एक जासूस की चाबी थी। ... सबसे बुरी बात ये थी कि दोनों बातें एक साथ सच थीं।
"सर... इतना भरोसा, इतनी जल्दी? ... आप मुझे जानते ही कितना हैं? मैं तो कल तक बस एक इंटर्न थी।"
"मैं लोगों को उनके काम से जानता हूँ, नाम से नहीं। ... और कल तुमने जो देखा, वो इस पूरी इमारत में कोई नहीं देख पाया। ... जो इंसान वो देख लेता है जो बाक़ी सब चूक जाते हैं, उस पर भरोसा न करूँ, तो किस पर करूँ?"
और यही सबसे गहरा घाव था। ... उसका हर भरोसा इशिता के सीने में किसी चाकू की तरह उतरता जा रहा था। वो जितना उस पर यक़ीन करता, उसका झूठ उतना ही भारी होता जाता। ... उसने नज़रें झुका लीं, कहीं वो उसकी आँखों में सच न पढ़ ले।
"और एक बात। ... कल जो पहेली तुमने सुलझाई ना, वो कोई आम टेस्ट नहीं था। ... वो इसी लैब के दिल का एक टुकड़ा था। मेरे पूरे प्रोजेक्ट का सबसे ज़रूरी हिस्सा। तुमने मिनटों में वो खोल दिया, जिसके आगे मेरी टीम हफ़्तों से अटकी हुई थी।"
और इशिता की रीढ़ में फिर वही सिहरन दौड़ गई, जो कल फ़ाइल खोलते वक़्त उठी थी। ... वो अधूरा डिज़ाइन। वो जाना-पहचाना सा आकार। जैसे उसने उसे कहीं देखा हो, बहुत पहले, किसी और रोशनी में। ... उसने उस एहसास को फिर झटक दिया। अभी नहीं। अभी सोचने का वक़्त नहीं था।
"मैं इस काम को पूरे दिल से करूँगी, सर। ... जो इस लैब में दफ़न है, मैं उसे बाहर लाकर रहूँगी। आपसे वादा।"
आदित्य मुस्कुरा दिया, जैसे इससे प्यारी बात इस पूरे साल में उससे किसी ने न कही हो। ... उसने उसमें एक वफ़ादार साथी की लगन सुनी। ... उसे कहाँ पता था कि 'जो इस लैब में दफ़न है' के दो मतलब थे, और लड़की का इशारा उस दूसरे, गहरे मतलब की तरफ़ था।
"आख़िरी बात। ... अगर कभी नकुल के लोग, या कोई और, तुमसे पूछें कि तुम इस माले पर क्या कर रही थीं... तो तुम यहाँ कभी आई ही नहीं। ये बैज तुम्हारे पास है ही नहीं। ... इस कंपनी में सच बोलना, इशिता, कभी-कभी सबसे ख़तरनाक काम होता है।"
इशिता ने गंभीरता से सिर हिलाया, पर अंदर एक कड़वी हँसी उठी। ... सच छुपाना ख़तरनाक होता है। ये बात उसे आदित्य वर्धान से बेहतर भला कौन सिखाता। ... और उसी पल उसकी नज़र गलियारे के उस पार गई, उस भारी, सीलबंद दरवाज़े की तरफ़, जो यहाँ से बस दो क़दम दूर था। लीगल आर्काइव। तहख़ाना। ... उसकी हथेली में दबा वो बैज अचानक और गरम हो गया।
उस रात, अपने किराए के छोटे से कमरे में, इशिता ने वो दूसरा फ़ोन निकाला। ... वो जिसे सिर्फ़ एक नंबर आता था। और जैसे ही घंटी बजी, उसके चेहरे से इंटर्न का वो मीठा मुखौटा उतर गया। पीछे एक और लड़की थी। ठंडी। थकी हुई। एक बेटी।
"इशिता? बेटा? ... बता, अंदर पहुँची? उन्होंने तुझे अंदर के माले पर लिया? ... दस साल, बेटा। दस साल से मैं बस इसी एक ख़बर का इंतज़ार कर रहा हूँ।"
"हाँ, पापा। ... मैं अंदर हूँ। उसी टीम में, जिसके पास ऊपर की मंज़िलों की चाबी है। ... आज मेरे हाथ में एक बैज आया है। इससे वो दरवाज़े खुलते हैं, जिन तक आम लोग पहुँच भी नहीं सकते।"
"बैज! ... मेरी बच्ची। मैं जानता था। मैं जानता था तू कर के दिखाएगी। ... अब बस वो फ़ाइल, बेटा। वो पुराने काग़ज़, सौदे के वो दस्तावेज़ जो उन्होंने तहख़ाने में दफ़ना रखे हैं। वो निकाल ला। बस वो एक चीज़, और तेरे पापा का नाम वापस आ जाएगा।"
और अपने पिता के पीछे, फ़ोन पर कहीं, इशिता को वो दूसरी आवाज़ भी सुनाई दे रही थी। ... रतन चाचा की। वही चेतावनी, जो अब हर हिदायत के साथ चिपकी चली आती थी। 'बस वही एक फ़ाइल, इशिता। कोई और नाम मत छेड़ना।' ... ये बात उसे तब अजीब क्यों नहीं लगी थी, ये उसे बहुत बाद में समझ आना था।
"और सुन। ... वहाँ किसी पर भरोसा मत करना। किसी पर भी नहीं। वो लोग मुस्कुरा कर तुम्हारा हाथ थामते हैं, और फिर उसी हाथ से तुम्हें ज़मीन में गाड़ देते हैं। ... मैंने उन्हें अपना दोस्त समझा था, बेटा। और उन्होंने मेरी पूरी ज़िंदगी उठा ली।"
और इशिता के होंठों पर एक नाम आते-आते रुक गया। आदित्य। ... वो कहना चाहती थी, पापा, यहाँ एक आदमी है जो मुझ पर सच में भरोसा करता है। जो शायद वैसा नहीं, जैसा आप कहते हैं। ... पर उसने वो शब्द निगल लिए। कल उसने आदित्य से 'मेरे पापा' कहते-कहते ख़ुद को रोका था। और आज वो अपने असली पापा से 'आदित्य' कहते-कहते रुक गई। ... अब वो दोनों तरफ़ झूठ बोल रही थी।
"मुझे माफ़ कर दे, बेटा। ... मैंने तेरा बचपन तुझसे छीन लिया। तुझे खिलौनों की उमर में एक जंग थमा दी। ... पर मेरा नाम... वो नाम जो उन्होंने कीचड़ में घसीट दिया था... उसे सिर्फ़ तू वापस ला सकती है। मेरी बच्ची।"
इशिता ने आँखें मूँद लीं। ... 'मैं ला दूँगी, पापा,' उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो बारह साल की लड़की छिपी थी, जिसने कभी अदालत की सीढ़ियों पर ये वादा किया था। ... फ़ोन कट गया। कमरा फिर ख़ामोश हो गया। और मेज़ पर पड़ा वो नीला बैज, अँधेरे में भी हौले से चमक रहा था।
नींद कहीं दूर थी। तो इशिता ने लैपटॉप खोला, और वो प्रोजेक्ट फ़ाइलें खोलीं, जिन तक आदित्य ने आज उसे पहुँच दी थी। ... उसकी ख़ुफ़िया लैब का दिल। वो भविष्य, जिसे गढ़ने में आदित्य वर्धान ने अपनी सारी ज़िद, अपनी सारी उम्मीद झोंक दी थी।
डिज़ाइन शानदार था। बोल्ड, नया, हिम्मत से भरा हुआ। ... पर जैसे-जैसे इशिता की आँखें उन लकीरों पर उतरती गईं, कल वाली वो दबी हुई पहचान फिर सिर उठाने लगी। इस बार और तेज़। इस बार चुप कराना मुश्किल।
वो कोर आर्किटेक्चर। ताक़त को दबाना नहीं, मोड़ देना। गर्मी को रास्ता देना। ... उसने ये पहले कहाँ देखा था? कोई किताब नहीं थी ये। कोई क्लास नहीं। ... और फिर, धीरे-धीरे, एक पुरानी याद उभरने लगी, किसी तहख़ाने की तरह बंद, बरसों से बंद।
एक छोटी सी वर्कशॉप। ज़मीन पर बिखरे काग़ज़, एक टिमटिमाता बल्ब, और दीवार पर पिन से टँगा एक अधूरा डिज़ाइन। ... उसके पापा के हाथ, उस पर झुके हुए। और उनकी आवाज़, 'ये मेरी सबसे बड़ी चीज़ होगी, इशिता। ये दुनिया बदल देगी।' ... वही आकार। वही मोड़। दीवार पर टँगा वो अधूरा सपना।
और अचानक, जैसे किसी ने बर्फ़ का पूरा समंदर उसके ऊपर उलट दिया हो, इशिता को सब दिखाई दे गया। ... ये उससे मिलता-जुलता नहीं था। ये वही था। हूबहू वही। ... वर्धान की इस चमचमाती ख़ुफ़िया लैब का दिल, आदित्य का सबसे प्यारा सपना, उसके पापा का वही आविष्कार था, जिसे चुरा कर इस कंपनी ने उन्हें बर्बाद किया था।
उसका हाथ अपने आप मुँह पर चला गया। ... जिस बीज ने उसके परिवार को उजाड़ा था, आदित्य वर्धान उसी बीज पर अपना भविष्य उगा रहा था। ... और सबसे भयानक बात? उसे इसकी ख़बर तक नहीं थी। वो अपने सबसे प्यारे सपने में उस चोरी की जड़ को सींच रहा था, जिसने इशिता का घर तबाह कर दिया था।
वो आदमी जो इस पूरी दुनिया में उस पर सबसे ज़्यादा भरोसा करता था, वो अपना सारा भविष्य उसके पिता की क़ब्र पर खड़ा कर रहा था। ... और इशिता को कल सुबह वापस उसी लैब में जाना था। मुस्कुराना था। और उस चोरी के दिल पर, उसके साथ बैठ कर, काम करना था।
"ये... ये तो मेरे पापा का है। ... ये सब... मेरे पापा का है।"
दस साल से इशिता जिस चोरी का सबूत ढूँढने आई थी, वो किसी सीलबंद तहख़ाने में दफ़न नहीं था। ... वो उस आदमी की आँखों में चमक रहा था, जिससे उसे मोहब्बत होने का ख़तरा था। ... और इशिता समझ गई कि अब ये सिर्फ़ एक जासूसी नहीं रह गई थी। अब ये उसके अपने दिल के दो टुकड़ों के बीच की जंग थी।
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