Chapter 3 of 26 12 min read
चमकती इंटर्न
इशिता की चमक ही उसका सबसे बड़ा ख़तरा बन जाती है: वो जितना ज़्यादा चमकती है, असली फ़ाइलों के उतना क़रीब पहुँचती है और उतनी ही नज़रों में आती है। जुगनू की चाय-ख़बर उसे लीगल माले के ख़ाली होने का वक़्त और नकुल के लाल घेरे की भनक थमा देती है, फिर आदित्य वर्धान उसके सामने एक नामुमकिन पहेली रखता है, जिसे वो एक आविष्कारक की बेटी की तरह मिनटों में सुलझा देती है, और 'मेरे पापा' कहते-कहते बाल-बाल बचती है। दोनों के बीच गर्माहट और सावधानी की एक चिंगारी उठती है। आख़िर में आदित्य एक फ़ैसला कर लेता है: उसे इंटर्न बे से निकाल कर उस टीम में डालना, जिसे बनाने की उसे कंपनी में इजाज़त ही नहीं है।
तीन दिन बीत चुके थे। ... और वर्धान का इंटर्न बे अब एक दफ़्तर कम, एक अखाड़ा ज़्यादा लगता था। हर सुबह एक नई पहेली, और हर शाम, एक नाम कम।
नकुल की टीम ने खेल का नियम पहले ही दिन साफ़ कर दिया था। हर दो दिन में एक टास्क। और हर टास्क के बाद, सबसे नीचे रह जाने वाला इंटर्न, चुपचाप, उसी दरवाज़े से बाहर। ... यहाँ किसी को सिखाना नहीं था। यहाँ बस छाँटना था।
आज की पहेली बे की बड़ी स्क्रीन पर टँगी थी। एक पुराना सर्किट डिज़ाइन, जो लोड पड़ते ही गरम हो कर बैठ जाता था। ... दस इंटर्न, दस झुकी हुई गर्दनें, और एक ही सवाल हवा में तैरता हुआ। इसे ठीक कौन करेगा।
और इशिता के लिए यही सबसे बड़ी मुसीबत थी। ... क्योंकि ये उसके लिए पहेली थी ही नहीं। उसने पहली ही नज़र में जवाब देख लिया था। और एक जासूस के लिए, सही जवाब जानने से ज़्यादा ख़तरनाक शायद ही कुछ होता है।
उसने ख़ुद को याद दिलाया। चमकना नहीं है, इशिता। जो लड़की डेमो बचा कर पहले ही सबकी नज़र में आ चुकी है, उसे अब ग़ायब हो जाना है। ... अच्छी इंटर्न बनो। पर सबसे अच्छी हरगिज़ नहीं।
तो उसने अपना हाथ नहीं उठाया। बल्कि अपने बग़ल में बैठे उस घबराए हुए लड़के की तरफ़ झुकी, जिसके हाथ पसीने में तर थे, और बहुत धीरे से बोली।
"घबराओ मत। ... जहाँ गर्मी बन रही है ना, ख़राबी वहाँ नहीं है। उससे एक क़दम पीछे देखो। बस एक क़दम। तुम कर लोगे।"
लड़के ने काँपते हाथों से वो एक बदलाव किया, और स्क्रीन पर लाल एरर हरे में बदल गया। मैनेजर ने उसकी पीठ थपथपाई। ... और इशिता? इशिता वापस अपनी कुर्सी में सिमट गई। किसी ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। ठीक वैसे ही, जैसे वो चाहती थी।
पर कोई तो देख रहा था। ... दो दिन से उसे ये अजीब सा एहसास हो रहा था। जैसे कोई नज़र उसकी गर्दन पर टिकी हो। कभी ऊपर मेज़ानाइन से, कभी किसी काँच के उस पार से। ... उसे लगा, शायद आदित्य होगा। उसे क्या पता था कि दो मंज़िल ऊपर, एक फ़ाइल पर उसके नाम के इर्द-गिर्द खिंचा वो लाल घेरा अब तक सूखा भी नहीं था।
दोपहर की चाय के साथ, इस टावर की सबसे भरोसेमंद ख़बर एजेंसी अंदर दाख़िल हुई। ... एक खड़खड़ाती ट्रॉली, एक केतली, और जुगनू।
"अरे वाह, हमारी डेमो वाली हीरोइन! ... पूरे पाँचवें माले पर तुम्हारा ही चर्चा है। कोई कहता है इंटर्न थी, कोई कहता है जादूगरनी। ... ले, अदरक वाली। आज पैसे मत देना, आज खुराना सर के नाम चढ़ा दूँगा।"
"भैया, धीरे बोलिए। ... कोई सुन लेगा तो अगली छँटनी में सबसे पहले मेरा ही नाम होगा। मैंने कुछ नहीं किया था, बस पानी पिलाने गई थी।"
"पानी पिलाने गई थी! ... अरे वो कहानी अच्छी है, वही चलने दे। ... पर एक बात कान खोल कर सुन ले, बेटा। ऊपर वाले साहब लोग तुझ पर नज़र गड़ाए बैठे हैं।"
"ऊपर वाले साहब? ... मेरे जैसी छोटी सी इंटर्न पर भला बड़े साहब क्यों नज़र रखेंगे, भैया?"
"क्यों रखेंगे? ... कल नकुल सर ने फ़ैसिलिटीज़ से तुम इंटर्नों की हाज़िरी वाली फ़ाइल मँगवाई थी। किसकी कब की एंट्री, कौन कहाँ गया, सब। ... और सुना है, किसी एक इंटर्न का नाम उन्होंने अलग से घेर रखा है। लाल पेन से।"
इशिता के हाथ में चाय का कप एक पल को थम गया। ... लाल पेन से घेरा हुआ एक नाम। उसे पूछने की ज़रूरत नहीं थी कि वो नाम किसका है। ... उसने कप होंठों से लगाया, और मुस्कुराती रही। एक इंच भी नहीं हिली।
"अरे तू फ़िक्र मत कर। नकुल सर तो हर साल किसी न किसी इंटर्न के पीछे पड़ जाते हैं, ये उनका शौक़ है। ... तू बस अपना काम कर। और हाँ, कभी लीगल वाले माले पर काग़ज़ पहुँचाने भेजें ना, तो लंच के वक़्त जाना। एक से दो बजे। ... उस वक़्त खुराना सर और उनके सारे कानूनी बाज़ खाना खाने निकल जाते हैं। पूरा माला ख़ाली। बस एक बूढ़ा गार्ड ऊँघता रहता है।"
इशिता ने ये बात यूँ सुनी जैसे बेमन से सुन रही हो। पर अंदर, उसने उसे पत्थर पर खिंची लकीर की तरह दर्ज कर लिया। ... एक से दो बजे। लीगल माला ख़ाली। ... और उसी पल, कहीं दूर, रतन चाचा की आवाज़ फिर गूँजी। 'बस वही एक फ़ाइल। कोई और नाम मत छेड़ना।' ... उसने ख़ुद को समेटा। अभी नहीं। पहले तहख़ाना।
"और एक बात, बेटा। ... अगर कभी छोटे मालिक तुझसे बात करें ना, आदित्य सर, तो घबराना मत। ... बेचारे बहुत सीधे आदमी हैं। बोर्ड वाले उन्हें मज़ाक समझते हैं, नकुल सर तो मुँह पर हँस देते हैं उन पर। ... पर मेरे हिसाब से, इस पूरे टावर में अगर कोई एक सच्चा इंसान है, तो वही है।"
इशिता ने सिर हिलाया, पर मन ही मन उसने वो तस्वीर एक तरफ़ धकेल दी। ... सीधा हो या टेढ़ा, वो एक वर्धान था। और वर्धान सिर्फ़ दुश्मन होते हैं। ... जुगनू की बातों में एक अच्छा आदमी छिपा था। पर वो इस इमारत के अच्छे आदमियों को माफ़ करने नहीं आई थी।
उसी शाम, जब बे लगभग ख़ाली हो चुका था और इशिता आख़िरी बचे इंटर्नों में थी, बे का दरवाज़ा फिर खुला। ... इस बार न कोई मैनेजर, न कोई गार्ड। ख़ुद आदित्य वर्धान अंदर आया, हाथ में एक पतली सी फ़ाइल लिए।
बाक़ी दो-तीन इंटर्न फ़ौरन सीधे हो कर बैठ गए, लैपटॉप की तरफ़ झुक गए। ... पर आदित्य की नज़र किसी और पर नहीं ठहरी। सीधे उस कोने पर गई, जहाँ इशिता बैठी थी। जैसे उसे पहले से पता हो कि वो वहीं मिलेगी।
"देर तक रुकी हुई हो। ... अच्छा है। मुझे देर तक रुकने वाले लोग पसंद हैं। ... एक चीज़ लाया हूँ तुम्हारे लिए। इसे पहेली समझ लो। मेरे सीनियर इंजीनियरों की एक पूरी टीम इसके आगे तीन हफ़्ते से हार चुकी है।"
"सर, मैं तो बस एक इंटर्न हूँ। ... जो चीज़ आपके सीनियर नहीं कर पाए, वो भला मैं..."
"मुझे सीनियर नहीं चाहिए। ... सीनियर सिर्फ़ वही देखते हैं, जो उन्हें दिखाया गया हो। मुझे कोई ऐसा चाहिए जो वो देखे, जो बाक़ी सब चूक जाते हैं। ... और मैंने सुना है, इशिता, तुम्हारी आँख ठीक ऐसी ही है।"
इशिता की रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ गई। तुम वो देखती हो, जो बाक़ी चूक जाते हैं। ... उसे नहीं पता था कि उसकी ये तारीफ़ कितनी सच्ची थी। वो सच में देखती थी। बस वो जो देख रही थी, वो इसी कंपनी के दफ़नाए हुए राज़ थे।
उसने फ़ाइल खोली। एक अधूरा डिज़ाइन, आधा बना हुआ, कहीं-कहीं से कटा-फटा। ... और उसे देखते ही इशिता के भीतर कुछ अजीब हुआ। एक हल्की, दबी हुई पहचान। जैसे ये आकार उसने कहीं देखा हो। बहुत पहले। किसी और मेज़ पर, किसी और रोशनी में।
उसने उस एहसास को झटक दिया। थकान होगी, उसने सोचा। ... पर फिर उसकी आँखें डिज़ाइन की लकीरों पर दौड़ने लगीं, और अब वो रुक नहीं पा रही थी।
"समस्या साफ़ है। ... वो हिस्सा, जब पूरी ताक़त से चलता है, तो इतनी गर्मी पैदा करता है कि ख़ुद को ही जला बैठता है। और हम जितना उसे ठंडा करने की कोशिश करते हैं, वो उतना ही गरम होता जाता है। ... तीन हफ़्ते। हर बड़े दिमाग़ ने हाथ खड़े कर दिए।"
और इशिता को दिख गया। ... जवाब उल्टा था। बिलकुल उल्टा। वो लोग गर्मी से लड़ रहे थे। पर गर्मी से लड़ा नहीं जाता। उसे रास्ता दिया जाता है।
"आप इसे ठंडा करने की कोशिश कर ही क्यों रहे हैं? ... इसे गरम होने दीजिए। बस गर्मी को यहाँ रोकिए मत, इसे इस रास्ते से बाहर बहने दीजिए। ... जो हिस्सा अभी दुश्मन लग रहा है ना, वही तो नाली बन सकता है। ताक़त को दबाइए मत, सर। उसे मोड़ दीजिए।"
आदित्य कुछ पल तक कुछ नहीं बोला। बस उसे देखता रहा। ... और उस नज़र में ठीक वही चीज़ थी, जिससे इशिता सबसे ज़्यादा डरती थी। हैरत नहीं। पहचान।
"तीन हफ़्ते। ... तीन हफ़्ते में मेरी पूरी टीम इस एक बात तक नहीं पहुँची। और तुमने... तीन मिनट में? ... ये तुमने सीखा कहाँ, इशिता? ऐसी बात किसी किताब में नहीं लिखी होती।"
और यहीं, उस एक पल में, उसकी ढाल एक इंच सरक गई। क्योंकि उसे याद आया कि उसने ये कहाँ सीखा था। ... एक छोटी सी मेज़, बिखरे हुए काग़ज़, और एक आवाज़ जो हमेशा कहा करती थी, ताक़त से लड़ो मत, बेटा, उसे मोड़ना सीखो।
"सच कहूँ तो, ये मेरे पापा हमेशा कहा करते थे। ताक़त से कभी लड़ते नहीं..."
और वहीं, बीच वाक्य में, शब्द उसके गले में अटक गया। पापा। ... वो कहना नहीं चाहती थी। ये फिसल गया था। ... और आदित्य की आँखें, जो अब तक गर्म थीं, एक पल को तेज़ हो गईं।
"...मेरे पापा के एक जानने वाले थे, मेरा मतलब। ... एक बूढ़े मास्टरजी, मोहल्ले में। मशीनें ठीक किया करते थे। ऐसी ही उल्टी-सीधी बातें कहते रहते थे। बचपन में सुन-सुन कर याद रह गईं।"
झूठ सफ़ाई से निकला, गोल और सधा हुआ। ... पर आदित्य कुछ पल चुप रहा। जैसे उसने वो हल्की सी लड़खड़ाहट पकड़ ली हो, जो 'पापा' और 'पापा के जानने वाले' के बीच थी। ... फिर उसने हौले से सिर हिलाया, और बात वहीं छोड़ दी। पर इशिता जानती थी। इस आदमी ने कुछ नोट कर लिया था। ये आदमी हर चीज़ नोट करता था।
बे अब पूरी तरह ख़ाली हो चुका था। बस वो दोनों, और स्क्रीन की मद्धम नीली रोशनी। ... और उन दोनों के बीच अचानक एक ख़ामोशी तन गई, जो एक इंटर्न और एक मालिक के बीच नहीं होनी चाहिए थी।
"जानती हो, इस पूरी इमारत में लोग मुझे क्या समझते हैं? ... एक सपने देखने वाला। एक नरम, बेकार सा वारिस, जो असली दुनिया के लायक़ नहीं। ... मेरा अपना चचेरा भाई मेरे मुँह पर हँसता है। ... पर मैं कुछ बना रहा हूँ, इशिता। कुछ ऐसा, जो एक दिन उन सबका मुँह बंद कर देगा।"
"और आज तीन मिनट में तुमने वो कर दिखाया, जो वो लोग तीन हफ़्ते में नहीं कर पाए। ... इस पूरी कंपनी में शायद तुम अकेली हो, जो वो देखती है जो मैं देखता हूँ।"
और एक पल के लिए, सिर्फ़ एक पल के लिए, इशिता को वो सुनना अच्छा लगा। ... बरसों से किसी ने उसे यूँ नहीं देखा था। जैसे वो कोई हथियार नहीं, कोई इंसान हो।
और ठीक इसीलिए उसने वो दरवाज़ा अपने अंदर ज़ोर से बंद कर दिया। ... ये एक वर्धान है, इशिता। इसी ख़ानदान ने तेरे पापा को घुटनों के बल, सबके सामने घसीटा था। ख़बरदार। एक क़दम भी क़रीब नहीं।
"सर, बहुत देर हो गई है। ... मुझे निकलना चाहिए। और... ये सब तो बस एक तुक्का था। मुझे सच में कुछ ख़ास नहीं आता।"
आदित्य ने उसे रुकते, सिमटते, पीछे हटते देखा। ... और उसे समझ आ गया कि ये लड़की जान-बूझ कर ख़ुद को छोटा दिखाने की कोशिश कर रही है। छुपने की कोशिश कर रही है। ... क्यों, ये तो वो नहीं समझ पाया। पर एक बात उसने पक्की ठान ली। इसे यूँ इंटर्न बे में सड़ने नहीं देना है।
इशिता अपना बैग उठा कर दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। ... और तभी, ठीक तभी, आदित्य वर्धान ने एक फ़ैसला कर लिया। एक ऐसा फ़ैसला, जिसकी कंपनी के किसी काग़ज़ में उसे इजाज़त नहीं थी।
"इशिता। ... कल से तुम इस बे में नहीं बैठोगी।"
इशिता के क़दम रुक गए। उसका दिल एक पल को धड़कना भूल गया। ... बाहर? क्या उसका कवर टूट गया? क्या नकुल का वो लाल घेरा आख़िर रंग ले आया? ... उसने बहुत धीरे से पलट कर देखा।
"घबराओ मत। ये सज़ा नहीं है। ... मैं एक टीम बना रहा हूँ। छोटी सी। कंपनी के काग़ज़ों में जिसका कोई नाम नहीं। बोर्ड को जिसकी भनक तक नहीं। ... और मुझे उसमें तुम्हारे जैसा कोई चाहिए। ... कल सुबह इंटर्न बे में मत आना। सीधे मेरे पास आना।"
इशिता खड़ी रह गई। बाहर से उसका चेहरा झील की तरह शांत था, वही मीठी, आज्ञाकारी इंटर्न। ... पर अंदर एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था। क्योंकि उसे पता था कि 'नाम रहित टीम', 'बोर्ड की नज़रों से दूर' का असली मतलब क्या होता है। ... इसका मतलब था, ऊपर की मंज़िलें। असली फ़ाइलें। असली चाबियाँ। वो सब कुछ, जिसके लिए वो इस दरवाज़े से अंदर आई थी।
दस साल से वो जिस दरवाज़े को बाहर से खटखटा रही थी, आज दुश्मन ने ख़ुद, अपने ही हाथों से, उसे खोल दिया था। ... पर उसी दरवाज़े के उस पार एक आदमी खड़ा था, जो इस पूरी दुनिया में उस पर सबसे ज़्यादा भरोसा करता था। और अब हर क़दम उसके साथ था। हर झूठ, उसकी आँखों में सीधे देख कर।
इशिता ने बस इतना कहा। 'जी सर।' ... और मुड़ कर सीढ़ियों के अँधेरे में उतर गई। ... आदित्य वर्धान को लगा, उसने अभी-अभी अपनी ज़िंदगी का सबसे सही फ़ैसला लिया है। ... उसे क्या पता था, उसने अभी-अभी अपनी सबसे बड़ी दुश्मन के हाथ में अपने सबसे गहरे राज़ की चाबी थमा दी थी।
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