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Chapter 26 of 26 10 min read

बाप का नाम

अंदर की बात by Avni Oberoi

अलार्म की चीख़ अब भी घुप अँधेरे को चीरती रही, और उस काली, लाल-बुझी हवा में इशिता को सिर्फ़ अपनी ही टूटी साँस सुनाई दे रही थी।

उसका पैर अब भी उसी केबल में उलझा था जिसने उसे गिराया था, और उस अँधेरे में उसे बस एक चीज़ चाहिए थी, एक साँस, जो बता दे कि जो भारी चीज़ अभी गिरी थी, वो आदित्य नहीं था।

“आदित्य?” ... “आदित्य, बोलो! कहाँ हो तुम? जवाब दो!”

एक पल की ख़ामोशी, जो एक पूरी उम्र जैसी लंबी थी। ... फिर छत में कहीं आपातकालीन बत्तियाँ झिलमिलाकर जल उठीं, दूधिया, कमज़ोर रौशनी, और उस रौशनी में तस्वीर धीरे-धीरे साफ़ हुई। एक गिरा हुआ सर्वर रैक, बिखरे तार, और उनके बीच खुराना, ज़मीन पर, एक भारी लोहे के ढाँचे के नीचे दबा, हिलने की बेकार कोशिश करता हुआ। ... और उसके ठीक बग़ल में आदित्य, घुटनों के बल उठता हुआ, उसकी कनपटी से बहती ख़ून की एक पतली लकीर, पर ज़िंदा, साँस लेता हुआ, उसकी तरफ़ बढ़ता हुआ।

“मैं ठीक हूँ। मैं ठीक हूँ, इशिता।” ... “अँधेरे में जैसे ही उसने तुम्हारी तरफ़ हाथ बढ़ाया, मैंने तुम्हें पीछे धकेल दिया। और वो रैक उसके और मेरे बीच आ गया। ... तुम्हें कुछ नहीं हुआ, बस यही मायने रखता है।”

अब इशिता को वो पूरा पल समझ आया जो अँधेरे ने छुपा लिया था। खुराना उसकी तरफ़ झपटा था, आदित्य बीच में आकर उसे धक्का देकर हटाते हुए ख़ुद खुराना से टकराया, और उसी रेले में वो भारी रैक उखड़कर खुराना पर आ गिरा, वही धमाका जिसने सारी रौशनी बुझा दी थी।

तभी सीढ़ियों वाले दरवाज़े खुले और सुरक्षाकर्मी टॉर्च लिए अंदर भागे, क्योंकि जो भुला हुआ अलार्म खुराना ने ख़ुद डर के मारे खींचा था, वही अब उसे पकड़वाने आ पहुँचा था।

“हटाओ... इस लोहे को हटाओ मेरे ऊपर से।” ... “ये डेटा... अगर मैं ये डेटा भी मिटा देता, तब भी अब कुछ नहीं बदलता, है ना।” ... “सब ख़त्म हो गया।”

“हाँ, खुराना जी। सब ख़त्म हो गया।” ... “दस साल पहले आपने मेरे पापा से उनका नाम छीना था, बिना उन्हें छुए, बिना उनके सामने आए। ... आज मैं वो नाम वापस ले जा रही हूँ, और इसके लिए मुझे आपको छूने तक की ज़रूरत नहीं पड़ी। बस सच काफ़ी था।”

सुरक्षाकर्मियों ने रैक हटाकर खुराना को उठाया और बाहर ले चले, वही आदमी जो कुछ घंटे पहले इसी इमारत का सबसे ताक़तवर आदमी था। ... इशिता की मुट्ठी में वो छोटी सी ड्राइव अब भी सलामत थी, और उसकी असली नक़ल बोर्ड के पास, कैलाश की गवाही में, वक़्त की पहुँच से बाहर।

फिर उस दूधिया रौशनी में आदित्य का ख़ून से सना, काँपता हाथ उसके हाथ से आ मिला, और दोनों बस वहीं खड़े रहे, बिना कुछ कहे।

उस रात के बाद के दिन एक टूटे बाँध जैसे थे, जिनका पानी हर उस कोने में जा पहुँचा जिसे बरसों से सूखा रखा गया था। ... खुराना गिरफ़्तार हो चुका था, नकुल का नाम फ़ीनिक्स लीक की जाँच में सबसे ऊपर था, और दस साल पुरानी वो सीलबंद फ़ाइल फिर खुल गई थी, इस बार अदालत में नहीं, अख़बारों की सुर्ख़ियों में।

और उन सुर्ख़ियों में एक नाम बार-बार लौट रहा था, वो नाम जिसे इशिता ज़िंदगी भर 'चाचा' कहकर पुकारती आई थी, रतन सिन्हा।

कुछ दिन बाद, कैलाश वर्धान के दफ़्तर में, इशिता और आदित्य उनके सामने बैठे थे, और मेज़ पर वही फ़ोल्डर था, अब पुलिस की मुहरों से भरा हुआ। ... कैलाश की आवाज़ में अब वो पत्थर वाली अकड़ नहीं थी, कुछ और था, एक ऐसे आदमी की थकान जो अपनी सज़ा ख़ुद माँगने बैठा हो।

“मैंने अपने वकीलों से कह दिया है। मैं गवाही में कुछ नहीं छुपाऊँगा, अपना हिस्सा भी नहीं। दस साल पहले मैं जानता था कि वो सौदा साफ़ नहीं है, और मैं चुप रहा।” ... “अगर इसकी क़ीमत ये है कि दुनिया कैलाश वर्धान को भी एक चोर की तरह याद रखे, तो रखे। मैं तुम्हारे पापा का नाम वापस दिलाने के लिए अपनी इज़्ज़त भी इसी मेज़ पर रखने को तैयार हूँ।”

“मुझे आपकी बर्बादी नहीं चाहिए, कैलाश जी।” ... “जिन्होंने ये चोरी चुनी, खुराना, नकुल, और... और मेरे चाचा, वो क़ानून के सामने जवाब देंगे। पर जो सिर्फ़ आँख मूँदकर बैठा रहा, और आज आँख खोलकर सच चुन रहा है, उसे राख कर देने से मेरे पापा का नाम एक इंच भी ऊँचा नहीं होगा।”

“तुम मुझे बचा क्यों रही हो, बेटी? मैंने तुम्हारे साथ ऐसा कुछ नहीं किया जो इस रहम के लायक़ हो।”

“मेरे पापा ने मुझे एक ही बात सिखाई थी, इंसाफ़ और बदले में एक फ़र्क़ होता है।” ... “बदला चाहता है कि सामने वाला भी उतना ही जले जितना तुम जले हो। इंसाफ़ सिर्फ़ चाहता है कि सच अपनी जगह लौट आए। मैं दस साल से इंसाफ़ के लिए आई थी, बदले के लिए नहीं। इस घर में जो अब भी बेगुनाह हैं, उन्हें मैं इस आग में नहीं झोंकूँगी।”

“पता चला कि तुम जासूस हो, तो मुझे लगा मैं तुम्हें बिल्कुल नहीं जानता।” ... “पर अभी, इस मेज़ पर, तुमने जो किया, वो कोई जासूस नहीं कर सकता था। ये वही इंसान है जिस पर मैंने पहले दिन भरोसा किया था। मैं ग़लत नहीं था।”

उधर रतन सिन्हा का नाम अब उस फ़ाइल का हिस्सा था जो पुलिस के पास थी। सह-मालिकाना काग़ज़, सर्वोदय का पैसा, हर तार उन्हीं की तरफ़ जाता था, और परिवार का वो मसीहा अब दुनिया की नज़र में अभियुक्तों की सूची का एक नाम बन गया था। ... पर एक हिसाब ऐसा था जो न अदालत चुका सकती थी, न अख़बार, वो हिसाब अब भी एक छोटे से घर में, एक टूटे भाई और उसके गद्दार भाई के बीच बाक़ी था।

“एक काम मैं आज ही शुरू करवा रहा हूँ।” ... “जो पेटेंट दस साल पहले किशोर सिन्हा से छीने गए थे, उन पर वापस उनका नाम दर्ज होगा, वर्धान की अपनी अर्ज़ी से। जिस आविष्कारक को इस कंपनी ने अपने काग़ज़ों से मिटाया था, इन्हीं काग़ज़ों में उसका नाम फिर लिखा जाएगा।”

शहर के एक कोने में वो छोटा सा घर था जहाँ कभी एक मशहूर आविष्कारक रहता था, और अब सिर्फ़ उसका साया रहता था। ... इशिता दरवाज़े पर रुकी, आदित्य दो क़दम पीछे, और उसके हाथ में वो काग़ज़ था जिस पर दस साल में पहली बार उसके पापा का नाम फिर से एक हक़ की तरह लिखा था।

“पापा।” ... “हो गया, पापा। सब हो गया। खुराना पकड़ा गया, नकुल बाहर हुआ, और... और आपका नाम, आपकी सारी तकनीक, सब आपके नाम वापस दर्ज हो रही है। दुनिया अब जान गई है कि वो सब किसने बनाया था। किशोर सिन्हा ने।”

“मेरा नाम...” ... “बेटा, दस साल से मैं हर सुबह उठकर ख़ुद को याद दिलाता था कि मैं कौन था, इससे पहले कि दुनिया मुझे पूरी तरह भूला दे। ... और अब तू कह रही है कि दुनिया को फिर से याद आ गया?” ... “पर मेरा अपना भाई, इशिता... रतन... वही मेरा नाम बेच गया।”

“मुझे पता है, पापा। मुझे सब पता है।” ... “जिस आदमी ने आपको सबसे गहरा घाव दिया, वो कोई अजनबी दैत्य नहीं था, वो आपका अपना ख़ून था। और यही सबसे बड़ा ज़ुल्म है। पर आप दस साल एक झूठे दुश्मन से लड़ते रहे। अब आप सच के साथ जी सकते हैं। ये आज़ादी भी तो कुछ होती है, पापा।”

“तुझे पता है एक आविष्कारक के पास सबसे क़ीमती चीज़ क्या होती है? पैसा नहीं, पेटेंट नहीं।” ... “उसका नाम। वो नाम जो वो अपनी हर बनाई चीज़ के नीचे लिखता है, जैसे कोई पिता अपने बच्चे को अपना नाम देता है। उन्होंने मुझसे मेरा पैसा नहीं, मेरा नाम छीना था। ... और आज मेरी बेटी वो नाम वापस लेकर आई है। जो अदालत नहीं कर पाई, जो पैसा नहीं कर पाया, वो तूने कर दिखाया।”

किशोर की आँखों में आँसू थे, पर उनके काँपते हाथ आज कुछ कम काँप रहे थे, जैसे सीने में बरसों से बँधा कोई बोझ ज़रा सा ढीला पड़ गया हो। ... कोने में उनकी वो पुरानी नोटबुकें धूल में लिपटी रखी थीं, जिनके हर पन्ने के नीचे वही दस्तख़त था जो अब फिर से एक पेटेंट पर, क़ानून की नज़र में लौट रहा था।

“सिन्हा साहब।” ... “मेरे परिवार ने आपके साथ जो किया, उसे मैं ठीक नहीं कर सकता। पर जो तकनीक आपने बनाई थी, वो अब किसी तिजोरी में नहीं, दुनिया के सामने, आपके अपने नाम के साथ आगे बढ़ेगी। ये मेरा वादा है।”

“तुम वो लड़के हो जिसने मेरी बेटी पर तब भरोसा किया, जब वो ख़ुद पर भी नहीं करती थी।” ... “वर्धान का ख़ून हो, पर तुम्हारी आँखों में वो लालच नहीं जो मैंने उस दिन अदालत में देखा था। ... मेरी बेटी का ख़याल रखना, बेटा।”

उसी शाम, वर्धान टावर की छत पर, जहाँ नीचे बेंगलुरु की रौशनियाँ किसी बिखरे हुए आकाश की तरह जल रही थीं, इशिता और आदित्य अकेले खड़े थे।

दस साल जिस एक मक़सद ने उसे थामे रखा था, वो आज पूरा हो चुका था, और उस ख़ालीपन में इशिता को समझ नहीं आ रहा था कि अब वो कौन है, जासूस नहीं, इंटर्न नहीं, तो फिर क्या।

“मैं दस महीने एक ऐसी लड़की के साथ काम करता रहा जो हर रोज़ मुझसे झूठ बोलती थी।” ... “पर सबसे अजीब बात ये है, इशिता, कि उस झूठ के नीचे जो इंसान था, वो मेरी ज़िंदगी का सबसे सच्चा इंसान था। तुमने अपने बारे में सब कुछ छुपाया, पर तुम्हारे दिल ने एक पल के लिए भी झूठ नहीं बोला।”

“आदित्य, मैंने तुम्हें इस्तेमाल किया। पहले दिन से। तुम्हारा भरोसा, तुम्हारी लैब, तुम्हारा बैज, सब मेरे मिशन का हिस्सा था।” ... “जो आदमी मुझ पर सबसे ज़्यादा यक़ीन करता था, मैंने सबसे ज़्यादा उसी से झूठ बोला। ये सब जानते हुए भी तुम... कैसे?”

“इसलिए कि अब मैं तुम्हें पूरा जानता हूँ, और फिर भी यहाँ खड़ा हूँ।” ... “तुम्हारा मिशन ख़त्म हो गया, इशिता। तुम्हारे पापा आज़ाद हैं, तुम्हारा नाम अब कोई राज़ नहीं। तो अब मैं तुमसे एक इंटर्न की तरह नहीं पूछ रहा, एक जासूस की तरह नहीं, सिर्फ़ इशिता सिन्हा से पूछ रहा हूँ। ... रुक जाओ। मेरे साथ। अपने नाम से।”

और इशिता, जिसके पास हर सवाल का एक तराशा हुआ जवाब हमेशा तैयार रहता था, आज एक पल के लिए बिल्कुल ख़ाली थी। ... क्योंकि जिस मोहब्बत की बुनियाद ही एक झूठ पर रखी गई हो, क्या उसे कभी साफ़ दिल से चुना जा सकता है? क्या एक जासूस के 'हाँ' पर कभी यक़ीन किया जा सकता है, ख़ुद उस जासूस के भी? ... उसने कुछ कहने को होंठ खोले, नीचे बेंगलुरु की लाखों रौशनियाँ जगमगाती रहीं, आदित्य इंतज़ार करता रहा, पर इशिता के पास इस एक सवाल का कोई जवाब नहीं था।

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