Chapter 9 of 26 13 min read
दो चेहरे, एक झूठ
आठवीं रात के राज़ से टूटती इशिता पहली बार अपने ही घर से झूठ बोलती है, आधे फटे 'सिन्हा' नाम को पापा और चाचा रतन से छुपाकर, और ठान लेती है कि उस नाम का पहला हिस्सा वो ख़ुद ढूँढेगी। उधर लीगल माला सील हो जाता है, आदित्य की मँगेतर समझी जाने वाली देविका मलिक आकर भाँप लेती है कि आदित्य इस इंटर्न को किस नज़र से देखता है, और नकुल चीख़ने की जगह मीठा होकर उसे अपनी जाँच में शामिल कर लेता है, यानी इशिता तीन तरफ़ से घिर जाती है। रात को अपने ख़ानदान का अतीत टटोलते हुए वो चाचा तक पहुँचकर, प्यार में, उन्हें बरी कर देती है, और तभी उसे असली जाल दिखता है: आदित्य ने भरोसे में जो सबसे गहरा भेद सिर्फ़ उसे सौंपा था,
भोर से पहले का सबसे गाढ़ा अँधेरा था। ... इशिता के कमरे में बस एक रोशनी थी, फ़ोन की नीली, ठंडी लौ, और उसमें बार-बार वही तस्वीर जगमगा रही थी। हस्तांतरण का पन्ना, वो असली दस्तख़त, और वो आधा फटा नाम, जिसका बचा हुआ हिस्सा उसकी छाती में अंगारे की तरह दहक रहा था... सिन्हा।
रात भर वो उस एक शब्द को घूरती रही, जैसे घूरने से वो बदल जाएगा, कोई अजनबी नाम बन जाएगा, किसी दुश्मन का नाम। ... पर वो नहीं बदला। वो वहीं रहा, अटल, उसका अपना। जिस चोरी का सबूत ढूँढने वो दुश्मन के घर में घुसी थी, उस पर उसके अपने ख़ानदान की मुहर लगी थी।
अभी, इसी वक़्त, उसे ये तस्वीर पापा को, चाचा को भेज देनी चाहिए थी। यही तो मिशन की मंज़िल थी, दस साल की तपस्या का फल, बस एक बटन की दूरी पर। ... पर उसका अँगूठा उस हरे बटन पर आकर काँप कर रुक गया, जैसे वो बटन नहीं, जलता हुआ कोयला हो।
क्योंकि जिस पल वो ये नाम पापा के सामने रखती, उसी पल वो अपने ही ख़ून पर उँगली उठा देती। ... और चाचा की हिदायत अचानक किसी और ही सुर में गूँजने लगी। 'किसी और नाम को मत छेड़ना, बेटा। बस वर्धान का सबूत ले आना।' ... दस साल जिसे उसने प्यार समझा था, आज पहली बार वो चेतावनी जैसी लगी। पर उसने वो ख़याल झट से परे धकेल दिया।
तभी फ़ोन उसके हाथ में थरथराया, और स्क्रीन पर वही नाम जगमगाया जिससे वो आज रात सबसे ज़्यादा डर रही थी... पापा। ... दस साल में पहली बार, पापा का फ़ोन उठाने से पहले, इशिता को एक लंबी, काँपती साँस भरनी पड़ी।
"हाँ पापा... नहीं, मैं ठीक हूँ, बस थोड़ी थकी हुई हूँ।" ... "नहीं, अभी कुछ ठोस हाथ नहीं लगा। तहख़ाने तक पहुँची थी, पर वो पुरानी फ़ाइल वहाँ थी ही नहीं, पापा। और अब वो पूरा माला हमेशा के लिए सील हो गया है।" ... "मुझे बस थोड़ा और वक़्त चाहिए।"
दूसरी तरफ़ से पापा की वही थकी, पर उम्मीद से काँपती आवाज़ आई। ... फिर फ़ोन दूसरे हाथ में गया, और शहद जैसी सँभली आवाज़ उभरी, चाचा की। बेटा, कोई भी पुराना काग़ज़ जिस पर अपने ख़ानदान का नाम हो, सबसे पहले मुझे दिखाना, किसी और को नहीं, तेरे पापा की हिफ़ाज़त के लिए। ... और इशिता की रीढ़ में ठंडी लकीर दौड़ गई, क्योंकि ठीक वही काग़ज़ उसकी जेब के फ़ोन में क़ैद था।
"आप बिल्कुल फ़िक्र मत कीजिए, चाचा।" ... "जो भी मिलेगा, सबसे पहले आप ही जानेंगे, हमेशा की तरह। ... मैं आपकी बच्ची हूँ ना।"
फ़ोन कटा, और इशिता देर तक उस सन्नाटे में अपने ही झूठ की गूँज सुनती रही। ... दस साल से उसने दो चेहरे पहने थे। एक जो दुश्मन के लिए मुस्कुराता था, और एक सच्चा, जो सिर्फ़ अपने घर के लिए बचा कर रखा था। ... पर आज पहली बार उसने अपने घर से भी झूठ बोला था। अब वो झूठ सिर्फ़ दुश्मन का नहीं, उसका अपना था।
और उसी सन्नाटे में उसने एक फ़ैसला किया। ... जब तक वो उस आधे नाम का पहला हिस्सा ख़ुद न ढूँढ ले, जब तक जान न ले कि उसके ख़ानदान में पापा की ज़िंदगी बेचने वाला कौन था, तब तक ये राज़ किसी को नहीं देगी, न पापा को, न चाचा को। ... एक जासूस अब अपने ही आक़ाओं की जासूसी करने वाली थी।
उधर वर्धान का टावर उस जलसे की रात के बाद बदल चुका था। ... लीगल का पूरा माला अब सील था, दरवाज़ों पर नई मुहरें, गलियारों में दुगुने गश्त। खुराना का हुक्म था, जो भी उन पुरानी फ़ाइलों के पास फटके, पता चले। ... और इस कसती हवा के बीच से इशिता हमेशा की तरह मुस्कुराती गुज़र रही थी, जैसे उसे कुछ ख़बर ही न हो।
उस सुबह जुगनू की चाय-ट्रॉली ताज़ा अख़बार की तरह ख़बरों से लबालब थी। ... 'मैडम, आज ऊपर बड़ा तमाशा है,' उसने आँखें नचाकर फुसफुसाया। 'देविका मैडम आई हैं, मलिक साहब की बेटी, वो बड़े इन्वेस्टर वाले। और सबसे रसीली बात... कहते हैं चेयरमैन साहब ने उन्हें आदित्य सर के लिए पसंद कर रखा है। बचपन की मँगनी जैसी बात है, समझीं? पूरा दफ़्तर इसी चर्चा में डूबा है।'
और थोड़ी ही देर में इशिता ने उसे देखा। ... एग्ज़ीक्यूटिव लॉबी के बीच खड़ी एक औरत, जो इस शीशे की दुनिया में उतनी सहज थी जितना इशिता सिर्फ़ होने का नाटक करती थी। बेदाग़ कपड़े, तराशी अदा, पीढ़ियों की दौलत वाला आत्मविश्वास। देविका मलिक। वो इस टावर में मेहमान की तरह नहीं, मालकिन की तरह खड़ी थी।
और देविका की नज़र पूरे कमरे पर फिरती हुई इशिता पर आकर ठहर गई। ... वो उस औरत की नज़र थी जो एक पल में भाँप लेती है कि उसकी दुनिया में नई चीज़ कहाँ आ घुसी है। उसने इशिता को सिर से पैर तक पढ़ा, और उसके होंठों पर एक हल्की, सर्द मुस्कान तैर गई, जैसे उसने कुछ ऐसा जान लिया हो जो ख़ुद इशिता को भी अभी मालूम नहीं था।
"तो तुम हो वो इंटर्न।" ... "आदित्य जिसका नाम आजकल हर दूसरे वाक्य में लेता है। इशिता ये, इशिता वो।" ... "मैंने सोचा था कोई और ही होगी। पर तुम तो बस... एक बच्ची हो।"
"जी, मैं इशिता हूँ, मैम। आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।" ... "मलिक इंडस्ट्रीज़ का नाम कौन नहीं जानता।"
"मलिक और वर्धान बरसों से एक-दूसरे को जानते हैं, बेटा। मैं और आदित्य साथ खेलकर बड़े हुए हैं।" ... "मैं जानती हूँ उसे किस चीज़ की ज़रूरत है, और किस चीज़ की नहीं।" ... "और तुम जैसी होनहार इंटर्न... वो आती हैं, थोड़ा चमकती हैं, और अपने रास्ते चली जाती हैं। बुरा मत मानना, बस दुनिया का दस्तूर है।"
इशिता ने सिर झुकाए रखा, पर उसके भीतर का जासूस पूरी तरह जाग चुका था। ... नकुल एक कुल्हाड़ी था, सीधा वार करता था, इसीलिए उससे बचा जा सकता था। पर ये औरत आँखें थी। ऐसी आँखें जो ग़लत वजह से, जलन से, उस पर टिकी थीं, पर किसी भी पल सही चीज़ देख सकती थीं, और यही बात उसे सबसे ख़तरनाक बनाती थी।
"एक बात बताऊँ, इशिता?" ... "मैंने आज तक आदित्य को किसी को उस तरह देखते नहीं देखा, जैसे वो कल तुम्हें देख रहा था। मुझे नहीं पता तुमने ऐसा क्या किया है। पर मैं पता लगा लूँगी। ... मैं हमेशा पता लगा लेती हूँ।"
और देविका एड़ियों की नपी-तुली खट-खट के साथ चली गई, हवा में महँगे इत्र की लकीर और एक चेतावनी छोड़ती हुई। ... एक तरफ़ नकुल का जाल, और अब दूसरी तरफ़ ये नई, जलती हुई नज़र। तीन में से दो दीवारें खड़ी हो चुकी थीं, और तीसरी का उसे अभी अंदाज़ा भी नहीं था।
और नकुल? नकुल कुछ दिनों से अजीब तरह ख़ामोश था। ... बैज-लॉग वाला जाल उसके ठंडे, तराशे झूठ के सामने बेकार हो गया था, और मुँह की खाकर नकुल ने चीख़ना छोड़ दिया था। ... पर इशिता जानती थी, शिकारी की ख़ामोशी उसकी दहाड़ से ज़्यादा ख़तरनाक होती है। जब वो चुप होता है, तब वो जाल बुन रहा होता है।
और उस दोपहर इशिता ने वो देखा जिसका उसे डर था। ... काँच की एक दीवार के पीछे नकुल और देविका सिर जोड़े खड़े थे, धीमी आवाज़ में। ... दो शिकारी, अलग-अलग वजहों से, पर एक ही शिकार पर। और आज उन दोनों ने एक-दूसरे को पहचान लिया था।
थोड़ी देर बाद नकुल ख़ुद उसके पास आया, और इस बार चेहरे पर वो पुरानी नफ़रत नहीं थी। ... वहाँ एक नरम, शाइस्ता मुस्कान थी, और इसीलिए दहला देने वाली। नकुल वर्धान का मीठा होना तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी जैसा था।
"इशिता जी। ... मुझे लगता है मैंने पिछले दिनों आपके साथ कुछ ज़्यादा ही सख़्ती कर दी। माफ़ करेंगी।" ... "सच कहूँ तो इस पूरी टीम में सबसे तेज़ दिमाग़ आपका ही है। इसीलिए चाहता हूँ कि इस लीक की जाँच में आप मेरी मदद करें। आप जैसी होशियार लड़की की नज़र से कोई चीज़ नहीं बचती।"
और इशिता के भीतर हर घंटी एक साथ बज उठी। ... नकुल की तारीफ़, माफ़ी, उसे जाँच में शामिल करना, ये उस आदमी के लिए स्वाभाविक नहीं था जो इंटर्नों को जूते की धूल समझता था। ... ये मदद माँगना नहीं था, ये उसे पास खींचना था, ताकि वार का निशाना और साफ़ हो जाए।
"ये तो मेरे लिए बड़ी बात है, सर।" ... "जो भी मदद कर सकूँ, ज़रूर करूँगी। आख़िर ये लैब हम सबकी है ना।"
"देखा नकुल? मैंने कहा था ना, ये लड़की बहुत काम की है।" ... "हर किसी पर नज़र रखती है, हर दरवाज़े को जानती है। ऐसी इंटर्न तो कंपनी के लिए तोहफ़ा है। ... है ना, इशिता?"
और उस पल इशिता ने अपने चारों तरफ़ कसता जाल साफ़ देख लिया। ... एक तरफ़ नकुल, जो अब मुस्कुरा कर शिकार करता था। दूसरी तरफ़ देविका, जिसकी जलती आँखें हर क़दम गिन रही थीं। और तीसरी तरफ़, सबसे भारी, उसका अपना घर, जिससे वो अब ख़ुद झूठ बोल रही थी। ... तीन दीवारें, और बीच में एक अकेली लड़की, जिसके पास सच कहने का कोई रास्ता नहीं बचा था।
उस रात इशिता ने कमरे की बत्ती नहीं जलाई। ... अँधेरे में, फ़ोन की उसी नीली रोशनी में, वो एक साथ दो शिकार कर रही थी। एक, अपने ख़ानदान के अतीत का, और दूसरा, अपने चारों तरफ़ बुने जा रहे उस नए जाल का।
पहले उसने पुरानी यादें टटोलीं, बचपन के धुँधले साल, पापा की वो शुरुआती लैब। ... कोई तो था जिसका नाम उन पेटेंटों पर पापा के साथ था, कोई सिन्हा, जिसे उन्हें बेचने का हक़ था। पर पापा तो कहते थे वो तकनीक अकेले उनकी थी। तो फिर ये दूसरा सिन्हा कौन था?
"इस लैब को छूने वाले सिन्हा तो बस तीन ही थे..." ... "पापा। मैं। ... और... और चाचा।" ... "नहीं। चाचा नहीं। जिसने हमें बचाने के लिए अपना घर तक बेच दिया, जिसने मुझे पढ़ाया, पाला... वो नहीं। ये सोचना भी गुनाह है।"
और उसने वो ख़याल फिर उसी अँधेरे तहख़ाने में धकेल दिया, जहाँ वो हर डरावने सवाल को दफ़न करती आई थी। ... पर आज वो सवाल पहले जैसा दबा नहीं। आज वो अँधेरे में आँखें खोले पड़ा रहा, उसे घूरता हुआ।
फिर वो नकुल के जाल की तरफ़ मुड़ी, और तभी वो पल याद आया, दो दिन पहले का, ख़ुफ़िया लैब का कोना। ... आदित्य उसे एक तरफ़ ले गया था, इतने पास कि उसकी आवाज़ बस एक फुसफुसाहट थी, और उसकी आँखों में वो भरोसा था जो इशिता को किसी सज़ा से ज़्यादा चुभता था।
'ये बात इस पूरी कंपनी में सिर्फ़ दो लोग जानते हैं, इशिता,' उसने कहा था, और फिर प्रोजेक्ट का वो सबसे गहरा भेद बता दिया था, जिस पर उसका पूरा सपना टिका था। 'तुम और मैं। मैं किसी और पर इतना भरोसा नहीं कर सकता।' ... उस पल इशिता का दिल दो हिस्सों में बँट गया, एक जो पिघलना चाहता था, और दूसरा, जो जानता था कि वो उसी भरोसे का क़ातिल है।
उसने उस भेद को एक तोहफ़े की तरह लिया था। पर एक जासूस के लिए हर तोहफ़ा एक ख़बर भी होता है। ... उसके आक़ा दस साल से यही जानना चाहते थे, वर्धान बना क्या रहे हैं। और अब वो सबसे गहरी ख़बर उसके हाथ में थी।
पर आज रात, उस पल को बार-बार पलटते हुए, कोई चीज़ खटक रही थी। ... वो भेद इतना साफ़ क्यों था, इतना अलग-थलग, इतनी आसानी से दोहराया जा सकने वाला? और वो ठीक उसी वक़्त उसके पास क्यों आया, जब नकुल अचानक चुप और मीठा हो गया था?
और फिर, अँधेरे में, सारे टुकड़े एक साथ जुड़ गए, और इशिता का ख़ून जम गया। ... नकुल ने शिकार करना बंद नहीं किया था। उसने चारा डाला था। एक झूठा भेद, एक नक़ली ख़बर जो इस इमारत में सिर्फ़ एक रास्ते से बह सकती थी, आदित्य के भरोसे से, सीधे उस इंटर्न तक जिस पर उसे शक था।
"ये भेद आदित्य ने मुझे नहीं दिया।" ... "ये नकुल ने... आदित्य के हाथों... मुझ तक पहुँचाया है। ये कोई राज़ नहीं। ये एक निशान है, मुझ पर लगाया हुआ एक निशान।"
और तभी उसे उस जाल के असली दाँत दिखे। ... वो नक़ली भेद इस दुनिया में कहीं और था ही नहीं, सिर्फ़ नकुल के पास, और अब उसके पास। जिस पल वो ये 'ख़बर' अपने आक़ाओं तक पहुँचाती, उसी पल वो अपने ही हाथों उस लीक पर अपने नाम की मुहर लगा देती।
अगर वो ये ख़बर बाहर भेजती, तो नकुल का जाल बंद हो जाता, और वो सबके सामने वही जासूस साबित हो जाती जिसे वो ढूँढ रहा था। ... और अगर चुप रहती? तो पापा का दस साल का भरोसा टूटता, और चाचा, जो पहले से 'और तेज़ चलो' का दबाव डाल रहे थे, पूछने लगते कि उनकी बच्ची अचानक चुप क्यों है। ... दोनों रास्ते एक ही खाई में गिरते थे।
चारा उसकी मुट्ठी में था। और काँटा, कब का, उसके गले में उतर चुका था। ... वो जाल आने वाला नहीं था, वो बिछ चुका था, बस इस इंतज़ार में कि इशिता हिले, कि वो पापा को अगला फ़ोन करे। ... और अँधेरे में अकेली बैठी इशिता को पहली बार वो बात समझ आई जो उसे उम्र भर सताने वाली थी... पापा के लिए बोला गया अगला सच, उसका अगला ही शब्द, उसके अपने गले का फंदा बन जाएगा।
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