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Chapter 7 of 26 11 min read

शक की चिंगारी

अंदर की बात by Avni Oberoi

सुबह के दस भी नहीं बजे थे कि इशिता के फ़ोन पर वो संदेश आ गया, जिसका उसे रात भर से डर था। ... नकुल वर्धान का दफ़्तर। अभी। अकेली।

और जब वो अंदर घुसी, तो शीशे की उस लंबी मेज़ पर काग़ज़ों का वही मोटा पुलिंदा पड़ा था, और नकुल की एक उँगली किसी एक लाइन पर टिकी हुई थी, जैसे किसी गर्दन पर रखी हुई छुरी।

"आओ, इशिता। बैठो। ... मेरे पास एक छोटी सी पहेली है, और मुझे यक़ीन है, तुम जैसी होशियार इंटर्न इसे झट से सुलझा देगी। ... परसों रात, ठीक ग्यारह बजकर सत्रह मिनट पर, इस इमारत के लीगल आर्काइव माले पर एक बैज छुआया गया। तुम्हारा बैज। तुम्हारा नाम। ... अब तू मुझे ये बता, कि एक इंटर्न आधी रात को उस सीलबंद माले पर, अकेली, आख़िर क्या कर रही थी?"

और इशिता के भीतर वो सारा डर, जो दस साल से चुपचाप पल रहा था, एक पल में सिर उठाकर खड़ा हो गया। ... पर बाहर, उसके चेहरे पर एक शिकन तक नहीं उभरी। कहीं बहुत गहरे, किसी और ही इशिता ने कमान थाम ली, वो ठंडी, तराशी हुई इशिता, जिसे वो ख़ुद भी अब तक ठीक से नहीं जानती थी।

"ग्यारह सत्रह?" ... "सर, आपने वाक़ई मेरे लिए इतनी मेहनत की, सिर्फ़ ये पता लगाने के लिए कि मैं देर रात तक काम करती हूँ?"

"आदित्य सर ने मुझे कहा था कि इस लीक की जाँच के लिए लैब की पुरानी पेटेंट रेफ़रेंसें निकालूँ, ताकि हम साबित कर सकें कि लीक हमारी टीम से नहीं हुआ। वो रेफ़रेंसें लीगल रिकॉर्ड्स में पड़ी थीं। मैं वहीं गई थी। ... और आप ख़ुद उस रात वहाँ थे, सर। आपने मुझे अपनी आँखों से देखा था। आदित्य सर ने आपको बताया भी था।"

"आधी रात को? ... कोई इंटर्न, अपने पहले ही महीने में, पुरानी पेटेंट रेफ़रेंसें निकालने आधी रात को अकेली उस माले पर उतरती है, जहाँ बड़े-बड़े साहबों को भी जाने से पहले दो बार सोचना पड़ता है? ... मेरी बीस साल की नौकरी में मैंने कोई इंटर्न इतना... समर्पित नहीं देखा।"

"शायद इसीलिए, सर।" ... "शायद इसीलिए आपकी टीम का डिज़ाइन बाहर लीक हो गया, और आदित्य सर की टीम का नहीं। ... मुझे माफ़ करेंगे, पर मैं समर्पित हूँ। इस पूरे शहर में मेरे पास और है भी क्या, सिवाय इस काम के? कुछ लोगों के पास वर्धान का नाम होता है, सर। मेरे पास सिर्फ़ मेरी मेहनत है।"

नकुल एक पल के लिए ख़ामोश हो गया, और उस ख़ामोशी में इशिता को अपनी ही ठंडक चुभ गई। ... उसने वो झूठ इतनी सफ़ाई से, इतने पत्थर जैसे ठहराव से बोला था कि वो भीतर तक सिहर उठी।

ये आवाज़ किसकी थी? इतना अच्छा, इतना बेदाग़ झूठ बोलना उसने कब सीख लिया? ... दस साल पहले जो लड़की अपने पापा के लिए फूट-फूट कर रोई थी, क्या वो धीरे-धीरे सच में एक जासूस बनती जा रही थी, इतनी कि अब उसका ख़ुद का चेहरा भी उसे पहचान में न आए?

"ठीक है।" ... "जा, काम कर, समर्पित इंटर्न। ... पर एक बात गाँठ बाँध ले, इशिता। आज आदित्य तेरी ढाल है। पर ढालें टूटती हैं। और जिस दिन ये ढाल टूटेगी, उस दिन तेरे और मेरे बीच कोई आदित्य खड़ा नहीं होगा। ... सिर्फ़ ये काग़ज़ होंगे। और मैं।"

इशिता सिर उठाए उस कमरे से निकल गई, पर गलियारे में क़दम रखते ही उसकी टाँगें भीतर से काँप उठीं। ... वो बच गई थी, आज के लिए। पर अब उसका नाम नकुल की उस लंबी सूची में सबसे ऊपर था, लाल स्याही में घिरा हुआ।

और इन सबके नीचे, वो एक सवाल अब भी उसे भीतर से नोच रहा था, वो विक्रय, वो अधूरा दस्तख़त, जो पिछली रात से उसे एक पल के लिए भी सोने नहीं दे रहा था।


उस शाम, जब पूरी इमारत ख़ाली हो चुकी थी और खिड़कियों के पार बेंगलुरु की बत्तियाँ जगमगा उठी थीं, स्कंकवर्क्स की उस छोटी सी लैब में सिर्फ़ दो लोग बचे थे, इशिता और आदित्य। ... और उनके बीच वही अधूरा प्रोजेक्ट, जिसकी जड़ में इशिता के पापा की चुराई हुई तकनीक दबी थी। हर बार जब वो उस स्क्रीन को छूती, उसे लगता जैसे वो अपने पापा का पुराना ज़ख़्म अपनी उँगलियों से छू रही हो।

"पता है इशिता, आज बोर्ड की मीटिंग में नकुल ने मेरी इस पूरी लैब को क्या कहा? ... 'एक बच्चे का खिलौना।' ... और बोर्ड हँसा। पूरा बोर्ड। मेरे अपने पापा समेत। सबने सिर हिलाया, जैसे नकुल ने कोई बहुत बड़ी अक़्लमंदी की बात कह दी हो।"

"और आपको बुरा नहीं लगा? ... सब आपको कम आँकते हैं, सर, हर रोज़, आपके अपने ही घर में। और आप... आप बस मुस्कुरा देते हैं।"

"बुरा?" ... "इशिता, ये पूरी लैब टेप, ठंडी चाय और ज़िद से जुड़ी हुई है। आधी मशीनें मैंने ख़ुद कबाड़ से उठाई हैं। ... अगर बोर्ड इसे खिलौना कहता है, तो शायद वो ग़लत भी नहीं। बस उन्हें ये नहीं पता कि खिलौने कभी-कभी पूरी दुनिया बदल देते हैं।"

"लगता था, इशिता। बहुत लगता था। ... मेरा एक बड़ा भाई था। रोहन। वो तेज़ था, चमकदार था, वो 'असली वारिस' था। पापा की हर उम्मीद उसी पर टिकी थी। और मैं... मैं वो दूसरा बेटा था, जो किताबों में खोया रहता था, मशीनों से बातें करता था, जिसे कोई गिनता ही नहीं था।"

"फिर एक हादसे में रोहन चला गया। और रातों-रात इस पूरी कंपनी का बोझ उसी बेटे पर आ गिरा, जिसे कभी इस लायक़ समझा ही नहीं गया था। ... सब मुझे देखते हैं और उन्हें रोहन याद आता है, और ये कि मैं वो नहीं हूँ।"

इशिता का हाथ स्क्रीन पर वहीं ठहर गया। ... वो इस घर में एक दैत्य ढूँढने आई थी, एक ऐसा दुश्मन जिससे नफ़रत करना आसान हो। और उसके सामने एक ऐसा आदमी खुल रहा था, जिसके अपने ज़ख़्म हूबहू उसके अपने ज़ख़्मों जैसे थे, कम आँका गया, अकेला, किसी और की परछाईं में जीता हुआ।

"तो मैंने एक दिन तय कर लिया, इशिता। ... मैं उन सबको ग़लत साबित करूँगा। इस बोर्ड को, नकुल को, अपने पापा को, सबको। इसीलिए ये लैब है। छुप कर, नियम तोड़ कर, अपने ही घर की नज़रों से बचाकर मैंने इसे खड़ा किया है।"

"वो मुझे नरम समझते हैं। पर नरम होना कमज़ोर होना नहीं होता, इशिता। कभी-कभी नरमी ही सबसे बड़ी ताक़त होती है, वो जिसे कोई आता हुआ देख ही नहीं पाता, जब तक बहुत देर न हो जाए।"

"मैं समझती हूँ, आदित्य। ... मैं सच में समझती हूँ। मेरे घर में भी एक ऐसा आदमी था। एक जो सबसे होशियार था, सबसे सच्चा, जो अपने सपनों में डूबा रहता था, और फिर भी दुनिया ने उसे... ... मेरे पा..." ... और वो शब्द फिर वहीं, उसी दहलीज़ पर आकर टूट गया, जहाँ वो हर बार टूटता था।

"तुम्हारे... तुम्हारे कौन, इशिता? ... तुम हमेशा किसी बात को कहते-कहते ठीक बीच में रुक जाती हो। जैसे तुम्हारे अंदर कोई पूरी की पूरी दुनिया बसी है, जिसे तुम किसी को, कभी, एक झलक तक देखने नहीं देतीं।"

वो इतने पास आ गए थे कि लैब की उस मद्धम नीली रोशनी में इशिता उसकी आँखों में अपना ही अक्स देख सकती थी। ... दो सच्चे लोग, एक ही मेज़ के दो सिरों पर, और उन दोनों के बीच सिर्फ़ एक चीज़ खड़ी थी, इशिता का झूठ।

उसने झट से अपनी नज़र झुका ली, क्योंकि वो जानती थी, अगर एक पल और वो उन आँखों में देखती रही, तो आदित्य उसका सारा सच पढ़ लेता।

"कोई पूरी दुनिया नहीं है, सर। ... बस एक थकी हुई इंटर्न है, जो देर रात तक पेटेंट रेफ़रेंसें निकालती है और नकुल सर की पहेलियाँ सुलझाती है।" ... और वो हँस दी। पर उस हँसी के ठीक नीचे कुछ था, जो चुपचाप टूट रहा था।

और आदित्य भी हँस दिया, उसी भोलेपन से, जो इशिता को हर दिन थोड़ा और मार डालता था। ... क्योंकि इस पूरी दुनिया में जिस एक आदमी पर वो सबसे ज़्यादा भरोसा कर सकती थी, वही एकमात्र आदमी था, जिससे उसे सबसे बड़ा झूठ बोलना था, और हर गुज़रती शाम के साथ वो झूठ पत्थर की तरह भारी होता जा रहा था।


रात के सन्नाटे में इशिता अपने छोटे से किराए के कमरे में बैठी थी, फ़ोन की नीली रोशनी उसके थके चेहरे पर पड़ रही थी। ... स्क्रीन पर वही अधूरा टुकड़ा, वही एक शब्द जो पिछली रात से उसे दिन-रात नोच रहा था। विक्रय। बेचा गया। एक दस्तख़त के साथ, एक क़ीमत के साथ।

उसे बस एक आवाज़ चाहिए थी, जो इस शक को जड़ से उखाड़ फेंके, हमेशा के लिए। अपने पापा की आवाज़। उसने काँपते हाथों से नंबर मिलाया।

"इशिता? इतनी रात को, बेटा? ... सब ठीक तो है ना? किसी को कोई शक तो नहीं हुआ? तूने कुछ ग़लत तो नहीं..."

"नहीं पापा, सब ठीक है। किसी को कुछ नहीं पता। ... पापा, मुझे बस एक बात पूछनी थी। उस अधिग्रहण के बारे में, दस साल पुरानी बात। ... जब वर्धान ने आपकी तकनीक अपने नाम की, तो क्या उसके साथ कोई काग़ज़ था? कोई सौदा, कोई... विक्रय-पत्र? कोई ख़रीद का दस्तावेज़, कोई दस्तख़त?"

"विक्रय-पत्र?" ... "कौन कहता है विक्रय? ये शब्द तेरे कान में किसने डाला, इशिता? किसने? ... वहाँ कोई विक्रय नहीं था! वो चोरी थी, डाका था, दिन-दहाड़े का डाका! उन्होंने मेरी पूरी ज़िंदगी छीन ली, और उसके ऊपर एक झूठा काग़ज़ चढ़ा दिया, ताकि दुनिया को लगे कि मैंने ख़ुद, अपने हाथों, अपना सब कुछ बेच दिया!"

"पापा... पापा, शांत हो जाइए। ... मैंने आपको कभी ऐसे नहीं देखा। मैं बस समझना चाहती हूँ, ताकि मैं सही सबूत ढूँढ सकूँ। मैं बस..."

"वो काग़ज़ जाली है, बेटा! एक-एक अक्षर झूठा है, एक-एक लाइन!"

"वो नीली स्याही वाला दस्तख़त, दाईं तरफ़ नीचे के कोने में, वर्धान की गोल मुहर के ठीक ऊपर... वो मेरा दस्तख़त नहीं था, कभी नहीं था! और वो तारीख़, चौदह अगस्त... वो भी झूठी है! उस दिन तो मैं शहर में था ही नहीं। ... और वो दूसरा पन्ना, जिस पर वो एक शर्त छपी थी, वो बाद में जोड़ा गया था, मैं जानता हूँ, मैंने... मैंने..."

और इशिता की साँस बीच में ही रुक गई। ... नीली स्याही। दाईं तरफ़ का कोना। मुहर के ठीक ऊपर। चौदह अगस्त। दूसरा पन्ना। वो शर्त।

पर वो काग़ज़ तो पापा ने कभी देखा ही नहीं था। दस साल से वो यही तो कहते आए थे, कि वर्धान ने उन्हें वो दस्तावेज़ कभी देखने ही नहीं दिया, कि अदालत ने उन्हें अकेला, अंधा, हरा दिया, बिना कुछ दिखाए। ... तो फिर उन्हें कैसे पता कि उस 'जाली' काग़ज़ पर दस्तख़त किस स्याही में था, किस कोने में था? किसी काग़ज़ की तारीख़, उसका दूसरा पन्ना, उस पर छपी एक-एक शर्त, ये सब उन्हें रट्टे की तरह कैसे याद, अगर उन्होंने उसे कभी अपनी आँखों से देखा ही नहीं?

"...उन्होंने सब मिलकर मुझे बर्बाद किया, इशिता। सब। ... इशिता? ... बेटा, तू सुन रही है? तू चुप क्यों हो गई?"

"हाँ पापा... ... मैं सुन रही हूँ। मैं... मैं सब सुन रही हूँ।"

दस साल से इशिता जिस एक आवाज़ को अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा, सबसे पक्का सच मानती आई थी, उसी आवाज़ ने अभी-अभी, अनजाने में, एक ऐसी बात कह दी थी जो वो कह ही नहीं सकती थी। ... जिस काग़ज़ को उसके पापा दस साल से 'जाली' कहते आए थे, उसे उन्होंने ख़ुद देखा था। अपनी आँखों से। एक-एक कोने तक, एक-एक तारीख़ तक।

और पहली बार, अपनी पूरी ज़िंदगी में पहली बार, इशिता के मन में वो सवाल उठा जो सबसे ख़तरनाक था, वो सवाल जिसे सोचना भी एक गुनाह जैसा लगा... पापा, आप मुझसे क्या छुपा रहे हैं?

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